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मनन एक समीक्षा
कविता केवल भावनाओं की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि मानव आत्मा की गहराइयों से निकली एक ऐसी रचना है जो शब्दों के माध्यम से संवेदनाओं, विचारों, अनुभवों और कल्पनाओं को आकार देती है। यह भाषा का वह रूप है जो सौंदर्य, संगीत, लय, भाव और बिंब के माध्यम से पाठक के हृदय को स्पर्श करता है। कविता में यथार्थ और कल्पना, तर्क और भावना, बाहरी दृश्य और आंतरिक अनुभूति—सभी एक साथ जीवित हो उठते हैं। यह कभी प्रेम बनकर बहती है, कभी विद्रोह बनकर उफनती है, कभी करुणा बनकर रिसती है, तो कभी दर्शन बनकर चमकती है।
श्री विजय शंकर प्रसाद की कविता एक स्पष्ट नागरिक चेतना से संचालित होती है, जिसमें समकालीन समाज की राजनीतिक, नैतिक, लैंगिक और सांस्कृतिक विसंगतियों को अत्यंत सशक्त प्रतीकों और प्रश्नों के माध्यम से उकेरा गया है। इन रचनाओं में कवि केवल एक पर्यवेक्षक नहीं, बल्कि सामाजिक आलोचक, द्रष्टा और व्यंग्यात्मक दार्शनिक के रूप में सामने आता है। कवि की रचनाधर्मिता किसी एक भाव, दृश्य या विमर्श पर नहीं टिकी, बल्कि वह एक साथ स्त्री की अस्मिता, समाज की कुटिलता, राजनीति की दिखावटी नैतिकता, धार्मिक मिथकों का आधुनिक अपप्रयोग, और आत्मा की बिखरती संवेदनशीलता—इन सबको एक वितान में पिरो देता है।
कविता की गहराई निम्न पंक्तियों में स्पष्ट रूप से झलकती है-
“पुण्य और पाप का पता पर मनन,
सुंदर कहलाने की होड़ में तेरा सफ़र।“
पंक्तियाँ गहरी दार्शनिकता लिए हुए हैं — "पुण्य और पाप का पता पर मनन" आत्मचिंतन की ओर संकेत करती है, और "सुंदर कहलाने की होड़ में तेरा सफ़र" बाह्य रूप की सामाजिक दौड़ पर कटाक्ष करती है।
स्त्रियों की वेदना भी कवि से छुपी नहीं है। कवि का अन्तर्मन एक नारी की पीड़ा को समझ कर लिखता है-
"त्रिया चरित्र के दोष से मुक्ति की प्यास,
मिलकर भी अधूरी बातें करने का है गुनाह।"
उपरोक्त पंक्तियों में "त्रिया चरित्र के दोष से मुक्ति की प्यास" में स्त्री के ऊपर लादे गए सामाजिक आरोपों और उसके आत्ममुक्ति की चाह का संकेत है, जबकि "मिलकर भी अधूरी बातें करने का है गुनाह" रिश्तों की अधूरी, असम्पूर्ण संवाद की पीड़ा को दर्शाता है।
कवि श्री विजय शंकर प्रसाद का अन्तर्मन निरंतर चिंतन से परिपूर्ण है। पित्रसत्तात्मक समाज में संवेदनहीनता पर उनकी गहरी प्रतिक्रिया है। कविता की पंक्तियों में इन्ही भावों का समावेश है-
"पुरूषत्व की तलाश में तेरी हो गई हार,
डूब गया शर्म कहीं और क्रीड़ा में विरासत।"
"पुरुषत्व की तलाश में तेरी हो गई हार" पितृसत्ता की उस अंधी दौड़ पर सवाल है, जहाँ संवेदनशीलता को कमजोरी समझा गया। "डूब गया शर्म कहीं और क्रीड़ा में विरासत" यह पंक्ति उस ऐतिहासिक दोष की ओर इशारा करती है जहाँ खेल-तमाशा और सत्ता-उत्तराधिकार ने नैतिकता को निगल लिया।
कवि की चेतना ही कविता की पंक्तियों में अभिव्यक्त हो रही है-
"तिनकों से नीड़ निर्मित हरे-भरे पेड़ों पर यार,"
यह पंक्ति आश्रय, प्रेम और आशा की कोमलता को दर्शाती है, जहाँ तिनके मेहनत और प्रेम का रूपक हैं।
"बिजली कौंधती है तो चिपककर क्या राहत?"
