मनुष्य से बड़ा व्यभिचारी शायद ही जगत में कोई दूसरा जीव होगा। आवरण का प्रपंच तो मनुष्य की दुर्बलता और अहंकार का प्रतीक है। मनुष्य ही है जो जानवरों की खाल से बने वस्त्र पहन सकता है,पंछियों को पिंजरे में कैद कर सकता है,कुत्तों के गले में पट्टा, बैलों के गले में घंटी और घोड़े के पांव में नाल ठोंक सकता है यह प्रतिभा जानवरों में नही है। इसीलिये तो जानवरों में बलात्कार करने का हुनर नही है, अनावृत्त रहकर भी बेचारे सहज रहते हैं कैसे तुच्छ जीव हैं। पुरुष सदियों से आधे अधूरे नंग धड़ंग स्त्रियों के सामने बेटे,भाई, भतीजे, देवर,ससुर चाचा,ताऊ बनकर आते रहे पर स्त्रियों सहज रहीं किंतु पुरुष स्त्री को आंशिक अनावृत्त देख भी सहज न हो सके, वासनाओं में उलझे रहे और अपनी दुर्बलता को चरित्रहीनता और व्यभिचार जैसे शब्दों के पीछे छुपा दिया। इसीलिए तो कभी चाचा,कभी मामा, कभी भाई, कभी देवर और आजकल तो बाप भी। सीमाओं ने संसार को जन्म दिया है और जो सीमाओं के बाहर है वो परमात्मा है।
Saturday, July 15, 2023
Tuesday, July 4, 2023
सइयाँ बिजली वाले
बिजली की तार छुए पिया बार बार छुए
फिर भी न कोई जोश और न जवानी है
अधर में लटकी है दर दर भटकी है
लगता है कि व्यर्थ अब मेरी जिंदगानी है
सुने है कि काम करता है हाई वोल्टेज का
फिर भी लो वोल्टेज की इसकी कहानी है
चारों ओर ख्वाहिशें हैं ख्वाहिशों का समंदर है
बस आंख में ही है और कहीं नही पानी है
जिया मेरा धड़के है बायीं आँख फड़के है
मन के जो तार जुड़े फ्यूज उड़ जाता है
देखता है मेरी तरफ मद भरी आंखों से
पर सीढ़ी तार लिए कहीं और मुड़ जाता है
लाख चिट्टी लिखूं, लाख लिखूं लव लेटर
उसके मेरे बीच मे हैं जाने कैसा इंसुलेटर
अर्थ फाल्ट ओवर करंट सब गया बेकार
पंक्चर होता नही बिजली गिरी हजार।
हाय रे विधाता क्या गजब मनमानी है
लगता है कि व्यर्थ अब मेरी जिंदगानी है।
एक रोज सांझ ढले मौसमी खुमार रहा
खिड़की से बार बार पिया था निहार रहा
शिव की कृपा हुई रति के भाग जगे
राग रागिनी सजे मन के सितार बजे
प्रेम की मधुर घड़ी अपलक मैं खड़ी
पूर्ण होगी प्रार्थना आस है मुझे बड़ी।
विकास
मोहन ...बेटा मोहन..कुछ खा ले फिर खेलने जाना..मोहन..कहाँ चला गया अभी तो स्कूल से आया था..क्यों अपनी बूढ़ी दादी को सता रहा है,कहाँ छिपा है ??
