Thursday, May 1, 2025

 रोहिणी पुलिस स्टेशन !

इंस्पेक्टर सलिल ने फोन पर बात करके कॉल को डिस्कनेक्ट कर दिया था।.....परंतु अभी भी वो शांत नहीं हुआ था, उसकी धड़कन धौंकनी की मानिंद चल रही थी। उसके चेहरे पर आश्चर्य के भाव गोते लगा रहे थे। ऐसा कैसे हो सकता है कि उसने अभी अपराध के बारे में चर्चा की और अभी अपराध घटित हो गया। क्या यह महज एक संयोग है? या फिर उसकी जुबान ही काली है। बस सलिल संशय और आश्चर्य के सागर में डुबकी लेता हुआ अपनी सीट के पास पहुंचा और धम्म से बैठ गया। इस समय उसके हाव-भाव से ऐसा ही प्रतीत हो रहा था कि जैसे वो शक्तिहीन हो चुका हो।

जबकि रोमील, उसे तो कुछ भी समझ नहीं आ रहा था। आखिर हुआ क्या....अभी साहब अच्छे मूड में थे, अचानक ऐसी क्या बात हुई कि एक दम से लुंज- पुंज हो गए। ज्यादा तो कुछ नहीं, परन्तु वह इतना तो समझ ही चुका था कि कोई अनहोनी घटित हुई है... परंतु क्या? यह उसके लिए सवाल ही था। वैसे तो रोमील अभी जीवन के बारे में ज्यादा नहीं समझता था, आखिर उसकी उम्र भी तो अधिक नहीं थी। परन्तु साहब के साथ नौकरी करते हुए इन दो वर्ष में बहुत कुछ समझ गया था।

साथ ही वो सलिल के गांव का था, बचपन से सहपाठी था..वो अच्छी तरह से जानता था कि किसी के चेहरे पर आश्चर्य का भाव आना, मतलब नहीं होने वाली बात घटित हो गई है। लेकिन क्या? इसी प्रश्न का उत्तर जानने के लिए उसने हिम्मत जुटाकर सलिल से प्रश्न पूछा- "आखिर बात क्या है सर कि आप इस तरह से हैरान-परेशान है?"

रोमील ने प्रश्न पूछा और अपनी नजर सलिल के चेहरे पर टिका दी। जबकि सलिल, जब वो परेशान हो, उस समय उससे कोई प्रश्न पुछे, उसे नागवार गुजरता था।  इस समय भी उसके चेहरे पर नाराजगी दिखी, परंतु वह तुरन्त ही सामान्य हो गया, फिर बोला-

घटित हो चुका है!

"लेकिन क्या?"

आधे-अधूरे उत्तर सुनकर रोमील ने अपने प्रश्न को दुहरा दिया। जबकि दुबारा प्रश्न सुनकर सलिल के स्वर में नाराजगी की गंध आ ही गई। वो तनिक उखड़े हुए स्वर में बोला।

तुम भी न रोमील, बहुत सवाल किया करते हो। कभी तो थोड़ी शांति रखा करो और अपने जुबान को आराम दिया करो। सलिल ने जब अपनी बात खत्म की, रोमील कांप चुका था। वह समझ चुका था कि साहब नाराज हो चुके है, इसलिये संयमित स्वर में बोला-

"ज...जी सर! "

उसके सहमें हुए स्वर सुनकर सलिल तुरंत ही शांत हो गया और अपनी जगह से उठता हुआ बोला-

"तुम जल्दी मेरे साथ चलो, फिर रास्ते में बतलाता हूं कि आखिर हुआ क्या है।"

बोलने के साथ ही सलिल ऑफिस से बाहर निकला। फिर क्या था, रोमील ने उसका अनुसरण किया। दोनों बाहर आकर पुलिस वैन में बैठे और सलिल ने वैन स्टार्ट की और दौड़ा दिया। वैन गेट से निकली और सड़क पर सरपट दौड़ने लगी। जबकि इसी बीच सलिल ने डॉग स्क्वायड एवं फिंगर प्रिंट एक्सपर्ट को कॉल कर दिया। उसके बाद उसने ड्राइविंग पर अपनी नजर जमा दी। 

लेकिन इसका मतलब ये नहीं था कि उसका ध्यान कहीं और नहीं था। उसकी तिरछी नजर पास हो रहे दोनों किनारे की बिल्डिंग को भी देख रही थी। रात के दस बज चुके थे और ऐसे में दिल्ली की सड़क पर ट्रैफिक में कमी आ गई थी। सलिल सड़क के दोनों ओर बहुमंजिला इमारतों एवं मल्टी स्टोर को देखे जा रहा था । साथ ही उसकी तिरछी नजर कभी-कभी रोमील के चेहरे पर भी जाकर टिक जाती थी।....वह जानता था कि रोमील उसके व्यवहार से दुःखी है, स्वाभाविक ही है कि उसे इस प्रकार से बात नहीं करनी चाहिए थी। बस इतना सोचने के बाद सलिल रोमील को संबोधित करके धीमे स्वर में बोला-

"रोमील ! सॉरी यार, वैसे तुमने पूछा था न कि क्या हुआ?"

बोलकर सलिल रुक सा गया। जबकि उसको बोलते देख कर रोमील चहक कर बोला-

"यस सर ! मैं जानना चाहता था कि एक फोन कॉल ने आपके चेहरे के भाव को कैसे बदल दिया? बस एक फोन कॉल और आप आश्चर्य के सागर में डूब से गए।"

"बात ही कुछ ऐसी है रोमील.... मैंने तुमको कहा था न कि आजकल अपने इलाके में शांति है।....परंतु सिर मुड़वाते ही जैसे ओले पड़े हो, मेरी जुबान काली साबित हुई। मैंने इधर अपनी बातें खत्म नहीं की, उधर होटल सांभवी में मर्डर हो चुका था।अब मैं क्या जानता था कि मैं बोलूंगा और अपराध घटित हो जाएगा।अब इसे संयोग कहे, या अभिशाप कि बोला नहीं और अपराध घटित भी हो गया।"

बोलने के बाद सलिल तिरछी नजर से रोमील के चेहरे को देखने लगा, जबकि उसके हाव-भाव से लग रहा था कि वो तल्लीनता के साथ ड्राइव कर रहा है। पुलिस जिप्सी आगे की ओर सरपट दौड़ती जा रही थी।

"नहीं सर ! आप भी न खामखा ही उस बात को दिल पर ले बैठे है। वैसे भी अपराध घटित होना होता है, तो होता ही है, चाहे आप बोलते, या नहीं बोलते।"

सलिल के चुप होते ही रोमील उत्साहित होकर बोला।

उसकी बातें सुनकर सलिल कुछ बोलने ही वाला था, लेकिन फिलहाल उसने अपना इरादा बदल दिया। क्योंकि होटल सांभवी आ चुका था और अब उसे पुलिसिया कार्रवाई को अंजाम जो देना था। सलिल ने पुलिस जिप्सी को होटल गेट के अंदर घुसाया और कंपाऊंड में खड़ी कर दी। फिर वे दोनों जिप्सी से बाहर निकले और बिल्डिंग की ओर बढ़ चले। जिप्सी से उतरते समय ही सलिल की तेज नजर ने देख लिया था कि पुलिस टीम आ चुकी है। इसका मतलब है कि काम शुरु हो चुका है। इसलिये उसने अपनी चाल तेज कर दी। वे होटल के उस रूम में पहुंचे, जहां वारदात हुई थी।

वहां पहुँचने के बाद सलिल ने नंदा की लाश को देखा। "लाश" को नंगी अवस्था में देखकर सलिल के तो हाथ-पाँव ही फूल गए। कहीं मीडिया बालों ने लाश को इस अवस्था में देख लिया, तिल से ताड़ बनाते देर नहीं करेंगे। फिर तो उसकी शामत ही आनी है, क्योंकि उसका खड्डूस बाँस तो बस मौके की तलाश में ही रहता है। बस मौका मिला नहीं कि उसपर राशन-पानी लेकर चढ दौड़ेगा।

.....सोचकर ही सलिल ने झुरझुरी सी ली, फिर उसने फिंगर एक्सपर्ट जयकांत बात्रा को निर्देशित किया कि लाश को ढक दे। परन्तु जयकांत बात्रा ने उसको समझाया कि अभी सबूत इकट्ठी करनी है, इसलिये लाश के साथ छेड़छाड़ करना ठीक नहीं।

जयकांत की बातें सुनकर उसने हामी भरी, फिर वहां खड़े पुलिस के जवानों को निर्देशित करने लगा कि जब तक वो नहीं कहे, मीडिया वाले को अंदर आने नहीं दे। उसके बाद सलिल लाश के पास बैठ गया और गहरी नजर से नंदा के जिस्म को देखने लगा। तभी उसकी नजर दूर कोने में बैठे श्रेयांश पर गई। 

सलिल उठा और श्रेयांश के पास पहुंचा। उसे अपनी ओर बढ़ता देख श्रेयांश की धिग्धी बंध गई, जबकि सलिल उसके करीब ही बैठ गया।.....फिर अपने हाथ को उसने श्रेयांश के कंधे पर टिका दिया। उसका सहानुभूति भरा स्पर्श पा कर श्रेयांश थोड़ा शांत हुआ और सलिल को घटना के बारे में बतलाने के लिए उद्धत हुआ।.....परंतु उससे बिना कोई सवाल किए ही सलिल उठा और होटल के दूसरी तरफ बढ़ गया।

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श्रेयांश के पास से उठने के बाद सलिल होटल के अंदर की तरफ बढ़ा। होटल पांच मंजिला था, इसलिये सलिल को पूरा होटल खंगालने में करीब एक घंटे का समय लग गया। परंतु…. क्या मजाल कि उसके चेहरे पर हल्की सिकन भी आई हो। लेकिन पूरा होटल छान मारने के बावजूद भी उसके हाथ ऐसी कोई भी चीज नहीं लगी, जिसे वो अपने काम की समझता। 

इसलिये होटल का एक चक्कर लगाने के बाद वो वापस उसी रूम में आ गया, जहां नंदा की लाश रखी हुई थी।.....परंतु वो नंदा के लाश के करीब जाने के बजाए सीधे श्रेयांश के पास पहुंच गया और उसके करीब पलथी मारकर बैठ गया। फिर श्रेयांश की आँखों में झांकते हुए सपाट स्वर में बोला।

बर्खुर्दार! आप अपना परिचय देंगे?

ज....जी सर! श्रेयांश, श्रेयांश मजुमदार। श्रेयांश सलिल के प्रश्न सुनकर हकला कर बोला। जबकि उसका जबाव सुनकर सलिल के होंठों पर मंद-मंद मुस्कान छा गई। उसने एक मिनट तक श्रेयांश के चेहरे का अवलोकन किया, फिर शब्दों को चबा-चबा कर बोला।

तो श्रीमान! अब यह भी बतला दो कि इस होटल में तुम दोनों कर क्या रहे थे?

कुछ नहीं सर-कुछ नहीं सर। श्रेयांश जल्दी-जल्दी बोला, फिर रुका, उसके बाद बोला। सर, नंदा और हम अच्छे मित्र थे और बस होटल घूमने आए थे।

तड़ाक! जोरदार चांटे की आवाज रूम में गूंजउठा। साथ ही श्रेयांश की दबी-दबी चीख भी गूंजी। साथ ही सलिल गुर्रा कर बोला। अबे, मुझे चुतिया समझता है क्या? जो मुझे कच्ची गोलियां दे रहा है। बोलने के बाद सलिल थोड़ी देर के लिए रुका और देखा, श्रेयांश अपने गाल सहला रहा था, क्योंकि सलिल के पाँचों अंगुलियों के निशान उसके गाल पर छप चुके थे। 

स्वाभाविक था कि भय की स्याह परत उसके आँखों में फैल गई थी। उसके मानसिक स्थिति को समझने के बाद सलिल फिर से पूर्ववत बोला। इत्ता सा है तू और मुझे बेवकूफ बना रहा है। अबे, मैं नहीं जानता कि एक लड़का और एक लड़की होटल में इतनी रात को क्या करने आते है।

ज......जी सर! सहम कर बोला श्रेयांश। जबकि उसकी बाते सुनी-अनसुनी कर के सलिल ने रोमील को आवाज दी और ऊँचे स्वर में बोला।

रोमील!......जरा श्रेयांश के पट्ठे को हथकड़ी लगाकर पुलिस स्टेशन लेकर चलो। वहां चलकर इसका जमकर स्वागत करेंगे। फिर देखना कि यह किस प्रकार से सत्य सुनाता है।

सलिल का बोलना और श्रेयांश के हौसले पस्त हो गए। अब वह अच्छी तरह से समझ चुका था कि पुलिस को घटित घटना के बारे में पूरी डिटेल से बताना होगा, अन्यथा वह सुनता आया था कि " पुलिस की मार मुर्दों से भी सच उगलवा लेती है"। इसलिये वो टेप रिकार्ड की तरह बतलाने लगा कि वह नंदा के साथ यहां पर क्यों आया था। वह कुछ देर पहले घटित हुए घटना की एक- एक बारीकियों को बतलाने लगा। सलिल उसकी बातों को ध्यान पूर्वक सुन रहा था, साथ ही उसकी नजर श्रेयांश के आँखों में ही गड़ी थी।

....इतना तो वो समझ चुका था कि श्रेयांश सच बोल रहा है, लेकिन उसका तसदीक करना बाकी था। इसलिये जब श्रेयांश ने अपनी बात खतम की, सलिल वहां से उठा और रोमील के पास पहुंचा, साथ ही उसने जयकांत से पूछा कि” उसका काम हो गया?

जयकांत ने तत्परता के साथ हां में सिर को हिलाया। फिर क्या था, सलिल ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेजने को कहा। फिर रोमील से बोला कि इस होटल के मैनेजर के पास चलो। बाँस का ऑर्डर, रोमील सलिल को लेकर उधर चल पड़ा, जिधर होटल के मैनेजर श्रीकांत भल्ला का ऑफिस था।

...जब वे दोनों भल्ला के ऑफिस में पहुंचे, उन्होंने देखा कि घबराहट में डूबा हुआ भल्ला सिगरेट पर सिगरेट फूंके जा रहा था।....दोनों करीब दो मिनट तक गेट पर ही खड़े होकर भल्ला के हरकतों को देखते रहे। "तभी भल्ला की नजर उन दोनों पर पड़ी और वो उछलकर खड़ा हो गया, मानो उसके चेयर के नीचे स्प्रिंग लगा हो"। फिर जबरन अपने शब्दों में मिठास घोल कर उसने दोनों का स्वागत किया।

फिर तो’ दोनों आगे बढे और खाली कुर्सी पर बैठ गए, तब भल्ला भी बैठ गया। भल्ला भले ही नार्मल दिखने की कोशिश कर रहा था, परन्तु उसके चेहरे पर खौफ स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहा था। भल्ला ने सलिल के बारे में सुन रखी थी और वो पुलिसिया रवैये को भी अच्छी तरह से जानता था। जबकि दूसरी तरफ सलिल ने भरपूर नजरों से ऑफिस को देखा, ऑफिस की सजावट बेहतरीन तरीके से की गई थी।....वहां हर एक सुविधा की वस्तु मौजूद थी, जो एक काँर्पोरेट ऑफिस में होता है। ऑफिस का मुआयना कर लेने के बाद सलिल ने भल्ला के आँखों में देखा और बोला।

श्रीमान भल्ला साहब! आप प्रकाश डालेंगे कि इस होटल में किस-किस प्रकार की गतिविधि हो रही थी।

ज....जी कुछ नहीं सर। अमूमन जैसा कि हर होटल में होता है, यहाँ भी ग्राहकों को सुविधा दी जाती है। सधे हुए स्वर में बोला भल्ला, जबकि सलिल इस बार गुर्रा कर बोला। 

तो फिर नंदा और श्रेयांश उस कमरे में क्या करने के लिए गए थे? श्रीमान भल्ला, कृपया कर इन बातों पर प्रकाश डाल सकते है? सलिल बोला फिर उसके चेहरे को देखने लगा। जबकि एक बारगी को लगा कि भल्ला टूट जाएगा, परन्तु वह भी ढीठ था, शब्दों को तौल-तौल कर बोला।

सर, आप भी न, किस प्रकार की बात करते है? आप तो जानते है कि” होटल का काम सुविधा मुहैया कराना है। फिर रूम के अंदर जाकर ग्राहक क्या करते है, होटल इस की जिम्मेदारी कैसे ले सकता है।

भल्ला बोलने को तो इन बातों को बोल गया, परंतु उसे क्या पता था कि उसके सामने जल्लाद बैठा हुआ है। अभी तो भल्ला की बात खतम भी नहीं हुई थी कि "सलिल पूरे दमखम से उसपर पिल पड़ा और उसको ठोकरों पर रख लिया। "सलिल तो वहशी हो चुका था" उसने यह नहीं देखा कि चोट कहां लग रही है। वो तो बस मारता ही रहा और रूम में भल्ला की कराह गूंजती रही। 

आखिर मारते-मारते सलिल थक गया, उसकी सांसें फूल गई, परंतु भल्ला नहीं टूटा। ऐसे में समय की कमी को जानकर सलिल ने रोमील से उसको गिरफ्तार करने के लिए कहा और ऑफिस से निकल कर उस रूम में पहुंचा, जहां वारदात हुई थी।

वहां आते ही जयकांत ने उसको बताया कि नंदा की लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी गई है। ऐसे में वहां रुके रहने का कोई मतलब ही नहीं था। तभी रोमील भी वहां भल्ला को लेकर पहुंचा। बस सलिल ने रोमील को निर्देशित किया कि श्रेयांश को भी लेकर चले। इसके बाद वो होटल से बाहर निकलने के लिए बढ़ा। परंतु होटल के बिल्डिंग से बाहर आते ही उसको मीडिया बालों ने घेर लिया। ऐसे में सलिल ने कोशिश की कि” किसी भी तरह से मीडिया बालों से पिंडछुड़ा ले। 

परंतु मीडिया बालों ने उसकी एक नहीं चलने दी। ऊपर से मीडिया बालों के ऊट-पटांग सवाल, बस सलिल चिढ गया और मीडिया बालों से उलझ गया। वो तो भला हो रोमील का कि उसने सलिल को संभाला और खींचकर गाड़ी के पास लेकर गया। फिर वे लोग जिप्सी में बैठे, भल्ला और श्रेयांश को पहले ही बैठा दिया गया था। इसके बाद ड्राइविंग सीट पर बैठे रोमील ने जिप्सी श्टार्ट करके आगे बढ़ा दी।

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रात के करीब एक बजने को थे।

अमूमन तो इस समय तक दिल्ली की सड़क की रफ्तार बहुत धीमी हो जाती थी। परंतु कमर्शियल वाहन की बाढ सी आ जाती थी। जिसमें से अधिकतर बड़ीगाड़ियां होती थी। आज भी सड़क पर बड़ी- बड़ीगाड़ियांदौड़ रही थी। परंतु ऐसा भी नहीं था कि छोटी गाड़ियां नगण्य थी। अभी छोटी गाड़ियां भी इक्का-दुक्का गुजर जाती थी और उसी में वो ब्लैककलर की इनोवा थी, जो सरपट आगे की ओर भागी जा रही थी।

इसका मतलब ऐसा बिल्कुल भी नहीं था कि कार की रफ्तार ज्यादा थी। कार धीमे-धीमे आगे की ओर बढ़ रही थी, जिसका कारण भी था" ड्राइविंग सीट पर बैठी लड़की" जो कि जान बुझ कर कार की रफ्तार धीमी किए हुए थी। लड़की, जिसका नाम सान्या सिंघला था, पोशाक से ही माँडर्ण लगती थी। गोल चेहरा, रस भरे होंठ, भरे-भरे गोरे गाल और कजरारे कारे नैन। 

उसपर रेशमी घने बाल, वह सुंदरता की मूरत ही तो थी। सान्या सिंघला, लाखों में भी नहीं छिपने वाली। इस समय वो एक हाथ से कार की स्टेयरिंग थामे हुए थी और दूसरे हाथ में स्कॉच की बोतल।......जिसे होंठों से लगाकर वो धीमे- धीमे शराब घुटक रही थी।

स्वाभाविक ही था कि वो अगर रात के इस समय शराब घुटक रही थी, तो बेवजह तो सड़क पर कार नहीं दौड़ा रही थी।.....हां, उसे शिकार की तलाश थी। "खुले विचारों की सान्या सिंघला" ,जो कि अभी थी तो काँलेज में ही, परन्तु उसके शौक ऊँचे थे। 

वो अमीर घराने से ताल्लुकात रखती थी और इसलिये उसके आदत बिगड़ गए थे। वो अपने स्वभाव से इस कदर बिगड़ गई थी कि” उसे रोज ही एक नौजवान बेड पर चाहिए था। परंतु…. आज उसके मन माफिक कोई नहीं मिला था शाम से, इसलिये वो बेवजह ही भटक रही थी और कार को सड़क पर दौड़ाए जा रही थी।

कहते है न कि मानव मन अति चंचल होता है और यह अपने स्वभाव में ही जीता है। वह तो मानव को इसपर अंकुश लगाना पड़ता है, "अन्यथा उसे यह मन जीवन में तिगनी का नाच-नचा दे।.....परंतु हर एक मानव की न तो इतनी सामर्थ्य होती है और न ही हर एक इंसान चाहता ही-है कि अपने मन को नियंत्रित करें। परिणाम उसका मन इतनी गति से बहकता जाता है कि " उसे पतन के गड्ढे में गिराकर ही छोड़ता है"। सान्या सिंघला भी अपने मन के हाथों मजबूर थी और परिणाम वो पतन के गड्ढे में गिर चुकी थी।

वह अपने मन के हाथों इतनी मजबूर थी कि उसे हर रोज एक नया जिस्म चाहिए था। वो अपने शौक पूरे करने के लिए किसी हद तक गुजर सकती थी और अभी भी वही कर रही थी। उसको शिकार चाहिए था और उसकी ही तलाश में भटक रही थी। लेकिन बीतते समय के साथ ही उसके चेहरे पर बेचैनी बढ़ती जा रही थी। वो शाम से ही अपने लिए शिकार की तलाश में निकली थी, परंतु अभी तक उसे मन मुताबिक कोई नौजवान नहीं मिला था।.....बस इसी बेचैनी में अब तक वो दो बोतल स्कॉच की गटक चुकी थी।

कहते है न कि मानव जिस चीज का अभ्यस्त हो जाता है, उसे वह चीज समय पर नहीं मिले, वो बेचैन हो जाता है।....फिर उसे कहीं शांति नहीं मिलती और वो अपने मन मुताबिक वस्तु को पाने के लिए हद से भी गुजर जाने को उद्धत हो जाता है।.....मन की लालसा बहुत ही बुरी है, वो मानव से वो भी करवा देती है, जिसकी मानव ने कभी कल्पना भी नहीं की थी। 

वो जो नहीं करना चाहता" उसी काम को करने के लिए लालायित होने लगता है।....फिर तो न तो उसे सामाजिक मान- मर्यादा की चिन्ता रहती है और न ही अनुशासन का भय। वो तो वही करता है "जिसकी उसको जरूरत होती है और जिसकी गवाही उसका मन देता है।

 सान्या सिंघला भी तो उसी में से थी, जो मन के आधीन होते है। उसे भी रात का आनंद उठाने के लिए बांका नौजवान चाहिए था।....परंतु आज सुबह उठकर उसने न जाने किसका चेहरा देख लिया था कि” उसके मन को भाए, "ऐसा नौजवान उसको मिला नहीं था"। 

उसपर वो शाम से भूखी थी, इस कारण से उसके पेट में अब चूहे भी दौड़ने लगे थे। एक तो शिकार नहीं मिलने की खीज, उसपर बढ़ता हुआ भूख, "वो अब कुछ -कुछ परेशान भी नजर आने लगी थी। ऐसे में उसने समय बिताने के लिए म्यूजिक प्लेयर आँन कर दिया।....कार में हिमेश रेशमिया के मदमस्त गाने गूंज उठे। अब वो थोड़ा नार्मल हुई, तभी उसे सड़क किनारे खुला हुआ पंजाबी ढाबा मिला।

वैसे ही उसे जोड़ो की भूख लगी थी, इसलिये उसने शिकार करने का इरादा त्याग दिया और कार को ढाबा के ग्राऊण्ड की ओर मोड़ दिया। कार खड़ी करने के बाद वह बाहर निकली और ढाबा के अंदर बढ़ गई। वैसे तो ढाबा की बनावट साधारण ही थी, परंतु भोजन की खुशबू आ रही थी। खुशबू के नथुने से टकराने भर की देर थी, वह झट खाली टेबल पर बैठ गई। 

वैसे भी पूरा ढाबा खाली था और ग्राहकों का वहां नामों-निशान नहीं था। कुर्सी पर बैठने के साथ ही सान्या ने समय देखा, रात के दो बजने वाले थे और जैसे ही उसने नजर उठाया। सामने हट्टा- कट्ठा गबरू नौजवान खड़ा था। गोरा रंग और सलीके से पहना हुआ लिबास, वो नौजवान आकर्षक लग रहा था। उसे देखते ही सान्या की जिस्मानी भूख जागृत हो गई, फिर भी वो अपने पर नियंत्रण रख के बोली।

अभी भोजन में क्या मिल सकता है?

