Wednesday, May 27, 2026

हाशिमपुरा

मई 1987 की वह गर्मी आज भी मेरठ की गलियों में कहीं न कहीं दबी पड़ी होगी।
धूल उड़ती होगी तो उसके साथ कुछ अधजली स्मृतियाँ भी उठती होंगी।
क्योंकि कुछ घटनाएँ शहरों में नहीं घटतीं — वे मनुष्यता की आत्मा में घटती हैं।
हाशिमपुरा ऐसा ही एक नाम है।
वह कोई अमीरों का इलाका नहीं था।
न वहाँ बड़ी कोठियाँ थीं, न ऊँची दीवारें।
छोटे-छोटे घर थे, जिनकी छतों पर बच्चे पतंग उड़ाते थे।
गलियों में करघों की आवाज़ आती थी।
किसी घर में सिलाई मशीन चलती थी, कहीं कोई बूढ़ा रेडियो पर समाचार सुनता था।
गरीबी थी, मगर जीवन था।
उन दिनों मेरठ दंगों की आग में था।
नेताओं के भाषणों में धर्म था,
अख़बारों में भय था,
और आम आदमी के हिस्से में केवल असुरक्षा।
हिंदू अपने घरों में डरे बैठे थे।
मुसलमान अपने घरों में डरे बैठे थे।
और राजनीति दोनों के डर पर रोटियाँ सेंक रही थी।
दंगों के समय सबसे सुरक्षित लोग वही होते हैं
जिनके पास बड़ी गाड़ियाँ और ऊँची पहुँच होती है।
मरता हमेशा गरीब है।
जिसके पास न नेता का फोन नंबर होता है,
न पुलिस कप्तान तक पहुँच।
22 मई की शाम थी।
सूरज ढल रहा था।
मोहल्ले में खबर फैल गई कि पीएसी आई है।
लोगों ने सोचा — तलाशी होगी, पूछताछ होगी, फिर सब शांत हो जाएगा।
वर्दी पर उस समय भी लोग भरोसा करते थे।
गरीब आदमी के पास भरोसा करने के अलावा और होता भी क्या है?
जवान घरों में घुसे।
पुरुषों को बाहर निकाला जाने लगा।
किसी को दाढ़ी से पकड़ा गया,
किसी को गाली देकर धक्का दिया गया।
एक बूढ़ी माँ अपने बेटे से लिपट गई —
“साहब, ये कहीं नहीं गया, घर पर ही था…”
लेकिन दंगों के दिनों में सफाइयाँ नहीं सुनी जातीं।
तब नाम देखे जाते हैं, चेहरे नहीं।
कुछ लड़के बनियान में ही उठा लिए गए।
किसी की चप्पल पीछे छूट गई।
एक आदमी बार-बार कह रहा था —
“मुझे दवा खानी है… मुझे शुगर है…”
पर बंदूकें बीमारियाँ नहीं सुनतीं।
फिर उन्हें ट्रक में भर दिया गया।
मोहल्ले के लोग देर तक देखते रहे।
किसी पत्नी ने सोचा — “थाने ले जा रहे होंगे, सुबह लौट आएँगे।”
एक बच्चा ट्रक के पीछे भागा भी,
मगर किसी ने उसे पकड़कर रोक लिया।
ट्रक चल पड़ा।
उस ट्रक में बैठे लोगों को अब डर लगने लगा था।
शुरू में वे आपस में बातें कर रहे थे।
फिर धीरे-धीरे सब चुप हो गए।
मनुष्य जब बहुत डर जाता है,