मोहन को सामने न पाकर बूढ़ी जमुना काकी कुछ विचलित हुई। होती भी क्यों न ..बुढ़ापे का एक ही सहारा था..बेटा और बहू दोनों विदेश जा बसे थे। जमुना काकी को अपनी मिट्टी से बड़ा लगाव था सो पोते मोहन को ले गांव में ही रह गई। बेटा हर महीने परदेश से जमुना काकी और मोहन के गुजर-बसर के लिए पैसे भेज देता। बस यूं ही जमुना काकी का गुजारा चल रहा था। छह साल के मोहन पर दादी की परवरिश का पूरा प्रभाव था। वह भी गांव के परिवेश और प्रकृति के आनंद में तल्लीन रहता था। मिट्टी से सना हुआ, स्कूल यूनिफार्म पर मिट्टी की एक परत लपेटे अभी तो स्कूल से आया था। बूढ़ी दादी को एक झलक दिखा अचानक जाने कहाँ चला गया।
“ये लड़का एकदम अपने बाप पर गया है। वो भी एक मिनट के लिए घर में नहीं रुकता। जरूर कहीं अपनी टोली के साथ खेलने निकल गया होगा।”
“दादी भूख लगी है… कुछ खाने को दो न…”
कुएँ की सीढ़ियों पर बैठे मोहन की आवाज सुन जमुना काकी की जान में जान आई।
“अरे मोहन बचवा तू वहाँ क्या कर रहा है? आ खाना खा ले… तेरे लिए खीर बनाई है।”
खीर का नाम सुनते ही मोहन भागता हुआ आकर जमुना काकी से लिपट गया।
“दादी बहुत भूख लगी है, जल्दी से खीर दो ना…”
“अच्छा जब इतनी भूख लगी थी तो बाहर कुएँ की सीढ़ियों पर जाकर क्यों बैठा था? और वो मुखिया जी के घर की तरफ क्यों देख रहा था बार-बार उचक-उचक कर?”
“दादी पता है! आज स्कूल में वो लंबी चुटिया वाले पुराने गुरुजी आये थे जो कभी-कभी आते हैं और जो पिछली बार कह के गए थे कि मुखिया जी के घर विकास आने वाला है। आज उन्होंने बताया कि मुखिया जी के घर विकास आ गया है। और कह रहे थे कि बच्चों तुम सब मन लगाकर पढ़ो तो तुम्हारे घर भी विकास आयेगा। दादी ये विकास क्या है और मुखिया जी के घर पर क्यों आया है? हमारे घर पर क्यों नहीं आया?”
“पहले तू खीर खा ले फिर बताती हूँ…”
यह कहकर जमुना काकी बड़े प्यार से कटोरी भर खीर रसोई से लाई और मोहन को अपने हाथों से खिलाया। उन्हें लगा शायद खीर खाने में तल्लीन मोहन अपने प्रश्नों को भूल जाये। पर मोहन तो मोहन था। खीर खाते ही उसने दादी से पूछ ही लिया—
“दादी अब बताओ न ये विकास क्या है?”
“क्यों तेरे लंबी चुटिया वाले गुरुजी ने नहीं बताया?”
“बताया होता तो तुमसे क्यों पूछता… बताओ न दादी… और मुझे मुखिया के घर ले चलो न… मुझे विकास को देखना है…”
“अभी-अभी स्कूल से आया है, कुछ देर आराम तो कर ले। मुखिया का घर कुएँ की सीढ़ियों से दिखाई जरूर देता लेकिन वो गांव के दूसरे छोर पर है। पैदल जाना पड़ेगा। इतनी दूर पैदल चल लेगा तू? अब मुझमें इतनी ताकत नहीं रही कि तुझे गोद में उठाकर मुखिया के घर तक चल सकूँ। अब मैं बूढ़ी जो हो चुकी हूँ…”
“पर मैं बूढ़ा थोड़े हूँ… मैं पैदल ही जाऊँगा। तुम चलो न दादी…”
“ठीक है बाबा… चलती हूँ…”
इतना कहकर जमुना काकी ने दीवार पर टंगी अपनी पुरानी चादर उठाई और दरवाजे की कुंडी लगा मोहन का हाथ थाम लिया। सांझ धीरे-धीरे गांव पर उतर रही थी। कहीं चूल्हों का धुआँ उठ रहा था, कहीं मवेशी लौट रहे थे। पगडंडी पर चलते हुए मोहन बार-बार उत्साह से उछल पड़ता।
“दादी… विकास कैसा दिखता होगा?”
“पता नहीं बचवा…”
“क्या वो शहर से आया होगा?”
“होगा… गांव में जो चीज अपने आप नहीं आती, वो अक्सर शहर से ही आती है…”
मोहन कुछ समझा, कुछ नहीं। वह रास्ते भर कल्पनाएँ करता रहा—शायद विकास कोई जादूगर होगा, शायद कोई बड़ा आदमी, शायद कोई ऐसा मेहमान जिसके आते ही घर चमक उठते हैं।
थोड़ी दूर चलने के बाद गांव की कच्ची गलियाँ अचानक सीमेंट की चिकनी सड़क में बदल गईं। दोनों ओर नए खंभों पर बिजली की लड़ियाँ जगमगा रही थीं। मोहन की आँखें चमक उठीं।
“दादी… यहाँ तो शहर जैसा लग रहा है!”