यह उस असहायता और असुरक्षा की ओर इशारा करती है, जो किसी संकट या सामाजिक भय के समय रिश्तों की कमजोरी को उजागर करती है। इन पंक्तियों में प्रकृति और भावनात्मक रिश्तों का अद्भुत मिश्रण है।
कवि नैतिकता पर प्रश्न करते हुए कहते हैं-
"कहाँ पर शिष्टाचार और क्यों ऐसा आयोजन,"
यह व्यवस्था, परंपरा और दिखावे के उन आयोजनों पर कटाक्ष है जहाँ शिष्टता केवल औपचारिकता बनकर रह जाती है।
"मूल सौंदर्यशास्त्र खंडित तो कहाँ पर रहम?"
यह पंक्ति दर्शाती है कि जब मूलभूत मानवीय सौंदर्य-जैसे करुणा, संवेदना और सच्चाई, टूटते हैं, तब कृत्रिम दया या शालीनता व्यर्थ हो जाती है।
कवि मानवीय संवेदनाओं को लेकर अत्यंत भावुक और विचारशील है। कविता की यह पंक्तियाँ गहरे क्षोभ और करुणा से भरी हुई हैं-
यह चारों पंक्तियाँ अत्यंत सशक्त, करुण और गहरे दार्शनिक क्षोभ से भरी हुई हैं—
"कैद़ का सपना साकार नहीं और बेमानी है तब भड़ास,"
यह पंक्ति उस मानसिक जेल को दर्शाती है जहाँ व्यक्ति अपनी ही सीमाओं में बंधा होता है, और जब वह टूटने नहीं पाता, तो रोष भी अर्थहीन लगने लगता है।
"ग़लत परिणाम के बाद हर ओर स्थित होता है तम,"
यह विफलता और उसके बाद छा जाने वाले अंधकार की ओर संकेत करती है ,जब हर दिशा दिशाहीन हो जाती है।
"मुँह फेर लिए कई अपने देखकर तेरी चलती-फिरती लाश,"
यह सामाजिक असंवेदनशीलता का तीखा चित्र है, जब अपने ही इंसान को जीवित शव समझकर किनारा कर लेते हैं।
"न कोई सहारा और आँसू से मालूम मंजर विषम,"
यह पंक्ति व्यक्ति की सम्पूर्ण असहायता और उस आंतरिक तूफान को दर्शाती है जो बाहर केवल एक आँसू बनकर छलकता है।
कवि दार्शनिक विचारों से ओत-प्रोत हैं। कवि की एक विशेष रचना शैली है जो कविता की प्रत्येक पंक्ति को अत्यंत सारगर्भित और दार्शनिक बनाती है। कविता की प्रस्तुत पंक्तियाँ इन्ही भावों का प्रतिनिधित्व करती है-
"माटी का घट से जिसे प्यार था,"
यह पंक्ति उस आत्मा या व्यक्ति की ओर इशारा करती है जो स्थूल, नश्वर, पर फिर भी आत्मीय शरीर (घट) से प्रेम करता था — जो प्रेम और ममता का प्रतीक है।
"तम और भ्रम में पला हुआ जीवन।"
जीवन की यात्रा यहाँ अज्ञान, मोह और छाया-जगत की अवस्था में दिखाई गई है — एक भ्रमित अस्तित्व।
"लय से प्रलय तक जिधर भार था,"
यह पंक्ति अस्तित्व के भार को दर्शाती है, जहाँ संतुलन (लय) से लेकर विनाश (प्रलय) तक, हर बिंदु पर कोई गहन जिम्मेदारी या पीड़ा जुड़ी रही।
"उधर ही तेरा दिखा क़ल भी नर्तन।"
और फिर भी, उसी दिशा में ,उसी अंधकार, भ्रम और भार के बीच ,जीवन का नर्तन यानी नाट्य, गति और भाव की उपस्थिति दिखाई देती है। यह शिव जैसे किसी रूप का भी सांकेतिक आभास देता है।
बहुत ही बारीक चिंतन करते हुए कवि दिव्यता और दुनियादारी के टकराव को रेखांकित करते हैं-
"चाँद-सितारों पर सितम तो कहाँ विष और कहाँ पर चंदन,"
यह पंक्ति आकाशीय, दिव्य प्रतीकों,चाँद और सितारों के बीच छल और कोमलता के द्वंद्व को रेखांकित करती है। "विष और चंदन" यहाँ प्रतीक हैं,एक ओर पीड़ा और धोखे के, दूसरी ओर शांति और पवित्रता के। सवाल है- जब इतने ऊँचे प्रतीकों पर भी अत्याचार हो, तो फिर विष और चंदन का भेद कैसे किया जाए?