तो सबसे पहले उसकी आवाज़ मरती है।
रास्ते भर केवल इंजन गरजता रहा।
उनमें कोई दर्जी था,
कोई मजदूर,
कोई करघा चलाने वाला।
वे इतिहास बदलने नहीं निकले थे।
वे केवल अपनी रोज़ी कमाने वाले लोग थे।
लेकिन इतिहास को जब रक्त चाहिए होता है,
तो वह सबसे पहले गरीबों को चुनता है।
रात गहरा चुकी थी जब ट्रक ऊपरी गंगा नहर के पास रुका।
चारों ओर सन्नाटा था।
दूर कहीं कुत्ता भौंका।
पानी बह रहा था — उदास, अंधा, निरपेक्ष।
फिर लोगों को नीचे उतारा जाने लगा।
अब उन्हें समझ आने लगा था कि कुछ भयानक होने वाला है।
किसी ने कुरान की आयत पढ़नी शुरू की।
किसी ने रोते हुए कहा — “हमें छोड़ दो साहब, हमने क्या किया है?”
किसी ने अपने बच्चों का नाम लिया।
लेकिन सत्ता जब भय में बदल जाती है,
तब उसे प्रार्थनाएँ सुनाई नहीं देतीं।
फिर गोलियाँ चलीं।
एक-एक कर लोग गिरते गए।
कुछ सीधे नहर में गिरे।
कुछ तड़पते रहे।
कुछ घायल होकर मृत शरीरों के नीचे दब गए और साँस रोककर पड़े रहे।
उस रात पानी केवल पानी नहीं था।
वह राज्य और नागरिक के बीच टूटे विश्वास का दर्पण था।
सुबह अख़बारों में खबर आई।
संख्या लिखी गई।
“इतने मारे गए…”
संख्याएँ हमेशा बड़ी निर्दयी होती हैं।
वे यह नहीं बतातीं कि मरने वालों में एक आदमी ऐसा भी था जिसकी बेटी की शादी अगले महीने थी।
एक ऐसा भी था जिसने सुबह निकलते समय पत्नी से कहा था — “रात को जल्दी लौटूँगा।”
एक ऐसा भी था जो अपने बेटे के लिए बाज़ार से जूते खरीदने वाला था।
सरकारी बयान आए।
जाँच बैठी।
फाइलें खुलीं।
फिर बंद हुईं।
वर्ष बीतते गए।
कुछ गवाह बूढ़े हो गए।
कुछ मर गए।
कुछ अदालतों के चक्कर लगाते रहे।
और देश आगे बढ़ता रहा —
जैसे देशों की आदत होती है।
लेकिन हाशिमपुरा वहीं अटका रहा।
वह हर उस माँ की आँख में रह गया
जिसने वर्दी देखकर अपने बेटे को सुरक्षित समझा था।
वह हर उस गरीब आदमी की चुप्पी में रह गया
जो जान गया था कि इस देश में न्याय भी कभी-कभी आदमी का नाम पूछकर आता है।
प्रेमचंद होते तो शायद लिखते—
इस देश में गरीब आदमी की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं कि वह मर जाता है,
बल्कि यह है कि उसकी मृत्यु भी कुछ दिनों बाद केवल एक “मामला” बनकर रह जाती है।
और फिर एक दिन फाइलों की धूल में दब जाती है,
ठीक वैसे ही
जैसे शहरों की नालियों में बहता हुआ रक्त
कुछ बरसातों बाद मिट्टी में मिल जाता है।