जमुना काकी चुप रहीं।
उन्हें याद आया, पिछले चुनाव में मुखिया जी ने पूरे गांव में कहा था—“गांव में विकास लाना है।”
तब लोगों ने सोचा था कि शायद स्कूल की टूटी छत बन जाएगी, तालाब साफ हो जाएगा, अस्पताल में दवाई मिलने लगेगी।
पर वर्षों बाद गांव में बदला क्या?
बस मुखिया का घर।
अब वे दोनों उसी घर के सामने खड़े थे।
मुखिया जी की हवेली रोशनी से नहा रही थी। बाहर दो बड़ी गाड़ियाँ खड़ी थीं। दरवाजे पर संगमरमर लगा था। भीतर से हँसी और बर्तनों की खनखनाहट आ रही थी।
मोहन विस्मित होकर बोला—
“दादी… विकास यहीं रहता है क्या?”
उसी समय दो आदमी बाहर निकलते दिखाई दिए।
एक ने बीड़ी सुलगाते हुए कहा—
“मुखिया जी की तो किस्मत खुल गई। विकास का सारा पैसा यहीं लग गया।”
दूसरा हँसकर बोला—
“अरे भाई, तभी तो देखो… नई गाड़ी, नया बरामदा, ऊपर दूसरी मंजिल… गांव में ऐसी कोठी किसी के पास नहीं।”
दोनों हँसते हुए आगे बढ़ गए।
मोहन ने धीरे से पूछा—
“दादी… विकास पैसा होता है क्या?”
जमुना काकी ने पहली बार मुखिया की हवेली को गौर से देखा।
घर के सामने चमचमाती सड़क थी, लेकिन उसी सड़क का सीमेंट थोड़ी दूर जाकर टूट जाता था।
मानो विकास ने अपना रास्ता यहीं तक तय किया हो।
उसी समय मुखिया जी बाहर निकले। सफेद कुर्ता, मोटा पेट, गले में सोने की चेन। उन्होंने मोहन और जमुना काकी को देखा।
“अरे काकी! इतनी रात गए कैसे आना हुआ?”
मोहन उत्साह से आगे बढ़ा—
“मुखिया जी! हम विकास को देखने आए हैं।”
मुखिया जी पहले तो चौंके, फिर ठहाका मारकर हँस पड़े।
“देखा काकी! आजकल के बच्चे भी कितनी बड़ी-बड़ी बातें करने लगे हैं।”
जमुना काकी ने धीमे स्वर में कहा—
“हाँ मुखिया जी… बच्चा है। स्कूल में सुन लिया कि आपके घर विकास आया है, तो देखने की जिद करने लगा।”
मुखिया जी की हँसी थोड़ी धीमी पड़ी। उन्होंने बात बदलते हुए नौकर को आवाज दी—
“अरे ओ रामू! बच्चे को मिठाई दे दो।”
मोहन ने मिठाई लेने के बजाय फिर पूछा—
“मुखिया जी… विकास कहाँ है?”
इस बार मुखिया जी के चेहरे पर हल्की झुंझलाहट उभरी।
उन्होंने मोहन के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—
“बेटा… बड़े होकर समझ जाओगे।”
मोहन मासूमियत से बोला—
“लेकिन गुरुजी तो कह रहे थे कि मन लगाकर पढ़ोगे तो तुम्हारे घर भी विकास आएगा। मैं तो पढ़ता हूँ… फिर हमारे घर क्यों नहीं आया?”
अब आँगन में एक पल को सन्नाटा छा गया।
मुखिया जी ने नजरें फेर लीं।
जमुना काकी के होंठ काँप उठे।
उन्होंने मोहन का हाथ पकड़ा और वापस मुड़ गईं।
लौटते समय मोहन बार-बार पीछे मुड़कर उस रोशनी से भरे घर को देखता रहा। फिर धीरे से बोला—
“दादी… विकास बहुत अमीर होगा न?”
