Tuesday, June 16, 2026

गौरी

बरगवां गाँव बहुत बड़ा नहीं था। पचास-साठ घरों का एक साधारण-सा गाँव। चारों ओर खेत, बीच में पीपल का पुराना पेड़, उसके पास छोटा-सा मंदिर और थोड़ी दूर पर पंचायत भवन। बाहर से देखने पर गाँव शांत दिखाई देता था, जैसे वहाँ सब कुछ ठीक हो।
लेकिन गाँवों की शांति कई बार नदी की उस सतह जैसी होती है जिसके नीचे तेज धाराएँ बह रही होती हैं।
उसी गाँव में गौरी रहती थी।
कोई बीस-बाईस वर्ष पहले जब वह दुल्हन बनकर इस घर में आई थी, तब उसके सपने भी बाकी लड़कियों जैसे ही थे। उसने सोचा था कि अपना छोटा-सा संसार होगा, पति होगा, बच्चे होंगे, सुख-दुख बाँटने वाला कोई साथी होगा।
परंतु जीवन मनुष्य के सपनों से नहीं, परिस्थितियों से चलता है।
शुरुआत के कुछ वर्ष ठीक गुज़रे। फिर धीरे-धीरे रघु को शराब की लत लग गई।
शराब पहले आदत बनी, फिर ज़रूरत बनी और अंत में मालिक बन गई।
अब घर में जो कुछ था, उसका असली स्वामी रघु नहीं, उसकी शराब थी।
रोटी कम पड़ जाए तो कोई बात नहीं।
बच्चा बीमार पड़ जाए तो कोई बात नहीं।
पत्नी के शरीर पर कपड़े फट जाएँ तो कोई बात नहीं।
लेकिन शराब की बोतल कम नहीं पड़नी चाहिए।
गौरी ने बहुत कोशिश की थी।
समझाया था।
रोई थी।
झगड़ा भी किया था।
फिर चुप भी हो गई थी।
क्योंकि एक गरीब स्त्री के पास विरोध करने के अवसर बहुत कम होते हैं।
समाज उसे बचपन से यही सिखाता है कि सहना ही उसका धर्म है।
जब वह बेटी होती है तो कहा जाता है—
"बेटियाँ ज्यादा नहीं बोलतीं।"
जब वह बहू बनती है तो कहा जाता है—
"ससुराल में सिर झुकाकर रहो।"
जब वह पत्नी बनती है तो कहा जाता है—
"पति जैसा भी हो, भगवान होता है।"
और जब वह माँ बनती है तो कहा जाता है—
"बच्चों के लिए सब सह लो।"
जीवन भर उसे सहने की शिक्षा मिलती है।
केवल एक बात कोई नहीं सिखाता—
कि अन्याय के सामने खड़ा कैसे हुआ जाता है।
गौरी भी सहती रही।
एक दिन।
एक महीना।
एक वर्ष।
फिर दस वर्ष।
धीरे-धीरे सहना उसकी आदत बन गया।
उसे स्वयं भी लगने लगा कि शायद उसका जीवन ऐसा ही है।
शायद हर औरत की किस्मत ऐसी ही होती है।
शायद दर्द ही उसका भाग्य है।
और यही अत्याचार की सबसे बड़ी विजय होती है।
जब पीड़ित व्यक्ति अपने दुख को सामान्य मानने लगे।
10 जून की शाम थी।
आसमान में बादल थे।
गौरी चूल्हे के सामने बैठी रोटियाँ बना रही थी।
आटा कम था।
लकड़ियाँ गीली थीं।
धुआँ आँखों में भर रहा था।
उसी समय रघु शराब पीकर घर लौटा।
उसकी चाल से ही पता चल रहा था कि आज फिर वह होश में नहीं है।
"खाना कहाँ है?"
उसने घर में घुसते ही पूछा।
"बस बन रहा है।"
गौरी ने शांत स्वर में कहा।
बस इतना ही।
केवल चार शब्द।
लेकिन शराब आदमी को शब्दों का अर्थ नहीं, अपमान का भ्रम सुनाती है।
रघु भड़क उठा।
गालियाँ शुरू हो गईं।
गौरी उस दिन बहुत थकी हुई थी।
शायद शरीर से भी और मन से भी।
उसके मुँह से निकल गया—
"हर बार इतना गुस्सा क्यों करते हो?"
