मनुष्य से बड़ा व्यभिचारी शायद ही जगत में कोई दूसरा जीव होगा। आवरण का प्रपंच तो मनुष्य की दुर्बलता और अहंकार का प्रतीक है। मनुष्य ही है जो जानवरों की खाल से बने वस्त्र पहन सकता है,पंछियों को पिंजरे में कैद कर सकता है,कुत्तों के गले में पट्टा, बैलों के गले में घंटी और घोड़े के पांव में नाल ठोंक सकता है यह प्रतिभा जानवरों में नही है। इसीलिये तो जानवरों में बलात्कार करने का हुनर नही है, अनावृत्त रहकर भी बेचारे सहज रहते हैं कैसे तुच्छ जीव हैं। पुरुष सदियों से आधे अधूरे नंग धड़ंग स्त्रियों के सामने बेटे,भाई, भतीजे, देवर,ससुर चाचा,ताऊ बनकर आते रहे पर स्त्रियों सहज रहीं किंतु पुरुष स्त्री को आंशिक अनावृत्त देख भी सहज न हो सके, वासनाओं में उलझे रहे और अपनी दुर्बलता को चरित्रहीनता और व्यभिचार जैसे शब्दों के पीछे छुपा दिया। इसीलिए तो कभी चाचा,कभी मामा, कभी भाई, कभी देवर और आजकल तो बाप भी। सीमाओं ने संसार को जन्म दिया है और जो सीमाओं के बाहर है वो परमात्मा है।
Saturday, July 15, 2023
Tuesday, July 4, 2023
सइयाँ बिजली वाले
बिजली की तार छुए पिया बार बार छुए
फिर भी न कोई जोश और न जवानी है
अधर में लटकी है दर दर भटकी है
लगता है कि व्यर्थ अब मेरी जिंदगानी है
सुने है कि काम करता है हाई वोल्टेज का
फिर भी लो वोल्टेज की इसकी कहानी है
चारों ओर ख्वाहिशें हैं ख्वाहिशों का समंदर है
बस आंख में ही है और कहीं नही पानी है
जिया मेरा धड़के है बायीं आँख फड़के है
मन के जो तार जुड़े फ्यूज उड़ जाता है
देखता है मेरी तरफ मद भरी आंखों से
पर सीढ़ी तार लिए कहीं और मुड़ जाता है
लाख चिट्टी लिखूं, लाख लिखूं लव लेटर
उसके मेरे बीच मे हैं जाने कैसा इंसुलेटर
अर्थ फाल्ट ओवर करंट सब गया बेकार
पंक्चर होता नही बिजली गिरी हजार।
हाय रे विधाता क्या गजब मनमानी है
लगता है कि व्यर्थ अब मेरी जिंदगानी है।
एक रोज सांझ ढले मौसमी खुमार रहा
खिड़की से बार बार पिया था निहार रहा
शिव की कृपा हुई रति के भाग जगे
राग रागिनी सजे मन के सितार बजे
प्रेम की मधुर घड़ी अपलक मैं खड़ी
पूर्ण होगी प्रार्थना आस है मुझे बड़ी।
विकास
मोहन ...बेटा मोहन..कुछ खा ले फिर खेलने जाना..मोहन..कहाँ चला गया अभी तो स्कूल से आया था..क्यों अपनी बूढ़ी दादी को सता रहा है,कहाँ छिपा है ??