जमुना काकी ने थकी हुई आँखों से अंधेरे में डूबे अपने गांव को देखा और बोलीं—
“हाँ बचवा…
विकास अब गरीबों के घर नहीं आता।
उसे बड़े दरवाजों पर रहना अच्छा लगता है…”
Monday, February 13, 2023
कोरी गप्प/बंडलबाजी
गाँव गिरांव में जून की दुपहरी थी।
आम के पेड़ के नीचे संकठा, दामोदर और बिरजू बैठे गप्प हाँक रहे थे। ऊपर से गरम हवा के थपेड़े आते, पत्ते खड़कते और बीच-बीच में कोई पका आम धम्म से गिर पड़ता। दूर खेतों के ऊपर हवा ऐसी काँप रही थी जैसे धरती जल रही हो।
तभी गजोधर भईया का आगमन हुआ।
“ए संकठा! कईसा है? मतलब एकदम दुपहरी में गर्मी का पूरा आनंद लई रहे हो!
और बिरजुवा… पसीना से लथपथ… कितना चमक रहा है तू।
पेट भरा है कि एकदम खाली ए बैठे हो?”
संकठा हँसा—
“सवेरे से तेज गरम हवा चल रहा। आम गिर रहा है, खाइ रहे हैं और का गजोधर भईया।
सुने हैं हवा और तेज होगा, बरसात भी होगी। कौनव तूफान आइ रहा है।
आम गिरे तो सब बटोर लेंगे। लेकिन आप हियाँ कैसे?”
“उ सब छोड़ो। पहिले ई बताओ घर के पिछवारे से नाली काहे खुला है? बजबजा रहा है…”
“का करें भईया… बरसात पहिले साफ कर देंगे।”
“अरे नया टेकनालजी आया है। एकदम हल्का… एकदम सरल… वोका इस्तेमाल करो…”
“कईसा टेकनालजी भईया?”
“जब बिजली रहता है तो आम के पेड़ के नीचे पड़ा रहता है। आम के आगे बढ़ता ही नहीं है। एकदम ही बुड़बक है तुम लोग।”
“अरे ठीक से बताओ न भईया…”
“टीवी में समाचार देखा कर। सब चैनल दिखा रहा है कल सवेरे से ही। बार-बार दिखा रहा है कि सब आदमी, लड़का, औरत सब सीख सके। विज्ञान का नया खोज है।
नाली को पूरा बंद कर, ढाँक दे एकदम से… बस एक पतला छोटा-सा छेद छोड़ दे… और वोहमा पाइप लगाई के खाली सलंडर भर ले।
मूरख! कितना गैस बर्बाद कर रहा है तुम और तुम्हरे जैसा कितना लोग!”
संकठा आँख फाड़े सुनता रहा।
“मतलब खाना भी बन जाएगा?”
“अरे खाना, चाय, सब! विदेश में आदमी चाँद से मंगल निकल गया और तुम लोग अभी तक गोबर और नाली में ही फँसे हो।”
इतने में गजोधर की नजर बिरजू पर गई।
“बिरजू… ए बिरजू… तू काहे अउंघा रहा है? अबकी आलू का पैदावार त ठीक रहा है ना?”
बिरजू सुस्त आवाज में बोला—
“हाँ गजोधर भईया… आलू त पिछला बरस से दुगना पैदा हुआ है इस बार…”
“भगवान की किरपा बरसी है और तू बैठा अउंघा रहा है! जल्दी शहर जा। नया मशीन लगा है। आलू से सोना बन रहा है!”
संकठा और बिरजू दोनों एक साथ उछले—
“काsss?”
“हाँ! अब तक इतना सोना बन चुका है कि आधा शहर सोने का होई गवा है।
उ रम चरना याद है ना…”
“कऊन रम चरना भईया?”
“सुखियापुर वाला रमचरना। वही जो अहमदाबाद गया था कमाने। एक साल पहिले लउटा है। आस-पास के दस गाँव में सबसे ज्यादा आलू वही के खेत में पैदा हुआ है। सोने के ईंटा से घर बनवा रहा है।”
बिरजू अब पूरी तरह जाग चुका था।
“सच कहत हो भईया?”
“हम झूठ बोलत हैं का?