यह प्रश्न नहीं था।
वर्षों से दबा हुआ दर्द था।
लेकिन अत्याचारी आदमी दर्द को भी चुनौती समझता है।
रघु बाहर गया।
थोड़ी देर बाद हाथ में मोटी डाल लेकर लौटा।
फिर जो हुआ, उसे देखकर शायद पत्थर भी रो पड़ते।
हर वार के साथ केवल गौरी का शरीर नहीं टूट रहा था।
उसका आत्मसम्मान, उसका विश्वास और उसकी इंसानियत भी घायल हो रही थी।
रात गहरी हो गई।
रघु शराब के नशे में सो गया।
गौरी के शरीर में दर्द की लहरें उठ रही थीं।
लेकिन उससे बड़ा दर्द उसके मन में था।
उसे पहली बार लगा कि अगर वह आज नहीं निकली, तो शायद कभी नहीं निकल पाएगी।
वह धीरे-धीरे उठी।
दरवाज़ा खोला।
और घर से बाहर निकल गई।
गाँव सो रहा था।
कुत्ते भौंक रहे थे।
आसमान में बादल चल रहे थे।
गौरी थाने की ओर बढ़ रही थी।
उसके पैरों में चप्पल भी नहीं थी।
लेकिन उसके भीतर वर्षों से कैद साहस जाग चुका था।
विडंबना देखिए।
जिस समाज ने उसे हमेशा कहा था कि पति परमेश्वर है, उसी समाज से बचने के लिए वह रात के अँधेरे में भाग रही थी।
जिस घर को औरत का स्वर्ग कहा जाता है, उसी घर से वह अपनी जान बचाकर निकल रही थी।
वह मंदिर के पास पहुँची ही थी कि पीछे से किसी ने उसके बाल पकड़ लिए।
रघु था।
शायद उसे भागते देख लिया गया था।
मंदिर के सामने।
भगवान के सामने।
लोगों के सामने।
एक आदमी अपनी पत्नी को पीट रहा था।
और लोग खड़े देख रहे थे।
किसी ने रोकने की कोशिश नहीं की।
क्योंकि हमारे समाज में तमाशबीनों की संख्या हमेशा मददगारों से ज्यादा होती है।
सबको दया आती है।
लेकिन बहुत कम लोगों में साहस आता है।
रघु उसे घसीटकर घर ले आया।
इस बार वह सुनिश्चित करना चाहता था कि गौरी फिर कभी भाग न सके।
उसने लोहे की भारी जंजीर निकाली।
गले में डाल दी।
खंभे से बाँध दिया।
ताला लगा दिया।
गौरी अब एक कैदी थी।
फर्क केवल इतना था कि जेल का अपराधी कानून की सजा काटता है और गौरी किसी अपराध के बिना कैद थी।
लेकिन रघु की क्रूरता यहीं नहीं रुकी।
उसने लोहे की छड़ आग में रख दी।
जब वह लाल हो गई तो उसने उसे गौरी के शरीर से लगा दिया।
चीख पूरे घर में गूँज गई।
फिर दूसरी।
फिर तीसरी।
उस रात केवल गौरी नहीं जली।
मानवता भी जली।
सभ्यता भी जली।
वे सारे आदर्श भी जले जिन पर समाज गर्व करता है।
लगभग चौबीस घंटे तक वह जंजीर से बँधी रही।
भूख लगी।
प्यास लगी।
घाव जलते रहे।
लेकिन उससे भी ज्यादा उसकी आत्मा जल रही थी।
वह सोचती रही—
क्या उसका अपराध केवल इतना था कि उसने पुलिस तक पहुँचने की कोशिश की?
क्या उसका अपराध केवल इतना था कि वह जीना चाहती थी?
अगले दिन रघु बोला—
"पंचायत के सामने कसम खानी होगी कि कभी पुलिस नहीं जाओगी।"
गौरी ने सिर झुका दिया।
उसे पता था कि अभी विरोध करना मृत्यु को बुलाना है।
कभी-कभी साहस का अर्थ लड़ना नहीं, सही समय तक जीवित रहना भी होता है।
रघु पंचायत बुलाने चला गया।
घर में सन्नाटा था।
गौरी अकेली थी।
तभी उसकी नज़र एक पत्थर पर पड़ी।
साधारण-सा पत्थर।
वही पत्थर जिसे शायद लोग रोज़ ठोकर मारकर निकल जाते होंगे।
लेकिन उस दिन वह पत्थर आशा बन गया।
इतिहास गवाह है—
जब-जब इंसान के हाथ से सारे हथियार छिन गए हैं, तब-तब उसने पत्थर से शुरुआत की है।
गौरी घिसटती हुई वहाँ पहुँची।
पहली चोट।
ताला नहीं टूटा।
दूसरी चोट।
कुछ नहीं हुआ।
तीसरी चोट।
हाथ काँपने लगे।
आँखों से आँसू बहने लगे।
लेकिन उसने हार नहीं मानी।
क्योंकि कुछ लड़ाइयाँ जीतने के लिए नहीं, जीने के लिए लड़ी जाती हैं।
चौथी चोट।
पाँचवीं चोट।
और फिर...
