'किलकारी' शिशु के जीवन के आरंभिक क्षणों का काव्यमय उत्सव है। यह संग्रह उस मासूम संसार की झलक है, जहाँ हर साँस, हर मुस्कान और हर आँसू जीवन की नयी परिभाषा गढ़ता है। शिशु की पहली किलकारी, उसकी कौतूहल भरी आँखें, नींद में थिरकते होंठ, दूध की गंध पर खिंचती मुस्कान—ये सभी दृश्य कवि की संवेदनशील दृष्टि से कविता बनकर यहाँ जीवित हो उठे हैं।
यह पुस्तक केवल शिशु के हावभावों का वर्णन नहीं करती, बल्कि उन्हें गहन अर्थों में देखती है। शिशु यहाँ केवल परिवार का केंद्र नहीं, बल्कि समाज और मानवता की नई सुबह है। उसकी किलकारी भविष्य का वादा है, उसकी आँखों में चमकती रोशनी आशा का दीप है, और उसकी मासूम नज़र हमें यह याद दिलाती है कि जीवन का सबसे बड़ा सौंदर्य उसकी सरलता और करुणा में निहित है।
कविताओं में माँ की आत्मीयता है, पिता की अपेक्षाएँ हैं और समाज की साझा आकांक्षाएँ भी। हर कविता में पाठक न केवल शिशु को देखेंगे, बल्कि अपने ही बचपन की स्मृतियाँ और अपने भविष्य की संभावनाएँ भी पहचानेंगे। इस संग्रह का प्रत्येक पृष्ठ यह विश्वास दिलाता है कि हर नवजात अपने साथ एक नई संस्कृति, एक नया उत्साह और एक नई रोशनी लेकर आता है।
'किलकारी' का सौंदर्य इसकी सरल और मार्मिक भाषा में है। कवि ने शिशु के अनुभवों को न केवल संवेदनाओं से, बल्कि दार्शनिक दृष्टि से भी जोड़ा है। यही कारण है कि यह पुस्तक केवल माता–पिता या परिवार के लिए ही नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए है जो जीवन की गहराइयों में जाकर मासूमियत और आशा का अनुभव करना चाहता है।
'किलकारी' जीवन के आरंभ की वह काव्यमय गूँज है, जो पाठक को आत्मा तक छू लेगी और यह स्मरण कराएगी कि हर किलकारी में पूरी मानवता की नयी धड़कन छिपी होती है।