Friday, October 31, 2025

सैनबाड़ी

सन् 1970 का बंगाल।
वह समय जब हवा में केवल धूल नहीं उड़ती थी, विचारधाराएँ भी उड़ती थीं।
दीवारों पर लिखे नारे लोगों के भीतर उतर चुके थे।
किसी के घर का रंग, किसी के हाथ का झंडा, किसी की सभा में जाना — सब मनुष्य की पहचान बन गए थे।
बर्दवान का वह पुराना मोहल्ला बाहर से बिल्कुल साधारण लगता था।
संकरी गलियाँ, काई जमी दीवारें, बरामदों में रखे जल के घड़े, और शाम ढलते ही घरों से आती शंखध्वनि।
उसी मोहल्ले में एक घर था — सैन परिवार का घर।
लोग उसे “सैनबाड़ी” कहते थे।
घर में राजनीति थी, लेकिन जीवन भी था।
माँ सुबह तुलसी पर जल चढ़ाती थी।
रसोई में चावल की भाप उठती थी।
आँगन में बच्चे कभी हँसते हुए दौड़े होंगे।
पर उन दिनों बंगाल में घर केवल घर नहीं रह गए थे; वे राजनीतिक पहचान बन चुके थे।
शहर में कई दिनों से तनाव था।
जुलूस निकलते, नारे लगते, टकराव होते।
लोग अब बहस कम और घृणा अधिक करने लगे थे।
ऐसा लगता था मानो विचार धीरे-धीरे मनुष्यता को खा रहे हों।
फिर वह दिन आया।
सुबह से ही वातावरण विचित्र था।
गलियाँ असामान्य रूप से शांत थीं, जैसे किसी तूफ़ान से पहले की हवा।
दोपहर तक खबरें आने लगीं कि शहर के कई हिस्सों में हिंसा फैल चुकी है।
सैनबाड़ी के भीतर माँ बेचैन थी।
वह बार-बार दरवाज़े तक जाती, लौट आती।
उसे राजनीति की गहराइयाँ समझ नहीं आती थीं।
उसे केवल इतना पता था कि बाहर कुछ भयावह घूम रहा है।
शाम ढलने लगी थी जब भीड़ वहाँ पहुँची।
पहले नारे सुनाई दिए।
फिर पत्थर।
फिर दरवाज़े पर प्रहार।
उस क्षण घर अचानक घर नहीं रहा; वह युद्धभूमि बन गया।
भीड़ भीतर घुस आई।
चेहरों पर क्रोध था, आँखों में उन्माद।
ऐसा उन्माद जिसमें मनुष्य दूसरे मनुष्य को नहीं देखता — केवल “शत्रु” देखता है।
फिर जो हुआ, वह इतिहास के सबसे भयावह राजनीतिक प्रसंगों में गिना जाने लगा।
घर के बेटों की हत्या कर दी गई।
चीखें दीवारों में समा गईं।
आँगन, जहाँ कभी जीवन की आवाज़ें रही होंगी, रक्त से भर गया।
लेकिन क्रूरता यहीं समाप्त नहीं हुई।
कहा जाता है कि हत्या के बाद उनके रक्त से सने चावल माँ के सामने परोस दिए गए।
इतिहासकार इस घटना के कुछ विवरणों पर अलग-अलग मत रखते हैं, पर यह कथा बंगाल की सामूहिक स्मृति में इतनी गहराई से दर्ज हुई कि वह स्वयं एक प्रतीक बन गई — राजनीतिक अमानवीयता का प्रतीक।
कल्पना कीजिए उस क्षण को।
एक माँ, जिसने उन्हीं बच्चों को अपने हाथों से खिलाया था,
जिसने बुखार में रात-रात भर जागकर उनकी साँसें सुनी थीं,
जिसने उनके लिए देवताओं से प्रार्थनाएँ की थीं—
उसी माँ के सामने उसके पुत्रों के रक्त से सनी थाली रख दी जाए।
उस क्षण केवल एक परिवार नहीं टूटा था।
मनुष्यता का चेहरा फट गया था।
राजनीतिक हिंसा में लोग मरते हैं।
दंगे इतिहास में बार-बार हुए हैं।
लेकिन कुछ घटनाएँ इसलिए अमर हो जाती हैं क्योंकि वे केवल हत्या नहीं होतीं — वे करुणा की हत्या होती हैं।
सैनबाड़ी कांड ऐसा ही एक क्षण बन गया।
उसने लोगों को यह सोचने पर मजबूर किया कि विचारधारा जब मनुष्य से बड़ी हो जाती है, तब वह धर्म नहीं रहती, उन्माद बन जाती है।
और उन्माद का सबसे भयावह रूप वही है, जहाँ किसी माँ के आँसू भी मनुष्य को रोक नहीं पाते।

 - देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत' 

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