मोहन को सामने न पाकर बूढ़ी जमुना काकी कुछ विचलित हुई। होती भी क्यों न ..बुढ़ापे का एक ही सहारा था..बेटा और बहू दोनों विदेश जा बसे थे। जमुना काकी को अपनी मिट्टी से बड़ा लगाव था सो पोते मोहन को ले गांव में ही रह गई। बेटा हर महीने परदेश से जमुना काकी और मोहन के गुजर-बसर के लिए पैसे भेज देता। बस यूं ही जमुना काकी का गुजारा चल रहा था। छह साल के मोहन पर दादी की परवरिश का पूरा प्रभाव था। वह भी गांव के परिवेश और प्रकृति के आनंद में तल्लीन रहता था। मिट्टी से सना हुआ, स्कूल यूनिफार्म पर मिट्टी की एक परत लपेटे अभी तो स्कूल से आया था। बूढ़ी दादी को एक झलक दिखा अचानक जाने कहाँ चला गया।
“ये लड़का एकदम अपने बाप पर गया है। वो भी एक मिनट के लिए घर में नहीं रुकता। जरूर कहीं अपनी टोली के साथ खेलने निकल गया होगा।”
“दादी भूख लगी है… कुछ खाने को दो न…”
कुएँ की सीढ़ियों पर बैठे मोहन की आवाज सुन जमुना काकी की जान में जान आई।
“अरे मोहन बचवा तू वहाँ क्या कर रहा है? आ खाना खा ले… तेरे लिए खीर बनाई है।”
खीर का नाम सुनते ही मोहन भागता हुआ आकर जमुना काकी से लिपट गया।
“दादी बहुत भूख लगी है, जल्दी से खीर दो ना…”
“अच्छा जब इतनी भूख लगी थी तो बाहर कुएँ की सीढ़ियों पर जाकर क्यों बैठा था? और वो मुखिया जी के घर की तरफ क्यों देख रहा था बार-बार उचक-उचक कर?”
“दादी पता है! आज स्कूल में वो लंबी चुटिया वाले पुराने गुरुजी आये थे जो कभी-कभी आते हैं और जो पिछली बार कह के गए थे कि मुखिया जी के घर विकास आने वाला है। आज उन्होंने बताया कि मुखिया जी के घर विकास आ गया है। और कह रहे थे कि बच्चों तुम सब मन लगाकर पढ़ो तो तुम्हारे घर भी विकास आयेगा। दादी ये विकास क्या है और मुखिया जी के घर पर क्यों आया है? हमारे घर पर क्यों नहीं आया?”
“पहले तू खीर खा ले फिर बताती हूँ…”
यह कहकर जमुना काकी बड़े प्यार से कटोरी भर खीर रसोई से लाई और मोहन को अपने हाथों से खिलाया। उन्हें लगा शायद खीर खाने में तल्लीन मोहन अपने प्रश्नों को भूल जाये। पर मोहन तो मोहन था। खीर खाते ही उसने दादी से पूछ ही लिया—
“दादी अब बताओ न ये विकास क्या है?”
“क्यों तेरे लंबी चुटिया वाले गुरुजी ने नहीं बताया?”
“बताया होता तो तुमसे क्यों पूछता… बताओ न दादी… और मुझे मुखिया के घर ले चलो न… मुझे विकास को देखना है…”
“अभी-अभी स्कूल से आया है, कुछ देर आराम तो कर ले। मुखिया का घर कुएँ की सीढ़ियों से दिखाई जरूर देता लेकिन वो गांव के दूसरे छोर पर है। पैदल जाना पड़ेगा। इतनी दूर पैदल चल लेगा तू? अब मुझमें इतनी ताकत नहीं रही कि तुझे गोद में उठाकर मुखिया के घर तक चल सकूँ। अब मैं बूढ़ी जो हो चुकी हूँ…”
“पर मैं बूढ़ा थोड़े हूँ… मैं पैदल ही जाऊँगा। तुम चलो न दादी…”
“ठीक है बाबा… चलती हूँ…”
इतना कहकर जमुना काकी ने दीवार पर टंगी अपनी पुरानी चादर उठाई और दरवाजे की कुंडी लगा मोहन का हाथ थाम लिया। सांझ धीरे-धीरे गांव पर उतर रही थी। कहीं चूल्हों का धुआँ उठ रहा था, कहीं मवेशी लौट रहे थे। पगडंडी पर चलते हुए मोहन बार-बार उत्साह से उछल पड़ता।
“दादी… विकास कैसा दिखता होगा?”
“पता नहीं बचवा…”
“क्या वो शहर से आया होगा?”
“होगा… गांव में जो चीज अपने आप नहीं आती, वो अक्सर शहर से ही आती है…”
मोहन कुछ समझा, कुछ नहीं। वह रास्ते भर कल्पनाएँ करता रहा—शायद विकास कोई जादूगर होगा, शायद कोई बड़ा आदमी, शायद कोई ऐसा मेहमान जिसके आते ही घर चमक उठते हैं।
थोड़ी दूर चलने के बाद गांव की कच्ची गलियाँ अचानक सीमेंट की चिकनी सड़क में बदल गईं। दोनों ओर नए खंभों पर बिजली की लड़ियाँ जगमगा रही थीं। मोहन की आँखें चमक उठीं।
“दादी… यहाँ तो शहर जैसा लग रहा है!”