कुछ भी! वो नौजवान विनम्र स्वर में बोला।

कुछ भी से मतलब? उसके जबाव सुनकर सान्या चौंक कर बोली। जिसका जबाव उस युवक ने बहुत ही शालीनता से दिया।

कुछ भी से मैडम! आपको जो भी खाने में चाहिए, यहां वही भोजन परोसा जाता है।

तो फिर ठीक है, दो प्लेट पनीर भुजी, पनीर कबाब एवं रुमाली रोटी लेकर आओ। सान्या ने ऑर्डर दिया और अभी उसकी बात भी खतम नहीं हुई थी कि” नौजवान वहां से जा चुका था।

सान्या उसे जाते हुए देखकर बस आह भर कर रह गई। वैसे तो वो नौजवान उसके मानदंड के अनुरूप नहीं था, परंतु उसमें कोई कमी भी तो नहीं थी। वह इस लायक तो था ही कि उसकी भूख मिटा सकता था और फिर कभी-कभी अपने स्वाद को बदल-बदल कर भी तो देखना चाहिए। सोचकर वह इस निर्णय पर पहुंच गई कि” आज इसी नौजवान से काम चला लेना है। 

तब तक वो नौजवान, जो कि उस ढाबे पर नौकरी करता था, उसके ऑर्डर लेकर आ गया।.....फिर क्या था, सान्या ने उसे भी साथ में खाने के लिए बिठा लिया। नौजवान भी तो खुले विचारो का था, हाथ आए मौका को नहीं जाने देने बालो में से। फिर तो खाने के दौरान दोनों ही खुल गए, उनके दरमियान छिपाने लायक कुछ नहीं बचा।

कहते है न कि दो विपरीत लिंग में आकर्षण जल्द ही होता है। उसमें भी जब निमंत्रण खुला मिले, तो इस आकर्षण को हवा मिलने लगती है।" बस उन दोनों के बीच भी यही हुआ", सान्या के खुले आमंत्रण को उस युवक ने स्वीकार कर लिया। साथ ही सान्या के पुछने पर उसने अपना नाम "आलोक" बतलाया। बातें तो खतम नहीं होनी थी, सो नहीं हुई, परंतु भोजन खतम हो गया। इसके बाद सान्या ने बिल चुकाए और उस युवक को साथ लेकर ढाबे से बाहर निकली।

सान्या के साथ बाहर निकलता हुआ वो नौजवान अच्छा-खासा उत्साहित था। क्योंकि वो जानता था कि ऐसी हुस्न की मलिका बड़े भाग्य से मिलती है और आज "बिल्ली के भाग्य से ही छिका टूटा था। ऐसे में वो हाथ आए हुए इस अवसर को बेजा नहीं जाने देना चाहता था।

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रात के एक बजे के करीब पुलिस काफिला रोहिणी पुलिस स्टेशन पहुंची। इसके बाद वे लोग उतरे और ऑफिस की ओर बढे। चलते-चलते सलिल ने रोमील को समझाया कि भल्ला एवं श्रेयांश को लॉकअप में डालो, इससे हम बाद में पूछताछ करेंगे। बाँस का ऑर्डर मिलते ही रोमील भल्ला एवं श्रेयांश को लेकर लॉकअप की तरफ बढ़ गया, जबकि सलिल अपने ऑफिस की ओर। 

लेकिन ऑफिस में पहुंचने से पहले ही उसको एहसास हुआ कि "उससे बहुत बड़ी गलती हो गई है"।....कहां तो उसको होटल शील करनी चाहिए थी और कहां उसने खुला ही छोड़ दिया। ऐसे में कोई भी होटल में घुसकर छेड़छाड़ कर सकता था और यह सही नहीं था।

 इसलिये ऑफिस में पहुंचते ही उसने सब-इंस्पेक्टर राम माधवन को कॉल किया और निर्देशित करने लगा कि वो आज की रात "होटल सांभवी" में ही गुजारे, साथ ही अपने साथ दो सिपाही भी ले-ले। इसके बाद उसने फोन डिस्कनेक्ट कर दिया और फ्रीजर की और बढ़ा, फिर पानी की बोतल निकाल कर ले आया और अपनी सीट पर बैठकर गला तर करने लगा। 

सब-इंस्पेक्टर राम माधवन उसका ही मातहत था और उसने एक छोटी सी गलती की थी, जिसके कारण उसे ट्रैफिक कंट्रोल करने का दंड मिला था। ......सलिल अच्छी तरह से जानता था कि अब राम माधवन फिर से कोई गलती नहीं करेगा।

 सोचते समय सहज ही सलिल के होंठों पर मुस्कान आ गई।....परंतु दूसरे ही पल वो थोड़ा गंभीर हो गया और सोचने लगा। उसकी जुबान काली किस प्रकार से हो गई? मतलब, उसने सोचा नहीं और अपराध घटित हो गया।.....यह संयोग मात्र तो हो-ही नहीं सकता, हां अपराधियों का प्रयोग जरूर है। परंतु जब तक कोई साक्ष्य नहीं मिलता, अपराधी की पहचान मुश्किल है। 

साथ ही इस अपराध को किस कारण से अंजाम दिया गया है?इसकाजबावभी तो बिना सुराग के नहीं मिल सकता। वैसे भी " विक्टीम के साथी के कहे अनुसार" कुछ तो अजीब है इस केस में।.....सलिल भूत-प्रेत के अस्तित्व पर विश्वास नहीं करता था" परन्तु श्रेयांश ने जिस तरह से कहा था, बेवजह तो नहीं हो सकता।

वह सोच ही रहा था, तभी रोमील ने ऑफिस में कदम रखा और सामने वाली चेयर पर आकर बैठ गया।....परंतु उसकी हिम्मत नहीं हुई कि सलिल को टोके। उसे आकर बैठते देख तो सलिल ने भी लिया था, परंतु वह भी अभी बात करने के मूड में नहीं था। उसे अभी जिस चीज की जरूरत थी," वह थी निंद"। वह अच्छी तरह से जानता था कि आने वाला कल बिल्कुल ही आराम नहीं देने वाला है।

.....इसलिये दिन भर फुर्ती बनी रहे, इसके लिये अभी थोड़ा निंद ले-लेना जरूरी था और वो जानता था कि बात करने पर रोमील "भल्ला और श्रेयांश के बारे में ही राग छेड़ेगा।....इस कारण से अभी बात करना टालकर उसने अपने शरीर को कुर्सी पर ही ढीला छोड़ दिया और आँखें बंद कर के झपकी लेने की कोशिश करने लगा।

परंतु निंद तो जैसे उसके नसीब में ही नहीं लिखी थी.....क्योंकि बाहर शोरगुल होने लगी। जो कि समय के साथ ही बढ़ने लगा।.....रात के इस समय पुलिस स्टेशन के बाहर यह शोरगुल किसलिये? सहज ही सलिल के मन में प्रश्न उठा और वो इस विषय में आगे कुछ सोचता, इस से पहले ही एक सिपाही दौड़कर ऑफिस में आया और ऊँचे स्वर में बोला। 

"सर मीडिया बालों ने पुलिस स्टेशन को चारों तरफ से घेर लिया है"। सुनकर सलिल एवं रोमील को झटका लगा। हालांकि रोमील ने सिपाही को कहा भी कि इन लोगों को खदेर कर भगा दो। ...परंतु सिपाही ने जो उत्तर दिया, वो काफी निराशा जनक था। सिपाही के कहे अनुसार मीडिया बालों की तादाद हजारों में थी और ऐसे में उनपर बल प्रयोग उचित नहीं था। सिपाही की बातें सुनकर सलिल एवं रोमील के हाथ-पांव फूल गए।

सिपाही तो कब का ऑफिस से बाहर जा चुका था....परंतु उसके द्वारा कहे शब्द अभी तक दोनों के कान में गूंज रहे थे। "अब क्या होगा”? प्रश्न सहज ही दोनों के चेहरे पर विराजमान हो गया था। वैसे सलिल जहां अपने उस गलती को याद कर के खुद को कोश रहा था। जब वह होटल में मीडिया बालों से उलझ गया था। वही पर रोमील, उसे तो समझ ही नहीं आ रहा था कि मामले ने इतना तूल क्यों पकड़ लिया।.....साहब और मीडिया बालों के बीच हल्की धक्का-मुक्की हुई थी...परंतु मामला तो वही पर खतम हो गया था। फिर पुलिस स्टेशन का घेराव किसलिये? 

खैर! जो होना था, वो हो चुका था और अब सिर पर आ चुके परेशानी से दो-चार होना था। इसलिये रोमील ने सलिल को हिम्मत दिया और फिर दोनों उठे एवं ऑफिस से बाहर निकले। वे जब बिल्डिंग के बाहर निकले, उनके होश फाख्ता हो गए....क्योंकि बल्ब की रोशनी में उनकी नजर जहां तक जा रही थी, मीडिया बालों का हुजूम ही नजर आ रहा था। 

अब क्या होगा?.... रात के इस वक्त मीडिया बालों का यहां जमावड़ाहोना, उनके स्वस्थ के लिए अच्छा नहीं होना था। उसमें भी सलिल, उसे तो सहज ही अंदाजा हो गया था कि” कल बाँस के सामने उसकी जमकर फजीहत होनी है।....परंतु अभी क्या करें कि मीडिया वाले यहां से शांत होकर चले जाए? सहज ही सलिल एवं रोमील के मन में एक साथ यह प्रश्न उठा।

सलिल एवं रोमील अभी सोच ही रहे थे कि तभी उनकी नजर मीडिया बालों के बीच से आते एस. पी. मृदुल शाहा पर गई।.....लो हो गया काम! सलिल बड़बड़ा उठा खुद से।....घबरा तो रोमील भी गया था उनको देखकर.....क्योंकि एस. पी. साहब का यहां होना, जरूर वे आज की रात उन दोनों की जमकर क्लास लेंगे।

अभी दोनों सोच ही रहे थे कि एस. पी. साहब उसके करीब पहुंच गए। दोनों ने उनको सैल्यूट दिया.....परंतु वे जबाव देने के बजाए मीडिया बालों से मुखातिब हुए और सहज ही उन्होंने विनम्र स्वर में क्षमा मांग ली। उनकी बातों का असर हुआ और दूसरे ही पल मीडिया वाले कंपाऊंड खाली कर के जाने लगे।

 करीब दस मिनट बाद ही पुलिस स्टेशन का कंपाऊंड खाली हो चुका था और अब ऑफिस में मृदुल शाहा सलिल के चेयर पर बैठे थे। जबकि सलिल एवं रोमील हाथ बांधे खड़े थे। बल्ब की उजली रोशनी में स्पष्ट देखा जा सकता था कि शाहा का चेहरा सपाट है और उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं होना, दोनों के धड़कन को बढ़ाने के लिए काफी था।

वैसे तो एस. पी. साहब का नाम भर मृदुल था....बाकी तो वे अपने मातहत के लिए क्रूर बन जाते थे। बस उनका यही स्वभाव उनके मातहत के बीच खौफ का कारण था और अभी भी यही हाल था। सलिल एवं रोमील का हलक सूख रहा था, माथे से पसीना छलक रहा था।

मिस्टर सलिल.....आप पुलिस डिपार्ट मेंट के जिम्मेदार ऑफिसर होकर इतनी बड़ी गलती कैसे कर सकते है? एस. पी. साहब अचानक ही सपाट स्वर में बोले, फिर एक मिनट रुक कर उन दोनों का चेहरा देखा, फिर बोले। आप इस केस के विवेचना अधिकारी हो...फिर ऐसी गलती। वैसे भी आपलोगों को पहले ही बतला चुका हूं कि किसी भी हालत में मीडिया बालों से नहीं उलझना है।

य...यश सर ! सलिल बस इतना ही बोल सका, परंतु एस. पी. साहब और भी अधिक कठोर शब्द में बोले।

वो तो भला हो कि मुझे समय पर यहां होने वाले हंगामे की जानकारी मिल गई।.....अन्यथा तो आप ने पुलिस स्टेशन में ड्रामे की तैयारी पूरी तरह कर दी थी।

एस. पी. साहब ने अपनी बात खतम की और उन दोनों के चेहरे को देखने लगे।....परंतु क्या मजाल कि दोनों में से किसी ने भी एक भी शब्द बोलने की हिम्मत की हो।....दोनों को अच्छी तरह से मालूम था कि अगर उन्होंने अपने होंठ से एक भी शब्द निकाला...डाँट के रुप में ही वापस मिलना है। 

इसलिये दोनों ने ही चुप्पी साधने में भलाई समझी। ऐसे में करीब दस मिनट तक ऑफिस में पूर्ण शांति रही, तब मृदुल शाहा ने अपने शब्दों में हल्की मधुरता घोली और इस केस के संदर्भ में दोनों को निर्देशित करने लगे। परन्तु क्या मजाल कि दोनों में से किसी ने प्रतिक्रिया दी हो।

**********

सुबह की प्रभात किरणें फूटने को आतुर हो चली थी। चारों तरफ उजाला फैल चुका था और अंधेरे का साम्राज्य छिन्न -भिन्न हो चुका था।.....तो सहज ही था कि चिड़ियों के कलरव से वातावरण गूंज उठे। "यूं तो शहर में कंकरीट का जाल इस प्रकार से फैल चुका है कि विचारी चिड़ियां को अपना आशियाना ढूंढने के लिए दर-दर की ठोकरें खानी पड़ती है"। 

परंतुपंछी है न, बहुत जीवट होते है और विपरीत परिस्थिति में भी गुजारा कर लेते है।....तो फिर स्वाभाविक ही है कि प्रभात बेला के आगमन पर वे एक कंठ स्वर में कलरव करके गीत गाए।....परंतु मानव तो मानव है, स्वार्थी और धूर्त, जो अपने हित साधने के लिए इनका आशियाना उजाड़ने से भी गुरेज नहीं करता। बस यही बात है, अभी मानवों का चहल-पहल बहुत कम ही था, इसलिये चिड़ियां चहक रही थी।

 ऐसे ही मनोहारी वातावरण में, जब लग रहा था कि प्रकृति खिल उठी हो, सफेद रंग की इनोवा कार सड़क पर फिसलती जा रही थी। कार के ड्राइविंग सीट पर बहुत ही सुंदर कोमलांगी बैठी हुई थी और वो पूरी तन्मयता से कार ड्राइव कर रही थी। उसके रेशमी बाल, जो कि लगता था कि नागिन से फन काढे हुए हो।

उसके सुर्ख रसीले अधर और लंबा सुता हुआ नाक। गुलाबी गाल और पतली कमानीदार भौंह।.....उसपर उसने ब्लू रंग की टी-शर्ट और ब्लैक जिंस पहना हुआ था, जिसमें वो " कमायनी" की प्रतिमा लग रही थी।....हां वो लवण्या आर थी, उद्योगपति जगपति आर की लाडली बेटी। 

वैसे तो उसकी अभी पढाई चल रही थी, परंतु उसके हाव-भाव से नहीं लगता था कि वो पढऩे में रुची रखती हो। उसके सुंदर चेहरे पर अभी थकावट के भाव थे, जिसकी चुगली उसकी आँखें कर रही थी।....हां वो शाम से ही कार को बेवजह ही दिल्ली की सड़क पर दौड़ाती रही थी और अब वह कार को कुंज बिहार की ओर लिए जा रही थी।

.....वह जानती थी कि उसके पिता निंद से जग गए होंगे और अब उसको ही ढूंढ रहे होंगे। वैसे भी तो एक वही अकेली थी, जो पिता का ध्यान रख सकती थी और शायद इसलिये ही सुबह होने के साथ ही वो अपने आश्रय यानी निवास स्थान को लौट रही थी। आँखों में निराशा का भाव लिए।

आखिर आज की रात भी तो उसके हाथ निराशा ही लगी।....कहां तो वो घर से सोचकर निकली थी कि आज उसे जरूर ढूंढ लेगी। परंतु शाम से रात ढली और रात से सुबह हो गई, फिर भी वह उसको नहीं ढूंढ सकी।उफ! जीवन भी कितना अजीब है कि मानव मन को भ्रमित किए रहता है।...उसे जिसकी तलाश होती है, "उसका साया भी उसे दूर-दूर तर नजर नहीं आता"। 

उसके साथ भी तो ऐसा ही हो रहा था, उसे जिसकी तलाश थी, गर्वित सक्सेना, वह मिल नहीं रहा था। लवण्या करीब एक वर्ष से बिना किसी दिन नागा किए उसकी तलाश में शाम को निकल जाती थी और सुबह निराश होकर लौटती थी।

परंतु पता नहीं कि गर्वित को आकाश निगल गया था, या जमीन खा गई थी, उसका साया भी नजर नहीं आया था।.....लवण्या जानती थी कि उसके लिए गर्वित का मिलना कितना महत्वपूर्ण था....परंतु वो उसे ढूंढ नहीं सकी थी।....लेकिन उसने अभी तक हार नहीं माना था और नियमित रुप से निकल जाती थी।

उफ! रात की थकावट अब उसपर हावी होने लगा था, इसलिये उसने म्यूजिक प्लेयर आँन किया। कार में भगवान का सुमधुर भजन गुंजने लगा और उसने विचारों को झटक कर अपना ध्यान ड्राइविंग में पिरोया।.....परंतु मानव का मन उसके नियंत्रण में नहीं होता, तभी तो खाली नहीं बैठता। "मन" मानव को कभी तो अच्छे विचार या तो बुरे विचार में उलझाए रहता है और लाचार मानव अपने मन के इशारे पर नाचता रहता है।

 "लवण्या आर" की स्थिति भी तो इससे जुदा न थी, क्योंकि उसके पास भी" मन" था, जो कि अनियंत्रित हो रहा था। वह चाहती थी कि अब वो विचारों के भंवर जाल से बाहर निकले और जितनी जल्दी हो सके, घर पहुंचे।.....परंतु ऐसा कब हुआ है? जो अब होगा। वो न चाहते हुए भी फिर से विचारों की माला में गूंथ गई। 

उसका काँलेज मेंद्वितीय वर्ष था, तभी गर्वित सक्सेना उस काँलेज में आया था। "स्वभाव से मिलनसार गर्वित एवं लवण्या", दोनों ही थे। ऐसे में दोनों के बीच करीबियां बढ़ रही थी। मामला इतना करीब का हो चुका था कि दोनों को एक दूसरे के बिना रहा ही नहीं जाता था।...हां यह बात जरूर थी कि उनके बीच चाहत का इजहार नहीं हुआ था।....परंतु अचानक से ही गर्वित लवण्या से दूरियाँ बनाने लगा। पहले तो लवण्या समझ ही नहीं पाई, पर जब समझी, बहुत देर हो चुका था।

वह समझ भी नहीं सकी थी और गर्वित उससे दूर हो गया था। इस घटना ने लवण्या को काफी प्रभावित किया और वो टूटने सी लगी थी।...वो टूट कर बिखर ही जाती...अगर उसके पिता ने उसको संभाला नहीं होता। फिर भी एक कसक तो थी ही उसके हृदय में कि गर्वित उसे आखिर छोड़ कर क्यों गया? उसमें आखिर किस चीज की कमी थी कि गर्वित अचानक ही उससे दूर हो गया?

.....बस वो गर्वित से मिलकर सिर्फ उस कारण को जानना चाहती थी, जिसके लिए वो उससे अलग हो गया था।....परंतु यह समय का चक्र कहा जाए या उसकी बदकिस्मती, एक वर्ष हो चुके थे, परंतु अब तक गर्वित का साया भी उसे नहीं मिला था।

सहसा ही लवण्या के पैर ब्रेक पर तेजी से कसे, क्योंकि उसकी कार उसके घर के आगे निकल चुकी थी। लवण्या ने कार रोकी, रिवर्स किया और फिर "आनंद बिला" के गेट से कार को अंदर ले लिया और पार्किंग में खड़ी करके बाहर निकली और बिल्डिंग की ओर बढी। आनंद बिला, काफी क्षेत्रफल में फैला हुआ और हर एक सुविधा से परिपूर्ण  एवं सुंदर। 

लवण्या ने गेट खोला और हॉल में कदम रखा और हॉल में कदम रखते ही उसकी नजर अपने पिता जगपति आर पर गई। जगपति आर हॉल में रखे सोफे पर बैठे लैपटाप चला रहे थे।...जगपति आर, आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी.....परंतु उनके चेहरे पर बुढ़ापा का असर दिखाई देने लगा था।

आ गई बेटा! जगपति आर ने बिना सिर उठाए ही कहा और फिर अपने काम को करनेलगे। जबकि लवण्या ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया।

जी पापा! इतना बोलने के बाद वो किचन की ओर बढ़ गई। जबकि जगपति आर अपने काम में ही उलझे रहे। उधर बाहर सूर्य क्षितिज पर आ चुके थे और उनकी प्रखर रोशनी चारों ओर फैल चुकी थी।

करीब दस मिनट बाद ही लवण्या किचन से दो कप काँफी लेकर लौटी और एक जगपति आर को थमाया और दूसरा खुद थामे उनके सामने वाले सोफे पर बैठ गई। जगपति आर, काँफी का कप हाथ में आते ही उन्होंने लैपटाप साइड में रखा और काँफी की चुस्की लेने लगे। 

ऐसे, जैसे कि वे बिल्कुल शांत हो और उनको किसी प्रकार की चिंता नहीं हो।....परंतु लवण्या अच्छी तरह से जानती थी कि यह सिर्फ बाहरी आवरण है। बाकी तो उसके पिता अंदर ही अंदर घुटते है।....लवण्या काँफी पीना भूलकर उनके ही चेहरे को देख रही थी और सोच रही थी कि "वह कैसी बेटी है, जो अपने पिता को खुशी देने के बदले चिन्ता के सागर में डुबाये हुए है"। 

परंतु वह भी तो दिल के हाथों मजबूर थी, अन्यथा ऐसी तो वो नहीं थी।...खट! हल्की सी आवाज हुई और लवण्या संभल गई, फिर काँफी के घूंट भरने लगी।

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सुबह की किरण ने जैसे ही धरती के आँचल को छूआ, चारों ओर प्रकृति खिल सी गई। ऊंची-ऊंची इमारतें अपने बुलंदी पर इतराने लगी। शहर का कोना-कोना प्रकाश से खिलकर इतराने लगा।.....फिर तो इंडिया गेट की चमक तो विशेष कर निखरने लगा। 

सुबह के आगमन के साथ ही वहां हलचल बढ़ गई थी।.....सूर्य के आगमन के साथ ही सभी अपने-अपने काम में लग गए थे। उस इनोवा कार में भी प्रकाश पड़ी और प्रकाश सीधे पड़ने के कारण सान्या सिंघला कुनमुना कर उठी।

 इस समय वो शरीर पर बिना किसी लिबास के थी और आँख खुलते ही उसे इस बात का एहसासभीहोगया ।......यह तो संजोग ही कहा जाएगा कि” किसी की नजर कार की तरफ नहीं गई थी.....अन्यथा तो वहां काफी भीड़ जमा हो जाती...और उसे शर्मिंदगी का सामना करना होता। 

परंतु ऐसी कोई बात नहीं हुई थी, अतः वो फटाफट अपने कपड़े पहनने लगी।...साथ ही उसके होंठों पर मादक मुस्कान उभड़ आई। उफ!...यह जिंदगी, मजा के लिए ही तो है, जम कर घूमो और मजे लो। उसने सोचा नहीं था कि ढाबे में काम करने वाले लड़के में इतनी जान होगी।....उस लड़के ने तो उसको जन्नत की सैर करा दी थी, उसके अंग-अंग में अभी मीठा -मीठा दर्द हो रहा था।

 सोचते-सोचते सान्या सिंघला ने कपड़े पहन लिए थे और अब वो कार श्टार्ट करके आगे बढ़ा दी थी। कार झटके लेती हुई आगे बढी और सरपट सड़क पर दौड़ने लगी। जबकि सान्या, उसने म्यूजिक प्लेयर आँन कर दिया था और बजते हुए गीत को होंठों से दुहरा रही थी।......बीस मिनट भी नहीं बीते होंगे कि उसकी कार ने रोहिणी में अवस्थित उसके निवास "भाव्या बिला" में प्रवेश किया। उसने कार को बंगले के पोर्च में खड़ा किया और बाहर निकल कर बिल्डिंग की और बढ़ गई। 

जब वो हॉल में पहुंची, राजीव सिंघला हॉल में बैठे थे।....राजीव सिंघला, सौंदर्य प्रसाधन के उत्पादन कर्ता और बहुत बड़े बिजनेस मेन। पचास वर्ष के राजीव सिंघला इकहरा शरीर और आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी थे। उसपर उनके आँखों पर काला चश्मा, उनके व्यक्तित्व को और भी प्रभावशाली बना रहा था।

.....राजीव सिंघला, खुले विचार रखने वाले और खुले रिलेशनशिप का समर्थन करने वाले। इस समय वे इंग्लिस न्यूज का अखबार पढ रहे थे।.....सान्या ने हॉल में जैसे ही कदम रखा...उन्होंने पेपर से नजर उठाया और सान्या के चेहरे पर नजर टिकाकर बोले।

सान्या....माइ सन, इतनी देर कहां लग गई बेटा? बोलने के बाद वो फिर पेपर पढऩे लगे, जबकि सान्या उनके करीब आकर बैठ गई।....फिर मुस्करा कर बोली।

कुछ नहीं पापा......मैं सहेली के घर रुक गई थी, इसलिये आने में लेट हो गई।

कोई बात नहीं बेटा.....परंतु समय से घर आ जाने की कोशिश किया करो। इस बार पेपर पढते हुए ही राजीव सिंघला ने कहा, जिसका जबाव सान्या ने नहीं दिया।

ऐसे में वहां चुप्पी छा गई और शायद उन दोनों में से कोई भी चुप्पीतोड़ना नहीं चाहते थे। तभी घर के नौकर रामदिन ने हॉल में कदम रखा। इस समय उसके हाथों में ट्रे थी, जिसमें रखे कप से भाप उठ रहा था, स्वाभाविक था कि वो काँफी लेकर आया था। 