रैली

रैली
“अरे बुधई काका! तैयार हो गए कि नहीं? ट्रैक्टर निकल जाएगा फिर मत कहना कि बताये नहीं…”
बाहर से आती आवाज सुनकर बुधई ने अपनी टूटी खाट से उठने की कोशिश की। घुटनों में जैसे किसी ने गरम सीसा भर दिया हो। दीवार पकड़कर धीरे-धीरे उठा और कोने में टंगी अपनी मटमैली कमीज पहनने लगा।
“आ रहे हैं भइया… इतना भी क्या हड़बड़ी है…”
दरवाजे पर खड़ा हरिचरण हँस पड़ा—
“हड़बड़ी नहीं करेंगे तो सौ रुपया कैसे मिलेगा काका! नेताजी खुद दे रहे हैं। बस भी है, खाना भी मिलेगा। ऊपर से शहर घूमना अलग।”
“हाँ रे… सौ रुपया…”
बुधई ने जैसे खुद से कहा।
पूरा घर नजरों के सामने घूम गया।
छप्पर से टपकता पानी।
चूल्हे के पास खाली कनस्तर।
कोने में खाँसती उसकी बीमार पत्नी फूलमती।
और चारपाई पर बैठी उसकी पोती गुड़िया, जो सुबह से रोटी माँगते-माँगते अब चुप हो गई थी।
बुधई ने जाते-जाते फूलमती से कहा—
“देख, शाम तक आ जाऊँगा। सौ रुपया मिलेगा। आते में दवा भी लेता आऊँगा… और गुड़िया के लिए बिस्कुट भी…”
फूलमती ने बस उसे देखा।
वह जानती थी—इस घर में अब सपने भी उधार पर पलते हैं।
गांव के बाहर पहले से ही कई ट्रैक्टर-ट्रॉलियाँ खड़ी थीं। हर ट्रॉली में आदमी ऐसे भरे थे जैसे बोरे में आलू। कुछ लोग झंडे पकड़े थे, कुछ को अभी तक यह भी नहीं पता था कि रैली किस बात की है।
एक लड़का झंडे बाँटता हुआ चिल्ला रहा था—
“सब लोग याद रखना! जब नेताजी हाथ उठाएँ तो जोर से बोलना—‘नेताजी जिंदाबाद!’”
भीड़ में किसी ने पूछा—
“नेताजी आएँगे किसलिए?”
दूसरा बोला—
“अरे वही… गरीबों के विकास के लिए।”
सब हँस पड़े।
बुधई भी हल्का मुस्कुराया, फिर खाँसी का दौरा पड़ गया।
ट्रॉली चल पड़ी।
धूल उड़ाती सड़क पर घंटों हिचकोले खाते हुए लोग शहर पहुँचे। बुधई ने शायद पहली बार इतना बड़ा शहर देखा था। ऊँची-ऊँची इमारतें, चमचमाती दुकानें, बड़े-बड़े पोस्टर जिनमें नेताजी मुस्कुरा रहे थे—ठीक वैसे जैसे कोई आदमी फोटो में मुस्कुराता है, असल जिंदगी में नहीं।
रैली मैदान में जनसमूह उमड़ा पड़ा था।
लाउडस्पीकर फट रहे थे—
“गरीबों का मसीहा कौन?”
भीड़ चिल्लाती—
“नेताजी! नेताजी!”
बुधई को प्यास लगी थी। सुबह से उसने सिर्फ आधी सूखी रोटी खाई थी। पानी लेने गया तो वहाँ भी लंबी लाइन।
उधर मंच पर नेताजी हेलीकॉप्टर से उतरे।
भीड़ अचानक पागल हो उठी।
लोग धक्का देने लगे।
झंडे हवा में लहराने लगे।
किसी ने बुधई को पीछे से ऐसा धक्का दिया कि वह गिर पड़ा।
उसके ऊपर कई पैर चढ़ गए।
“अरे बचाओ…”
उसकी आवाज नारों में दब गई।
किसी तरह एक लड़के ने उसे उठाया।
“काका मरना है क्या? किनारे बैठो!”
बुधई हाँफता हुआ मैदान के कोने में बैठ गया। दूर मंच पर नेताजी गरज रहे थे—