जमुना काकी चुप रहीं।
उन्हें याद आया, पिछले चुनाव में मुखिया जी ने पूरे गांव में कहा था—“गांव में विकास लाना है।”
तब लोगों ने सोचा था कि शायद स्कूल की टूटी छत बन जाएगी, तालाब साफ हो जाएगा, अस्पताल में दवाई मिलने लगेगी।
पर वर्षों बाद गांव में बदला क्या?
बस मुखिया का घर।
अब वे दोनों उसी घर के सामने खड़े थे।
मुखिया जी की हवेली रोशनी से नहा रही थी। बाहर दो बड़ी गाड़ियाँ खड़ी थीं। दरवाजे पर संगमरमर लगा था। भीतर से हँसी और बर्तनों की खनखनाहट आ रही थी।
मोहन विस्मित होकर बोला—
“दादी… विकास यहीं रहता है क्या?”
उसी समय दो आदमी बाहर निकलते दिखाई दिए।
एक ने बीड़ी सुलगाते हुए कहा—
“मुखिया जी की तो किस्मत खुल गई। विकास का सारा पैसा यहीं लग गया।”
दूसरा हँसकर बोला—
“अरे भाई, तभी तो देखो… नई गाड़ी, नया बरामदा, ऊपर दूसरी मंजिल… गांव में ऐसी कोठी किसी के पास नहीं।”
दोनों हँसते हुए आगे बढ़ गए।
मोहन ने धीरे से पूछा—
“दादी… विकास पैसा होता है क्या?”
जमुना काकी ने पहली बार मुखिया की हवेली को गौर से देखा।
घर के सामने चमचमाती सड़क थी, लेकिन उसी सड़क का सीमेंट थोड़ी दूर जाकर टूट जाता था।
मानो विकास ने अपना रास्ता यहीं तक तय किया हो।
उसी समय मुखिया जी बाहर निकले। सफेद कुर्ता, मोटा पेट, गले में सोने की चेन। उन्होंने मोहन और जमुना काकी को देखा।
“अरे काकी! इतनी रात गए कैसे आना हुआ?”
मोहन उत्साह से आगे बढ़ा—
“मुखिया जी! हम विकास को देखने आए हैं।”
मुखिया जी पहले तो चौंके, फिर ठहाका मारकर हँस पड़े।
“देखा काकी! आजकल के बच्चे भी कितनी बड़ी-बड़ी बातें करने लगे हैं।”
जमुना काकी ने धीमे स्वर में कहा—
“हाँ मुखिया जी… बच्चा है। स्कूल में सुन लिया कि आपके घर विकास आया है, तो देखने की जिद करने लगा।”
मुखिया जी की हँसी थोड़ी धीमी पड़ी। उन्होंने बात बदलते हुए नौकर को आवाज दी—
“अरे ओ रामू! बच्चे को मिठाई दे दो।”
मोहन ने मिठाई लेने के बजाय फिर पूछा—
“मुखिया जी… विकास कहाँ है?”
इस बार मुखिया जी के चेहरे पर हल्की झुंझलाहट उभरी।
उन्होंने मोहन के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—
“बेटा… बड़े होकर समझ जाओगे।”
मोहन मासूमियत से बोला—
“लेकिन गुरुजी तो कह रहे थे कि मन लगाकर पढ़ोगे तो तुम्हारे घर भी विकास आएगा। मैं तो पढ़ता हूँ… फिर हमारे घर क्यों नहीं आया?”
अब आँगन में एक पल को सन्नाटा छा गया।
मुखिया जी ने नजरें फेर लीं।
जमुना काकी के होंठ काँप उठे।
उन्होंने मोहन का हाथ पकड़ा और वापस मुड़ गईं।
लौटते समय मोहन बार-बार पीछे मुड़कर उस रोशनी से भरे घर को देखता रहा। फिर धीरे से बोला—
“दादी… विकास बहुत अमीर होगा न?”
जमुना काकी ने थकी हुई आँखों से अंधेरे में डूबे अपने गांव को देखा और बोलीं—
“हाँ बचवा…
विकास अब गरीबों के घर नहीं आता।
उसे बड़े दरवाजों पर रहना अच्छा लगता है…”