उसने दोनों को काँफी सर्व किया और उलटे पांव वापस किचन की ओर लौट गया।....फिर तो दोनों काँफी पीने में मशगूल हो गए, परंतु फिर भी उन लोगों के बीच बातचीत नहीं हुई। लेकिन अपनी काँफी खतम करने के बाद राजीव सिंघला ने अपनी नजर सान्या के चेहरे पर टिका दी और गंभीर स्वर में बोले।

बेटा सान्या.....।

जी पापा...। सान्या ने भी तत्परता के साथ उत्तर दिया। जिसे सुनकर सहज ही राजीव सिंघला के होंठों पर मुस्कान छा गई, फिर वे अपने शब्दों को तौल-तौल कर बोले।

बेटा.....मैं चाहता हूं कि तुम अब अपना जीवन साथी चुन लो, जिससे मैं अपने इस जिम्मेदारी से मुक्त हो सकूं।

पापा.....आप भी न, कभी-कभी बहकी-बहकी बातें करने लगते है। उनकी बातें सुनकर सान्या ने बनावटी नाराजगी दिखाकर कहा और फिर पैर के अंगूठे से फर्श को कुरेदने लगी। जबकि उसके द्वारा कही बातों को सुनकर राजीव सिंघला की मुस्कराहट और भी गहरी हो गयी। उन्होंने सान्या के आँखों में देखकर कहा।

सान्या बेटा.....ब्याह तो तुम्हें करना ही है और यह मेरी जिम्मेदारी भी है। "क्योंकि इतने विशाल एंपायर की तू अकेली वारिस है और तेरे सिवा मेरा दुनिया में कोई भी नहीं है और तो बेटा.....मुझपर मां एवं बाप, दोनों की जिम्मेदारी है। बोलने के बाद राजीव सिंघला एक पल के लिए रुके, फिर बोले।

....यह अलग बात है बेटा कि तुम्हें कोई पसंद आ गया हो, तो बोल दे, मैं तुम्हारी शादी उसी से करवा दूंगा। बोलने के बाद राजीव सिंघला ने अपनी नजर सान्या के चेहरे पर टिका दी और उसके मनोभाव को पढऩे की कोशिश करने लगे।

जबकि सान्या क्या कहती, उसे तो रोज ही बिस्तर पर एक नया लड़का चाहिए होता था। लड़के में चाहे कितनी भी खूबसूरती हो, वह कितना भी जवाँ मर्द हो, एक बार के बाद वो उसके चित से उतर जाता था। उसकी इच्छा ने इतना विशाल वृक्ष का रुप ले-लिया था कि रात गई-बात गई, वाली स्थिति थी। ऐसी परिस्थिति में वो एक से शादी करके एक खूंटे से बंधकर नहीं रह सकती थी।

.....परंतु इन बातों को वो अपने पिता के सामने कह भी तो नहीं सकती थी। ऐसे में बहुत देर तक उसने चुप रहने के बाद गोल-मटोल जबाव दिया।

पापा.....आप भी न, सुबह-सुबह ही किस टाँपिक को ले कर बैठ गए। आप छोड़िए न अभी इन बातों को, अभी तो मेरी उम्र ही क्या है? जब कोई लड़का पसंद आ जाएगा, आप को बता दूंगी।

बोलने के बाद वो उठी और अपने रूम की ओर चली गई। उसने जो जबाव दिया था, उसके प्रतिक्रिया को भी जानने की कोशिश नहीं की।...उसे जाता हुआ देखकर राजीव सिंघला मुस्कराए। उनकी तो समझ में यही आया कि सान्या अभी बच्ची है, शायद उनके बातों को सुनकर शर्मा गई है।

....वैसे भी उनकी नजर में सान्या की उमर ही क्या हुई थी," अभी तो उसके खाने-खेलने के दिन थे। इसलिये उन्होंने अपना ध्यान उस ओर से हटाया और "अपने बिजनेस के लिए निर्धारित कार्यक्रम" को याद करने लगे। वैसे तो उनका बिजनेस बहुत बड़ा आकार ले चुका था....फिर भी उनके हृदय में संतुष्टि नहीं थी। उन्हें अपने इस विशाल एंपायर को और भी विशाल करना था" इतना विशाल कि इसकी जद में पूरी दुनिया ही सिमट कर आ जाए।

वैसे तो उनके पास अर्जित किए हुए संपत्ति का उपभोग करने वाला "सान्या" के अलावा और कोई नहीं था। परंतु फिर भी उनको सनक सवार रहती थी कि इस बिजनेस को किस प्रकार से आगे बढ़ाया जाए। इसलिये वे हमेशा प्रयासरत रहते थे और हर वो कदम उठाने के लिए तत्पर रहते थे, जिससे उनके बिजनेस को लाभ हो। 

आज भी इसी सिलसिले में उनकी विदेशी कंपनी से मीटिंग थी। इसलिये वे एक पल तक अपने दिन के सारे कार्यक्रम को याद करते रहे.....फिर अपनी जगह से उठे और हॉल से बाहर निकले। बाहर बिल्डिंग के अहाते में उनकी मर्सिडीज खड़ी थी। उन्होंने ड्राइविंग सीट संभाली और कार श्टार्ट करके आगे बढ़ा दी। कार बिला के गेट से निकली और सड़क पर फिसलती चली गई।

*********

सुबह के सूर्य उदय होने के साथ ही सलिल ऑफिस से बाहर निकला। उसे बाहर निकलता देखकर रोमील भी उसके साथ निकल पड़ा। वे दोनों प्रांगण में खड़ी स्काँरपियों में बैठे, कार श्टार्ट की और आगे की ओर बढ़ा दी। स्काँरपियों पुलिस स्टेशन से बाहर निकली और सड़क पर आते ही रफ्तार पकड़ ली।

ड्राइव कर रहे रोमील ने सलिल को कनखियों से देख रहा था। सलिल भी समझ रहा था कि रोमील आखिर क्यों उसे देख रहा है। स्वाभाविक ही था कि रात के हत्याकांड ने बहुत से सवाल खड़े कर दिए थे। उसपर घाव ये कि मीडिया बालों ने पंगा खड़ा कर दिया था।

ऐसे में रोमील के हृदय में सवाल उठना ही लाजिम था। सलिल जानता था कि अभी जो वो बाहर निकला है, उसी के बारे में रोमील सोच रहा होगा। परंतु सलिल इस बारे में अभी कोई बात नहीं करना चाहता था। वह तो उलझा हुआ था, रात होटल में हुई हत्या के बारे में।.....आखिर किस कारण से नंदा की हत्या हुई होगी।

सवाल गंभीर था और उसे इसका हल जल्द से जल्द ढूंढना था।....परंतु वह दुविधा में इसलिये फंसा हुआ था कि श्रेयांश ने जिस प्रकार से बतलाया था, केस में अजीब सा पेंच फंस चुका था। "अगर श्रेयांश की कही हुई बातें सही है, प्रथम दृष्टया इस केस में प्रेत बाधा लग रहा था"। .....अब ऐसे में सच क्या है? कहना कठिन था और जब तक इस केस के भेद नहीं खुलते, अभी कुछ भी कहना उचित नहीं था।

 वैसे भी उसने अपने पूरे सर्विस लाइफ में इस तरह के केस को नहीं देखा था।....उसकी सर्विस लाइफ वैसे तो ज्यादा नहीं थी.....परंतु इतने ही दिनों में उसने इस प्रकार की घटना नहीं देखी थी।.....उसमें भी अभी तक इस केस में उसे ज्यादा जानकारी नहीं थी। इस कारण से ही वो होटल "सांभवी" जा रहा था कि वहां जाकर वह सुबूत ढूंढने की कोशिश करेगा।

...इसके बाद ही वह इस केस के बारे में कुछ कह पाएगा। सोचते- सोचते सलिल ने कार के बाहर देखा। सड़क पर सरपट दौड़ता ट्रैफिक और अपने जगह पर टट्टार खड़ी बिल्डिंगे। शहर की यही तो खुबी है कि चारों तरफ बहुमंजिला इमारतों का जाल होता है।

सर! अभी हम लोग कहां जा रहे है? रोमीलने कार ड्राइव करते हुए उससे प्रश्न पूछा और फिर अपनी नजर ड्राइविंग पर जमा दी। जबकि सलिल, वह मन ही मन मुस्कराने लगा। वह जानता था कि रोमील अपने-आप पर ज्यादा देर तक नियंत्रण नहीं रख सकता था। ऐसे में उसका यूं प्रश्न करना, स्वाभाविक ही था।

कहां जा रहे है से मतलब?......तुम जानना क्या चाहते हो? सलिल ने उसके प्रश्न का उत्तर देने के बदले उससे प्रश्न ही पुछ लिया और फिर अपनी नजर रोमील के चेहरे पर टिका दी।

स...सर, मेरे कहने का मतलब बस इतना ही था कि इतनी सुबह-सुबह ही हम लोग कहां जा रहे है। सलिल के प्रश्न सुनकर रोमील बड़ी मुश्किल से इन शब्दों को बोला। जबकि सलिल ने जबाव में धीरे से बोला।

होटल सांभवी! हम लोग अभी होटल सांभवी जा रहे है। सलिल ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया और फिर उसने चुप्पी साध ली।

बस बात खतम हो गई, इसके बाद रोमील की हिम्मत ही नहीं हुई कि आगे किसी प्रश्न को पुछ सके। इसके बाद तो स्काँरपियों अपने रफ्तार से सड़क पर भागती रही.....परंतु उन दोनों के बीच चुप्पी छाई रही। किन्तु” यह चुप्पी भी तो असह्य था, क्योंकि दोनों के हृदय में विचार चलने लगे थे। जहां सलिल इस केस के बारे में उलझा हुआ था, वही रोमील अपने साहब के बारे में ही सोच रहा था।

....सलिल सोच रहा था कि "अपराध को घटित हुए दस घंटे हो चुके थे" परंतु अभी तक वो इस केस पर थोड़ा भी काम नहीं कर सका था।...वो इस केस में छानबीन की शुरुआत करता भी कैसे? मीडिया बालों ने इस कदर हंगामा वड़पाया था कि उसकी बुद्धि कुंद होकर रह गई थी।....साथ ही उसके लिये चेतावनी समान भी था कि” आगे से उसे मीडिया बालों से बचकर भी रहना होगा "अन्यथा मीडिया वाले उसके वर्दी पर कीचड़ उछालने में तनिक भी नहीं हिचकेंगे"।

स्काँरपियों होटल सांभवी के प्रांगण में रुकी और दोनों की विचार श्रृंखला टूट सी गई। इसके बाद दोनों कार से बाहर निकले और होटल बिल्डिंग के अंदर की तरफ बढ़ गये। फिर तो उन्होंने पूरे होटल को छान मारा,....परंतु उनके हाथ काम की चीज नहीं लगी। जिस रूम में अपराध हुई थी, "कितनी ही बार उस रूम को सर्च किया, फिर भी उनके हाथ निराशा ही हाथ लगी। 

तभी अचानक ही रोमील ने सलिल को सुझाया कि इस होटल में सी. सी. टीवी कैमरा जरूर लगा होगा, "तो हमें सी. सी. टीवी आँपरेटर रूम की तलाशी लेनी चाहिए"। अचानक से रोमील द्वारा दिए गए सुझाव पर सलिल के होंठों पर मुस्कान आ गई, साथ ही उसने रोमील के बुद्धि पर गर्व महसूस किया।

इसके बाद वे दोनों सी. सी. टीवी आँपरेटर रूम में पहुंचे, तभी वहां पर सब- इंस्पेक्टर राम माधवन भी पहुंच गया और उसने सलिल को सैल्यूट दिया।....सलिल ने उसके सैल्यूट का जबाव दिया और वहां रखे कंप्यूटर सिस्टम से छेड़छाड़ करने लगा। 

राम माधवन, लंबा तगड़ा शरीर और श्यामला रंग, उसपर चेहरे पर मोटी मूँछें, पूरे पुलिस स्टेशन में गब्बर सिंह के नाम से विख्यात था वो। अभी वो ध्यान पूर्वक सलिल को कार्य करते हुए देख रहा था। परंतुअथकप्रयास करने के बावजूद भी सलिल को अपने काम में सफलता नहीं मिली। तब राम माधवन ने अनुमति ली और कंप्यूटर सिस्टम को खोलने की कोशिश करने लगा और अपने प्रयास में वो सफल भी रहा।

सलिल को अपने मातहत पर गर्व होने लगा। परंतु अभी उसे काम करना था, इसलिये वो फटाफट होटल में लगे कैमरे को चेक करने लगा और जल्द ही सफल भी हुआ। " होटल के जिस रूम में वारदात हुई थी" उस कैमरे को उसने जल्द ही ढूंढ लिया और वीडियो रिप्ले करने पर जो उसने जो देखा, उसने उसके होश फाख्ता कर दिए। उसने देखा कि रूम में श्रेयांश नंदा के कपड़े को उतार चुका था, तभी रूम की लाइट जलने बुझने लगी और मिनट भी नहीं गुजरे होंगे कि लाइट की रोशनी रंग- बेरंगी हो गई।....इसके बाद उस रूम में रहस्य में डूबा स्वर "रति संवाद-रति संवाद गूंजने लगा।

उस वीडियो को तीनों ध्यान पूर्वक देख रहे थे और समझने की कोशिश कर रहे थे।....तभी उन तीनों की नजर स्क्रीन पर चिपक कर रह गई, क्योंकि ड्रेसिंग टेबल का शीशा तेज आवाज के साथ टूटा और उसकी काँच पूरे रूम में बिखर गई। इसके बाद तो नंदा तड़पती हुई दिखी....उसके पेट में काँच आकर धंस चुका था।.....फिर तो दो मिनट बाद ही नंदा तड़प कर शांत हो गई।

...ऐसा किस प्रकार से हो सकता है कि एक काँच का टुकड़ा किसी की जान ले-ले। सोचते हुए सलिल ने इसके बाद दो-तीन बार वीडियो को प्ले करके देखा....परंतु उसके समझ में कुछ भी नहीं आया। ऐसे में उसने इस वीडियो को अपने मोबाइल में एसेस कर लिया...फिर तीनों होटल से बाहर निकले। सलिल ने राम माधवन को वही छोड़ा और रोमील के साथ पुलिस स्टेशन के लिए लौट गया।

**********

अब दिन के दस बज चुका था और इसके साथ ही शहर की गतिविधि अधिक तेज हो गई थी। रोजी-रोटी के लिए भागता शहर, यहां हर एक मानव आगे की ओर निकलने की होड़ में लगा हुआ था। सभी अपने-अपने तरीके से रोजगार उपार्जन में लग गए थे।.....परंतु उस युवक को तो जैसे इसकी जरूरत ही नहीं थी।

घुंघराले काले बाल, मोटी-मोटी काली आँखें और आकर्षक चेहरा। उसपर उसका लंबा कद उसकी सुन्दरता में चार चाँद लगा रहा था। वह युवक अभी मुक्ता अपार्ट मेंट में अपने फ्लैट में बिस्तर पर लेटा हुआ मैगजीन पढ रहा था, नाम था सम्यक बहल। नाम के अनुरूप ही उसके चेहरे पर चिर शांति थी और उसके हाथ में पुस्तक भी "शांति की खोज" ही थी।

....परंतु उसकी यह शांति छनिक ही तो थी, वह तो वास्तव में उद्विग्न था। उसकी नजर भले ही पुस्तक पर टिकी थी, परंतु वह पुस्तक तो बिल्कुल भी नहीं पढ रहा था। "शायद वो किसी विचार के भंवर जाल में था और उस विचार का मनो-मंथन करके किसी निष्कर्ष पर पहुंचना चाहता था।

जीवन की परिपाटी कितनी विचित्र है, जो हमें पसंद नहीं होता, यह उसे ही चलाना चाहती है और जो हम चाहते है, यह उसे होने ही नहीं देती।....परंतु मानव ही तो है, हार मानना उसने सीखा कहां है? उसे तो अनवरत प्रयास करना पड़ता है, जीत के लिए। उस जीत के लिए, जो अवश्यंभावी नहीं है, क्योंकि ढृढता के साथ कहा नहीं जा सकता कि जीत उसकी ही होगी। 

फिर भी प्रयास तो उसको करना है और यह उसका स्वभाव भी है। सम्यक भी इसी प्रयास में लगा हुआ था कि वो अपने विचारों को जीत ले।....फिर तो उसने बांह फैलाएगा और सारा जहां उसका ही होगा।

जीवन बहुधा ही मानव मन के इसी ढृढता की परीक्षा लेता है। उसे सत्य की उस कसौटी पर कसता है, जिसे शायद " भट्ठी" का उपनाम दिया जाता है। जैसे सोने को जलती हुई "भट्ठी" में उच्च ताप पर तपाया जाता है और वह तप कर दमक उठता है, उसी प्रकार मानव भी है। 

जीवन की "कसौटी" पर कसने के बाद मानव निखर उठता है, "दमक" उठता है मानवीय गुणों से। परंतु सम्यक इस कसौटी पर ज्यादा देर तक टिका नहीं रह सका।....उसके चेहरे से बेचैनी के भाव "परिलक्षित" होने लगे। आखिरकार उसके हृदय की ढृढता उसका साथ छोड़ती हुई सी प्रतीत होने लगी, उससे अलग होती सी लगी।

 फिर तो वह बेड पर उठकर बैठ गया, किताब को साइड में रख दिया और फिर उसने रूम में नजर घुमाई।...रूम में सुविधा की हर एक वस्तु मौजूद थी, फिर भी कभी-कभी यह रूम उसे काट खाने को दौड़ता था। उसके पिता युनिवर्सिटी के डीन थे, जिनका वो इकलौता वारिस था, ऐसे में पैसे की कोई कमी तो थी नहीं। फिर भी न जाने क्यों उसे चैन नहीं मिलती थी। 

वह चाहता था कि सुकून भरी जिंदगी गुजर-बसर करें, परंतु उसकी यह अभिलाषा "अभिशप्त" हो गई थी। जीवन के तट बंध उष्णिय हो गये थे, जो अपनी तीव्र ज्वाला में उसके सुख-शांति को भस्म करने पर उतारू हो गए थे।

ऐसे में उसने बैठे-बैठे ही पास रखे टेबल के डोअर को खोला और उसमें से चरस की पुड़िया एवं चिलम निकाल ली।....उसके बाद उसने बड़े प्रेम से चिलम तैयार की और सुलगा कर होंठों से लगा ली।...फिर तो उसने लंबी कश ली, जिससे ऊंची लपट उठी। इसके बाद तो रूम एक पल के लिए धुएँ के गुबार से भर गया।..... परंतु उसने कश लगाना तब छोड़ा, जब चिलम खाली हो गई।

...धुआँ अंदर गया और उसके चेहरे पर संतुष्टि के भाव दृष्टिगोचर होने लगे।....परंतु कितनी देर तक? कृत्रिम संसाधनों के द्वारा प्राप्त किया गया संतुष्टि अल्पायु लिए होता है, जो कि क्षणिक होता है। तो उसकी संतुष्टि कब तक स्थाई रहती?

 दो पल भी नहीं गुजरे होंगे कि वह फिर से बेचैन नजर आने लगा। उसको धीरे-धीर विचारों की श्रृंखला अपने आगोश में समेटने लगी।.....वह सोचने लगा कि पहले तो वो ऐसा नहीं था। हंसमुख स्वभाव का सम्यक, सभी से घुला-मिला रहता था। 

उसका हंसमुख स्वभाव ही था कि काँलेज में उसके दोस्तों की लिस्ट बहुत लंबी थी।....लेकिन एक दिन, उसकी मुलाकात लवण्या आर से हुई और उसकी जिंदगी बदल गई।....परंतु न जाने उसकी खुशियों को ग्रहण लग गया हो, "गर्वित सक्सेना लवण्या आर के करीब आ चुका था"। इसके बाद तो उसने काफी कोशिश की अपने दिल को मनाने की, पर दिल माने तब न।

 इश्क अजीब सी वस्तु है, बिना अकार- प्रकार के, बिना किसी रुप-रंग के, यह अतिशय प्रभावी है। जब यह किसी को अपने बाहु पाश में जकड़ता है, उसके अस्तित्व को रहने ही नहीं देता, जबकि अपना रुप-रंग, आकार-प्रकार ग्रहण कर लेता है। तभी तो बड़े-बड़े तपस्वी अपने तप साधना से डिग जाते है और प्रेम की शरणागति स्वीकार कर लेते है।

....फिर तो सम्यक युवा था, उसके रगो में प्रवाहित होने वाला लहू गर्म था, तो प्रेम के सामने उसकी बिसात ही क्या थी? वो तो प्रेम के मधुर अंक पाश में जकड़ कर रह गया। ऐसे में उसकी स्थिति उस मछली के समान हो गई, जिसे पानी से निकाल कर रेतीले जमीन पर रख दिया गया हो।

वो लवण्या आर को दिली हद तक चाहता था, इस हद तक कि उसके लिए जान भी दे सकता था।....."फिर भी वो अपने मुहब्बत का इजहार नहीं कर सका"। बस यही उससे भूल हो गई और वो खाली हाथ मलता ही रह गया।....शायद उसने प्रेम का इजहार कर दिया होता, परंतु उसके नसीब में तो तड़प ही लिखी थी और तब से अब तक वो तड़प हीतो रहा था। 

इस कारण से ही वो अपने पिता से अलग इस अपार्ट मेंट में रहने के लिए चला आया था। उसकी दिली चाहत थी कि उसके "नयनों के अश्रु बिंदु" को किसी की नजर नहीं लगे।....उफ! जीवन इंसान को कैसे-कैसे नाच नचाती है कि इंसान खुद में ही उलझ जाता है।

सोचते-सोचते आखिरकार उससे नहीं रहा गया और उसने फिर से चिलम भर लिया और सुलगा कर धुआँ फेफड़ों में भरने लगा। चिलम खतम करते ही उसे भूख की अनुभूति भीहुई। इसके बाद वह उठा और कपड़ा पहन कर बाहर निकला, अपार्ट मेंट को लॉक किया और पैदल ही सड़क किनारे चलने लगा। 

चलता रहा....कदम दर कदम चलता रहा। वैसे तो अक्तूबर के प्रथम सप्ताह में सूर्य की किरणें इतनी तेज नहीं होती। धूप में इतनी तिखाश नहीं होती, फिर भी ए. सी. रूम में रहने बालों के लिए इतना धूप भी काफी है। ....फिर भी वो चलता रहा और आखिर राम दयाल ढाबा के पास पहुंचा और अंदर जाकर बैठ गया।

 ढाबे के अंदर अभी तक तो खाली -खाली था। परंतु अब दिन के ग्यारह बज चुके थे और ऐसे में अब ग्राहकों की तादाद बढ़ने लगी थी। लेकिन सम्यक को इन बातों से जैसे कोई मतलब नहीं हो, उसकी नजर तो बस "लवण्या आर" को ही ढूंढ रही थी। बहुत दिनों से उसको नहीं देखा था, इसलिये आँखों को सुकून की कमी खल रही थी।....भले ही वो प्रेम का इजहार नहीं कर पाया हो, परंतु फिर भी अगर चाहत का एक दीदार मिल जाए," राहत सी मिल जाती है।....बस यही बात चाहत के लिए थी। भले ही दिल का मिलन हो, चाहे नहीं हो, परन्तु आँखों को सुकून मिलने का तो अधिकार है।

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होटल “सांभवी” से लौटने के बाद पहले तो सलिल एवं रोमील ने पेट- पुजा की।.....उसके बाद सलिल ने रोमील को निर्देशित किया किभल्लाको टाँर्चर रूम में लेकर आए। दिन के ठीक बारह बजे सलिल भल्ला के साथ टाँर्चर रूम में था। टाँर्चर चेयर पर बंधा हुआ श्रीकांत भल्ला सलिल एवं रोमील को जिबह होते बकरे की तरह देख रहा था। उसकी आँखों में खौफ....स्पष्ट देखा जा सकता था। उसके आँखों में अगर इस समय कोई भाव था....तो वो थाकि” रहमकी याचना कररहाहो। वो करुण नेत्रों से दोनों को देख रहा था....मानो कि रहम की भीख मांग रहा हो।

परंतु उसे क्या पता था कि वो ऐसे कसाई के चंगुल में फंस चुका है, जो न तो उसे जीने देंगे और न ही मरने की इजाजत देंगे। सलिल और रोमील तो ऐसे ऑफिसर थे, जो अपनी पर आ जाए, तो पत्थर को भी बोलने पर विवश कर सकते थे।....तो फिर श्रीकांत भल्ला की बिसात ही क्या थी? वैसे भी वो ए.सी. रूम में काम करने के कारण कमजोर इम्युनिटी का था। बीतते समय के साथ ही श्रीकांत भल्ला के दिलों की धड़कन बढ़ती जा रही थी और आखिरकार सलिल उसके करीब आकर उससे मुखातिब हुआ।

तो श्रीमान बतलाएंगे कि होटल में आखिर ऐसा क्या हुआ कि नंदा को अपनी जान गंवानी पड़ी। बोलने के साथ ही सलिल ने अपनी आँखों को भल्ला के चेहरे पर गड़ा दी। जबकि उसके प्रश्न सुनकर भल्ला अकबकाया।...उसे तो समझ ही नहीं आ रहा था कि वो क्या बोले? सच का उसे शायद पता नहीं था और झूठ बोलने पर मार पड़नी थी। ....परंतु चुप भी तो नहीं रह सकता था, इसलिये सलिल से आँखें मिलाकर बोला।

सर....सच कहता हूं कि यह घटना कैसे घटी?....इसकी जानकारी बिलकुल भी नहीं है। अभी भल्ला अपनी बाते खतम भी नहीं कर पाया था कि स्वर गुंजा।

तड़ाक......।

आवाज अधिक तीव्र थी, जो सलिल के हाथों द्वारा उसके गाल पर पड़ने के स्वरूप उत्पन्न हुई थी। इसके बाद तो भल्ला के मुंह से चीख निकली और वो अपने गाल सहलाने लगा। जबकि सलिल उसकी आँखों में झांककर गुर्रा कर बोला।

अबे कमीने, गोटी किसको दे रहा है? साले....तेरे होटल रूम में अय्याशी होती थी और तू बोलता है कि तुम्हें मालूम ही नहीं। साले....सच-सच बोल, नहीं तो समझ ले कि छठी की दूध याद करा दूंगा। सलिल ने अपनी बातें खतम की और फिर भल्ला को क्रूर नजरों से देखने लगा, जबकि भल्ला बकरी की तरह मिमिया कर बोला।

सर......मैं सच कह रहा हूं कि इस घटना के बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं है। 

बस इतना बोलना था और सलिल भल्ला पर पिल पड़ा, वह उसकी धुआँधार पिटाई करने लगा। जिसके परिणाम स्वरूप टाँर्चर रूम की दीवार भल्ला के चीखो-पुकार से दहलने लगी। परंतु इसका कोई असर सलिल पर नहीं हुआ, उसने तो भल्ला को ठोकरों पर रख लिया और जब वो थक गया, रोमील ने मोर्चा संभाल ली। परंतु भल्ला पर किसी प्रकार की रहम नहीं की गई।

 जिसके परिणाम स्वरूप ही भल्ला पंद्रह मिनट में ही लहूलुहान होकर बेहोश हो गया था। परंतु अभी तक सलिल को संतुष्टि नहीं पहुंची थी। इसलिये उसने पानी मंगवा कर भल्ला पर डाला और जब भल्ला होश में आया, फिर से उसकी तुड़ाई शुरु कर दी गई।

परंतु भल्ला "भला उस बात को कहां बताता, जिसके बारे में उसे खुद जानकारी नहीं थी"। ऐसे में सलिल ने ही हार मान ली और रोमील को आदेश दिया कि भल्ला को लॉकअप में पहुंचा दे और खुद पुलिस स्टेशन के बाहर की ओर निकलने के लिए बढ़ा। बाहर वो स्काँरपियों के करीब पहुंचा ही था कि रोमील बाहर निकल कर आ गया। फिर तो सलिल ने खुद ड्राइविंग सीट संभाली, जबकि रोमील बगल में बैठ गया।.....इसके बाद स्काँरपियों श्टार्ट हुई और पुलिस स्टेशन से बाहर निकली और सड़क पर सरपट दौड़ने लगी। इधर कार के रफ्तार पकड़ते ही रोमील के हृदय में जो विचार दौड़ रहे थे, उसे बाहर लाने को तत्पर होकर बोला।

सर......"भल्ला" ने तो कुछ बताया नहीं, फिर हम लोग क्या करेंगे?