“हम गरीबों के सम्मान की लड़ाई लड़ रहे हैं!”
तालियाँ गूँज उठीं।
“हमने हर गरीब के घर विकास पहुँचाया है!”
भीड़ फिर चीखी—
“जिंदाबाद!”
बुधई को अचानक गुड़िया याद आई।
सुबह वह कह रही थी—
“बाबा, लौटते में मेरे लिए लाल वाली टॉफी लाना…”
उसने जेब टटोली।
अभी सौ रुपया मिला नहीं था।
शाम तक रैली खत्म हुई।
अब पैसा बाँटने की बारी आई।
लोग टूट पड़े।
धक्का-मुक्की के बीच किसी ने बुधई के हाथ में एक मुड़ा-तुड़ा सौ का नोट थमा दिया। वह नोट उसने ऐसे पकड़ा जैसे कोई भूखा आदमी आखिरी रोटी पकड़ता है।
उसने राहत की साँस ली।
“चलो… दवा आ जाएगी… गुड़िया के लिए बिस्कुट भी…”
लेकिन विडंबनाएँ अभी बाकी थीं।
बसें कम पड़ गईं।
हजारों लोग सड़क पर छूट गए।
कुछ लोग ट्रैक्टरों पर चढ़ गए, कुछ पैदल निकल पड़े। बुधई भी लाठी टेकता हुआ चलने लगा।
रात घिर आई थी।
शहर से बाहर निकलते ही तेज बारिश शुरू हो गई।
बुधई एक बंद दुकान के छज्जे के नीचे खड़ा हो गया। वहीं उसे याद आया कि उसने दवा नहीं खरीदी।
पास की मेडिकल दुकान बंद हो चुकी थी।
वह देर तक बंद शटर को देखता रहा।
फिर धीरे-धीरे चल पड़ा।
रास्ते में भूख लगी तो उसने सोचा कुछ खा ले। एक ढाबे पर जाकर पूछा—
“भइया… दस रुपये की चाय मिल जाएगी?”
ढाबे वाले ने ऊपर से नीचे तक देखा—भीगा हुआ बूढ़ा, कीचड़ सनी धोती, काँपते हाथ।
“पहले पैसे दिखाओ।”
बुधई ने जेब में हाथ डाला।
जेब खाली थी।
वह घबरा गया।
दूसरी जेब टटोली।
कमीज टटोली।
धोती की गाँठ खोली।
सौ का नोट गायब था।
शायद भीड़ में… या बारिश में… या रास्ते में कहीं गिर गया था।
कुछ देर तक वह सड़क किनारे खड़ा रहा।
बारिश उसके चेहरे पर गिरती रही।
फिर अचानक वह हँस पड़ा।
धीरे-धीरे… सूखी हुई हँसी।
“गरीब के हाथ में पैसा भी मेहमान जैसा होता है… टिकता कहाँ है…”
आधी रात के करीब वह गांव पहुँचा।
गांव में अजीब सन्नाटा था।
उसका दिल घबराने लगा।
घर के बाहर लोगों की भीड़ थी।
बुधई तेजी से भीतर घुसा।
अंदर फूलमती जमीन पर बैठी थी और उसकी गोद में गुड़िया पड़ी थी।
बिलकुल शांत।
बिलकुल चुप।
फूलमती ने सूनी आँखों से उसे देखा।
“गुड़िया शाम से तड़प रही थी बुधई… बुखार बहुत तेज था… गांव में गाड़ी नहीं मिली… अस्पताल ले जाते उससे पहले…”
उसकी आवाज टूट गई।
बुधई पत्थर बना खड़ा रहा।
उसने कांपते हाथों से गुड़िया का माथा छुआ।
सुबह तक जो बच्ची लाल टॉफी माँग रही थी, अब उसकी छोटी-सी मुट्ठी हमेशा के लिए बंद हो चुकी थी।
बाहर कहीं दूर लाउडस्पीकर अब भी बज रहा था—
“गरीबों के सुनहरे भविष्य के लिए ऐतिहासिक रैली सफल रही!”
बुधई ने धीरे से अपनी खाली जेब में हाथ डाला।
फिर गुड़िया के निर्जीव चेहरे को देखते हुए बुदबुदाया—
“हाँ… रैली बहुत सफल रही…”