ताला टूट गया।
उस क्षण कोई शोर नहीं हुआ।
कोई जयकार नहीं हुई।
कोई तालियाँ नहीं बजीं।
लेकिन एक स्त्री के भीतर वर्षों से कैद स्वतंत्रता मुक्त हो गई।
जंजीर जमीन पर गिर गई।
और उसके साथ भय का एक बड़ा हिस्सा भी।
वह चल पड़ी।
छह किलोमीटर का रास्ता।
घायल शरीर।
जलते घाव।
नंगे पैर।
लेकिन इस बार वह भाग नहीं रही थी।
इस बार वह अपने अधिकार की ओर जा रही थी।
जब वह थाने पहुँची तो पुलिस वाले कुछ क्षणों तक उसे देखते रह गए।
उसके गले में जंजीर का टूटा हिस्सा लटक रहा था।
शरीर पर घाव थे।
आँखों में आँसू थे।
लेकिन उन आँसुओं से भी अधिक चमक उसके साहस में थी।
लोग अक्सर पूछते हैं—
दुनिया की सबसे मजबूत चीज़ क्या है?
लोहा?
पत्थर?
जंजीर?
ताला?
नहीं।
दुनिया की सबसे मजबूत चीज़ वह इच्छा है जो इंसान को कहती है—
"मैं हार नहीं मानूँगा।"
इस कहानी का सबसे भयावह पात्र रघु नहीं है।
रघु जैसे लोग हर युग में रहे हैं।
सबसे भयावह पात्र वह समाज है जो देखता रहता है।
जो कहता है—
"यह उनका निजी मामला है।"
जो पीड़िता से पूछता है—
"तुमने उसे नाराज़ क्यों किया?"
लेकिन अत्याचारी से नहीं पूछता—
"तुम्हें अत्याचार करने का अधिकार किसने दिया?"
और इस कहानी का सबसे सुंदर दृश्य भी ताला टूटने का नहीं है।
सबसे सुंदर दृश्य वह क्षण है जब गौरी ने पत्थर उठाया।
क्योंकि उसी क्षण उसने दुनिया को बता दिया था कि इंसान को हमेशा जंजीरें नहीं बाँधतीं।
कई बार जंजीरें टूट जाती हैं।
और जब एक स्त्री भय के विरुद्ध खड़ी हो जाती है, तब उसकी मुक्ति केवल उसकी अपनी नहीं रहती।
वह उन हजारों स्त्रियों की आशा बन जाती है, जो अब भी किसी अदृश्य जंजीर में बँधी हुई हैं।
उस दिन बरगवां में केवल एक ताला नहीं टूटा था।
उस दिन एक स्त्री ने यह सिद्ध कर दिया था कि अत्याचार कितना भी पुराना क्यों न हो, साहस उससे हमेशा एक दिन बड़ा होता है।

Friday, June 12, 2026

मृत्यु भोज

माँ का श्राद्ध
(प्रेमचंद की शैली से प्रेरित एक कहानी)
बरसात अभी-अभी विदा हुई थी। गाँव के बाहर पीपल के पेड़ से टपकती बूंदें अब भी धरती पर गिर रही थीं। घरों के आँगन में नमी थी और हवा में एक अजीब-सी उदासी।
रामदीन के घर भी उदासी थी।
दस दिन पहले उसकी पत्नी कौशल्या मर गई थी।
पचपन वर्षों का साथ था। लड़ते-झगड़ते, हँसते-रोते, अभावों में जीवन काटते-काटते दोनों बूढ़े हो गए थे। कौशल्या चली गई, पर रामदीन को ऐसा लगता था जैसे घर का आधा हिस्सा उखड़ गया हो।
चार बेटे थे उसके।
रघुवीर, महेंद्र, सुरेश और सबसे छोटा शुभम।
चारों के लिए कौशल्या ने एक-सा कष्ट उठाया था। किसी को कम दूध नहीं पिलाया था, किसी के बुखार में कम रातें नहीं काटी थीं।
लेकिन माँ की चिता की राख ठंडी होते-होते बेटों के दिल ठंडे पड़ गए।
श्राद्ध की तैयारी चल रही थी।
गाँव के लोग सलाह दे रहे थे।
कोई कहता, "सौ आदमी खिलाना।"
कोई कहता, "नहीं, दो सौ से कम हुए तो लोग क्या कहेंगे?"
मृत्यु पर भी लोगों को सबसे अधिक चिंता इस बात की थी कि लोग क्या कहेंगे।
रामदीन चुप बैठा सुनता रहता।
जिस स्त्री ने जीवन भर दो वक़्त की रोटी जुटाने के लिए संघर्ष किया, उसकी आत्मा की शांति अब पचास किलो घी और सौ किलो आटे पर निर्भर कर गई थी।
उसे यह बात कभी समझ नहीं आई।
एक शाम चारों बेटे बैठकर खर्च का हिसाब कर रहे थे।
बात यहीं से बिगड़ी।
रघुवीर बोला, "हम दोनों बड़े भाई अलग श्राद्ध करेंगे।"
महेंद्र ने समर्थन किया।
"हाँ, हम अलग करेंगे।"
सुरेश चौंका।
"अलग क्यों?"