क्या करेंगे से मतलब?.....आखिर तुम कहना क्या चाहते हो? बोल कर सलिल एक पल के लिए रुका, फिर आगे बोला।....मेरे भाई रोमील.....भल्ला को जो मालूम होगा, वही बतलाएगा न। 

तो फिर आप कहना चाहते है कि "भल्ला" निर्दोष है? रोमील चौंक कर बोला। जिसके बाद सलिल के होंठों पर मुस्कान छा गई और वो धीरे से बोला।

अमा यार रोमील.....तुम भी न, बिना मतलब की बातें करते हो। भला, "भल्ला" निरपराध कैसे हो गया? उसके मैनेजर रहते होटल में दो नंबर का काम होता था और इसलिये ही यह दुर्घटना घटित हुई है। बोलने के बाद एक पल रुककर सलिल ने रोमील के चेहरे को देखा, फिर आगे बोला।.... परन्तु इस अपराध से "भल्ला" का दूर-दूर तक का रिश्ता नहीं है, क्योंकि यह एक आम मर्डर नहीं होकर सीरियल मर्डर है, मेरे विचार से।

सीरियल मर्डर से मतलब सर? आप कहना क्या चाहते है? रोमील तनिक उत्तेजित होकर बोला। जिसके जबाव में सलिल मुस्करा कर पूर्ववत बोला।

इसका मतलब यही है कि यह एक मर्डर मिस्ट्री है। मैंने जो इस केस में अब तक समझा है, उसके अनुसार इस केस में अभी और भी वारदात होने बाकी है। सलिल बोलकर चुप हुआ, तो रोमील ने टाँपिक ही बदल दी।

सर....अभी हम लोग कहां जा रहे है? 

तुम न रोमील....बहुत ज्यादा सवाल करते हो। चिढकर बोला सलिल, परंतु दूसरे ही पल उसने संक्षिप्त उत्तर दिया। हम अभी पोस्टमार्टम विभाग के डाक्टर संजीव पाहूजा के पास जा रहे है। 

 बोलने के बाद सलिल ने चुप्पी साध ली, जिसके बाद रोमील आगे बोलने की हिम्मत नहीं कर सका। जिसके परिणाम स्वरूप स्काँरपियों के अंदर पूर्ण शांति छा गई, रह गया तो सिर्फ इंजन की आवाज। कार सड़क पर सरपट दौड़ती जा रही थी, पीछे लंबी-लंबी बिल्डिंगो की कतार छोड़ते हुए।.....परंतु कार में फैली शांति उनके हृदय में नहीं थी। जहां रोमील बाँस द्वारा कहे बातों का मनो-मंथन कर रहा था, वही सलिल इस घटना क्रम में उलझा हुआ था।.....उसने नंदा के हत्या की वीडियो देखी थी, वह भी अनेकों बार,...फिर भी उसके समझ में कुछ भी नहीं आया था।

वह तो इसी बिंदु पर उलझा हुआ था कि ड्रेसिंग टेबल का शीशा टूटकर अचानक ही बिखरा किस प्रकार से।....फिर तो एक शीशे का टुकड़ा पेट में धंसने से नंदा की मौत कैसे हो गई? सवाल गंभीर था और इसका उत्तर तभी मिल सकता था, जब पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ जाए। इसलिये ही वो संजीव पाहूजा से मिलना चाहता था। जब वो संजीव पाहूजा के ऑफिस में पहुंचा, दिन के ढाई बज चुके थे।

...वह डाक्टर साहब से मिला तो जरूर, परंतु उसके हाथ निराशा ही लगी," क्योंकि अभी तक पोस्टमार्टम रिपोर्ट नहीं आई थी। ऐसे में वह रोमील के साथ वहां से निकला और फिर दोनों स्काँरपियों में बैठकर निकले।.....किन्तु अब की सलिल बेवजह ही कार को दिल्ली की सड़क पर दौड़ा रहा था। " नहीं ऐसा कहना भी उचित नहीं होगा कि वह बेवजह ही दिल्ली की सड़कों को नाप रहा था।

 एक तो उसे समय बिताना था और दूसरे उसे विचार करने के लिए समय चाहिए था और इसलिये ही वो अभी पुलिस स्टेशन लौटना नहीं चाहता था। ……परंतु विचार तो उलझते ही जा रहे थे, वो जितना चाहता था कि सुलझ जाए "विचारों की श्रृंखला उसपर हावी होती जा रही थी। कार जिस रफ्तार से दिल्ली की सड़क पर दौड़ रही थी, उसी रफ्तार से उसके विचार भी दौड़ रहे थे और इसी कशमकश में शाम के छ बज गए। तब थक-हार कर सलिल ने कार का रुख पुलिस स्टेशन की ओर कर दिया। अब वो अपने ऑफिस को लौटना चाहता था, क्योंकि उसे बहुत से काम निपटाने थे।

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अपने- आप में बहुत सुंदर, नाम के ही अनुरूप "होटल" मृणालिका। ऐसा लग रहा था कि जैसे उसे दुल्हन की तरह सजाया गया हो।....गेट पर खड़े दरबान आने वाले ग्राहकों का विनम्रता से स्वागत कर रहे थे। अंदर कंपाऊंड, जिसके चारों तरफ विशाल गार्डण और उसके बीच होटल का विशाल बिल्डिंग। .....अंदर होटल के विशाल हॉल में इस समय ग्राहकों की काफी भीड़ थी और वेटर उन्हें सर्विस दे रहे थे।

 इस होटल की खासियत थी ग्राहकों के लिए उत्तम प्रकार की सर्विस। यहां होटल में तमाम वो सर्विस दी जाती थी, जो शायद कानून की नजर में "अवैध" भी होता है।....परंतु इस होटल का मैनेजमैंट "कानून के मुंह" को खनकते पैसों से भर देते थे। फिर तो, सैंया भये कोतवाल, अब डर काहे का।....इस समय भी हॉल में धड़ल्ले से ग्राहकों को मादक द्रव्य "परोसा जा रहा था। 

हॉल में जाम से जाम टकराएजा रहे थे, चरस भरे चिलम से कश लिया जा रहा था और कहीं-कहीं तो "ड्रग्स की पुड़िया भी खींची जा रही थी। चारों तरफ मदमस्त आलम था और ऐसे में किसी को किसी की पड़ी नहीं थी।....जिधर नजर घुमाओ -लोग जाम से जाम टकरा रहे थे या तो चिलम में " फुंक" मार रहे थे।

 हॉल में लगे ब्लू लाइट की रोशनी में चिलम का फैला गाढा धुआँ और टकराते हुए जाम, अजीव से रहस्यमय दुनिया का "आभास" करा रहा था। परंतु इस से वेटर को मानो कोई मतलब नहीं हो, वे पूरी सतर्कता के साथ ग्राहकों के ऑर्डर को सर्व करने में जुटे थे।....उधर स्टेज पर पाँप म्यूजिक की धुन पर आधे जिस्म दिखाती बार वाला अल्हड़ ठुमके लगा रही थी। उसके इस अल्हड़ नृत्य पर कभी-कभी सुस्वर मादक आह "हॉल" में गुंज जाती थी। आखिर गुंजे भी क्यों नहीं, एक तो शराब का नशा, दूजे हॉल में मौजूद अधिकांश युवा और बीतते रात का मादक मय गहराता आलम।

 इस होटल की सर्विस ही ऐसी थी कि यहां अधिकांश युवा ही आते थे "कपल जोड़ा" बनकर, जिसमें से अधिकांश अमीर घर के बिगड़े नवाब जादे होते थे।....जिन्हें मौज-शौक पूरा करने के लिए यह होटल किसी स्वर्ग से कम नहीं लगता था।.....यहां की रूम सर्विस शेफ और उत्तम क्वालिटी की थी, बस यही कारण उनको ये होटल आकर्षित करता था। 

बस यही कारण भी था कि” यहां शाम ढलने के साथ ही ग्राहकों की तादाद बढ़ने लगती थी। आज की रात भी इस होटल में खास ही था, "क्योंकि हॉल में मौजूद ग्राहकों में अधिकांश युवा ही थे, वह भी जोड़े में।

सभी को ऐश-मौज करना था और उनमें से अधिकांश को अपने "जिस्म की आग बुझानी थी"। इस सर्विस के लिए तो होटल एक्सपर्ट था। हॉल में फैली मदहोशियों के बीच युवा, उसमें भी बीच वाले टेबल पर बैठा युवा जोड़ा खास था। लड़की नंदिनी और लड़का प्रभास, दोनों अमीर घर के थे, इसकी चुगली उनके तन पर मौजूद कपड़े कर रहे थे। उन दोनों का चेहरा भी काफी आकर्षक था।

तभी तो दोनों एक दूसरे को "कामुक नजरों से देख रहे थे"। जबकि उनके टेबल पर रखी हुई स्कॉच की बोतल खाली होने को आई थी। हां, दोनों के लिए प्याले में जाम बना पड़ा था।....परंतु दोनों की नजरें एक दूसरे के शरीर-सौष्ठव को नाप-तौल रही थी और होंठ थे कि” प्यासे हो रहे थे।

कहते है न कि प्रेम अलग वस्तु है, क्योंकि इसमें पाने की "लालसा" नहीं होती। प्रेम तो पूर्ण निष्काम होता है, जो कि निछावर हो जाने को तत्पर रहता है।.....किन्तु यहां प्रेम तो था ही नहीं, थी तो सिर्फ वासना। दोनों के हृदय में कामुकता का वाण लगा हुआ था और वे इस होटल में इसलिये ही आए थे कि "अपने हृदय में भड़की हुई कामुकता की ज्वाला का "समन" कर सकें। 

दोनों में प्रेम का दूर-दूर तक का संबंध नहीं था, हां थी तो सिर्फ मित्रता, ऐसी मित्रता जो कि "अवैध संबंधों" की मौन स्वीकृति देता है।....यह इसलिये भी कि आज की शिक्षा यथार्थ परक नहीं है और हम अपनी संस्कृति भूला कर पश्चिम की नकल करने लगे है।

बस यही हाल दोनों का था, दोनों की आँखों में हवस के कीड़े गिजबिजाने लगे थे। ऐसे में प्रभास से नहीं रहा गया और उसने अपने होंठ "नंदिनी" के सुर्ख होंठों पर टिका दिए और होंठों के पराग कणों को चूसने लगा। जिससे नंदिनी की भी व्यग्रता बढ़ने लगी। वो पल भर में ही तड़प कर प्रभास से अमर बेल की तरह लिपट गई।....परंतु इससे उनके जिस्म की आग बुझने की बजाए और भी भड़क उठी।....लगा कि दोनों एक दूसरे में समा जाने के लिए उत्कट हो उठे हो। लोक-लाज का तो वहां पर भय था नहीं, तो फिर उनकी कामुकता बढ़ते ही जाना था। वैसे भी वहां पर मौजूद अधिकांश जोड़े इसी क्रिया में लगे हुए थे।

परंतु एक समय ऐसा भी आया, जब प्रभास और नंदिनी, दोनों एक दूसरे से अलग हुए। फिर उन्होंने जाम भरे प्याले को उठाया और हलक में उतार लिया। फिर बोतल में बची-खुची शराब को प्याले में उड़ेलने लगे। परंतु प्रभास की काम- लोलुप नजरे नंदिनी के जिस्म को तौल रही थी। उसका बस चलता, तो वो यही इसी हॉल में नंदिनी से एकाकार हो जाता।

.....किन्तु उसपर अभी नशा हावी नहीं हुआ था, इसलिये उसकी चेतना बची हुई थी। अतः दोनों ने अंतिम बचे शराब के प्याले को होंठों से लगाया और अंतिम बूंद तक शराब पी ली। इसके बाद प्रभास ने कलाईं घड़ीको देखा, रात के नौ बज चुके थे, तो अब समय हो चुका था।

आखिरकार प्रभास अपनी जगह से उठा और नंदिनी को उसने गोद में उठा लिया। उसके इस हरकत से नंदिनी मादक हंसी- हंसपड़ी। जबकि प्रभास उसे लेकर रूम की ओर बढ़ा और सीढ़ियों पर चढ कर फर्स्ट फ्लोर पर पहुंचा और फिर नंदिनी को लिए ही रूम नंबर ग्यारह में प्रवेश कर गया। इसके बाद तो, उसने नंदिनी को बेड पर पटका और दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। 

फिर उसने नजर घुमाकर रूम को देखा, आधुनिक सुविधा से लैस, रूम की सुविधा देखकर प्रभास की नजरों में संतुष्टि के भाव उभड़े।.....इसके बाद तो वह भी कुदककर बेड पर चढ गया और नंदिनी को देखने लगा।.....रूम की नीली रोशनी में नंदिनी और भी कामुक प्रतीत हो रही थी। इस परिस्थिति में प्रभास खुद पर कब तक नियंत्रण रख पाता। उसकी भावना भड़कने लगी, फिर तो उसने नंदिनी को अपने बाहु पाश में जकड़ लिया।

.....फिर तो एक-एक कर वो नंदिनी के शरीर से वस्त्रों को जुदा करने लगा और एक ऐसा भी समय आया, जब नंदिनी पूर्ण नि-वस्त्र हो गई। लेकिन जैसे ही प्रभास अपने वस्त्रों को उतारने लगा " रूम की लाइट जलने-बुझने लगी"। लगा कि रूम में कंपन हो रहा हो जैसे और फिर तेज स्वर "रति संवाद-रति संवाद" गुंजने लगा। अचानक परिवर्तित हुए इस परिस्थिति ने प्रभास एवं नंदिनी को आतंकित कर दिया था।

भय के मारे दोनों के हलक सूखने लगे थे और शराब का नशा तो न जाने कब का उड़न-छू हो चुका था।....परंतु वे दोनों जब तक परिस्थिति को समझते या फिर मदद के लिए कोई उपाय करते। रूम में गूँजता  हुआ "रति संवाद" स्वर अधिक तीव्र हो गया और फिर ड्रेसिंग टेबल का शीशा तेज आवाज के साथ टूटकर बिखरा और पूरे रूम में फैल गया।....फिर तो काँच का एक टुकड़ा नंदिनी के पेट में आकर धंस गया।

वो असह्य पीड़ा से तड़पने लगी, छटपटाने लगी वो।....जबकि प्रभास हक्का-बक्का सा रह गया, उसे तो कुछ भी समझ नहीं आ रहा था। वो नंदिनी को बचाना चाहता था, लेकिन नंदिनी ने तड़प कर दम तोड़ दिया। इधर नंदिनी के प्राण पखेरू उड़े और उधर रूम का दरवाजा जोर-जोर से पीटा जाने लगा। ऐसे में प्रभास ने हिम्मत करके दरवाजा खोला, देखा तो गेट पर होटल स्टाफ और ग्राहकों का हुजूम जमा था। इसके बाद तो जैसे ही उन लोगों की नजर अंदर पड़ीऔर सभी के होश फाख्ता हो गए।

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सलिल वापस तो पुलिस स्टेशन लौटा, परन्तु ऑफिस के काम निपटाने के बाद बोर होने लगा। दूसरे शाम के आलम ने ढलते-ढलते रात का रुप ले लिया था।.....जी हां, अब रात के आठ बज चुके थे, इसलिये सलिल को भूख भी लग गई थी।.....दूसरे पिछली रात का जागरण और दिन भर की भागदौड़....वो काफी थक चुका था। इसलिये शरीर को थोड़ा आराम देने की सख्त जरूरत थी "और फिर क्या पता, कोई अपराध घटित न हो जाए।....जी हां, वो इस केस में अब तक जितना समझ पाया था, उसके मन में अंदेशा तो पनप ही चुका था।

खैर!....जो भी होगा, देखा जाएगा। इस प्रकार से सोचकर सलिल रोमील के साथ पुलिस स्टेशन से बाहर निकला। अभी ड्राइविंग सीट रोमील ने संभाल रखी थी। इसके बाद वे दोनों लक्खी पाजी के ढाबे पर पहुंचे और वहां उन्होंने छककर भोजन किया।.....इसके बाद उनकी स्काँरपियों दिल्ली की सड़क पर निकल पड़ी। ड्राइव कर रहे रोमील ने इस दरमियान सलिल से बात करने की कोशिश की, परंतु सलिल शायद बात करने के मूड में ही नहीं था, इसलिये उसने किसी प्रकार की प्रतिक्रिया नहीं दी। ऐसे में स्काँरपियों के अंदर पूर्ण शांति पसर गई। ऐसी शांति कि सुई भी गिरे, तो तेज धमाके की आवाज हो।

परंतु कब तक? इस शांति को कब तक स्थाई रहना था? अचानक ही सलिल ने अपने कलाईं घड़ी को देखा, जो रात के साढे़ नौ बजने की सूचना दे रही थी और अभी वो अपनी कलाईं से नजर हटा भी नहीं पाया था कि उसके मोबाइल ने बीप दी। रात के इस समय फोन, "सहज ही फोन कॉल ने उसके दिल की धड़कन को बढ़ा दिया"। कल की घटना ने उसके दिलो-दिमाग पर गजब का असर किया था, ऐसे में फोन की घंटी," जरूर कोई अमंगल समाचार होगा"। परंतु फोन कॉल आया था, तो उठाना तो था ही। इसलिये सलिल ने अपने अंदर हिम्मत को जुटाया और "कॉल" उठा लिया।

उधर मृणालिका होटल के रिसेप्सन से लाइन थी, इसलिये सलिल के पुछने पर सीधा ही होटल में घटित घटना के बारे में बतलाया गया।....फोन पर कही बातें जैसे ही उसके कान में पड़ी, सलिल सीट पर उछल पड़ा। उफ! उसको क्या हो गया है? उसने अभी-अभी तो अपराध के बारे में सोचा था और अपराध घटित भी हो गया। कहीं यह संयोग तो नहीं है?

....नहीं-नहीं, यह संयोग तो नहीं हो सकता, हां इसे अपराधी का प्रयोग जरूर कह सकते है। सोचते हुए सलिल खुद को शांत करने की कोशिश करने लगा। वैसे भी थकावट ने उसका बुरा हाल कर दिया था, उसपर से घटित ये घटना। उधर कार ड्राइव कर रहे रोमील ने जब सलिल को उछलते देखा, पहले तो चौंका, फिर समझ गया कि "जरूर कोई अनहोनी घटित हुई है, अन्यथा बाँस ऐसी हरकत नहीं करते।

रोमील सोच ही रहा था कि सलिल ने अपने-आप को संभाल लिया और फिर रोमील को आदेश दिया कि स्काँरपियों "होटल मृणालिका" की ओर लेकर चले। बाँस का आदेश, तत्परता पूर्वक रोमील ने पालन किया और स्काँरपियों को "होटल मृणालिका" की ओर घुमा दिया। जबकि सलिल ने इस दरमियान फिंगर प्रिंट एक्सपर्ट एवं डाँग स्क्वायड को फोन लगा कर घटना के बारे में बतलाया। 

साथ ही निर्देशित करने लगा कि उन लोगों को वहां पहुंच कर क्या करना है। इसके बाद उसने पुलिस स्टेशन फोन लगाकर इस घटना के बारे में सूचना दी। फिर फोन साइड में रखकर उसने सिर को सीट से टिकाकर आँखें बंद कर ली और शांत चित होकर इस घटना के बारे में सोचने लगा।

वैसे भी इस घटना ने सलिल को अंदर से आंदोलित कर दिया था। उसपर उलझन ये कि उसने जो वीडियो क्लीप देखी थी।....आखिर मामला क्या है?..... समझ में आ जाए, तो आधा केस तभी साँल्व हो जाए। परंतु समझ आए तो कैसे? शब्द ही इतना उलझा हुआ और असभ्य था कि किसी के सामने कहने में भी शर्मिंदगी महसूस हो।....."रति संवाद" शायद कोर्ड वर्ड था इस अपराध का और अपराधी भी शातिर ही होगा, अन्यथा ऐसे शब्द प्रयोग करने के लिए कुशाग्र बुद्धि चाहिए।

...... खैर जो भी हो! परंतु इस "रति संवाद" का मतलब क्या हो सकता है? सलिल सोच रहा था, दिमाग पर जोड़ दे रहा था और वो जितनी कोशिश कर रहा था, उसकी उलझन भी उतनी ही बढ़ती जा रही थी।

बीतते समय के साथ ही सलिल के उलझन की रफ्तार भी बढ़ती जा रही थी।....जबकि रोमील ने भी कार की रफ्तार बढ़ा दी थी। ठीक रात के दस बजे उनकी स्काँरपियों "होटल मृणालिका" के कंपाऊंड में पहुंच चुकी थी। कार के खड़ी होते ही सलिल एवं रोमील तेजी से बाहर निकले और होटल के अंदर बढ़ गए। अंदर हॉल में सन्नाटा था, जबकि उस रूम में, जिस रूम में वारदात हुई थी, पुलिस का दस्ता पहुंच चुका था।.....फिर तो सलिल व रोमील भी तेज कदमों से चलते हुए उस रूम में पहुंचे। वहां पहुंच कर सलिल ने देखा कि जयकांत बात्रा अपने काम में जुटा हुआ था, जबकि गेट के पास सिपाहियों की फौज अलर्ट मोड में खड़ी थी।

वहां की स्थिति देखने के बाद सलिल के चेहरे पर संतुष्टि का भाव उभड़आया। वो जानता था कि सिपाहियों की मुस्तैदी के कारण मीडिया वाले अंदर नहीं आ सकते थे। इसलिये चलता हुआ वो "नंदिनी" के डेड बाँडी के पास पहुंच गया और उसके करीब घुटनों के बल बैठकर लाश का अवलोकन करने लगा। सेम वही परिस्थिति, जिस परिस्थिति में नंदा की हत्या हुई थी। 

पेट में कांच का टुकड़ा धंसा होना और चेहरे पर असह्य पीड़ा के चिन्ह। जब वो वहां से उठकर प्रभास के पास पहुंचा, पहले से ही अक्रांत प्रभास ने वहां घटित होने वाली घटना को सिलसिलेवार बतलाने लगा।.....परंतु उसके बयान में कुछ नया नहीं होने के कारण सलिल वहां से भी उठकर खड़ा हो गया।

फिर वो आगे बढ़ा, होटल बिल्डिंग की तलाशी के लिए। हालांकि वो जानता था कि उसे कुछ भी हासिल नहीं होने वाला है,....फिर भी कहीं हत्यारे ने कोई गलती कर दी हो। बस वही एक गलती की उसे तलाश थी, इसलिये उसने होटल के विशाल बिल्डिंग के पूरे एक चक्कर लगा लिए,....परन्तु उसके हाथ निराशा ही आई। इसलिये वो वापस उसी रूम में वापस लौट आया, जिसमें वारदात हुई थी। 

जिसके बाद उसने रोमील को लिया और सी. सी. टीवी रूम कीओर बढ़ा। वहां पहुँचने पर वहां के मौजूद स्टाफ ने उन्हें उस रूम की वीडियो प्ले करके दिखा दी।.... सेम वही परिस्थिति, "नंदिनी का नि:वस्त्र होना और इसके बाद लाइट जलने-बुझने लगना"।.... इसके बाद गूँजता  हुआ "रति संवाद-रति संवाद" का स्वर और फिर ड्रेसिंग टेबल का शीशा टूटना। इसके बाद तो नंदिनी भी नंदा की तरह तड़पने लगी और आखिर में उसने सांस तोड़ दी और लाश में तबदील हो गई।

