लेकिन गाँवों की शांति कई बार नदी की उस सतह जैसी होती है जिसके नीचे तेज धाराएँ बह रही होती हैं।
उसी गाँव में गौरी रहती थी।
कोई बीस-बाईस वर्ष पहले जब वह दुल्हन बनकर इस घर में आई थी, तब उसके सपने भी बाकी लड़कियों जैसे ही थे। उसने सोचा था कि अपना छोटा-सा संसार होगा, पति होगा, बच्चे होंगे, सुख-दुख बाँटने वाला कोई साथी होगा।
परंतु जीवन मनुष्य के सपनों से नहीं, परिस्थितियों से चलता है।
शुरुआत के कुछ वर्ष ठीक गुज़रे। फिर धीरे-धीरे रघु को शराब की लत लग गई।
शराब पहले आदत बनी, फिर ज़रूरत बनी और अंत में मालिक बन गई।
अब घर में जो कुछ था, उसका असली स्वामी रघु नहीं, उसकी शराब थी।
रोटी कम पड़ जाए तो कोई बात नहीं।
बच्चा बीमार पड़ जाए तो कोई बात नहीं।
पत्नी के शरीर पर कपड़े फट जाएँ तो कोई बात नहीं।
लेकिन शराब की बोतल कम नहीं पड़नी चाहिए।
गौरी ने बहुत कोशिश की थी।
समझाया था।
रोई थी।
झगड़ा भी किया था।
फिर चुप भी हो गई थी।
क्योंकि एक गरीब स्त्री के पास विरोध करने के अवसर बहुत कम होते हैं।
समाज उसे बचपन से यही सिखाता है कि सहना ही उसका धर्म है।
जब वह बेटी होती है तो कहा जाता है—
"बेटियाँ ज्यादा नहीं बोलतीं।"
जब वह बहू बनती है तो कहा जाता है—
"ससुराल में सिर झुकाकर रहो।"
जब वह पत्नी बनती है तो कहा जाता है—
"पति जैसा भी हो, भगवान होता है।"
और जब वह माँ बनती है तो कहा जाता है—
"बच्चों के लिए सब सह लो।"
जीवन भर उसे सहने की शिक्षा मिलती है।
केवल एक बात कोई नहीं सिखाता—
कि अन्याय के सामने खड़ा कैसे हुआ जाता है।
गौरी भी सहती रही।
एक दिन।
एक महीना।
एक वर्ष।
फिर दस वर्ष।
धीरे-धीरे सहना उसकी आदत बन गया।
उसे स्वयं भी लगने लगा कि शायद उसका जीवन ऐसा ही है।
शायद हर औरत की किस्मत ऐसी ही होती है।
शायद दर्द ही उसका भाग्य है।
और यही अत्याचार की सबसे बड़ी विजय होती है।
जब पीड़ित व्यक्ति अपने दुख को सामान्य मानने लगे।
10 जून की शाम थी।
आसमान में बादल थे।
गौरी चूल्हे के सामने बैठी रोटियाँ बना रही थी।
आटा कम था।
लकड़ियाँ गीली थीं।
धुआँ आँखों में भर रहा था।
उसी समय रघु शराब पीकर घर लौटा।
उसकी चाल से ही पता चल रहा था कि आज फिर वह होश में नहीं है।
"खाना कहाँ है?"
उसने घर में घुसते ही पूछा।
"बस बन रहा है।"
गौरी ने शांत स्वर में कहा।
बस इतना ही।
केवल चार शब्द।
लेकिन शराब आदमी को शब्दों का अर्थ नहीं, अपमान का भ्रम सुनाती है।
रघु भड़क उठा।
गालियाँ शुरू हो गईं।
गौरी उस दिन बहुत थकी हुई थी।
शायद शरीर से भी और मन से भी।
उसके मुँह से निकल गया—
"हर बार इतना गुस्सा क्यों करते हो?"