"हमारी इच्छा।"
सबसे छोटा शुभम अब तक चुप था।
उसने धीरे से कहा,
"माँ एक थी। श्राद्ध दो कैसे होंगे?"
रघुवीर का चेहरा तमतमा गया।
"हम जैसा चाहें करेंगे।"
"लेकिन गाँव क्या सोचेगा?"
"गाँव को सोचने दो।"
शुभम ने पिता की ओर देखा।
रामदीन सिर झुकाए बैठा था।
वह जानता था कि यह झगड़ा श्राद्ध का नहीं है।
यह वर्षों से जमा अहंकार का झगड़ा है।
माँ तो केवल बहाना है।
उस रात बहस बढ़ी।
पुराने हिसाब खुलने लगे।
किसने किसकी मदद की।
किसने नहीं की।
किसने ज्यादा खर्च किया।
किसने कम किया।
मृत माँ धीरे-धीरे गायब हो गई।
बचे केवल जीवित लोगों के अहंकार।
शुभम बार-बार एक ही बात कहता रहा—
"चार भाई हैं तो चारों साथ करेंगे।"
उसे लगता था कि यह केवल एक रस्म नहीं, माँ के प्रति अंतिम सम्मान है।
लेकिन कभी-कभी सबसे सरल बात ही सबसे कठिन हो जाती है।
रघुवीर की आवाज़ ऊँची होती गई।
महेंद्र भी उत्तेजित हो उठा।
सुरेश बीच-बचाव करता रहा।
और फिर वह क्षण आया जो किसी ने नहीं सोचा था।
रघुवीर भीतर गया।
लौटा तो हाथ में बंदूक थी।
गाँवों में बंदूकें अक्सर सुरक्षा से ज्यादा अहंकार की वस्तु होती हैं।
लोग समझे, डराने आया है।
शुभम फिर भी नहीं डरा।
वह बोला—
"भैया, माँ के नाम पर कम-से-कम..."
वाक्य पूरा नहीं हुआ।
धमाका हुआ।
सन्नाटा छा गया।
शुभम जमीन पर गिर पड़ा।
उसकी छाती से बहता रक्त मिट्टी में समाने लगा।
वह मिट्टी, जिसमें कभी उसकी माँ ने नंगे पैर चलकर उसे स्कूल पहुँचाया था।
कुछ ही क्षणों में सब समाप्त हो गया।
लोग भागे।
औरतें चीखीं।
बच्चे रोने लगे।
पर जो होना था, हो चुका था।
माँ के श्राद्ध की तैयारी के बीच बेटे की अर्थी तैयार होने लगी।
अगले दिन रामदीन आँगन में बैठा था।
एक ओर पत्नी की तस्वीर थी।
दूसरी ओर बेटे का शव।
गाँव भर के लोग आए।
सांत्वना देने।
सलाह देने।
अफसोस जताने।
कुछ लोग घटना की चर्चा कर रहे थे।
कुछ कानून की।
कुछ प्रतिष्ठा की।
लेकिन किसी के पास उस बूढ़े पिता के लिए शब्द नहीं थे।
वह चुप बैठा रहा।
बहुत देर बाद उसने तस्वीर की ओर देखा और बुदबुदाया—
"कौशल्या, देख रही हो न?"
बस इतना ही।
उसकी आँखों से आँसू भी नहीं निकले।
कुछ दुख इतने बड़े होते हैं कि आँसू भी उनका भार नहीं उठा पाते।
श्राद्ध हुआ।
भोज भी हुआ।
लोग खाकर चले गए।
किसी ने पूड़ी की तारीफ की।
किसी ने सब्जी की।
किसी ने कहा व्यवस्था अच्छी थी।
जैसे हर मृत्युभोज के बाद कहा जाता है।
लेकिन उस घर में दो मृत आत्माओं के नाम पर बना भोजन किसी को यह नहीं बता सका कि शांति आखिर होती क्या है।
यदि आत्माएँ सचमुच देखती होंगी, तो उस दिन कौशल्या ने अवश्य सोचा होगा—
"मैंने बेटों को रोटी बाँटना सिखाया था, वे मुझे ही बाँटने लगे।"
और शायद शुभम की आत्मा ने भी यही पूछा होगा—
"जिस प्रेम को बचाने के लिए मैं खड़ा था, क्या वह इतना कमजोर था कि एक गोली से मर गया?"