वीडियो देखने के बाद एकबारगी तो सलिल को मन ही मन बहुत गुस्सा आया, "इस होटल मैनेजमैंट एवं वहां मौजूद स्टाफ पर, जो किसी के अंतरंग पल के वीडियो बनाते है। यह कानूनन जुर्म है और पोर्नोग्राफी के कटेगरी में आता है। परंतु इस कारण से ही उसे इस केस में महत्वपूर्ण क्लू मिला था। सजा तो जरूर इन होटल के मैनेजमैंट और यहां के स्टाफ को मिलेगा,.... परंतु अभी नहीं। सोचने के बाद सलिल ने उस वीडियो को अपने मोबाइल में एसेस किया और फिर वहां के स्टाफ को बाहर निकाल कर उस रूम को लॉक करवा दिया। फिर रोमील के साथ वारदात वाले रूम में लौट आया।तब तक जयकांत बात्रा ने अपने काम निपटा लिए थे और लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया था। 

ऐसे में सलिल ने रोमील को निर्देशित किया कि होटल के मैनेजर एवं प्रभास को गिरफ्तार कर ले। फिर वो बाहर की तरफ निकला, परंतु होटल के गेट पर उसे मीडिया वाले मिल गए।.....कहते है न कि "दूध का जला छाछ भी फुक-फुक कर पीता है"। ऐसे ही सलिल भी सावधान हो गया, उसने मीडिया बालों के अधिकांश प्रश्नों को टालने की कोशिश की, नहीं तो गोल-मटोल जबाव दिया। फिर मीडिया बालों से अपना पिंड छुड़ाकर होटल बिल्डिंग से बाहर निकला और अपने स्काँरपियों की तरफ बढ़ा।

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रात के दस बजने के साथ ही उन्नति वियर बार का जलवा अपने चरम पर पहुंचने लगा था।....वियर बार होने के कारण यहां जमकर शराब परोसा जाता था। साथ ही यहां ग्राहकों के द्वारा जमकर चरस को धुएँ में उड़ाया जाता था। उसपर अधनंगे बार वालाओं का नृत्य, कामुकता का खुला निमंत्रण देता हो जैसे।.....तभी तो यहां पर ज्यादातर युवा अपनी कुंठित आकांक्षा को पूरा करने के लिए आते थे। यहां पैसे के बल पर ग्राहकों को हर वो सुविधा मुहैया करवाई जाती थी, जिसके लिए कोई लालायित होता है, खासकर युवा।

आजकल बिजनेस का एक ट्रेंड सा हो गया है कि वे युवा को आकर्षित करना चाहते है। मानव सभ्यता की महत्वपूर्ण कड़ी युवा ही तो है,.....परंतु युवाओं की तादाद आजकल ज्यादा हो गई है। उसमें भी युवा "जोश" से लबरेज होते है, युवाओं में कुछ नया करने की "उत्कंठा " ज्यादा होती है। "युवा मन चंचल होता है और मुक्त गगन में परवाज करना चाहता है"। 

यही कारण है कि समाज के वो मांधाता, जो कि बिजनेस करते है और समाज के नेतृत्व की हामी भरते है, युवा को टार्गेट करने के लिए हर संभव कोशिश करते है। यही आज का सत्य है " कि जिसने युवा की नब्ज पकड़ ली, उसे बिजनेस टायकुन बनने से कोई नहीं रोक सकता।

नहीं तो घर-गृहस्थी वाले इतने खर्च करने में समर्थ कहां होते है। उनके ऊपर परिवार की जिम्मेवारी होती है, उन्हें बच्चों के परवरिश की चिन्ता होती है। ऐसे में वो अपने ऊपर मनमाना खर्चा नहीं कर सकते, तो फिर खर्चा करेगा कौन? अरे, युवा है न, बेफिक्र होकर खर्चे करेगा, क्योंकि अभी वो कमाना नहीं जानता। बस यही लाँजिक इस "उन्नति वियर बार" के मालिक भी जानते थे। 

तभी तो विशाल क्षेत्रफल में फैला हुआ वियर बार, जिसकी इंटिरियर डिजाइनिंग बेहतर तरीके से की गई थी। "वियर बार" को दुल्हन की मानिंद सजाया गया था और अंदर खास प्रकार की सजावट की गई थी। इस कारण से इसके अंदर जाने पर प्रतीत होता था कि "स्वर्ग अगर कहीं है, तो यही है।

अंदर हॉल में वेटर ग्राहकों को तत्परता के साथ ऑर्डर सर्व कर रहा था। वहां की व्यवस्था इतनी उम्दा थी कि रात के दस बज चुके थे, परंतु अभी तक ग्राहकों के आने का सिलसिला जारी था और हॉल भरा हुआ था। लेकिन उस बीच वाले टेबल पर बैठे कपल को मानो इससे कोई मतलब नहीं था। उस टेबल पर बैठे कपल में "सान्या सिंघला थी और लड़का कोई नया था। 

...परंतु सान्या सिंघला की पसंद तो साधारण नहीं हो सकता न, उसके साथ बैठा युवक आकर्षक था। उसकी नीली आँखें, भूरे बाल, गोल-मटोल मक्खन जैसा चेहरा। नाम बलजीत और नाम के अनुरूप ही उसकी आकर्षक कद-काठी थी। तभी तो राह में मिलते ही सान्या ने उसे सीधे आँफर ही दिया था और साथ में ही यहां पर लेकर आ गई थी।

बलजीत भी तो, जब से आया था, हॉल में फैली हुई दुधिया रोशनी में सान्या सिंघला के हुस्न को निहारे जा रहा था। उसकी लालची नजर बार-बार सान्या के जिस्म पर जाकर चिपक जाती थी।....सान्या भी उसके मनोभाव समझती थी.....परंतु जब तक उसे सही से नशा नहीं हो, वो हम बिस्तर नहीं हो सकती। ऐसे में सान्या प्याले में "टेबल पर रखे स्कॉच की बोतल से" शराब डाल रही थी। 

साथ ही मंद-मंद मुस्करा रही थी। वो जानती थी कि जब बगल में कमनीय वाला हो, शराब का नशा हो और इश्क करने की रजामंदी हो, कोई भी पुरुष अपने आप पर नियंत्रण नहीं रख सकता। फिर तो वो अप्सरा सी सुंदर थी, ऐसे में बलजीत का बहकना वाजिब ही था।

अरी ओ सान्या.....ऐसा क्यों लगता है कि मैं तुम्हें बहुत पहले से जानता हूं। जबकि हम दोनों तो अभी चंद घंटों पहले मिले है। आखिरकार जब बलजीत से नहीं रहा गया, तो वो अपने शब्दों में मक्खन लपेटकर बोला। जबकि सान्या उसकी बातें सुनकर कातिल अदा के साथ मुस्कराई, साथ ही उसने तैयार जाम को बलजीत को थमाया और दूसरे प्याले को अपने होंठों के करीब ले-जाकर एक बार बलजीत के चेहरे को देखकर बोली।

स्वीट हार्ट....जब शराब का नशा हावी हो और मुझ जैसी कमनीय वाला बगल में हो, नयी पहचान भी जानी- पहचानी हो जाती है।

ओह!....स्योर बेबी। तुम शायद सही कहती हो, यह इश्क चीज ही ऐसी है कि ऐसा होना स्वाभाविक है। बलजीत तपाक से बोला, फिर एक पल के लिए रुका, इसके बाद आगे बोला। अरी सान्या....क्या हम दोनों की दोस्ती हमेशा के लिए कायम नहीं रह सकती। बलजीत ने अभी अपनी बातें खतम ही की थी कि सान्या ने अपने सुर्ख अधर को बलजीत के होंठों के करीब ले गई और फुसफुसा कर मादक स्वर में बोली।

स्वीट हार्ट.....तुम तो आम खाओ, गुठली के दाम क्यों गिनने में लगे हो।

बोलने के साथ ही सान्या सिंघला ने अपने होंठ बलजीत के होंठ पर चिपका दिए।......फिर क्या था, खुला निमंत्रण मिला और बलजीत उसके अधर से पराग रस कण को चूसने लगा।....फिर तो दोनों की भावनाएँ भड़कने लगी और पल-प्रति पल बढ़ने लगी। परंतु कितनी देर तक? 

आखिरकार दोनों अलग हुए और हाथ में थामे जाम को गटक लिया। प्याला खाली हुआ और सान्या फिर से जाम बनाने लगी, जबकि बलजीत अपने "कामुक" नजरों से सान्या के जिस्म को तोलता रहा। उसके हृदय में हो रहा था कि "बिल्ली के भाग्य से छींके टूटे है" अन्यथा अप्सरा सी सुंदर लड़की का सानिध्य कहां मिल पाता है।

परंतु वो कहां जानता था कि कुछ पल बाद ही उसका दिन में देखा गया "दीवा:स्वप्न" टूटकर बिखर जाने वाला है। वो जिसका सानिध्य चाहता है, वो कामना की जीती-जागती प्रति मूरत है, जो पल में ही अपने विचार बदल लेती है।....उसे मानवीय भावनाओं से किसी प्रकार का ताल्लुकात नहीं, उसे तो बस "जरूरत" की बातें ही पता है।....सच! यही हुआ भी, अभी उन दोनों को एक दूसरे से अलग हुए पांच मिनट भी नहीं गुजरा था कि वियर बार के गेट से एक नौजवान युवक ने अंदर कदम रखा और उसकी आँखें हॉल में खाली टेबल तलाशने लगी। जबकि आए हुए नौजवान को देखकर सान्या सिंघला चौंकी।

उसके चौंकने का कारण यह नहीं था कि वो उस नौजवान से परिचित थी।.....परंतु आए हुए नौजवान का शरीर सौष्ठव काफी आकर्षक था। उसकी भूरी आँखें और काले बाल, उसपर गोल चेहरा और सुराहीदार गर्दन। बस एक नजर में ही वो नौजवान "सान्या सिंघला" के हृदय में उतर गया। उस नौजवान को देखकर वो तड़प सी उठी और मीठे आह भरने लगी।

....सहज ही उसके मन में भाव जगे कि "काश यह लड़का आज की रात उसके बांहों में हो"।....फिर तो सोचना था और सान्या सिंघला अपने जगह से उठ खड़ी हुई और तेजी से आए हुए नौजवान की तरफ बढी। उसे अचानक से ही उठते देख और फिर दूसरे नौजवान की तरफ बढ़ता देख पहले तो बलजीत समझ ही नहीं पाया कि "हो क्या रहा है" परंतु जब उसे समझ आया। उसने सान्या को रोकने की काफी कोशिश की, किन्तु सान्या "भला" अब उसके रोकने से रुकने वाली कहां थी।

बलजीत, उसके तो सपने ही छिन्न- भिन्न हो गए। कहां तो उसने सोचा था कि आज की रात वो जन्नत की सैर करेगा और कहां वो हकीकत के कठोर धरातल पर आकर गिरा था। कहीं ऐसा भी होता है? प्रश्न सहज ही उसके मन में उठे। वैसे भी उसकी सुंदरता क्या कम थी? वह भी तो आकर्षक व्यक्तित्व का स्वामी था। परंतु उसने आज जिसे पार्टनर बनाने का सोचा था, उसका स्वभाव ही ऐसा था। 

भला उसे क्या पता था कि सान्या तो ऐसी काली नागिन है, जिसे रिश्ते बनाने और निभाने में कोई दिलचस्पी नहीं। उसे तो "रात" का पार्टनर चाहिए और उससे बेहतर मिल गया, तो उसके पास चली गई। सान्या के इस हरकत ने तो मानो बलजीत के हृदय पर आघात किया था। परंतु वो इस आघात को छिपा लेना चाहता था, इस घाव को सहन कर लेना चाहता था। इसलिये, इसके बाद तो वो बेतहाशा पीने लगा।

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होटल मृणालिका से लौटने के बाद जब सलिल अपने ऑफिस में पहुंचा, काफी थक चुका था। उसकी आँखें लाल-लाल हो चुकी थी और सांसें चढने लगीथी। ऐसे में उसने कुर्सी के पीछे दीवाल पर सिर टिकाया और निढाल होकर पसर गया।....आँखें बंद और दिमाग में विचारों के झंझावात। आखिर ऐसा हो भी क्यों नहीं, बीते दो दिन, दस अक्तुबर एवं ग्यारह अक्तुबर "और दो हत्याएँ " वह भी इस प्रकार से कि उलझन में डाल दे। वैसे भी आज तक उसने न जाने कितने ही केस साँल्व किए थे,.... परंतु "मर्डर का यह केस" मानो उसके लिए सिर दर्द के समान था।

 वह सोच ही रहा था कि अब वो किस प्रकार के "कदम" उठाए कि मामला सुलझाने में उसे सफलता मिले। तभी ऑफिस में रोमील ने भी कदम रखा और आकर धम्म से सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया। उसके आने से सलिल की तंद्रा टूटी, फिर तो उसने कलाईं घड़ी पर नजर डाली, रात के बारह बज रहे थे। रात के बारह बज चुके थे, ऐसे में थोड़ा सो लेना चाहिए, क्योंकि अगले दिन भी तो भागदौड़ रहने वाली ही-है। ऐसा सोचकर सलिल अपने सीट पर से उठा और ऑफिस को अंदर से बंद कर अपनी सीट पर पूर्ववत आकर बैठ गया। किन्तु निंद आए तब न, हृदय में तो विचारों के झंझावात चल रहे थे, तो आँखों में निंद कहां से आती।

दिमाग में तो नंदा एवं नंदिनी के हत्या का "दृश्य " घूमने लगता था। वह आवाज "रति संवाद- रति संवाद" एक शोर सा बनकर उसके कान में गूंज रहा था। उसे इस प्रकार की अनुभूति हो रही थी कि "उसके सामने, अभी-अभी ही जैसे घटना घटित हुई हो"। उफ!.....कितना भयावह दृश्य होगा, “जब नंदा एवं नंदिनी ने तड़प-तड़प कर दम तोड़ा होगा।

...परंतु क्यों? इस घटना के पीछे कारण क्या है और इसका सूत्रधार कौन हो सकता है? ऐसे ढेर सवाल थे। जिसका उत्तर उसको ही ढूंढना था,....किन्तु उससे पहले जानना जरूरी था कि इस हत्याओं के कारण क्या है। इस "वीभत्स" हत्या प्रकरण को अंजाम देने वाला आखिर लड़का है, या फिर लड़की है? इन दो प्रश्न के उत्तर मिल जाने पर बाकी के प्रश्न स्वतः ही हल हो जाने थे। इसी दो प्रश्न में तो पूरा का पूरा केस उलझा हुआ था। ऐसे में उसको यही प्रयास करना था कि इन दोनों प्रश्नों के करीब पहुंच जाए।

किन्तु उससे पहले....उसको इस सिलसिलेवार होते हत्याकांड को रोकने के लिए भी प्रयास करना था। क्योंकि लगातार इसी क्रम में शहर में हत्याओं को अंजाम दिया गया, तो शहर में एक अराजकता सी छा जाएगी। ऐसे में एक तो मीडिया वाले इस घटना का जमकर फायदा उठाना चाहेंगे। वो अपने टी.आर. पी. को बढ़ाने के चक्कर में अपनी "सीमा" को भूलने से भी गुरेज नहीं करेंगे। 

दूसरे लोगों का "पुलिस डिपार्ट" से विश्वास उठने लगेगा और दोनों ही स्थिति में उसकी परेशानी बढ़ जाएगी।.....सलिल अच्छी तरह से जानता था कि वो इन दोनों परिस्थितियों पर नियंत्रण नहीं कर सकता। क्योंकि मीडिया बालों से उलझने की भूल वो अब कर नहीं सकता। क्योंकि मीडिया से उलझकर उसने देख लिया था कि इसका परिणाम क्या होता है।

सोचते-सोचते सलिल ने करवट बदला, तभी उसकी नजर रोमील पर गई। रोमील तो आँखें बंद कर कुंभकर्ण की तरह निंद खींच रहा था। उसे इस तरह से निंद खिचता देखकर सलिल को चिढ हुई,.....उसके दिल में हुआ कि खींच कर लात मारे,....परंतु ऐसा वो अभी तो नहीं कर सकता था।

जानता था कि दो दिनों की थकावट उसको भी है, इसलिये उसे सोने देना चाहिए। सोच कर उसने अपनी नजर रोमील पर से हटा ली और फिर वो सोचा कि "खुद भी थोड़ी निंद खींच ले।...किन्तु शायद उसके नसीब में निंद नहीं लिखा था, क्योंकि उसने जैसे ही आँखों को बंद की,....वैसे ही उसके मोबाइल ने बीप दी।

रात के इस समय कौन हो सकता है? सहसा ही उसके दिमाग में प्रश्न उभड़ा और जैसे ही उसने मोबाइल उठाकर देखा...."एस. पी. साहब सामने फोन लाइन पर थे। बस फिर क्या था, सलिल संभल कर कुर्सी पर बैठ गया और फिर उसने कॉल रिसीव की। उधर से साहब ने उसका हाल-चाल पूछा और सीधे पुलिस मूख्यालय आने के लिए कहा। बाँस के आदेश सुनकर सलिल ने सिर्फ हां में सिर हिलाया।

 फिर तो फोन कनेक्शन कट गया।.....किन्तु बहुत देर तक सलिल फोन को ही घुरता रहा, मानो कि बाँस फोन में ही घुसे बैठे हो। एक तो रात का आलम, दूसरे थकावट, ऐसे में उसकी इच्छा एक कदम चलने की नहीं थी। लेकिन इस स्थिति में वो कर भी क्या सकता था, "बाँस का आदेश आखिरकार पालन करने के लिए होता है"। इसमें मनाही अथवा कोताही करने की छूट नहीं होती।

सोचकर वह अपने सीट से उठा, फिर उसने रोमील को उठाया।.....रोमील तो अचानक ही इस प्रकार से निंद से जगाने पर हकबका कर उठा। उसकी सांस तेज-तेज चल रही थी और ऐसे में उसने परेशान नजरों से सलिल को देखा, जिसमें शिकायत के भाव थे। जबकि सलिल ने पहले तो ऑफिस में जलते हुए बल्ब को देखा, फिर रोमील को ऊँचे स्वर में सुना दिया कि अभी पुलिस मूख्यालय चलना है, क्योंकि बाँस का आदेश है। 

सुनकर रोमील मन ही मन चिढा, आखिरकार वो कर भी तो कुछ नहीं सकता था, इसलिये मन को मार कर सलिल के पीछे-पीछे ऑफिस से बाहर निकला। फिर दोनों स्काँरपियों के पास पहुंचे, सलिल ने ड्राइविंग सीट संभाल ली और रोमील बगल में बैठा। इसके बाद तो स्काँरपियों श्टार्ट होकर पुलिस स्टेशन के गेट से निकली और सड़क पर सरपट दौड़ने लगी।

लेकिन सलिल, वो अपने विचार को किस प्रकार से रोके। जिस रफ्तार से कार सड़क पर भागी जा रही थी, उसी रफ्तार से उसके विचार भी भागे जा रहे थे। पीछे छूटती शहर की ऊंची-ऊंची बिल्डिंगे और पीछे छूटता सड़क। हालांकि सलिल पूरी सावधानी के साथ कार ड्राइव कर रहा था। वैसे तो रात के इस समय सड़क पर ट्रैफिक न के बराबर थी, फिर भी तनिक भूल होने पर परिणाम भयावह हो सकते थे। 

इसलिये वो सावधान होकर ड्राइव करना चाहता था। लेकिन वो अपने विचारों का क्या करें, जो उसे बार-बार अपने लपेटे में ले रही थी, उसको उलझाए जा रही थी। जबकि बगल वाले सीट पर बैठा हुआ रोमील झपकी लेने में व्यस्त था।

उसे इस तरह से निंद लेता देखकर सलिल चिढ गया। किन्तु न जाने क्या सोचकर उसने रोमील को सोने दिया। जबकि आधे घंटे का सफर कब बीत गया, उसे पता ही नहीं चला। पुलिस मूख्यालय आ चुका था, इसलिये उसने कार गेट से अंदर लिया और पोर्च में खड़ी की, फिर रोमील को निंद से जगा दिया। फिर दोनों कार से बाहर निकले और मूख्यालय बिल्डिंग की ओर बढे, मन में संशय लिए हुए। 

आखिर रात के इस समय मूख्यालय बुलाने का कारण क्या हो सकता है? प्रश्न सहज ही दोनों के मन में उठ रहे थे। रात के इस समय बुलाने का मतलब खास ही हो सकता है। सोचते हुए वे बिल्डिंग के गलियारों से गुजर रहे थे और एस. पी. साहब के ऑफिस की ओर बढ़ रहे थे।

रात के इस समय भी मूख्यालय में काफी चहल-पहल थी। पुलिस अधिकारी पूरी मुस्तैदी के साथ अपने कार्य का संपादन कर रहे थे, जबकि चप्पे- चप्पे पर तैनात सुरक्षा के लिए पुलिस कर्मी पूरी मुस्तैदी के साथ अपनी डियूटी को निभा रहे थे। 

गलियारों से गुजरते हुए सलिल की आँखें इन सभी चीजों को देखती जा रही थी। जबकि रोमील, वह तो चलते हुए भी ऊँघ रहा था। उसे ऊँघता देखकर सलिल को अंदर से कुढ़न हो रही थी। उसे अफसोस हो रहा था कि बेकार में ही उसने रोमील को साथ आने के लिए कह दिया। खैर!.....अब क्या हो सकता था, वे दोनों तो एस. पी. साहब के ऑफिस के करीब पहुंच चुके थे और जैसे ही उन्होंने अंदर कदम रखा।

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एस. पी. साहब रात के इस समय लैपटाप पर डटे हुए थे। उनकी आँखों में देखकर ऐसा लगता था कि निंद उनसे कोसो दूर है।....आखिर उन्हें निंद आता भी कैसे? जब उनके इलाके में लगातार दूसरे दिन ही नवजवान लड़की की निर्मम हत्या कर दी गई थी। मामला ही इतना गंभीर था कि वे आज पुलिस स्टेशन में ही रुक गए थे,....घर नहीं गए थे। इस केस को लेकर वे कितने गंभीर है, इस बात की पुष्टि उनके चेहरे पर छाई गंभीरता कर रही थी।

एस. पी. ऑफिस, आधुनिक सुविधाओं से लैस, ऑफिस में उनके कुर्सी के आगे टेबल, उसके आगे लगा इंपोर्टेड सोफा चेयर। साथ ही कोने में रखा हुआ रेफ्रीजरेटर। आखिर वे पुलिस कप्तान थे और उनके ऑफिस की व्यवस्था भी उसी प्रकार की होनी चाहिए थी। 

परंतु उनका स्वभाव, अपने अधीनस्थ के लिए वे कठोर व्यवहार करते थे, किन्तु नगर वासियों के लिए उनके स्वभाव में मृदुलता कुछ अधिक ही थी। इस समय भी वे ऑफिस में इसलिये ही रुके थे कि इस केस को जल्द से जल्द सुलझा कर जनता को राहत दे सकें।

जय हिंद सर! ......ऑफिस का गेट खुला और ऑफिस में कदम रखते ही सलिल एवं रोमील ने उन्हें सैल्यूट देते हुए बोला।

जय हिंद!.....आओ बैठो।....एस. पी. साहब अपना काम करते हुए ही बोले। सलिल एवं रोमील के आने से "मजाल कि उनके चेहरे पर कोई भाव आया हो"।

ऑफिस में कदम रखने के बाद भी बाँस की किसी प्रकार की प्रतिक्रिया नहीं देखकर सलिल एवं रोमील की धिग्धी बंध गई।.....उन्हें ज्यादा तो कुछ भी समझ नहीं आया, बस इतनी ही बात दोनों समझ पाए कि आज उनकी जमकर क्लास लगने वाली है। इसलिये दोनों सावधानी पूर्वक आगे बढे और वहां रखे सोफे पर सावधानी पूर्वक बैठ गए। 

इस ऑफिस में कदम रखते ही रोमील भी काफी हद तक संभल चुका था। कुछ पल पहले चलते-चलते भी निंद खींचने वाला रोमील अभी सावधान बैठा हुआ था, उसके चेहरे पर सतर्कता चश्पा हो गई थी। किन्तु मृदुल शाहा साहब को तो मानो इससे कोई मतलब ही नहीं था। वे तो बस अपने काम को निपटाने में लगे हुए थे और जब वे काम से निवृत हुए, उन दोनों को आए हुए करीब आधा घंटे हो चुका था।

हां तो सलिल, अब बताओ कि इस केस में कहां तक पहुंचे हो और आगे की क्या योजना है? एस. पी. साहब ने अपने काम से फ्री होते ही सबसे पहले यही प्रश्न किया और अपनी कुर्सी खींचकर उन लोगों के करीब ले आए और फिर उन्होंने अपनी नजर दोनों के चेहरे पर टिका दी। 

उन्हें इस प्रकार से अपनी ओर देखता पाकर एक बारगी तो दोनों का हिम्मत ही जबाव दे गया, फिर भी बातें तो करनी ही थी, इसलिये सलिल धीरे से बोला।

सर!.....इस केस में हम ज्यादा तो कुछ भी अभी तक नहीं जान पाए है।....परंतु मौका- ए- वारदात की वीडियो क्लीप हमारे हाथ लगी है। बोलकर सलिल मौन हो गया, तब एस. पी. साहब बोले।

तुम भी न सलिल,....ऐसे आधी-अधूरी जानकारी दोगे, तो क्या समझ पाऊँगा। मुझे तो, इस केस में कितना प्रोग्रेस किए हो, उसके बारे में बतलाओ? एस. पी. साहब ने प्रश्न किया और फिर नजर टिका दी, सलिल के चेहरे पर। परंतु उनके प्रश्न पुछने का तरीका ही ऐसा था कि एक पल के लिए सलिल जबाव देने केलिए हिम्मत नहीं कर सका। फिर बहुत हिम्मत जुटाकर इस घटना के बारे में क्रम-बार बतलाने लगा।

एस. पी. साहब उसकी बातों को ध्यान पूर्वक सुन रहे थे। जबकि सलिल उन्हें बतलाने लगा कि किस प्रकार से नंदा एवं नंदिनी की हत्या की गई और फिर सी. सी. टीवी से वीडियो क्लीप हासिल हुआ। इसकेबादवोबोलताचलागया कि किस प्रकार से इस केस में अब तक खोजबीन की है और वीडियो मिलने के बाद उसकी आगे की तैयारी क्या है? 