यह प्रश्न नहीं था।
वर्षों से दबा हुआ दर्द था।
लेकिन अत्याचारी आदमी दर्द को भी चुनौती समझता है।
रघु बाहर गया।
थोड़ी देर बाद हाथ में मोटी डाल लेकर लौटा।
फिर जो हुआ, उसे देखकर शायद पत्थर भी रो पड़ते।
हर वार के साथ केवल गौरी का शरीर नहीं टूट रहा था।
उसका आत्मसम्मान, उसका विश्वास और उसकी इंसानियत भी घायल हो रही थी।
रात गहरी हो गई।
रघु शराब के नशे में सो गया।
गौरी के शरीर में दर्द की लहरें उठ रही थीं।
लेकिन उससे बड़ा दर्द उसके मन में था।
उसे पहली बार लगा कि अगर वह आज नहीं निकली, तो शायद कभी नहीं निकल पाएगी।
वह धीरे-धीरे उठी।
दरवाज़ा खोला।
और घर से बाहर निकल गई।
गाँव सो रहा था।
कुत्ते भौंक रहे थे।
आसमान में बादल चल रहे थे।
गौरी थाने की ओर बढ़ रही थी।
उसके पैरों में चप्पल भी नहीं थी।
लेकिन उसके भीतर वर्षों से कैद साहस जाग चुका था।
विडंबना देखिए।
जिस समाज ने उसे हमेशा कहा था कि पति परमेश्वर है, उसी समाज से बचने के लिए वह रात के अँधेरे में भाग रही थी।
जिस घर को औरत का स्वर्ग कहा जाता है, उसी घर से वह अपनी जान बचाकर निकल रही थी।
वह मंदिर के पास पहुँची ही थी कि पीछे से किसी ने उसके बाल पकड़ लिए।
रघु था।
शायद उसे भागते देख लिया गया था।
मंदिर के सामने।
भगवान के सामने।
लोगों के सामने।
एक आदमी अपनी पत्नी को पीट रहा था।
और लोग खड़े देख रहे थे।
किसी ने रोकने की कोशिश नहीं की।
क्योंकि हमारे समाज में तमाशबीनों की संख्या हमेशा मददगारों से ज्यादा होती है।
सबको दया आती है।
लेकिन बहुत कम लोगों में साहस आता है।
रघु उसे घसीटकर घर ले आया।
इस बार वह सुनिश्चित करना चाहता था कि गौरी फिर कभी भाग न सके।
उसने लोहे की भारी जंजीर निकाली।
गले में डाल दी।
खंभे से बाँध दिया।
ताला लगा दिया।
गौरी अब एक कैदी थी।
फर्क केवल इतना था कि जेल का अपराधी कानून की सजा काटता है और गौरी किसी अपराध के बिना कैद थी।
लेकिन रघु की क्रूरता यहीं नहीं रुकी।
उसने लोहे की छड़ आग में रख दी।
जब वह लाल हो गई तो उसने उसे गौरी के शरीर से लगा दिया।
चीख पूरे घर में गूँज गई।
फिर दूसरी।
फिर तीसरी।
उस रात केवल गौरी नहीं जली।
मानवता भी जली।
सभ्यता भी जली।
वे सारे आदर्श भी जले जिन पर समाज गर्व करता है।
लगभग चौबीस घंटे तक वह जंजीर से बँधी रही।
भूख लगी।
प्यास लगी।
घाव जलते रहे।
लेकिन उससे भी ज्यादा उसकी आत्मा जल रही थी।
वह सोचती रही—
क्या उसका अपराध केवल इतना था कि उसने पुलिस तक पहुँचने की कोशिश की?
क्या उसका अपराध केवल इतना था कि वह जीना चाहती थी?