गाँव में जीवन फिर सामान्य हो गया।
लोग अपने-अपने कामों में लग गए।
पर रामदीन जब भी शाम को चौखट पर बैठता, उसे लगता—
उसकी पत्नी की मृत्यु केवल एक बार नहीं हुई।
वह उस दिन दूसरी बार भी मरी थी,
जब उसके बेटे उसकी स्मृति को अपने अहंकार से छोटा साबित करने पर उतारू हो गए थे।

Thursday, June 11, 2026

दूसरा बैल

दूसरा बैल

सुबह का समय था। सूरज अभी पूरी तरह निकला नहीं था, लेकिन खेतों में काम शुरू हो चुका था। गाँव के किसान अपने-अपने बैलों के साथ खेतों की ओर जा रहे थे।
रामसेवक अपने घर के बाहर चौखट पर बैठा था। उसकी आँखें सामने बँधे खाली जुए पर टिकी थीं।
कल तक वहाँ दो बैल हुआ करते थे।
अब एक ही बचा था।
दूसरा अचानक मर गया था।
बैल कोई साधारण पशु नहीं होता। किसान के लिए वह खेत का हाथ होता है। उसके बिना खेत ऐसा लगता है जैसे आदमी बिना एक बाँह के खड़ा हो।
रामसेवक सारी रात सो नहीं पाया था।
घर में पैसे नहीं थे। साहूकार का पुराना कर्ज़ पहले से सिर पर था। नया बैल खरीदने की बात सोचना भी उसके लिए वैसा ही था जैसे कोई भूखा आदमी महल का सपना देखे।
उसकी पत्नी गंगा चूल्हे के पास बैठी थी। चूल्हे में आग कम थी और चिंता अधिक।
"आज खेत नहीं जाओगे?" उसने धीरे से पूछा।
रामसेवक ने सिर झुका लिया।
"एक बैल से क्या होगा?"
गंगा कुछ देर चुप रही। फिर उठी और बाहर चली गई।
आँगन में खड़ा बचा हुआ बैल चारा खा रहा था।
गंगा उसकी ओर देखती रही।
उसे अपने बच्चों के चेहरे याद आए। घर का खाली अनाज का डिब्बा याद आया। पिछली बार साहूकार की धमकी याद आई।
उसने एक लंबी साँस ली।
"चलो खेत।"
रामसेवक ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा।
"कैसे?"
"जैसे गरीब जीता है।"
थोड़ी देर बाद खेत में एक विचित्र दृश्य था।
जुए की एक ओर बैल था।
दूसरी ओर गंगा।
रामसेवक पीछे से हल पकड़े हुए था।
धरती चीरती हुई फाल आगे बढ़ रही थी।
गंगा के कंधे काँप रहे थे।
पैर मिट्टी में धँसते थे।
माथे से पसीना टपककर धरती में मिल जाता था।
लेकिन वह रुकी नहीं।
रामसेवक कई बार चाहता कि हल छोड़ दे, सब कुछ छोड़ दे। मगर छोड़कर जाता कहाँ?
भूख आदमी को बहुत कुछ करा देती है।
दोपहर तक खेत का एक हिस्सा जोता जा चुका था।
आस-पास के किसान काम छोड़कर देखने लगे।
कुछ की आँखों में दया थी।
कुछ की आँखों में लाचारी।
क्योंकि वे जानते थे कि आज जो इस खेत में हो रहा है, वह किसी एक घर की कहानी नहीं है।
यह उन सबकी कहानी है जिनके हाथों की मेहनत से अन्न उगता है, पर जिनके घरों में अक्सर सबसे पहले अभाव प्रवेश करता है।
शाम को काम समाप्त हुआ।
गंगा थककर मेड़ पर बैठ गई।
उसके कंधे छिल गए थे।
रामसेवक ने उसकी ओर देखा।
पहली बार उसे लगा कि उसकी पत्नी केवल उसकी जीवनसंगिनी नहीं है।
वह उसके दुख की साझीदार है।
उसकी भूख की साझीदार है।
उसकी लड़ाई की साझीदार है।
और आज तो वह सचमुच उसका दूसरा बैल बन गई थी।
दूर कहीं सूर्य अस्त हो रहा था।
उसकी लालिमा खेत पर बिखरी हुई थी।
ऐसा लगता था मानो धरती स्वयं उस स्त्री के घायल कंधों पर अपना हाथ रखकर कह रही हो—
"मैं तुम्हारा दर्द जानती हूँ। क्योंकि मेरे सीने पर हल चलाने वाले हाथ हमेशा सबसे अधिक घायल रहे हैं।"

Wednesday, May 27, 2026

हाशिमपुरा

मई 1987 की वह गर्मी आज भी मेरठ की गलियों में कहीं न कहीं दबी पड़ी होगी।
धूल उड़ती होगी तो उसके साथ कुछ अधजली स्मृतियाँ भी उठती होंगी।
क्योंकि कुछ घटनाएँ शहरों में नहीं घटतीं — वे मनुष्यता की आत्मा में घटती हैं।
हाशिमपुरा ऐसा ही एक नाम है।
वह कोई अमीरों का इलाका नहीं था।
न वहाँ बड़ी कोठियाँ थीं, न ऊँची दीवारें।
छोटे-छोटे घर थे, जिनकी छतों पर बच्चे पतंग उड़ाते थे।
गलियों में करघों की आवाज़ आती थी।
किसी घर में सिलाई मशीन चलती थी, कहीं कोई बूढ़ा रेडियो पर समाचार सुनता था।
गरीबी थी, मगर जीवन था।
उन दिनों मेरठ दंगों की आग में था।
नेताओं के भाषणों में धर्म था,
अख़बारों में भय था,
और आम आदमी के हिस्से में केवल असुरक्षा।
हिंदू अपने घरों में डरे बैठे थे।
मुसलमान अपने घरों में डरे बैठे थे।
और राजनीति दोनों के डर पर रोटियाँ सेंक रही थी।
दंगों के समय सबसे सुरक्षित लोग वही होते हैं
जिनके पास बड़ी गाड़ियाँ और ऊँची पहुँच होती है।
मरता हमेशा गरीब है।
जिसके पास न नेता का फोन नंबर होता है,
न पुलिस कप्तान तक पहुँच।
22 मई की शाम थी।
सूरज ढल रहा था।
मोहल्ले में खबर फैल गई कि पीएसी आई है।
लोगों ने सोचा — तलाशी होगी, पूछताछ होगी, फिर सब शांत हो जाएगा।
वर्दी पर उस समय भी लोग भरोसा करते थे।
गरीब आदमी के पास भरोसा करने के अलावा और होता भी क्या है?