एस. पी. साहब ध्यान पूर्वक उसकी बातों को सुन रहे थे और जब सलिल चुप हुआ, उन्होंने वीडियो क्लीप चलाकर दिखाने को कहा।...फिर तो सलिल ने अपने मोबाइल को लैपटाप से जोड़ दिया और वीडियो प्ले कर दिया।....एस. पी. साहब ने दोनों वीडियो क्लीप को ध्यान पूर्वक देखा और फिर मौन होकर सलिल के चेहरे को देखने लगे। 

उन्हें इस प्रकार से देखता पाकर सलिल घबरा सा गया। उन्हें अपनी ओर इस प्रकार देखता पाकर सलिल समझ नहीं पा रहा था कि बाँस की मंशा क्या है? जबकि एस. पी. साहब करीब पांच मिनट तक मौन रहने के बाद सलिल को समझाने लगे कि तुम एक काम करो कि इस घटना को प्रेत से जोड़ दो और किसी तांत्रिक के पास इस घटना के संदर्भ में मिलो।

.....हालांकि सलिल ने हल्के स्वर में इस बात का विरोध करने की कोशिश की,....परंतु एस. पी. साहब उसको समझाने लगे। वे गंभीर होकर बतलाने लगे कि" इस घटना क्रम ने तहलका मचा दिया है"। इसपर मीडिया वाले टी. आर. पी के लिए इस केस को भुनाने की कोशिश कर रहे है। ऐसे में मुझे भी "डिबेट" के लिए बुलाया गया है। 

इसके बाद एस. पी. साहब उसे अपनी योजना के बारे में समझाने लगे।....बाँस का आदेश सिर्फ पालन करने के लिए होता है, इसमें विरोध शब्द की कोई गुंजाइश नहीं होती। इसलिये सलिल सहमति में सिर को हिलाता रहा और फिर एस. पी. साहब ने जब अपनी बातें खतम की, सलिल ने उनसे अनुमति ली और उठकर ऑफिस से बाहर निकला। 

जब वो ऑफिस से बाहर निकला, रात के दो बज चुके थे। ऐसे में दोनों ऑफिस बिल्डिंग से निकल कर स्काँरपियों के पास पहुंचे और गाड़ी में बैठने के साथ ही श्टार्ट की और आगे की ओर बढ़ा दिया।

स्काँरपियों ने सड़क पर आते ही रफ्तार पकड़ लिया था। जबकि रोमील, कार ड्राइव करते हुए भी सलिल के चेहरे को कनखियों से दख लेता था। रोमील के हाव-भाव बतला रहे थे कि ऑफिस से निकलने के बाद वह कुछ उलझा-उलझा सा है। 

बात ही कुछ ऐसी थी, उसे एस. पी. सर द्वारा कहा गया "आधा शब्द" ही समझ आया था। अतः वो चाहता था कि सलिल से इस संदर्भ में बात करें।.....परंतु वह हिम्मत ही नहीं कर पा रहा था सलिल से बात करने की, क्योंकि वो देख रहा था कि " सलिल" गहरे विचार में डूबा हुआ है। उधर सलिल भी समझ रहा था कि रोमील उससे कुछ पुछना चाह रहा है। किन्तु इस समय उसकी बोलने की इच्छा बिल्कुल भी नहीं थी। वह तो वास्तव में ही उलझा हुआ था, "बाँस द्वारा मिले आदेश ने उसे उलझाकर रख दिया था।

एस. पी. साहब द्वारा मिले आदेश के बाद वो सोचने पर विवश हो गया था कि " आगे क्या? वह अच्छी तरह से जानता था कि "घटित हुआ अपराध" भले ही सबसे अलग दिख रहा हो। लेकिन भूत-प्रेत से इस घटना को जोड़ना विक्टीम के साथ न्याय नहीं होगा। 

भले ही वो इस मामले को "प्रेत बाधा" के रुप में प्रचारित करें, ....परंतु जब तक इस केस को उकेरा नहीं गया। उसे सफलता नहीं मिल सकती। वो जानता था कि एस. पी. साहब के आदेश का पालन करके त्वरित राहत तो मिल सकती है। लेकिन यह राहत बिल्कुल भी टिकाऊ नहीं होगी और फिर से इस मामले को तूल पकड़ना है। 

उसने इस बात को समझाने की कोशिश की थी,....किन्तु बाँस तो बाँस होता है। उन्होंने आदेश सुना दिया, उसके बाद कोई शक की या आर्गूमेंट की गुंजाइश नहीं रहती। ऐसे में उसके पास "आदेश पालन" करने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं बचा था।

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रात के तीन बज चुके थे और रात्रि के इस पहर में नीरव शांति छा चुकी थी। हां, इस नीरव शांति को कभी-कभी शहर के आवारा कुत्ते, तो कभी-कभी सड़क पर गुजरती बड़ी गाड़ियों की आवाज तोड़ देता था। इन आवाज से ऐसा प्रतीत होने लगता था कि शहर अभी भी सजीव है। 

ऐसे में रोहिणी जिले का विजय विहार इलाका, इसके अंतर्गत इंडस्ट्रियल एरिया भी आता था, किन्तु पाँश इलाका होने के कारण इस इलाके में ज्यादातर शांति ही रहती थी।

इसी इलाके में होटल "पृथा" थी, दुल्हन की तरह सजी-धजी। इस होटल में "चौबीस" घंटे ग्राहकों को सर्विस दिया जाता था, इसलिये इस होटल में ज्यादा ही चहल-पहल रहती थी। पाँश इलाके में होने के कारण इस होटल में ज्यादातर ग्राहक अमीर ही होते थे। फिर भी कम शुल्क एवं अच्छी सर्विस के कारण यहां मध्यम वर्गीय परिवार के ग्राहकों की तादाद भी आमद होती रहती थी। 

तभी तो रात के इस समय "होटल के हॉल" में बलजीत बैठा हुआ शराब पी रहा था। सभी आधुनिक सुविधा से लैस इस होटल एवं इसके हॉल में इस समय ग्राहकों की संख्या नहींकेबराबर थी।

इस समय हॉल में कुल पांच ग्राहक बैठे हुए थे और भोजन के साथ ही शराब की भी चुस्की ले रहे थे। परंतु होटल के वेटरों के चेहरे ऐसा प्रतीत नहीं हो रहा था कि उन्हें किसी प्रकार की परेशानी हो। वे तो उतनी ही तन्मयता से ही ग्राहकों को "ऑर्डर" सर्व करने में लगे हुए थे। 

इधर बलजीत के टेबल पर स्कॉच की दो बोतल, जिसमें से एक पी चुका था और खाने के लिए आईटम रखा हुआ था। किन्तु वो खा कम रहा था और पीने में ज्यादा लगा हुआ था।.....हॉल की जलती हुई दुधिया रोशनी में स्पष्ट देखा जा सकता था कि उसकी आँखें क्रोध के आवेश में जल रही थी।

हां, ऐसा भी बिल्कुल नहीं था कि उस पर सिर्फ क्रोध ही हावी था। उसने नशा भी बहुत कर लिया था और क्रोध एवं शराब "दोनों का मिला-जुला असर था उसपर। उसे जब से सान्या सिंघला ने तिरस्कृत किया था, वो अपमान की आग में जल रहा था। उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि” भला उसमें ऐसी क्या कमी थी कि सान्या ने उसके साथ ऐसा किया?.....बस इसी अपमान की ज्वाला में जलते हुए उसने सान्या का पीछा किया था। 

उसने देखा था कि सान्या दो घंटे पहले इसी होटल के रूम में उस युवक को लेकर गई थी।.....बस उसने खतरनाक फैसला कर लिया था और कहीं से "देशी कट्टा" उठा लाया था कि आज सान्या का काम ही तमाम कर देगा।

इसलिये ही तो वो इस होटल में ग्राहक बना बैठा था और इंतजार कर रहा था कि "सान्या" कब उस युवक के साथ बाहर निकले और कब वो उसको ठिकाने लगा दे।.....बलजीत ने देख लिया था कि सान्या की कार होटल के कंपाऊंड में ही लगी थी, इसलिये वो बड़े आराम से शराब के प्याले को होंठों से लगाकर गटक रहा था। 

परंतु उसकी आँखें चौकन्नी थी और वो हॉल में देख रही थी। तभी तो अचानक ही वह चौंका, क्योंकि रात के इस समय वहां, होटल के इस हॉल में सलिल एवं रोमील ने कदम रखा।.....उनको यहां आए हुए देखकर बलजीत की भँवें तन गई। रात के इस समय पुलिस का यहां क्या काम?  

प्रश्न स्वाभाविक ही था, जो कि बलजीत के मन में उठा था। किन्तु सलिल एवं रोमील को उनके प्रश्न से किसी प्रकार का मतलब नहीं था। वे तो अपना समय निकालने और रुटिन चेकिंग के लिए ही इस होटल में आए थे। वैसे भी "दो दिन और हुई दो हत्याओं " ने उनके दिमाग को घुमाकर रख दिया था। 

इसलिये वे आराम करने की बजाय पेट्रोलिंग पर निकले थे और निंद लग रही थी, इसलिये इस होटल में काँफी पीने आ गए थे। इसलिये वे दोनों आगे बढे और खाली टेबल पर बैठ गए, साथ ही वेटर को दो गरमागरम काँफी लाने के लिए आदेश दिया। फिर वे दोनों काँफी सर्व होने का इंतजार करने लगे। जबकि बलजीत, उसे तो समझ ही नहीं आ रहा था कि अब वो क्या करें।

उसके आवेशित आँखों में अब निराशा के बादल मंडराने लगे थे। कहां तो उसने सोचा था कि” वह सान्या सिंघला से बदला ले-लेगा और कहां पुलिस वाले अचानक ही टपक पड़े थे। उफ! इसे ही तो कहते है कि " सिर मूंडाते ही ओले पड़े", यह मुहावरा उसके ऊपर चरितार्थ होती हुई सी प्रतीत हो रही थी।

.....किन्तु बलजीत दिल्ली का रहवासी था, अतः उसके अंदर हौसला कूट-कूट कर भरा हुआ था। इसलिये उसने मन ही मन फैसला कर लिया कि चाहे जो हो जाए,.....आज वो अपना बदला लेकर ही रहेगा। फिर तो इतनी बातें सोचने के बाद बलजीत अपने लिए पैग तैयार करने लगा, जबकि उसकी तिरछी नजर सलिल एवं रोमील पर ही टिकी रही।

उधर सलिल एवं रोमील के आगे काँफी सर्व हो चुका था। इसलिये दोनों काँफी के चुस्की लेने लगे थे,....परंतु इस बात से अनभिज्ञ कि कोई उनको चोर नजरों से देख रहा है। समय अपनी रफ्तार से आगे की ओर बढ़ता जा रहा था और बीतते समय के साथ ही बलजीत के चेहरे पर बेचैनी परिलक्षित होने लगी थी। लेकिन उसे अब ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ा, क्योंकि उसकी आँखों ने देखा कि सान्या सिंघला सीढ़ियों से उतर रही है और उसके पीछे-पीछे वो नौजवान भी उतर रहा है। 

फिर क्या था,.....बलजीत भी अपनी जगह से उठा और कैश काउंटर की ओर बढ़ा। लेकिन उसकी नजरें सान्या सिंघला पर ही टिकी रही। बलजीत ने मन ही मन फैसला कर लिया था कि चाहे जो हो जाए, "वो आज अपने शिकार को बचकर नहीं जाने देगा"।

बलजीत ने जबतक बील के पैसे चुकाये, सान्या सिंघला उस युवक के साथ होटल गेट से बाहर निकल चुकी थी। अतः उसने भी पैसे चुकाने के बाद बाहर की ओर कदम बढ़ा दिए। किन्तु” वो कहां जानता था कि आज उसके नियति में निराशा ही हाथ लगना लिखा है।

.....जब वो होटल गेट से बाहर निकला, उसने सान्या को कार की ओर बढ़ते देखा और फिर बस। उसने अंधेरे की ओट ली और हथियार निकालना ही चाहता था। तभी उसकी नजर बाहर की ओर आ रहे सलिल एवं रोमील पर गई।....उसके हौसले ही पस्त हो गए, उसने जो हिम्मत संजोया था, टूट-टूट कर बिखर गये। अब इस परिस्थिति में शिकार पर वार करना, "मतलब कि खुद ही शिकार हो जाने के बराबर था" और वो कदापि नहीं चाहता था कि ऐसे किसी झमेले में फंसे।

इसलिये उसने फिलहाल अपने इरादे बदल दिए और नजर उधर ही टिका दी, जिधर सान्या सिंघला गई थी। बलजीत की सजग नजर देख रही थी कि सलिल एवं रोमील भी उधर ही बढ़ा था, क्योंकि उनकी स्काँरपियों उधर ही पार्क थी। 

सलिल एवं रोमील कार में बैठे, श्टार्ट की और बाहर की ओर बढ़ा दी। बलजीत की आँखें देख रही थी कि पुलिस की कार होटल के गेट से निकली और सड़क पर फिसलती चली गई। हाश!....... अब वो अपनी योजना को अंजाम दे सकता है। सोचकर बलजीत ने जैसे ही "देशी कट्टे" को बाहर निकाला, तभी अफसोस, सान्या सिंघला की कार भी गेट से बाहर निकल गई और मिनट भी नहीं लगा,...आँखों से ओझल हो गई। अब तो बलजीत और भी निराश हो गया।

उफ!......जिंदगी कितनी हैरान करती है। एक तो वो शांत स्वभाव का था,....किन्तु जीवन में पहली बार उसने कुछ सोचा था और उसकी भावना पर तुषारापात हो गया था।....कभी-कभी मानव के जीवन में ऐसी घटनाएँ भी घटित हो जाती है, जिसका बेवजह का दंश उसे सालता रहता है।

....तभी तो वह शांत चित रहने वाला, अचानक ही क्यों सान्या सिंघला से मिला और उस काली नागिन ने उसके पौरुष को ललकार दिया? आखिर वह भी तो पुख्तवय पुरुष है,...."अपने साथ हुए इस अपमान को कैसे सह सकता है?....इतनी बातें सोचने के बाद बलजीत ने मन ही मन फैसला किया कि आज तो नाकामी मिली, किन्तु सान्या का हिसाब वो कल करेगा। इतनी बातें सोचकर वो अपनी कार की तरफ बढ़ा।

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होटल पृथा से निकलने के बाद स्काँरपियों ने रफ्तार पकड़ ली और सड़क पर सरपट दौड़ने लगी।....परंतु न जाने क्यों सलिल को कुछ न कुछ अजीब लग रहा था। वो जब होटल पृथा में गया था और जबतक वहां पर रहा था। उसे इस बात की अनुभूति हो रही थी कि उसके आस-पास कोई अजीब करेक्टर है। 

लेकिन क्या और किस तरह का? यह सवाल ही था जो उसके अंतरमन में द्वंद्व कर रहा था। किन्तु कितने भी मंथन कर लेने के बाद भी वह किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाया था। यही दुविधा शायद उसे बेचैन किए हुए थी।

इसलिये अब, जब वो होटल से निकल चुका था और उसकी कार सड़क पर फर्राटे भरती जा रही थी, वो अपने इस द्वंद्व का मंथन कर रहा था। उसकी आँखें ड्राइव कर रहे रोमील पर ही टिकी थी, लेकिन रोमील के चेहरे पर किसी प्रकार के भाव नहीं थे। वह तो बिल्कुल शांत था और ड्राइविंग में ध्यान पिरोएँ था। 

उसके शांत मन स्थिति को देखकर सलिल को जलन की भी अनुभूति होने लगी थी।.....एक वो है कि इस केस में सोच-सोच कर दुबला होता जा रहा है। उसे बीतते समय के साथ अजीब-अजीब सीअनुभूति हो रही है और एक रोमील है,...."दुनिया के टेंशन से अछूता और बेफिक्र"। सलिल ने मन ही मन गालियां दी रोमील को। साला! मेरी तरह ऑफिसर होता तब न, तब उसको लगता कि बाँस होना अपने-आप में कितनी तकलीफदेह है। "साला" बिना वजह के भी टेंशन के पहाड़ को सिर पर उठाए घूमो और जिम्मेदारी का बोझ भी उठाओ।

रोमील का इस तरह से बेफिक्र होकर ड्राइव करना,......सलिल को "फूटी आँख नहीं सुहा रहा था"। किन्तु वो कर भी क्या सकता था रोमील का। रोमील तो डियूटी निभा ही रहा था, वह कोई कोताही तो कर नहीं रहा था।....ऐसे में उसको डांटना भी " मुश्किल " ही था। परंतु इच्छा की बात है!....बस उसकी इच्छा हो रही थी कि रोमील को डांट की घुट्टी पिलाए। 

वैसे भी वह जब से पुलिस मूख्यालय से लौटा था, बिल्कुल ही अशांत था। वह अशांत था, इसलिये कि "बाँस ने उसे अजीवो-गरीब आदेश सुना दिया था और यह उस व्यक्ति का अंतरात्मा ही महसूस कर सकता है" जब उसे उसके इच्छा के विरुद्ध कार्य करना पड़े।

स्काँरपियों किसी वियर बार के सामने या फिर अंग्रेजी शराब की दुकान के सामने रोकना। सहसा ही सलिल ने धीर-गंभीर स्वर में बोला। क्योंकि उसे लग रहा था कि अब शराब के दो-चार घूंट नहीं लिए न, उसके दिमाग की बत्ती गुल हो जाएगी। जबकि उसकी बातें सुनकर रोमील सहज ही बोला।

यश सर.....! फिर एक पल रुकने के बाद रोमील आगे बोला। ......वैसे सर, मुझे लग रहा है कि आप उलझे हुए है और कोई ऐसी बात है, जो आपको अंदर ही अंदर खाए जा रही है।

हूं, जनाब....अब जाकर आपको ध्यान आया है कि मैं थोड़ा उलझा हुआ हूं। सलिल तनिक चिढ कर बोला। जिसके जबाव में रोमील ने उसकी ओर देखा एवं शांत चित होकर जबाव दिया।

सर....!आप तो खामखा ही नाराज हो रहे हो। मैंने आपको परेशानतोकबका देख लिया था, परंतु पुछने की हिम्मत ही नहीं हो रही थी।....क्योंकि आप तो बिना बात के भी नाराज हो जाते हो। 

नहीं.....ऐसी बात नहीं है रोमील। तुम जिस प्रकार से सोच रहे हो, इस प्रकार की बात बिल्कुल भी नहीं है। रोमील की बातें सुनकर सलिल तपाक से बोला, फिर एक पल रुककर फिर बोला।....मैं भी इंसान ही हूं और मेरे पास भी भावनाएँ है। ऐसे में कोई मुझे हर्ट करें,...स्वाभाविक ही-है कि गुस्सा आएगा। 

बोलने के बाद सलिल ने रोमील के चेहरे की ओर देखा, जहां किसी प्रकार के भाव नहीं थे। सलिल ने अपनी बात खतम की और रोमील उसके बातों का जबाव देना ही चाहता था....तभी उसकी नजर आगे "शराब के दुकान पर गई"....जो सुबह के चार बजे भी खुला हुआ था। 

बस फिर क्या था, रोमील ने गाड़ी की रफ्तार धीमी की और सड़क किनारे रोक दी। बस फिर क्या था, स्काँरपियों के रुकते ही सलिल तेजी से बाहर निकला और शराब के दुकान की ओर बढ़ गया। जबकि रोमील बैठा-बैठा सोचने लगा।

बाँस का व्यवहार कितना अजीब है!.....कभी तो मोम सा नर्म, तो कभी पत्थर से भी अधिक कठोर। बचपनसेलेकरअबतक,इतनासमयबीतगया था साथ रहते हुए,....परंतु अब तक उसे बाँस को समझने में सफलता हासिल नहीं हुई थी। 

वैसे तो साथ रहना, साथ खाना और साथ घूमना भी था। उसके बिना "बाँस" कहीं नहीं जाते थे, किसी काम को अंजाम देने की बात तो दूर है।किन्तु” गाहे-बगाहे डांट देना और किसी के सामने भी जलील कर देना, बाँस के स्वभाव की खासियत थी। इसलिये तो कभी -कभी रोमील की इच्छा होती थी कि किसी दूसरे पुलिस स्टेशन में अपना तबादला करवा ले।....उसने एक दो बार कोशिश भी की थी, किन्तु सलिल ने उसका तबादला होने ही नहीं दिया था।

क्या सोच रहे है जनाब?.....सलिल ने कार का गेट खोलकर बैठते हुए पूछा। फिर साथ लाए हुए शराब की बोतल, गिलास एवं चखने को सीट पर रख दिया। जबकि उसे आया देखकर रोमील की तंद्रा जैसे टूटी। फिर उसने कार श्टार्ट करके आगे बढ़ाया और सधे हुए स्वर में सलिल के प्रश्न का उत्तर दिया।

ऐसी कोई बात नहीं है सर!.....बोलने के बाद रोमील ने अपना ध्यान ड्राइव पर केंद्रित कर दिया। जबकि सलिल ने गाड़ी के आगे बढ़ते ही जाम बनाने की शुरुआत कर दी। फिर गंभीर स्वर में बोला।

अब छोड़ो भी इन बातों को और आओ, दो-दो घूंट शराब पीते है। बोलने के बाद सलिल थोड़ी देर के लिए रुका और जाम बनाने में जुटा रहा, फिर बोला। वैसे रोमील.....बाँस लोगों को पता नहीं, क्या-क्या सूझता रहता है कि जो मन में आया, योजना बना डाली और फैसला सुना दिया। अब इसके पीछे चाहे कितने ही पापड़ बेलने पड़े, या परेशानी उठानी पड़े। बोलने के बाद सलिल रोमील के चेहरे की ओर देखने लगा।

सलिल रोमील के चेहरे पर उभड़े भावों को पढना चाहता था,.....किन्तु उसे इसमें सफलता नहीं मिली। क्योंकि रोमील भी तो पूरा "घाघ" था, क्या मजाल जो उसने मन के भाव उसके चेहरे पर प्रदर्शित हो। जबकि रोमील मन ही मन सोच रहा था कि जब आप पर बाँस का अत्याचार होता है, परेशान हो उठते हो।

....लेकिन जो आप अपने अधीनस्थ के ऊपर अत्याचार करते हो, उसका क्या? भले ही रोमील मन ही मन इन बातों को सोच रहा था, परंतु उसका चेहरा सपाट था, भाव रहित। ऐसे में सलिल के हाथों निराशा लगी, तब उसने तैयार हुए "जाम" को रोमील के हाथ में थमाया, दूसरा पैग खुद उठा लिया और टकरा कर एक स्वर में बोले।

चियर्स.....!