हम बदनसीब त चूक गए। अबकी आलू बोये ही नहीं। पर तू काहे बेसुध पड़ा है? जा शहर आलू लेके।
अंदर की खबर है… केजीएफ वाले राकिया का नजर है पूरे देश का आलू पे। पुष्पा भी जंगल से निकल चुका है। जल्दी शहर नहीं गया त ना आलू रहेगा ना सोना बनाने का मशीन। कल सबेरे जल्दी ही निकल जा।”
बिरजू अब सचमुच चिंता में पड़ गया।
उधर दामोदर चुपचाप बीड़ी फूँक रहा था।
गजोधर ने उसे घूरा—
“दामोदरा… ए दामोदरा! ऐसे ही बीड़ी पी-पी के करेजा ना जलाऊ।
केतना सुंदर शरीर मिला है, ताकत मिला है, संस्कार मिला है।
एक महीना से भागवत सुन रहा है, दो दिन से मानस बाँच रहा है और आज खाली बैठा बीड़ी पी रहा है। बीड़ी से एकदम करियाय जा रहा है।
ई सब से बाहर निकल। देश-दुनिया से कौनव मतलब नहीं है तुम्हरा।
का-का हो रहा है… आदमी चाँद से मंगल और मंगल से आगे निकल रहा है। कुछ खबर है कि बस बीड़ी ही चलेगा आगे?
देश-दुनिया का प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं है तुम्हरा?”
दामोदर मुस्कुराया—
“का होई गवा गजोधर भईया? उक्रेन खतम होई गवा का? सुनामी फिर आई गवा का? अमरीका पे हमला तो नाही हुआ? ईरान-इराक में तेल का कुआँ में आग तो नाही लगा? का खबर है?”
“भक बुड़बक! मुँह खोले नहीं कि भक्क से बक दिये।
जब सोचो… हरदम बुरा ही सोचो।
अरे विदेश में सभ्यता कहाँ से कहाँ पहुँच रहा है और तुम हौ कि सुनामी और तेल के कुआँ में ही अटके हो!”
“का होई गवा गजोधर भईया?”
“स्वीडन का नाम सुने हो?”
“ना।”
“कइसे सुनोगे। सारा समय पूजा-पाठ में। कुछ और बचा भी तो बीड़ी और बंडलबाजी में गुजार दे रहे हो।
अब सुनो। स्वीडन में नया टूर्नामेंट होई वाला है। एकदम नया। खेले तो बहुत होगे लेकिन ऐसा टूर्नामेंट सुने नहीं होगे।”
संकठा हँस पड़ा—
“कईसा टूर्नामेंट भईया? का खेला जाता है इसमे?”
गजोधर दाँत निपोरने लगा—
“अरे उहै खेल… जो सब अपनी औरतन के साथ खेलत हैं… दिया बुझा के…
अब खुल्लम-खुल्ला मुकाबला होई स्वीडन में।”
बिरजू हँसी रोकते बोला—
“चलिहौ का भौजी का लइके, मुकाबला में हिस्सा लेने?”
सब ठठाकर हँस पड़े।
दामोदर सिर झुकाए बैठा रहा।
“अरे का कहि रहे हो गजोधर भईया। हमको त सुनकर ही शरम आ रहा है। अइसा भी कोई खेल होता है का?”
“होता है तबही त बताई रहे हैं। सभ्यता कतना आगे बढ़ रहा है। तुमको कुछ पता ही नहीं है।”
“राम राम… राधेश्याम… देवता हमका माफ करो। हम हियाँ ही ठीक हैं। तुम जाओ खेलौ टूर्नामेंट। ई सब तुम्हरे जैसे महापुरुष के ही बस का है।
हम तुमको अच्छे से जानत हैं। नियत के ठीक हो। संयम रखत हो। सही-गलत खाली जानत नहीं हो, समझत भी हो। औरतन का देवी का तरह पूजत हो। नजर एकदम गंगा मईया की तरह निर्मल रहता है…”
दामोदर अचानक चुप हो गया।
“हम त…”
“हम त का दामोदर?”