जवान घरों में घुसे।
पुरुषों को बाहर निकाला जाने लगा।
किसी को दाढ़ी से पकड़ा गया,
किसी को गाली देकर धक्का दिया गया।
एक बूढ़ी माँ अपने बेटे से लिपट गई —
“साहब, ये कहीं नहीं गया, घर पर ही था…”
लेकिन दंगों के दिनों में सफाइयाँ नहीं सुनी जातीं।
तब नाम देखे जाते हैं, चेहरे नहीं।
कुछ लड़के बनियान में ही उठा लिए गए।
किसी की चप्पल पीछे छूट गई।
एक आदमी बार-बार कह रहा था —
“मुझे दवा खानी है… मुझे शुगर है…”
पर बंदूकें बीमारियाँ नहीं सुनतीं।
फिर उन्हें ट्रक में भर दिया गया।
मोहल्ले के लोग देर तक देखते रहे।
किसी पत्नी ने सोचा — “थाने ले जा रहे होंगे, सुबह लौट आएँगे।”
एक बच्चा ट्रक के पीछे भागा भी,
मगर किसी ने उसे पकड़कर रोक लिया।
ट्रक चल पड़ा।
उस ट्रक में बैठे लोगों को अब डर लगने लगा था।
शुरू में वे आपस में बातें कर रहे थे।
फिर धीरे-धीरे सब चुप हो गए।
मनुष्य जब बहुत डर जाता है,
तो सबसे पहले उसकी आवाज़ मरती है।
रास्ते भर केवल इंजन गरजता रहा।
उनमें कोई दर्जी था,
कोई मजदूर,
कोई करघा चलाने वाला।
वे इतिहास बदलने नहीं निकले थे।
वे केवल अपनी रोज़ी कमाने वाले लोग थे।
लेकिन इतिहास को जब रक्त चाहिए होता है,
तो वह सबसे पहले गरीबों को चुनता है।
रात गहरा चुकी थी जब ट्रक ऊपरी गंगा नहर के पास रुका।
चारों ओर सन्नाटा था।
दूर कहीं कुत्ता भौंका।
पानी बह रहा था — उदास, अंधा, निरपेक्ष।
फिर लोगों को नीचे उतारा जाने लगा।
अब उन्हें समझ आने लगा था कि कुछ भयानक होने वाला है।
किसी ने कुरान की आयत पढ़नी शुरू की।
किसी ने रोते हुए कहा — “हमें छोड़ दो साहब, हमने क्या किया है?”