"जुगनू के साथ रहकर क्या-क्या हुआ पहले से ही जुगाड़?"
यह बेहद आधुनिक, कटाक्षपूर्ण पंक्ति है ,जहाँ जुगनू (प्रकाश का छोटा स्रोत, मासूमी का प्रतीक) के साथ रहकर भी "जुगाड़" यानी पहले से तय चालाकियाँ हो जाती हैं। यहाँ मासूम रिश्तों और स्वार्थी दुनिया की टकराहट दिखती है।
इस प्रकार हम पाते हैं कवि की रचना काव्य संग्रह 'मनन' एक गहन दार्शनिक और आत्ममंथनशील स्वर लिए हुए है, जिसमें जीवन, प्रेम, नैतिकता, समाज और अस्तित्व को लेकर अनेक प्रश्नों की श्रृंखला प्रस्तुत की गई है। यह कविता संग्रह एक साधारण कथ्य नहीं है, बल्कि एक संवादात्मक आत्मप्रश्न है जो पाठक को सोचने के लिए बाध्य करता है। रचनाकार का दृष्टिकोण कहीं से भी निष्कर्ष देने वाला नहीं है, बल्कि वह सवालों के माध्यम से मानसिक, नैतिक और भावनात्मक द्वंद्व की भूमि तैयार करता है। रचनाओं में प्रयोग किए गए प्रतीक-जैसे चाँद-सितारे, आईना, जुगनू, साया, धुआँ, श्रृंगार, गुलाब,यामिनी,अभिसारिका – अत्यंत प्रभावशाली और बहुअर्थी हैं। ये प्रतीक जीवन की उन सूक्ष्म परतों को उद्घाटित करते हैं, जिन्हें सामान्यतः अनदेखा कर दिया जाता है। कवि के लिए प्रतीक केवल सौंदर्य बढ़ाने का साधन नहीं हैं, बल्कि वे अर्थ और भाव के वाहक बन जाते हैं। कविता की शैली मूलतः प्रश्नात्मक है, लेकिन ये प्रश्न केवल जिज्ञासावश नहीं पूछे गए, बल्कि वे समाज, संबंधों और आत्मा की गहराइयों में छिपी असहमतियों, भ्रमों और विडंबनाओं को उधेड़ते हैं। कविता में कई स्थलों पर गहरा व्यंग्य भी है, जो बाहरी दिखावे, प्रेम की दासता, नैतिकता की बहस, और सामाजिक प्रदर्शन की खोखलेपन को उजागर करता है। शब्दचयन और भाषा-प्रयोग में कवि ने सौंदर्य और चुभन का अनुपम संतुलन बनाया है। कहीं-कहीं पंक्तियाँ शुद्ध दर्शन का आभास देती हैं, तो कहीं वे सामाजिक विडंबनाओं को चुनौती देती हैं। कविताओं की गति न तो एकदम धीमी है, न ही अत्यधिक आवेगमयी; यह एक ऐसी लय में चलती है जो लय से प्रलय तक का भार संजोए हुए है।
कुल मिलाकर, यह काव्य संग्रह समकालीन हिंदी कविता में एक ऐसा स्वर है जो गूढ़ प्रतीकों, विचारोत्तेजक प्रश्नों और आत्मविश्लेषी गहराई के माध्यम से पाठक के मन में ठहराव और टकराव दोनों उत्पन्न करता है। यह कविता शैली और कथ्य दोनों में नवोन्मेषी है, और इसकी रचनाधर्मिता सामाजिक अनुभवों और आंतरिक संघर्षों के बीच एक सधा हुआ पुल बनाती है।
श्री विजय शंकर प्रसाद को काव्य अपराजिता टीम की ओर से इस अनुपम कृति के हार्दिक बधाई और शुभकामनायें।