फिर दोनों ने शराब गटक ली, फिर रोमील ने कार की रफ्तार धीमी कर दी। इसके बाद तो दोनों ने स्कॉच की पूरी बोतल गटक ली। इसके बाद सलिल ने कलाईं घड़ी में देखा, सुबह के साढे़ चार बज चुके थे। अब वह पुलिस स्टेशन लौटेगा अपने काम की खाना पूर्ति करेगा। 

सलिल ने सोचा, फिर उसने रोमील के चेहरे की ओर देखा, रोमील शायद बात करने के मूड में नहीं था और ड्राइविंग में तल्लीन था। ऐसे में सलिल ने भी बात करने की इच्छा टाल दी और सोचने लगा कि आज उसे क्या-क्या करना है।.....वैसे ही बाँस के दिए हुए आदेश के अनुसार उसे किसी तांत्रिक को ढूंढना था।....फिर आगे क्या-क्या करना है, उसकी प्लानिंग करनी थी। सलिल इन बातों को सोच रहा था, जबकि स्काँरपियों फूल रफ्तार से पुलिस स्टेशन की ओर भागी जा रही थी।

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सूर्य की प्रथम रश्मि ने धरती के आँचल को छू लिया था। ऐसे में धरती खिलखिला उठी थी.....!....मंद-मंद मुस्करा उठी थी। तो फिर शहर की गलियां भी खिलखिला उठे,.... लाजिमी ही था। तभी तो "भाव्या बिला" की सुंदरता सूर्य की प्रथम किरणों के आगमन के साथ ही निखर आई थी। परन्तु राजीव सिंघला का चेहरा कुछ गंभीर था, कुछ गंभीर से मतलब कि मुरझाया हुआ। राजीव सिंघला इन दिनों अपने "बेटी सान्या सिंघला" की हरकतों को समझ नहीं पा रहे थे। 

वैसे तो उन्होंने "सान्या" के परवरिश में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं की थी। उसे जो चाहिए, पल भर में हाजिर हो जाता था, उसकी सेवा में नौकरों की फौज लगी हुई थी और उसे जितनी आजादी चाहिए थी, उसको मिली हुई थी। 

फिर भी पता नहीं क्यों?......वह उनसे कटी-कटी सी रहती थी। यह बात उनके अंतर्मन को चुभता था, उनके हृदय को कचोटता था।....परंतु वे कभी हिम्मत नहीं जुटा पाते थे कि सामने से "सान्या" से पुछे कि आखिर बात क्या है?.....वैसे ही वे अच्छी तरह से जानते थे कि सान्या बिन मां के पली-बढी है। भले ही उन्होंने कितनी ही कोशिशें की हो, किन्तु एक "मां" सरीखा प्यार और "मां" के समान देख-रेख तो नहीं दे सकते थे, क्योंकि वो मां नहीं बन सकते थे।

उनके मन की उलझन भी तो यही थी कि वे संभवतः एक दूरी सी अनुभव करते थे "सान्या" के साथ। भले ही वो कितनी ही कोशिशें कर लेते, किन्तु” फिर भी समीपता लाने में खुद को असमर्थ पा रहे थे। शायद यह "सान्या" के स्वभाव के कारण था, अथवा तो उनके बिजनेस में तल्लीन दिमाग के कारण। 

लेकिन कमी तो थी ही, जो उनको उलझाए हुए थी।....राजीव सिंघला, सूर्य के उदित होते किरणों के साथ ही जग गए थे और अब हॉल में बैठकर सान्या के आने का इंतजार कर रहे थे, या तो गरमागरम काँफी के आने का इंतजार कर रहे थे। उनका यह विशाल बंगला, यह विशाल हॉल उनके अकेले पन की गवाही देता था और कभी-कभी तो उन्हें काट खाने को दौड़ता था।

सर!.....आपका गरमागरम काँफी। हॉल में कदम रखते ही उनका चालीस वर्षीय नौकर सुंदर बोला और उनके करीब पहुंच कर टेबल पर काँफी का कप टिका दिया और उलटे पांव लौट गया।

हूं....शब्द निकला उनके कंठ से और होंठों पर आकर फंसकर रह गया। शायद वे नौकरों से बात नहीं करना चाहते थे.....अथवा तो उनका हृदय इस बात की गवाही नहीं दे रहा था।....लेकिन कब तक, कब तक इंसान किसी से बिना बात किए रह सकता है?....ऑफिस में तो उनका दिल बहल जाता था, क्योंकि वहां तो उनसे बात करने बालों की पूरी फौज थी। 

परंतु जब वो बंगले पर आते थे, सान्या कहीं निकल जाती थी और रह जाता था उनका वीराना पन। शायद यह उनकी ही कमी थी कि उन्होंने इस संदर्भ में सान्या से कभी बात ही नहीं की थी। कभी उससे पूछा ही नहीं था कि एक वर्ष हो गए उसे, वो अपने रात कहां बिताती है, रात के अंधकार में वह आखिर किस प्रकार के गुल खिलाती है?

नहीं-नहीं, इस प्रकार से अक्खड़ बन कर पुछना शायद ठीक नहीं होगा, नहीं तो इसके परिणाम भयावह भी हो सकते है।....आखिरकार "सान्या " जवान हो चुकी है और उसके साथ उसी प्रकार का व्यवहार करना उचित होगा। सोचकर राजीव सिंघला ने काँफी का मग उठाया और होंठों से लगाकर घूंट भरने लगे। 

किन्तु” कहते है न कि जब मानव मन किसी उलझन में हो, उसका विचार उसे छोड़ता ही नहीं। यह विचार ही तो है, जो मानव मन को "आंदोलित" किए रहता है। इस विचार की ही महिमा है कि या तो "मानव को नैतिकता के श्रेष्ठ शिखर पर ले जाती है, नहीं तो फिर उसको पतन के गहरे गर्त में डूबा देती है।

विचारों के श्रृंखला में डूबे-डूबे ही राजीव सिंघला ने अपनी काँफी खतम की और जैसे ही उन्होंने खाली मग को टेबल पर रखा, उनकी नजर हॉल में कदम रख रही सान्या पर टिक गई।...."गुलाब के पंखुड़ी सी सान्या”, लेकिन इस समय उसके चेहरे पर थकावट के भाव परिलक्षित हो रहा था।

....ऐसे में राजीव सिंघला की इच्छा हुई कि वो सान्या को रोक ले और पुछे कि "पूरी रात "बीता कर कहां से आ रही है। ....परंतु उनकी यह इच्छा, उनका यह प्रश्न उनके हृदय में ही रह गया। क्योंकि सान्या ने हॉल में कदम रखा और फिर तेजी से चलती हुई किचन की ओर बढ़ गई।

आज तो बात करना ही होगा, अन्यथा कहीं देर न हो जाए।....राजीव सिंघला के अंतरात्मा की आवाज उभड़ी। परंतु कैसे?....वो किस प्रकार से बातों की शुरुआत करें?....जो अब तक नहीं लगाया था, उन बंदिशों को "सान्या" पर किस तरह से लागू करें। 

सोचने लगे राजीव सिंघला, लेकिन उन्हें "वह राह" नजर नहीं आ रहा था, जिसपर वे ढृढता से कदम बढ़ाते। ऐसे में वो अपने हृदय के उलझन से दो-दो हाथ करने लगे, तभी सान्या हाथ में काँफी का मग थामे किचन से निकली और उनके सामने वाले सोफे पर आकर बैठ गई।....उसे करीब आया देखकर राजीव सिंघला "ममत्व" से उसके चेहरे को निहारने लगे। लगा कि उनके हृदय सागर में प्रेम का ज्वार -भांटा उमड़ आया हो और अब वे उस प्रेम के उफान को सान्या पर लुटा देना चाहते हो।

पापा!....लगता है कि आप किसी विचार में डूबे हुए है। सान्या काँफी के घूंट भरती हुई बोली। जबकि सान्या की बातें सुनकर राजीव सिंघला की इच्छा " बलवती" होने लगी कि अपने मन की दुविधा को सान्या के साथ साझा करें।.....परंतु हृदय के किसी कोने में भय ने भी डंख मारा कि कही सान्या उनके बातों का बुरा मान गई तो?... ऐसे में उन्होंने शांत होकर कहा।

नहीं!....ऐसी कोई बात नहीं है बेटा।....वैसे मैं थोड़ा उलझन में हूं....वह भी तुम्हारे कारण। 

वह किसलिये पापा? सान्या चौंक कर बोली, जबकि उसके प्रश्न सुनकर राजीव सिंघला थोड़ी देर के लिए मौन हो गए, फिर बोले।

सान्या बेटा!.....!यह जीवन बहुत कठिन है और इसका कोई भरोसा नहीं। बोलने के बाद राजीव सिंघला थोड़ी देर के लिए चुप हो गए, फिर बोले।....बेटा, जीवन में बहुत सी जिम्मेवारी होती है, इसलिये अब चाहता हूं कि तुम्हारे हाथ पीले करके फ्री हो जाऊँ और फिर तो मेरे विशाल एंपायर को आखिर में संभालना तो तुम्हें ही है।

पापा!.....आप छोड़ो भी न, अभी तो मेरी उम्र ही क्या है। "शादी" ही तो है, समय आने पर कर लूंगी।

राजीव सिंघला की बातें खतम होते ही सान्या ने तुनक कर जबाव दिया। जबकि उसके जबाव सुनकर फिर राजीव की हिम्मत ही नहीं हुई कि बात को आगे बढ़ा सके। इसलिये वे उठे और अपने रूम की ओर बढे।.....आखिर उन्हें तैयार होकर ऑफिस के लिये भी तो निकलना था।.....फिर तो आज उनको "यंग लाइफ" सेमिनार को संबोधित भी करना था। 

वैसे तो यह उनके बिजनेस स्ट्रैटजी का हिस्सा था और इसलिये उनकी कंपनी इस प्रकार के प्रोग्राम का आयोजन करती थी।.....बस इस कारण से ही वे ज्यादातर बीजी ही रहते थे। किन्तु अब कभी-कभी उनका ये "अपना लाइफ स्टाइल" खुद उनको ही चुभने लगता था।....उन्हें कभी-कभी तो प्रतीत होने लगता था कि "दौलत के प्रति उनकी यह हवस" कहीं उनको डूबो न दे।

परंतु मानव मन का लालच और श्रेष्ठ बनने की इच्छा, मानव के अंतरात्मा की आवाज को दबा देती है। यही तो राजीव सिंघला के साथ था। उसके मन की इच्छा ही इतनी विशाल थी कि कभी-कभी उन्हें ऐसा प्रतीत होता था कि उनकी "बलवती इच्छा" ही न कभी उनका दम घोंट देगी। 

बात गलत भी तो नहीं था, उन्होंने जमाने के रहन-सहन को करीब से देखा था और उनकी आशंका ऐसे में गलत तो नहीं हो सकती। सोचते हुए वे तैयार हुए और बंगले के बिल्डिंग से बाहर निकले" अपने विचारों के जाले को झटक कर।

...परंतु इंसान इतना समर्थ कहां कि अपने विचारों से मुक्ति पा सके? उसमें न तो ऐसी योग्यता विकसित हुई है और न कभी हो सकती है। बस अपने मन के भार उठाते हुए "राजीव सिंघला" अपने कार के करीब पहुंचे, कार में बैठे औरकारश्टार्टहोकरगेटसेनिकलीऔरसड़कपरसरपटदौड़नेलगी।

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सुबहकेआठबजचुकेथे।

प्रभातकिरणऔरभीप्रखरहोचुकीथी, परंतुतेरहअक्तुबरकीसुबह, वातावरणमेंफूलगुलाबीठंढीकाएहसासघुलाहुआ था। ऐसे में सलिल पुलिस स्टेशन लौट आया था और अब फाइलों में उलझा हुआ था। जबकि रोमील को उसने काम से बाहर भेजा हुआ था।

…..वैसे भी रोमील के लौटने के बाद उसे तांत्रिक भूत नाथ के पास जाना था। इसलिये वह चाहता था कि ऑफिस के काम जल्द से जल्द निपटा ले। तभी उसे ध्यान आया कि “ होटल “ से लौटने के बाद उसने प्रभास एवं होटल के मैनेजर ऋषिकांत से किसी प्रकार की पूछताछ नहीं की है। इसलिये उसने फाइल साइड में रखा और “रुल” उठाकर ऑफिस से बाहर निकला। 

वैसे तो उसको इस बात की अनुभूति थी कि “उन दोनों” के पास जाकर भी किसी प्रकार की जानकारी नहीं मिलनी है,…..फिर भी डियूटी तो निभाना ही था। इसलिये वो गलियारों से चलता हुआ “लॉकअप “ के करीब पहुंचा और उसकी नजर अंदर बंद प्रभास एवं होटल के मैनेजर ऋषिकांत पर गई। 

वे दोनों लॉकअप के कोने में दुबके हुए बैठे थे और जैसे ही उन दोनों की नजर “सलिल” पर गई,…..दोनों की धिग्धी बंध गई। लेकिन जब तक दोनों संभल कर बैठ पाते, सलिल लॉकअप  खोलकर अंदर प्रवेश कर चुका था। इसके बाद तो सलिल ने दोनों को संभलने का कोई मौका दिए बिना ही प्रश्नों की झड़ी लगा दी।

भला वे दोनों उन प्रश्नों का क्या जबाव देते, जिसके बारे में उन्हें खुद नहीं पता, भला उसके बारे में क्या जबाव देते। इसलिये दोनों चुप्पी साधे ही रहे,….जिसका परिणाम हुआ कि “सलिल” के क्रोध की ज्वालामुखी भड़क उठा। फिर तो वो दोनों पर पिल पड़ा और इसके बाद लॉकअप दोनों के चीखो पुकार से दहल उठा। शायद उन दोनों की स्थिति बहुत देर तक ऐसी ही रहती,….अगर रोमील वहां पर न आ गया होता। 

रोमील के आते ही सलिल ने दोनों को उसी हाल में छोड़ा और फिर बाहर निकला। इसके बाद दोनों ऑफिस में पहुंचे। वहां पहुंचते ही रोमील उसको बतलाने लगा कि उसने जाकर कौन-कौन से कार्य का संपादन किया है। सलिल उसकी बातों को सुनकर सिर्फ सहमति में सिर हिलाता रहा।

इसके बाद दोनों ऑफिस से बाहर निकले और स्काँरपियों के पास पहुंचेऔर वहां पहुंचते ही रोमील ने ड्राइविंग संभाल ली और सलिल बगल वाली सीट पर बैठ गया। इस दरमियान दोनों के बीच चुप्पी छाई रही, हां, रोमील ने कार श्टार्ट करके जरूर आगे बढ़ा दिया था और जैसे ही कार ने रफ्तार पकड़ी, रोमील के अंतर्मन में प्रश्न घुमड़ने लगे। उसे इस बात को जानना था कि “ उसके बाँस के दिमाग में आखिर चल क्या रहा है ?” एवं सुबह -सुबह ही जाना कहां है?

.....किन्तु उसकी हिम्मत नहीं हो रही था कि अपने प्रश्न पुछ सके। लेकिन उसके मन की दुविधा की स्थिति ज्यादा देर तक टिकी नहीं रह सकी,….क्योंकि उसके मनोभाव को सलिल ने पढ लिया था, इसलिये शांत स्वर में पूछा।

रोमील….मैं देख रहा हूं कि तुम बहुत देर से उलझन में हो,….शायद किसी प्रश्न को पुछना चाहते हो? सलिल ने रोमील को संबोधित करके कहा और उसने अपनी नजर रोमील के चेहरे पर टिका दी। जबकि रोमील अपनी नजर ड्राइव पर टिकाए हुए ही शंकित स्वर में बोला।

सर….!आप के दिमाग में इस समय क्या चल रहा है और हम लोग अभी जा कहां रहे है?

लेकिन इन बातों को तुम्हें जानने की जरूरत क्या आन पड़ी? सलिल ने सपाट स्वर में कहा और गहरी नजरों से रोमील के चेहरे को देखा। जबकि उसके मुख से निकली इतनी सी बात और रोमील की धिग्धी बंध गई। इसके बाद तो उसके कंठ से एक शब्द नहीं निकल सका, वह बस ड्राइव पर नजर जमाये रहा और कार सड़क पर सरपट दौड़ती रही।

…..आखिरकार सलिल से नहीं रहा गया और तब वह बोला।….रोमील!...अभी तो मेरे दिमाग में फिलहाल कोई योजना नहीं है, रही बात चलने की, तो हम लोग अभी तांत्रिक भूत नाथ के पास जा रहे है। बोलने के बाद सलिल ने चुप्पी साध ली।

फिर तो रोमील की हिम्मत ही नहीं हुई कि आगे “किसी प्रश्न को पुछ सके” इसलिये उसने अपना ध्यान ड्राइव पर केंद्रित किया। इसके बाद तो स्काँरपियों सड़क पर सरपट दौड़ती रही और पीछे शहर की बिल्डिंगे छूटती रही। ऐसे में करीब घंटे बाद स्काँरपियों ने दक्षिणी दिल्ली के वीरान इलाके में प्रवेश किया और एक आश्रम के सामने रुकी। वह आश्रम, वीरान इलाके में मौजूद विशाल फुस का मंदिर के शेप में बना हुआ झोंपड़ी। 

स्काँरपियों रुकते ही सलिल एवं रोमील बाहर निकले और झोंपड़ी के गेट की ओर बढे। गेट के करीब पहुंचते ही उन दोनों के नथुनों से धुमन जलने की सुगंध टकराई। फिर तो उनका मन वाग-वाग हो गया और फिर दोनों ने अंदर कदम रखा।

बाहर से साधारण सी दिखने वाली झोंपड़ी, अंदर से बहुत ही आलीशान एवं भौतिक सुख- सुविधा से परिपूर्ण थी। अंदर की साज-सज्जा एवं सुविधा को देखकर आश्चर्य चकित हो रहे सलिल की नजर जैसे ही एक छोटे से मंदिर के आगे ध्यानस्थ तांत्रिक भूत नाथ पर गई,……उसके आश्चर्य की सीमा नहीं रही। 

उसने तो सोचा था कि तांत्रिक कोई बूढा होगा, परंतु आसन पर बैठा हुआ वह पच्चीस वर्ष के करीब का नौजवान था। जिसके माथे पर जटा का शक्ल लिए हुए बाल, बढी हुई दाढी और ललाट पर लगी हुई लाल-लाल रोली। झोंपड़ी में जलती हुई रोशनी में तांत्रिक का व्यक्तित्व चमक रहा था।

उसे ध्यानस्थ देखकर सलिल एवं रोमील झोंपड़ी के अंदर सजाकर रखे सोफे पर बैठ गए और इंतजार करने लगे कि “तांत्रिक भूत नाथ” कब ध्यान से अलग होते है। लेकिन उन्हें ज्यादा देर तक इंतजार नहीं करना पड़ा,…..क्योंकि तांत्रिक भूत नाथ की आँखें खुल चुकी थी। 

आँखें खुलने के साथ ही जैसे ही उसकी नजर आए हुए आगंतुक पर गई, तांत्रिक ने हल्की आवाज में ताली बजाई। जिसके प्रतिक्रिया स्वरूप अप्सरा सी सुंदर युवती ने दो गिलास हाथ में लिए वहां कदम रखा और रोमील एवं सलिल को गिलास थमाकर वहां से उलटे पांव लौट गई। तब सलिल एवं रोमील ने देखा कि गिलास में “सुगंधित पेय” रखा हुआ था, जिसे दोनों ने होंठों से लगा लिया। जबकि तांत्रिक ने एक बार उन दोनों के चेहरे को देखा, फिर अपनी दाढी पर हाथ फेरते हुए गंभीर स्वर में बोला।

श्रीमान!.......आप लोगों के आने का प्रयोजन क्या है, जानता हूं। परंतु आप इतनी जल्दी आ जाएंगे,…इसकी उम्मीद तो बिल्कुल भी नहीं थी। 

महात्मन….समस्या ही ऐसी है कि मन समय बीतने का इंतजार नहीं कर सकता था। जानता था कि आप जरूर सहायता करने को तैयार होंगे, इसलिये आपकी सेवा में हाजिर हो गया। सलिल अपने शब्दों में शहद लपेट कर बोला। जबकि उसकी बातों ने मानो भूत नाथ पर कोई असर नहीं किया हो, वो पूर्ववत मुस्करा कर बोला।

आपका सोचना सही है श्रीमान…..आप तो जाइए और तैयारी कीजिए। समान का लिस्ट आपके थाने पर पहुंच जाएगा और मैं नियत जगह पर समय से पहुंच जाऊंगा। 

इतनी बातें बोलने के बाद भूत नाथ ने समाधि लगा ली।…..अब ऐसे में वहां रुकने का कोई प्रयोजन ही नहीं था। अतः सलिल ने एक नजर झोंपड़ी के अंदर चारों ओर डाली और फिर रोमील के साथ बाहर निकल गया। मन में इस आशा को लिए हुए…..कि कहीं इससे होकर ही केस में आगे बढ़ने के लिए रास्ता मिले।…..परंतु वो जानता नहीं था कि उसके इस कदम के परिणाम सार्थक होंगे या निरर्थक। वह तो बाँस ने आदेश दिया था। इसलिये उनके आदेश का पालन करना ही उसका धर्म था।

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दिल्ली का वह “इंजीनियरिंग एण्ड डेवलपमेंट फाँर यूथ” का विशाल हॉल। गोलाकार शेप में बना हुआ हॉल काफी भव्यता लिए हुए था। उसमें भी बड़ी बात कि यहां “यंग लाइफ” सेमिनार आयोजित होना था,….इसलिये अभी यहां काँलेज स्टुडेंट की भीड़ जमा होने लगी थी। साथ ही बने हुए स्टेज पर इको साऊण्ड सिस्टम धीमी आवाज में बज रहा था। 

जबकि स्टुडेंट की भीड़ बढ़ने के साथ ही हॉल में शोर-शराबा बढ़ गया था। वैसे तो दिन के ग्यारह बज चुके थे और अब तक प्रोग्राम शुरु हो जाना चाहिए था।.....किन्तु मुख्य अतिथि राजीव सिंघला के अभी तक नहीं आने के कारण "कार्यक्रम" में विलंब था। लेकिन ऐसी स्थिति ज्यादा देर तक नहीं रही, क्योंकि तभी "बिल्डिंग" के बाहर गाड़ी आने का शोर उभड़ा। इसी के साथ "हॉल" में सीटी की आवाज गुंजने लगी, जो काँलेज के छात्र खुशी में बजा रहे थे।

.....फिर तो "मुख्य अतिथि" के आ जाने से स्टेज पर प्रोग्राम संचालक ललित भंडारी आ गया।....."कुछ पल पहले तक मुरझाए हुए चेहरे पर अब हरियाली स्पष्ट दृष्टिगोचर होने लगी"। फिर तो उसके शब्दों में भी ताजगी आ गयी और गला खंखार कर उसने हॉल को संबोधित किया, जो "इको सिस्टम" के कारण हॉल में गुंजने लगा।

हॉल में मौजूद सभी मित्र बंधु.....आप लोगों के इंतजार का पल खतम हो चुका है,....क्योंकि अब चीफ गेस्ट के साथ ही "प्रोग्राम होस्ट" भी आ चुके है। बोलने के बाद ललित भंडारी एक पल के लिए रुका, फिर आगे बोला। आप.....विभिन्न काँलेज के छात्र-छात्राओं का इस मंच कीओर से स्वागत करता हूं जो आप लोग बड़ी संख्या में इस प्रोग्राम को सफल बनाने के लिए आए है। साथ ही आपसे गुजारिश करता हूं कि आप लोग शांति के साथ बैठकर इस प्रोग्राम का आनंद ले। 

ललित भंडारी ने अभी अपनी बात खतम ही की थी। तभी हॉल में राजीव सिंघला एवं ओजस्वी चक्रवर्ती ने कदम रखा। ओजस्वी चक्रवर्ती, शहर का मेयर, शांत स्वभाव लेकिन शातिर दिमाग। उम्र यही करीब पचपन के करीब होगा। ओजस्वी चक्रवर्ती, लालची प्रवृति के होने के कारण उसका ज्यादातर समय राजीव सिंघला के साथ ही बीतता था। आज भी ओजस्वी चक्रवर्ती इसलिये ही यहां पर आया हुआ था। 

राजीव सिंघला एवं ओजस्वी चक्रवर्ती आगे बढे और स्टेज पर पहुंच गए। उनके स्टेज पर पहुंचते ही पूरे हॉल ने सीटी बजा कर उन दोनों का अभिनंदन किया, जबकि ललित भंडारी ने फूलों का गुलदस्ता देकर दोनों का स्वागत किया।.....इसके बाद ललित भंडारी ने राजीव सिंघला को "यंग लाइफ" पर हॉल में वक्तव्य देने को कहा,.....परंतु राजीव सिंघला से पहले ओजस्वी चक्रवर्ती आगे बढ़ा, जबकि राजीव सिंघला वहां पर रखे सोफे पर बैठ गए।

माय डियर फ्रेंड....हाऊ आर यू? ओजस्वी चक्रवर्ती ने माइक के पास पहुंचते ही ओजस्वी एवं मधुर शब्द में कहा। जिसके बदले में हॉल में किलकारियां उभड़ी। जबकि मिस्टर चक्रवर्ती ने फिर अपनी बातों को आगे बढ़ाया। दोस्त......आप लोग यंग हो और अपनी लाइफ के शुरुआती बिंदु पर हो। 

ऐसे में हृदय में प्रश्न उठना लाजिमी ही है कि...."हम लाइफ" को जीए कैसे? जिसमें आनंद भी हो, उत्तेजना भी हो और बंधन भी नहीं रहे। तो मेरा मानना है कि इसके लिए हमें खुद के शर्तों पर जीना होगा, तभी हम जीवन का सही आनंद ले पाएंगे।

मिस्टर चक्रवर्ती ने कहा, तो हॉल में किलकारियां गुंजने लगी। जबकि मिस्टर चक्रवर्ती ने अपनी बात खतम की और सोफे पर जाकर बैठ गया। तब राजीव सिंघला माइक के पास पहुंचा और बोला।

हेलो फ्रेंड.....! राजीव सिंघला ने कहा और हॉल में मौजूद युवाओं को देखा। जबकि उनकी बातें सुनते ही हॉल फिर से किलकारियों से गुंजने लगी,...तब राजीव सिंघला ने कहा। दोस्तों....यह हमारा जीवन है और हमें इसे अपने शर्तों पर जीना चाहिए। बोलने के बाद राजीव सिंघला एक पल के लिये रुका, फिर आगे बोला। 

यह मेरा जीवन है और इसका मालिक दूसरा कोई नहीं हो सकता। हम फिर इसे अपने मन-मुताबिक क्यों नहीं जीएँ, हम क्यों दूसरे की इच्छाओं का सम्मान करने की शर्तों पर अपनी खुशियों को आग लगा लें। फिर तो....जीवन में जवानी बार-बार नहीं आती। बोलने के बाद "राजीव सिंघला" ने मुस्करा कर हॉल में देखा, तभी हॉल में मौजूद एक पत्रकार ने प्रश्न किया।

तो सर.....इसलिये ही आप "लीव इन रिलेशनशिप" के पक्षधर है? 