किसी ने अपने बच्चों का नाम लिया।
लेकिन सत्ता जब भय में बदल जाती है,
तब उसे प्रार्थनाएँ सुनाई नहीं देतीं।
फिर गोलियाँ चलीं।
एक-एक कर लोग गिरते गए।
कुछ सीधे नहर में गिरे।
कुछ तड़पते रहे।
कुछ घायल होकर मृत शरीरों के नीचे दब गए और साँस रोककर पड़े रहे।
उस रात पानी केवल पानी नहीं था।
वह राज्य और नागरिक के बीच टूटे विश्वास का दर्पण था।
सुबह अख़बारों में खबर आई।
संख्या लिखी गई।
“इतने मारे गए…”
संख्याएँ हमेशा बड़ी निर्दयी होती हैं।
वे यह नहीं बतातीं कि मरने वालों में एक आदमी ऐसा भी था जिसकी बेटी की शादी अगले महीने थी।
एक ऐसा भी था जिसने सुबह निकलते समय पत्नी से कहा था — “रात को जल्दी लौटूँगा।”
एक ऐसा भी था जो अपने बेटे के लिए बाज़ार से जूते खरीदने वाला था।
सरकारी बयान आए।
जाँच बैठी।
फाइलें खुलीं।
फिर बंद हुईं।
वर्ष बीतते गए।
कुछ गवाह बूढ़े हो गए।
कुछ मर गए।
कुछ अदालतों के चक्कर लगाते रहे।
और देश आगे बढ़ता रहा —
जैसे देशों की आदत होती है।
लेकिन हाशिमपुरा वहीं अटका रहा।
वह हर उस माँ की आँख में रह गया
जिसने वर्दी देखकर अपने बेटे को सुरक्षित समझा था।
वह हर उस गरीब आदमी की चुप्पी में रह गया
जो जान गया था कि इस देश में न्याय भी कभी-कभी आदमी का नाम पूछकर आता है।
प्रेमचंद होते तो शायद लिखते—
इस देश में गरीब आदमी की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं कि वह मर जाता है,
बल्कि यह है कि उसकी मृत्यु भी कुछ दिनों बाद केवल एक “मामला” बनकर रह जाती है।
और फिर एक दिन फाइलों की धूल में दब जाती है,
ठीक वैसे ही
जैसे शहरों की नालियों में बहता हुआ रक्त
कुछ बरसातों बाद मिट्टी में मिल जाता है।

रैली

रैली
“अरे बुधई काका! तैयार हो गए कि नहीं? ट्रैक्टर निकल जाएगा फिर मत कहना कि बताये नहीं…”
बाहर से आती आवाज सुनकर बुधई ने अपनी टूटी खाट से उठने की कोशिश की। घुटनों में जैसे किसी ने गरम सीसा भर दिया हो। दीवार पकड़कर धीरे-धीरे उठा और कोने में टंगी अपनी मटमैली कमीज पहनने लगा।
“आ रहे हैं भइया… इतना भी क्या हड़बड़ी है…”
दरवाजे पर खड़ा हरिचरण हँस पड़ा—
“हड़बड़ी नहीं करेंगे तो सौ रुपया कैसे मिलेगा काका! नेताजी खुद दे रहे हैं। बस भी है, खाना भी मिलेगा। ऊपर से शहर घूमना अलग।”
“हाँ रे… सौ रुपया…”
बुधई ने जैसे खुद से कहा।
पूरा घर नजरों के सामने घूम गया।
छप्पर से टपकता पानी।
चूल्हे के पास खाली कनस्तर।
कोने में खाँसती उसकी बीमार पत्नी फूलमती।
और चारपाई पर बैठी उसकी पोती गुड़िया, जो सुबह से रोटी माँगते-माँगते अब चुप हो गई थी।
बुधई ने जाते-जाते फूलमती से कहा—
“देख, शाम तक आ जाऊँगा। सौ रुपया मिलेगा। आते में दवा भी लेता आऊँगा… और गुड़िया के लिए बिस्कुट भी…”
फूलमती ने बस उसे देखा।
वह जानती थी—इस घर में अब सपने भी उधार पर पलते हैं।
गांव के बाहर पहले से ही कई ट्रैक्टर-ट्रॉलियाँ खड़ी थीं। हर ट्रॉली में आदमी ऐसे भरे थे जैसे बोरे में आलू। कुछ लोग झंडे पकड़े थे, कुछ को अभी तक यह भी नहीं पता था कि रैली किस बात की है।
एक लड़का झंडे बाँटता हुआ चिल्ला रहा था—
“सब लोग याद रखना! जब नेताजी हाथ उठाएँ तो जोर से बोलना—‘नेताजी जिंदाबाद!’”
भीड़ में किसी ने पूछा—
“नेताजी आएँगे किसलिए?”
दूसरा बोला—
“अरे वही… गरीबों के विकास के लिए।”
सब हँस पड़े।
बुधई भी हल्का मुस्कुराया, फिर खाँसी का दौरा पड़ गया।
ट्रॉली चल पड़ी।
धूल उड़ाती सड़क पर घंटों हिचकोले खाते हुए लोग शहर पहुँचे। बुधई ने शायद पहली बार इतना बड़ा शहर देखा था। ऊँची-ऊँची इमारतें, चमचमाती दुकानें, बड़े-बड़े पोस्टर जिनमें नेताजी मुस्कुरा रहे थे—ठीक वैसे जैसे कोई आदमी फोटो में मुस्कुराता है, असल जिंदगी में नहीं।
रैली मैदान में जनसमूह उमड़ा पड़ा था।
लाउडस्पीकर फट रहे थे—
“गरीबों का मसीहा कौन?”
भीड़ चिल्लाती—
“नेताजी! नेताजी!”