Friday, October 31, 2025

संविधान वेदों की छाया

नेति नेति

सत सदा ही रहा है। ऐसा कोई भी समय नही था जब वह नही था। जो नही था वह साकार नही हो सकता था।किंतु जब असत कह के उसे साकार किया तब जन्म लिया पाप ने।

सैनबाड़ी

सन् 1970 का बंगाल।
वह समय जब हवा में केवल धूल नहीं उड़ती थी, विचारधाराएँ भी उड़ती थीं।
दीवारों पर लिखे नारे लोगों के भीतर उतर चुके थे।
किसी के घर का रंग, किसी के हाथ का झंडा, किसी की सभा में जाना — सब मनुष्य की पहचान बन गए थे।
बर्दवान का वह पुराना मोहल्ला बाहर से बिल्कुल साधारण लगता था।
संकरी गलियाँ, काई जमी दीवारें, बरामदों में रखे जल के घड़े, और शाम ढलते ही घरों से आती शंखध्वनि।
उसी मोहल्ले में एक घर था — सैन परिवार का घर।
लोग उसे “सैनबाड़ी” कहते थे।
घर में राजनीति थी, लेकिन जीवन भी था।
माँ सुबह तुलसी पर जल चढ़ाती थी।
रसोई में चावल की भाप उठती थी।
आँगन में बच्चे कभी हँसते हुए दौड़े होंगे।
पर उन दिनों बंगाल में घर केवल घर नहीं रह गए थे; वे राजनीतिक पहचान बन चुके थे।
शहर में कई दिनों से तनाव था।
जुलूस निकलते, नारे लगते, टकराव होते।
लोग अब बहस कम और घृणा अधिक करने लगे थे।
ऐसा लगता था मानो विचार धीरे-धीरे मनुष्यता को खा रहे हों।
फिर वह दिन आया।
सुबह से ही वातावरण विचित्र था।
गलियाँ असामान्य रूप से शांत थीं, जैसे किसी तूफ़ान से पहले की हवा।
दोपहर तक खबरें आने लगीं कि शहर के कई हिस्सों में हिंसा फैल चुकी है।
सैनबाड़ी के भीतर माँ बेचैन थी।
वह बार-बार दरवाज़े तक जाती, लौट आती।
उसे राजनीति की गहराइयाँ समझ नहीं आती थीं।
उसे केवल इतना पता था कि बाहर कुछ भयावह घूम रहा है।
शाम ढलने लगी थी जब भीड़ वहाँ पहुँची।
पहले नारे सुनाई दिए।
फिर पत्थर।
फिर दरवाज़े पर प्रहार।
उस क्षण घर अचानक घर नहीं रहा; वह युद्धभूमि बन गया।
भीड़ भीतर घुस आई।
चेहरों पर क्रोध था, आँखों में उन्माद।
ऐसा उन्माद जिसमें मनुष्य दूसरे मनुष्य को नहीं देखता — केवल “शत्रु” देखता है।
फिर जो हुआ, वह इतिहास के सबसे भयावह राजनीतिक प्रसंगों में गिना जाने लगा।
घर के बेटों की हत्या कर दी गई।
चीखें दीवारों में समा गईं।
आँगन, जहाँ कभी जीवन की आवाज़ें रही होंगी, रक्त से भर गया।
लेकिन क्रूरता यहीं समाप्त नहीं हुई।
कहा जाता है कि हत्या के बाद उनके रक्त से सने चावल माँ के सामने परोस दिए गए।
इतिहासकार इस घटना के कुछ विवरणों पर अलग-अलग मत रखते हैं, पर यह कथा बंगाल की सामूहिक स्मृति में इतनी गहराई से दर्ज हुई कि वह स्वयं एक प्रतीक बन गई — राजनीतिक अमानवीयता का प्रतीक।
कल्पना कीजिए उस क्षण को।
एक माँ, जिसने उन्हीं बच्चों को अपने हाथों से खिलाया था,
जिसने बुखार में रात-रात भर जागकर उनकी साँसें सुनी थीं,
जिसने उनके लिए देवताओं से प्रार्थनाएँ की थीं—
उसी माँ के सामने उसके पुत्रों के रक्त से सनी थाली रख दी जाए।
उस क्षण केवल एक परिवार नहीं टूटा था।
मनुष्यता का चेहरा फट गया था।
राजनीतिक हिंसा में लोग मरते हैं।
दंगे इतिहास में बार-बार हुए हैं।
लेकिन कुछ घटनाएँ इसलिए अमर हो जाती हैं क्योंकि वे केवल हत्या नहीं होतीं — वे करुणा की हत्या होती हैं।
सैनबाड़ी कांड ऐसा ही एक क्षण बन गया।
उसने लोगों को यह सोचने पर मजबूर किया कि विचारधारा जब मनुष्य से बड़ी हो जाती है, तब वह धर्म नहीं रहती, उन्माद बन जाती है।
और उन्माद का सबसे भयावह रूप वही है, जहाँ किसी माँ के आँसू भी मनुष्य को रोक नहीं पाते।

 - देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'