अगले दिन रघु बोला—
"पंचायत के सामने कसम खानी होगी कि कभी पुलिस नहीं जाओगी।"
गौरी ने सिर झुका दिया।
उसे पता था कि अभी विरोध करना मृत्यु को बुलाना है।
कभी-कभी साहस का अर्थ लड़ना नहीं, सही समय तक जीवित रहना भी होता है।
रघु पंचायत बुलाने चला गया।
घर में सन्नाटा था।
गौरी अकेली थी।
तभी उसकी नज़र एक पत्थर पर पड़ी।
साधारण-सा पत्थर।
वही पत्थर जिसे शायद लोग रोज़ ठोकर मारकर निकल जाते होंगे।
लेकिन उस दिन वह पत्थर आशा बन गया।
इतिहास गवाह है—
जब-जब इंसान के हाथ से सारे हथियार छिन गए हैं, तब-तब उसने पत्थर से शुरुआत की है।
गौरी घिसटती हुई वहाँ पहुँची।
पहली चोट।
ताला नहीं टूटा।
दूसरी चोट।
कुछ नहीं हुआ।
तीसरी चोट।
हाथ काँपने लगे।
आँखों से आँसू बहने लगे।
लेकिन उसने हार नहीं मानी।
क्योंकि कुछ लड़ाइयाँ जीतने के लिए नहीं, जीने के लिए लड़ी जाती हैं।
चौथी चोट।
पाँचवीं चोट।
और फिर...
ताला टूट गया।
उस क्षण कोई शोर नहीं हुआ।
कोई जयकार नहीं हुई।
कोई तालियाँ नहीं बजीं।
लेकिन एक स्त्री के भीतर वर्षों से कैद स्वतंत्रता मुक्त हो गई।
जंजीर जमीन पर गिर गई।
और उसके साथ भय का एक बड़ा हिस्सा भी।
वह चल पड़ी।
छह किलोमीटर का रास्ता।
घायल शरीर।
जलते घाव।
नंगे पैर।
लेकिन इस बार वह भाग नहीं रही थी।
इस बार वह अपने अधिकार की ओर जा रही थी।
जब वह थाने पहुँची तो पुलिस वाले कुछ क्षणों तक उसे देखते रह गए।
उसके गले में जंजीर का टूटा हिस्सा लटक रहा था।
शरीर पर घाव थे।
आँखों में आँसू थे।
लेकिन उन आँसुओं से भी अधिक चमक उसके साहस में थी।
लोग अक्सर पूछते हैं—
दुनिया की सबसे मजबूत चीज़ क्या है?
लोहा?
पत्थर?
जंजीर?
ताला?
नहीं।
दुनिया की सबसे मजबूत चीज़ वह इच्छा है जो इंसान को कहती है—
"मैं हार नहीं मानूँगा।"
इस कहानी का सबसे भयावह पात्र रघु नहीं है।
रघु जैसे लोग हर युग में रहे हैं।
सबसे भयावह पात्र वह समाज है जो देखता रहता है।
जो कहता है—
"यह उनका निजी मामला है।"
जो पीड़िता से पूछता है—
"तुमने उसे नाराज़ क्यों किया?"
लेकिन अत्याचारी से नहीं पूछता—
"तुम्हें अत्याचार करने का अधिकार किसने दिया?"
और इस कहानी का सबसे सुंदर दृश्य भी ताला टूटने का नहीं है।
सबसे सुंदर दृश्य वह क्षण है जब गौरी ने पत्थर उठाया।
क्योंकि उसी क्षण उसने दुनिया को बता दिया था कि इंसान को हमेशा जंजीरें नहीं बाँधतीं।
कई बार जंजीरें टूट जाती हैं।
और जब एक स्त्री भय के विरुद्ध खड़ी हो जाती है, तब उसकी मुक्ति केवल उसकी अपनी नहीं रहती।
वह उन हजारों स्त्रियों की आशा बन जाती है, जो अब भी किसी अदृश्य जंजीर में बँधी हुई हैं।
उस दिन बरगवां में केवल एक ताला नहीं टूटा था।
उस दिन एक स्त्री ने यह सिद्ध कर दिया था कि अत्याचार कितना भी पुराना क्यों न हो, साहस उससे हमेशा एक दिन बड़ा होता है।