दामोदर ने बीड़ी फेंक दी।
गरम हवा का एक तेज झोंका आया। ऊपर पत्ते हिले। कहीं दूर से किसी बच्ची के रोने की आवाज आई और फिर शांत हो गई।
दामोदर बहुत धीमे बोला—
“हम त बस राम राम… राधेश्याम…”
“काहे उल्टी गंगा बहाई रहे हो? धरम-करम और सत्संग तुम करत हो और महापुरुष हमका बतावत हो दामोदर। केतना बड़ा झूठ बोले हो। बीड़ी का असर है ई सब।”
दामोदर ने पहली बार सीधे गजोधर की ओर देखा।
“सही कहत अहि भईया। ई झूठ नहीं… सच है।
एक सच और भी है… जिसका कहने का हिम्मत नहीं होता। लेकिन आज कहेंगे…”
अब तीनों चुप थे।
दामोदर की आवाज काँप रही थी—
“गजोधर भईया… हम त खाली बाहर से फूला, ताकतवर और संस्कारी दिखाई देता है। धरम-करम और सत्संग भी करता है…
पर भीतर से एकदम कमजोर है। बाहर से जितना साफ है, अंदर से उतना ही गंदा है।
ई चेहरा पे ना जाओ… आदमी का असली मुँह भीतर होता है…”
गजोधर की हँसी धीरे-धीरे गायब हो रही थी।
दामोदर बोलता गया—
“देवी की पूजा करता है लेकिन…
लेकिन औरत का देखत ही हमका कुछ होई जात है…
छोट-छोट लड़कियन के लिए भी मन में हवस रहता है।
यही कारण त हम अपनी बिटिया को घर से बाहर नहीं निकलने देता। उसको अपना सामने भी नहीं आने देता। बहुरिया को पर्दा में रखता है। बहिन से दूर रहता है…”
संकठा और बिरजू अब सिर झुकाए बैठे थे।
“एक ठो राक्षस है हमरा भीतर…
जो रावण से भी बड़ा है… दुर्योधन से भी खतरनाक… दुःशासन और कंस से भी बड़ा महापापी…
जिसको हम रोज देखता है… डर से अपनी आँख बंद कर लेता है।
उ ठहाका लगा के हँसता है और हमरी नजर में उतर जाता है।
तुम्हरी भौजी का पता है उ राक्षस के बारे में। तुमका नहीं पता…”
“का बोल रहा है दामोदर?” गजोधर बुरी तरह असहज हो उठा।
“बीड़ी के साथ गाँजा भी पीने लगा है क्या? या अफीम सूँघ के बैठा है?”
“एकदम होश में हैं गजोधर भईया।”
तभी बिरजू धीमे से बोला—
“दामोदर सही कहत है।
उ राक्षस खाली दामोदर के भीतर ही नहीं… शायद हर आदमी के भीतर कहीं न कहीं दबा बैठा है।
किसी में सोया हुआ… किसी में जागा हुआ… किसी में खुल्लमखुल्ला घूमता हुआ…”
गरम हवा अब और भारी लगने लगी थी।
“रोज सवेरे समाचार पढ़ के त ऐसा लगता है कि छोट-बड़ा सब… वही के चपेट में है।
सब ससुरा आदमी लोग ढोंग करता है सुर होने का… असुर है ससुरा… असुर…”
“बुद्धि भ्रष्ट होई गई है तुम दुइनों की!” गजोधर झुँझला उठा।
“प्रेत सवार है। कौनव व्यभिचारी की कबर पे फूल चढ़ाई के लौटे हो का?
का बात शुरू किए थे और का बक रहे! जबान खराब कर लिए। एकदम अशुद्ध होई गए हो।
चलो हियाँ से। चलकर गंगा में एक डुबकी लगाओ। सब निर्मल हो जाएगा।”
दामोदर हँसा। बहुत सूखी हँसी।
“इका त गंगा मईया भी न धोइ सकत है।
चारो धाम, मंदिर-मस्जिद, देवी-देवता, जादू-टोना, जंतर-मंतर… केहू ना ठीक कर सकत है…”
उसकी आँखें अब कहीं दूर देख रही थीं।
“केतना करोड़ साल लगा कीड़ा-मकोड़ा से जानवर… जानवर से आदमी… और आदमी से इंसान बनई में।
एक क्षण भी न लगा सब तहस-नहस, बर्बाद करई में।”
हवा एकदम थम गई।
“जो तुमको दुनिया में लाई… लोरी गाई के सुलाई… पाल-पोस के बड़ा की…
बिटिया बनके भाग्य जगाई… बहिन बनके स्नेह लुटाई…
जेका तुम अर्धांगिनी कहत हो… अपनी आत्मा का हिस्सा कहत हो…
देखो अपने आस-पास… कइसे मार रहे… पीट रहे… हत्या कर रहे…”
उसकी आवाज भर्रा गई।
“चीर रहे… नोच रहे… गीध के जैसन देखो…
इतनी निर्ममता कि गीध भी ना देख पाए… लुप्त होई गए दुनिया से…”
अब कोई कुछ नहीं बोल रहा था।
“देख सकत हो त देखो… ओकर छाती पे अपने दाँतों और नाखूनों के निशान।
सुन सकत हो त सुनो… खून से लथपथ… निर्बस्त्र… क्षत-विक्षत… तुम्हरे पाँव के नीचे से आती उसकी चीख।
गोंद दिए हो चाकुओं से। टुकड़ा-टुकड़ा कर दबाई दिए हो मिट्टी में।
कोई सबूत, कोई निशान ना रहे—जलाई रहे हो हर रोज…”
गजोधर बेचैन हो उठा।
“बस कर दामोदरा…”
लेकिन दामोदर जैसे वर्षों बाद बोल रहा था—
“एतनी क्रूरता… पहचान पाई रहे हो कि नहीं हमको और अपने को?