बुधई को प्यास लगी थी। सुबह से उसने सिर्फ आधी सूखी रोटी खाई थी। पानी लेने गया तो वहाँ भी लंबी लाइन।
उधर मंच पर नेताजी हेलीकॉप्टर से उतरे।
भीड़ अचानक पागल हो उठी।
लोग धक्का देने लगे।
झंडे हवा में लहराने लगे।
किसी ने बुधई को पीछे से ऐसा धक्का दिया कि वह गिर पड़ा।
उसके ऊपर कई पैर चढ़ गए।
“अरे बचाओ…”
उसकी आवाज नारों में दब गई।
किसी तरह एक लड़के ने उसे उठाया।
“काका मरना है क्या? किनारे बैठो!”
बुधई हाँफता हुआ मैदान के कोने में बैठ गया। दूर मंच पर नेताजी गरज रहे थे—
“हम गरीबों के सम्मान की लड़ाई लड़ रहे हैं!”
तालियाँ गूँज उठीं।
“हमने हर गरीब के घर विकास पहुँचाया है!”
भीड़ फिर चीखी—
“जिंदाबाद!”
बुधई को अचानक गुड़िया याद आई।
सुबह वह कह रही थी—
“बाबा, लौटते में मेरे लिए लाल वाली टॉफी लाना…”
उसने जेब टटोली।
अभी सौ रुपया मिला नहीं था।
शाम तक रैली खत्म हुई।
अब पैसा बाँटने की बारी आई।
लोग टूट पड़े।
धक्का-मुक्की के बीच किसी ने बुधई के हाथ में एक मुड़ा-तुड़ा सौ का नोट थमा दिया। वह नोट उसने ऐसे पकड़ा जैसे कोई भूखा आदमी आखिरी रोटी पकड़ता है।
उसने राहत की साँस ली।
“चलो… दवा आ जाएगी… गुड़िया के लिए बिस्कुट भी…”
लेकिन विडंबनाएँ अभी बाकी थीं।
बसें कम पड़ गईं।
हजारों लोग सड़क पर छूट गए।
कुछ लोग ट्रैक्टरों पर चढ़ गए, कुछ पैदल निकल पड़े। बुधई भी लाठी टेकता हुआ चलने लगा।
रात घिर आई थी।
शहर से बाहर निकलते ही तेज बारिश शुरू हो गई।
बुधई एक बंद दुकान के छज्जे के नीचे खड़ा हो गया। वहीं उसे याद आया कि उसने दवा नहीं खरीदी।
पास की मेडिकल दुकान बंद हो चुकी थी।
वह देर तक बंद शटर को देखता रहा।
फिर धीरे-धीरे चल पड़ा।
रास्ते में भूख लगी तो उसने सोचा कुछ खा ले। एक ढाबे पर जाकर पूछा—
“भइया… दस रुपये की चाय मिल जाएगी?”
ढाबे वाले ने ऊपर से नीचे तक देखा—भीगा हुआ बूढ़ा, कीचड़ सनी धोती, काँपते हाथ।
“पहले पैसे दिखाओ।”
बुधई ने जेब में हाथ डाला।
जेब खाली थी।
वह घबरा गया।
दूसरी जेब टटोली।
कमीज टटोली।
धोती की गाँठ खोली।
सौ का नोट गायब था।
शायद भीड़ में… या बारिश में… या रास्ते में कहीं गिर गया था।
कुछ देर तक वह सड़क किनारे खड़ा रहा।
बारिश उसके चेहरे पर गिरती रही।
फिर अचानक वह हँस पड़ा।
धीरे-धीरे… सूखी हुई हँसी।
“गरीब के हाथ में पैसा भी मेहमान जैसा होता है… टिकता कहाँ है…”
आधी रात के करीब वह गांव पहुँचा।
गांव में अजीब सन्नाटा था।
उसका दिल घबराने लगा।
घर के बाहर लोगों की भीड़ थी।
बुधई तेजी से भीतर घुसा।
अंदर फूलमती जमीन पर बैठी थी और उसकी गोद में गुड़िया पड़ी थी।
बिलकुल शांत।
बिलकुल चुप।
फूलमती ने सूनी आँखों से उसे देखा।
“गुड़िया शाम से तड़प रही थी बुधई… बुखार बहुत तेज था… गांव में गाड़ी नहीं मिली… अस्पताल ले जाते उससे पहले…”
उसकी आवाज टूट गई।
बुधई पत्थर बना खड़ा रहा।
उसने कांपते हाथों से गुड़िया का माथा छुआ।
सुबह तक जो बच्ची लाल टॉफी माँग रही थी, अब उसकी छोटी-सी मुट्ठी हमेशा के लिए बंद हो चुकी थी।
बाहर कहीं दूर लाउडस्पीकर अब भी बज रहा था—
“गरीबों के सुनहरे भविष्य के लिए ऐतिहासिक रैली सफल रही!”
बुधई ने धीरे से अपनी खाली जेब में हाथ डाला।
फिर गुड़िया के निर्जीव चेहरे को देखते हुए बुदबुदाया—
“हाँ… रैली बहुत सफल रही…”