ये हमही, बिरजू और तुमही हो गजोधर भईया…”
“ई… ई… ई दामोदरा! तुम दुइनों होगे मगर हम नहीं हैं।
ठीक से पढ़-लिख लिए होते त दिमाग भ्रष्ट ना होता। हम त पहिले ही कहि रहे थे गाँव छोड़-छाड़ के शहर चलो।”
बिरजू अब मुस्कुरा रहा था। कड़वी मुस्कान।
“वाह गजोधरा… बड़ा घमंड है तोका अपने शहर पे, पढ़ाई-लिखाई पे।
त खबर मिली कि नहीं?
बहुतै पढ़ा-लिखा… इतिहास, भूगोल, विज्ञान, नियम-कानून का ज्ञानी… समाज का रक्षक… बड़े शहर का बड़ा अफसर…
कैसे लूटा है अपने साथ काम करने वाली औरत का?
कैसे टुकड़ा-टुकड़ा कर कूकर में उबाल के कुत्ते को खिलाता रहा तुम्हरे बड़े शहर का बड़ा आदमी?”
गजोधर अब चुप था।
“कौनव जगह सुरक्षित है तुम्हरे शहर में? दफ्तर, अस्पताल, बस, ट्रेन, गली, मोहल्ला…”
दामोदर फिर बोला—
“ई सबसे बच के कोई का लगता है कि दुनिया बनाने वाले गॉड, भगवान, अल्लाह की शरण में जाके कुछ सहारा मिलेगा…
त भगवान का बड़का भगत ही दबोच ले रहा है… तार-तार कर दे रहा है…”
अब उसकी आवाज बहुत धीमी थी।
“जो संस्कारी है… जेका तुम पैरवी करत हो… जो शांत है, सौम्य है… जेकरे हृदय में औरत के लिए बड़ी श्रद्धा है…
तुम देख नहीं पा रहे हो…
वो हाथ-पाँव नहीं हिला रहा… चिल्ला भी नहीं रहा… गालियाँ भी नहीं दे रहा…
औरत को देवी मान हाथ जोड़े खड़ा है…
लेकिन अपनी आँखों से उस देवी के कपड़े उतार रहा है… उसके आँचल में झाँक रहा है…
एक मौका नहीं छोड़ रहा… नजर गड़ाए है…”
दामोदर ने अपनी आँखें बंद कर लीं।
“तुम नहीं देख सकत हो… काहे कि तुम खाली बाहर-बाहर अच्छा-अच्छा देख रहे हो।
हम बाहर देख के अपने भीतर भी देख रहा हूँ।
कितना विकराल… कितना वीभत्स… कितना अट्टहास कर रहा है हमरे भीतर…”
कुछ देर मौन रहा।
फिर बहुत धीरे से दामोदर बोला—
“ममता, प्रेम और सहानुभूति की चाह में…
हमरे कंधे पर सर टिकाए आखिर कहाँ जाए ई बिटिया… ई बहिन… ई देवी…
हमसे छिप के… हमसे बच के…”
“का तुम बचाई सकते हो?
तुम्हरा भगवान बचा सकता है?
शिक्षा-दीक्षा, कानून और समाज बचाई सकता है?”
अब कोई उत्तर नहीं था।
खिड़की के भीतर दामोदर की पत्नी अपनी बिटिया को आँचल में छुपाए खड़ी थी।
उसकी आँखें डरी हुई थीं।
बाहर आम के पेड़ से एक पका आम धम्म से गिरा।
लेकिन इस बार उसे उठाने कोई नहीं गया।