हां....जरूर!...मैं अपनी बातों को डंके की चोट पर कहता आया हूं और आज भी कहता हूं। पत्रकार की बातें खतम होते ही राजीव सिंघला ने शांत स्वर में कहा और एक पल रुककर फिर आगे बोला। माना कि यह चलन समाज में नया-नया है, लेकिन इसमें आजादी है.....जीवन जीने की अपनी शर्तें है। फिर तो......जीवन बार-बार मिलता नहीं, तो फिर  हम इसे यूं ही बर्बाद क्यों कर दें।

लेकिन सर.....सुनने में आता रहा है कि आपका "सौंदर्य" प्रसाधन का बिजनेस होने के कारण ही आप इसके पक्षधर है? क्या यह बात सही है? राजीव सिंघला की बातें खतम होते ही दूसरे पत्रकार ने प्रश्न पूछा, फिर अपनी नजर उनके चेहरे पर टिका दी।....जबकि उनकी बातें सुनते ही राजीव सिंघला के होंठों पर मुस्कान गहरी हो गई, फिर उन्होंने कहा।

आपकी बातें सही है या नहीं, मैं इन बातों में नहीं पड़ूंगा। फिर भी.....इतना तो कहूंगा ही कि जब व्यक्ति सफल होता है, उसके साथ बदनामी भी चलती है।.....किन्तु मैं उनमें से नहीं, जो इन बातों से घबरा जाऊँ। मैं सच्चे अर्थ में युवाओं को जीने की राह बतलाता हूं।

लेकिन सर!.....इसके दुष्परिणाम भी तो है। आपका इस संदर्भ में क्या मंतब्य है, इस पर भी प्रकाश डालें? राजीव सिंघला की बातें खतम होते ही तीसरे पत्रकार ने पूछा। जिसके जबाव में पहली बार राजीव सिंघला गंभीर शब्दों में बोला।

मानता हूं कि” आपका यह प्रश्न समाज के हित में है। लेकिन चिंता की ऐसी बात है-ही नहीं। अभी तो "लीव इन रिलेशनशिप" का भारत में नया प्रचलन है, तो स्वाभाविक है कि इसके कुछ इफेक्ट भी दिखेंगे। नया-नया होने के कारण इसका विरोध भी होगा। परंतु अब तो....हमारे न्यायाधीशों ने भी इसको मान्यता दी है, इसके जरूरत को समझा है।

इसके बाद कभी तो छात्र-छात्रा, तो कभी पत्रकार "राजीव सिंघला" से प्रश्न पुछते रहे और वे ढृढता से उन सभी प्रश्नों के जबाव देते रहे। आखिर में ललित भंडारी के संबोधन के साथ इस प्रोग्राम की समाप्ति दिन के दो बजे हुई। इसके बाद राजीव सिंघला हॉल से निकले और अपनी कार के पास पहुंचे। उससे पहले ही उनकी सेक्रेटरी "ज्योत्सना" वहां खड़ी थी। ज्योत्सना, चालीस वर्ष की शादीशुदा महिला, चेहरे पर ओज और सुंदर व्यक्तित्व। राजीव सिंघला के कार में बैठते ही....... ज्योत्सना भी उनके बगल में बैठ गई। 

इसके बाद तो कार ने रफ्तार पकड़ा और सड़क पर सरपट दौड़ने लगी। जबकि ज्योत्सना......वह "राजीव सिंघला" से कुछ कहना चाहती थी, लेकिन ड्राइवर के मौजूदगी के कारण कह नहीं पा रही थी। लेकिन वो अपने मन के भाव राजीव सिंघला के अनुभवी आँखों से नहीं छिपा सकी और उन्होंने पुछ ही लिया।

तुम शायद कुछ पुछना चाहती हो? अतः जो भी पुछना हो, निःसंकोच पुछो।

सर......!मैं देखती आ रही हूं कि आप करीब बीते दस वर्षों से "लीव इन रिलेशनशिप" पर वक्तव्य देते आएँ है और युवाओं की भावना भड़काते आए है। जबकि मैं भी जानती हूं और आप भी जानते है, इसके दुष्परिणाम को। राजीव सिंघला की बात खतम होते ही ज्योत्सना ने गंभीर होकर बोला और अपनी नजर उनके चेहरे पर टिका दी। जबकि उनकी बातें सुनकर राजीव सिंघला मुस्करा कर बोले।

ज्योत्सना.......तुम समझ नहीं पाई हो, या समझना नहीं चाहती।.....परंतु मैं जानता हूं कि मेरे जितने भी "उत्पाद" है, युवाओं के लिए ही-है। ऐसे में युवा जितने स्वच्छंद होंगे, हमारा बिजनेस उतना ही बढेगा।

बोलने के बाद राजीव सिंघला ने चुप्पी साध ली। बस ज्योत्सना ने समझ लिया कि बाँस अब नहीं बोलेंगे। लेकिन बाँस के शब्दों ने उसके हृदय को झकझोर दिया था। राजीव सिंघला के कहे गए शब्दों से वह उलझ सी गई थी। 

वो सोचने लगी थी कि "अपने स्वार्थ पूर्ति" के लिए इंसान इतना अंधा हो सकता है कि समाज में विष रुपी ग्रंथी का "बीजारोपण" करने को उद्धत हो जाए। इसके भयावह परिणाम को जानते हुए भी। लेकिन कहीं यही विष ग्रंथी उसके खुशियों को डंस ले तब? प्रश्न गंभीर था और उसके हल को ढूंढने की कोशिश "ज्योत्सना" कर रही थी,....परंतु उसे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। कार में इस समय खामोशी पसरी हुई थी, बस कार के इंजन की आवाज आ रही थी।

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दिन के तीन बजने के साथ ही " होटल सांभवी" के आस- पास चहल-पहल बढ़ गई थी। वैसे तो इस होटल में अपराध घटित हुआ था, यह पुलिस के द्वारा शील कर दिया गया था और इसके रक्षा की जिम्मेदारी सब- इंस्पेक्टर राम माधवन को था और वो पिछले दो दिनों से अपनी डियूटी पूरी मुस्तैदी से "निभा" रहा था। किन्तु आज इस होटल में सीनियर अधिकारियों के दौरे होने थे, साथ में भूत नाथ भी आने वाला था। 

बस समय निर्धारित होने के साथ ही होटल "सांभवी" के आस-पास हलचल बढ़ गई थी और इसे सुचारु रुप से चलाने की जिम्मेदारी राम माधवन एवं रोमील को दी गई थी।.....इसलिये रोमील कब का राम माधवन की मदद करने के लिए पहुंच चुका था।

 वैसे तो यहां पर ज्यादा कुछ नहीं करना था। बस तांत्रिक भूत नाथ यहां पर आकर तांत्रिक विधि को करने वाला था और इस कार्यक्रम को मीडिया वाले कबरेज करें, इसलिये पुलिस ने मीडिया बालों को भी बुला लिया था।....बस यही टेंशन था पुलिस बालों को कि.....कहीं एन मौके पर ही सब गुड़- गोबर नहीं हो जाए।

इसलिये सलिल ने रोमील को विशेष हिदायत देकर भेजा था, साथ ही पुलिस फोर्स की एक कंपनी "होटल" के आस-पास तैनात कर दी गई थी और अब जो रोमील यहां पहुंचा। उसने होटल के लॉक गेट को खुलवाया और फिर राम माधवन के साथ अंदर जाकर जायजा लिया।.....साथ ही एक सिपाही को उस रूम को धोने को कहा,...."जिसमें अपराध घटित हुआ था। 

सिपाही ने आदेश मिलते ही अपने काम की शुरुआत कर दी, जबकि राम माधवन व रोमील ने होटल बिल्डिंग के एक चक्कर लगाए और जब दोनों लौटे, रूम साफ हो चुका था। ऐसे में स्वाभाविक ही था कि दोनों के चेहरे पर चमक आ जाए।

इसके बाद दोनों वहां से निकले और हॉल में आकर बैठ गए एवं अधिकारियों के काफिला का इंतजार करने लगे। फिर बीतते समय के साथ ही दोनों के चेहरे पर बेचैनी का भाव परिलक्षित होने लगा, क्योंकि किसी का भी इंतजार करना कितना दुष्कर होता है,....यह तो इंतजार करने वाला ही बतला सकता है।

....किन्तु उन्हें ज्यादा देर तक इंतजार नहीं करना पड़ा, क्योंकि चार बजते ही गाड़ियों का काफिला आने लगा।.....गाड़ियों की आवाज सुनते ही रोमील एवं राम माधवन तेजी से बाहर निकले, तब तक उन्हें सामने से सीनियर अधिकारी के साथ सलिल आता दिखाई दिया। राम माधवन ने उन लोगों को सैल्यूट दिया,....परंतु सलिल एवं आने वाले अधिकारियों ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

इसके बाद मीडिया बालों की भी टीम आ गई और उन लोगों ने भी हॉल का रुख किया। सब से अंत में पांच मिनट बाद एस. पी. साहब की गाड़ी ने होटल कंपाऊंड में प्रवेश किया और पोर्च में रुकी। फिर उसमें से एस. पी. साहब के साथ तांत्रिक भूत नाथ निकला। उन्हें देखते ही दोनों ने सैल्यूट दिया, जिसका जबाव एस. पी. साहब ने मुस्करा कर दिया।

....फिर तो सभी होटल बिल्डिंग की ओर बढ़ गये,....लेकिन गेट के पास पहुंचते ही तांत्रिक भूत नाथ अचानक ही रुक गया।.....उसका यूं ही अचानक रुकना....ऐसा प्रतीत हो रहा था कि उसे अदृश्य ताकत ने रोक लिया हो।....फिर तो वो होंठों ही होंठों में कुछ बुदबुदाने लगा और अचानक ही उसने हुंकार भरी।

इसके बाद एस. पी. साहब के साथ उसने हॉल में कदम रखा। जबकि उसके इस नौटंकी पर जहां एस. पी. साहब के होंठों पर मंद-मंद मुस्कान छा गई, वही पर राम माधवन कूढ कर बोला,...."साला कमीना, नौटंकी तो ऐसे करता है, जैसे अदृश्य शक्तियों से सीधा ताड़ जोड़ रखा हो"। 

लेकिन राम माधवन के होंठों से निकला स्वर इतना धीमा था कि उसकी गूंज सिर्फ रोमील के कानों तक ही पहुंच सकी। उसकी बातें सुनकर रोमील के होंठों पर मुस्कान आकर गायब हो गई। फिर वे लोग हॉल के अंदर पहुंचे। तब तक तो सलिल पुजा विधि करवाने के लिए उस रूम में वेदी बनवा चुका था, जिसमें वारदात हुई थी। हॉल में उन लोगों के पहुंचने पर हद ही हो गई, क्योंकि तांत्रिक भूत नाथ वहां रुका नहीं।

वह सीधे कदमों से तेजी से चलता हुआ उसी रूम में पहुंचा और वहां पहुंचने के बाद ही रुका। फिर तो देर ही किस बात की थी, वह आसन पर बैठ गया और ऊँचे स्वर में मंत्र बुदबुदाने लगा और फिर हाथों में जल लेकर सीधे हवन वेदी में डाला। उसके इस क्रिया से अचानक ही हवन के लिये रखी लकड़ियों ने आग पकड़ा और धूं-धूं कर जलने लगी। 

फिर तो तांत्रिक भूत नाथ के होंठों से निकलता "मंत्र स्वर" उच्च आवाज में गुंजायमान होने लगा। उसकी ये हरकत मीडिया वाले लाइव प्रसारण कर रहे थे। जबकि रूम में मौजूद एस. पी. साहब, सलिल, रोमील, राम माधवन एवं पुलिस के अधिकारी, सभी ध्यान पूर्वक उसकी कार्यवाही देख रहे थे।

बीतते समय के साथ ही तांत्रिक भूत नाथ, अग्नि में हविश को डालने लगा और उच्च स्वर में मंत्र बुदबुदाने लगा और अचानक ही,.....उसके चेहरे के हाव-भाव बदले। उसकी आँखें अचानक ही लाल-लाल हो गई, उसके बाल बिखर गए और फिर वह दबी-दबी आवाज में चिल्लाने लगा,....."रति संवाद-रति संवाद"। 

उसे इस प्रकार से चिल्लाता देखकर रूम में मौजूद सभी व्यक्ति की आँखें आश्चर्य से फैलने लगी। जबकि तांत्रिक भूत नाथ अपने स्वर उच्चारण की गति को बढ़ाता जा रहा था-बढ़ाता जा रहा था और अचानक ही रुका। उसने अपनी आँखें बंद कर ली और थोड़ी देर के लिए ध्यानस्थ मुद्रा में हो गया।

उसके इस हरकत पर रूम में मौजूद सभी व्यक्तियों की सांसे अधर में फंस गई। तभी भूत नाथ ने अपनी आँखें खोली और फिर से हवन करने लगा। फिर तो वो करीब पंद्रह मिनट तक तांत्रिक क्रियाओं को करता रहा और उसके इस कर्मकांड की लाइव रिपोर्टिंग होती रही। इसके बाद वो रुका और एस पी. साहब की और भरपूर नजरों से देखने के बाद बोला।

एस. पी. साहब....वह कोई प्रेतात्मा है.....खून की प्यासी आत्मा!....जो अतृप्त है और इसी तृप्ति की चाह में वह इन हत्याओं को अंजाम दे रही है। बोलने के बाद भूत नाथ ने एस. पी. साहब के चेहरे को देखा, मानो जानने की कोशिश कर रहा हो कि उसके बातों का कितना प्रभाव हुआ है। जबकि उसकी बातों को सुनकर एस. पी. साहब गंभीर स्वर में बोले।

तो फिर आप ही बताओ......कि इसके उपाय क्या है और पुलिस को आगे क्या करना चाहिए?

उपाय.....उपाय करने की सोचना भी मत!...क्योंकि जो संभव ही नहीं, उसे करोगे कैसे? वह आत्मा बहुत ही शक्तिशाली है और वह किसी के बस में आने वाली नहीं। भूत नाथ ने ऊँचे स्वर में कहा और एक पल रुककर अपने शब्दों के प्रभाव को देखता रहा, फिर आगे बोला। 

वह अतृप्त आत्मा लड़के का है और वो लड़की से धोखा खाया हुआ है।.....ऐसे में वो बदले की भावना से ऐसी घटनाओं को अंजाम दे रहा है।.....ऐसे में उसको सिर्फ और सिर्फ तांत्रिक विधि द्वारा ही रोका जा सकता है, जो मैं करूंगा। भूत नाथ अपने अंतिम के शब्दों पर भार देकर कहा। 

इसके बाद एस. पी. साहब ने अपनी शंकाओं को उसके सामने व्यक्त किया, जिसका समुचित उत्तर भूत नाथ ने दिया। उधर उन दोनों में बातें हो रही थी, इधर सलिल मन ही मन कूढ रहा था। उसे इतना तो पता था कि अभी जो इस रूम में हो रहा है,...."ढकोसला” के सिवा कुछ भी तो नहीं"। किन्तु उसकी मजबूरी यह थी कि इस ढकोसले को वह रोक नहीं सकता था। 

वह यह भी जानता था कि इससे कुछ हासिल होने वाला नहीं, इसलिये उसके चेहरे पर उकताहट के भाव थे। आखिरकार जब सलिल ज्यादा ही व्यग्र हो गया,....उसने राम माधवन एवं रोमील के चेहरे को देखा और उसके मन में संतुष्टि के भाव जगे। क्योंकि एक वही नहीं था, जिसके चेहरे पर ऐसे भाव थे, जबकि दोनों के चेहरे से वही भाव परिलक्षित हो रहा था।

**********

शाम के छ बजते ही सलिल अपने अपार्ट मेंट पर पहुंच गया था। वैसे ही वो बहुत ही थका हुआ था और दूसरी ये बात थी कि उसे पता नहीं था कि कितनी रातें जागकर बितानी पड़े।.....इसलिये उसने रोमील को पहले ही सोने के लिए भेज दिया था और खुद अब एक स्कॉच की बोतल लिए लौटा था। वैसे तो उसकी भी यही इच्छा थी कि जाकर मस्त खर्राटे भरी निंद लेगा।....परंतु उससे पहले जानना जरूरी था कि न्यूज डिबेट में आखिर हुआ क्या? बस यही सोचता हुआ उसने अपार्ट मेंट के अंदर कदम रखा, तो देखा कि लाइटें जली हुई थी।

जरूर रोमील ने जलाया होगा और अब बेडरूम में चादर तान कर सो रहा होगा। सलिल मन ही मन बुदबुदाया और किचन की तरफ बढ़ गया और जब लौटा, हाथ में आईश बाऊल एवं गिलास लिए था।.....फिर तो उसने शराब की बोतल, आईश बाऊल एवं गिलास को टेबल पर टिकाया और सोफे पर बैठ गया।....लेकिन ऐसा प्रतीत हो रहा था कि जैसे उसे कोई जल्दी नहीं हो,.....यह उसके ऊपर हावी थकावट के कारण ऐसा था। इसके बाद उसने एक बार भरपूर नजरों से हॉल को देखा, सुख- सुविधा से युक्त, लेकिन जहां-तहां बिखरे हुए समान। यही तो "बैचलर लाइफ" की विशेषता है।

हॉल में फैली हुई अव्यवस्था को देख कर सहज ही उसके होंठों पर मुस्कान आ गई। इसके बाद तो उसने रिमोट से टीवी आँन की और फिर अपने लिए पैग बनाने लगा। लेकिन उसकी आँखें तो टीवी स्क्रीन पर ही टिकी हुई थी। टीवी स्क्रीन जैसे ही आँन हुई, न्यूज तक के "लोगो दिखाई देने लगा"। तब तक सलिल ने अपने लिए पैग भी तैयार कर लिया था और अब उठाकर होंठों से लगा चुका था। 

जबकि टीवी स्क्रीन पर न्यूज एंकर "अभीताभ संथाल" आ चुका था और अपने चीर-परिचित अंदाज में दर्शकों का अभिनंदन कर रहा था। ....सलिल जानता था कि अब "अभीताभ संथाल" अपने लच्छेदार वक्तव्यों से न्यूज देखने बालों को मोहित करेगा और यही साबित करने की कोशिश करेगा कि "उसका न्यूज चैनल" सबसे सुपिरियर है।

अतः उसने थामे हुए प्याले से शराब को अपने हलक में उड़ेल लिया और फिर अपने लिये दूसरा पैग बनाने लगा। तभी उसकी नजर फिर से टीवी स्क्रीन पर गई और उसने देखा कि "डिबेट के लिए"पैनल जुड़ चुके थे। ऐसे में सलिल ने दूसरा पैग भी गटक लिया और तीसरा पैग भी बनाने में जूट गया। 

तब तक टीवी स्क्रीन पर डिबेट शुरु हो चुका था और "अभीताभ संथाल ने एस. पी. मृदुल शाहा को संबोधित करके प्रश्न पूछा।.....सर! शहर में इस तरह से सरेआम हत्याएँ हो रही है। इस बारे में आपकी क्या सोच है? देश की जनता जानना चाहती है। अपनी बातें खतम करके अभीताभ संथाल ने अपनी नजर एस. पी. साहब के चेहरे पर टिका दी।

जबकि सलिल ने अपनी नजर टीवी स्क्रीन पर टिका दी। अब वो सब कुछ भूल चुका था और बस अब यही जानने के लिए बेचैन हो चुका था कि "बाँस इस केस के बारे में आँन स्क्रीन क्या कहते है। सलिल इस बारे में सोच ही रहा था कि तभी टीवी स्क्रीन पर प्रभावशाली स्वर उभड़ा। 

"मिस्टर अभीताभ" इस घटना के बारे में अभी ज्यादा कहना तो उचित नहीं होगा।...... परंतु इतनी बातें कहूंगा कि पुलिस इस वारदात को बहुत गंभीरता से ले रही है। हम इस केस में सभी कोण से सोच रहे है और उम्मीद है कि हमें जल्द ही इस केस में सफलता मिलेगी और जल्द ही अपराधी चाहे कोई भी हो," पुलिस के गिरफ्त में होगा"।

लेकिन सर!.....जब आप लोग इस केस को आपराधिक दृष्टिकोण से देख रहे है,....तो फिर तांत्रिक भूत नाथ का आना और तांत्रिक क्रियाएँ करना?.....मतलब नहीं समझ में आ रहा है? एस. पी. साहब के चुप्पी साधते ही टीवी स्क्रीन पर "अभीताभ संथाल" का स्वर गुंजा और उसके इस आवाज ने सलिल की भी उत्तेजना बढ़ा दी। अब वो जानने को बेचैन हो उठा था कि एस. पी. साहब इस प्रश्न का उत्तर क्या देते है।

मिस्टर अभीताभ.....इस बारे में अभी ज्यादा कुछ तो बता नहीं सकता,....परंतु यह किसी प्रेतात्मा का भी काम हो सकता है। सलिल सोच ही रहा था, तभी टीवी स्क्रीन पर एस. पी. साहब का गंभीर स्वर उभड़ा और सलिल ने देखा कि एस. पी. साहब कुछ पल के लिए रुके, फिर आगे बोले। 

मैंने आपको पहले ही कहा "अभीताभ" कि पुलिस इस केस में अलग-अलग दृष्टिकोण से जाँच कर रही है और अब तक मिले सबूत से तो यही लगता है कि इस केस में "ऊपरी हवा" के हाथ होने की संभावना ज्यादा है, बस हम उसी संभावना को तलाश रहे हैं।

तो सर!.....मैं यह मान कर चलूं कि पुलिस भूत-प्रेत के अस्तित्व पर विश्वास करती है?....एस. पी. साहब की बातें खतम होते ही अभीताभ ने दूसरा प्रश्न दाग दिया।

नहीं, ऐसी बात है-ही नहीं मिस्टर अभीताभ।...बात विश्वास करने या नहीं करने की नहीं है, बात है संभावनाओं की और.....पुलिस को ये अधिकार है कि” केस को "हर एक एंगल" से जांचे। फिर तो..... जो सत्य है, वही छन कर आएगा न। 

अभीताभ के प्रश्न का एस. पी. साहब ने समुचित उत्तर दिया और फिर उन्होंने चुप्पी साध ली। तब अभीताभ दूसरे पैनलिश्टों से इस संदर्भ में बातें करने लगा और जबाव सुनने लगा।

परंतु सलिल को तो जो सुनना था, जानना था, उसे जान लिया था। इसके बाद उसने अपने लिये तैयार तीसरे पैग को भी हलक में उतार लिया और चौथे पैग की तैयारी करने लगा। साथ ही सोचने लगा, अपने बाँस के बारे में। उसका बाँस कितना तेज-तर्रार है, जो जबाव देने से पहले ही तैयारी कर ली थी। 

शायद उसके बाँस की यही कोशिश है कि इस सीरियल हत्याकांड का शहर के रहवासी पर नकारात्मक असर नहीं पड़े। लेकिन कहीं ऐसा तो नहीं कि उसका बाँस इस केस को दूसरी ओर "मूव" करने की सोच रहेहो।....नहीं-नहीं ऐसा नहीं हो सकता कि बाँस इस प्रकार की भूल करें। बाँस को जरूर पता होगा कि "ऐसा करने पर, इसके परिणाम कितने भयावह हो सकते है।

सलिल इन बातों को सोच रहा था और साथ ही दूसरे पैनलिश्टों की बातें भी सुनता जा रहा था। साथ ही यह भी सोचता जा रहा था कि आखिर इस केस के कारण क्या है और यह वारदात "आखिर कहा जाकर रुकेगी"। फिर तो....इस केस को वह किस प्रकार से हैंडल करें कि अपराधी कानून के शिकंजे में जकड़ लिया जाए। 

कार्य अति दुष्कर था, किन्तु करना तो था ही। लेकिन कैसे?.....इस सवाल के जबाव को ढूंढने के लिए वो मनो-मंथन कर रहा था और जब उसे समझ नहीं आया....उसने चौथे पैग को भी हलक में उतार लिया।उफ!.....पुलिस की नौकरी में कितनी जिम्मेदारी है,..... शहर में चाहे जो भी घटना घटित हो, उसकी जिम्मेदारी उठाओ, अपराधी को पकड़ो।

सलिल इन बातों को सोच ही रहा था, तभी टीवी स्क्रीन अचानक ही झिलमिल होने लगी। अचानक से कनेक्शन कटने के कारण को सलिल समझ भी नहीं पाया था, तभी टीवी स्क्रीन पर एक विशाल हॉल की तस्वीर उभड़ी। रोशनी से नहाई हुई और अचानक ही उस रूम की रोशनी जलने-बुझने लगी। सलिल तो समझ ही नहीं पा रहा था कि चलते न्यूज प्रोग्राम के बीच अचानक से यह क्या लाइव प्रसारित होने लगा। 

तभी टीवी स्क्रीन पर "रति संवाद-रति संवाद" का रहस्यमयी स्वर गुंजने लगा। अचानक ही लाइव न्यूज में इस प्रकार के प्रसारण से सलिल बौखला उठा।

उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि अचानक ही न्यूज एजेंसी बालों को क्या सूझी कि इतने "सेंसेटिव वीडियो" को लाइव प्रसारित कर दिया। उफ!...

मीडिया वाले भी न, बिना मतलब की बातों को तूल देने में कोई कसर नहीं छोड़ते। उनका बस चले, तो टी आर पी के लिए कुछ भी "लाइव" प्रसारित कर सकते है। सलिल इस बात को सोच ही रहा था कि तभी टीवी स्क्रीन पर से वह वीडियो गायब हो गया और टीवी डिबेट के पेनलिश्ट दिखने लगे। 

साथ ही अभीताभ संथाल भी दिखा और स्पष्ट दिखी उसके चेहरे की बौखलाहट। लेकिन कुछ पल बाद ही उसने अपने-आप पर नियंत्रण कर लिया और बीच न्यूज में आए रुकावट के लिए उसने दर्शकों से माफी मांग ली। लेकिन सलिल को इससे कोई मतलब नहीं था, वो तो एस. पी. साहब के चेहरे को देख रहा था, जो भाव-विहीन था।

*********

शाम के छ बज चुके थे और ढलती हुई सूर्य लालिमा के बीच चंद्रिका वन फार्म हाउस की छटा और भी निखर उठी थी। साथ ही निखरने लगा था बिल्डिंग का रंगत। उस बिल्डिंग के अंदर बेडरूम में सोया हुआ वही सुन्दर युवक, नितांत घोड़े बेच कर सो रहा था। लेकिन म्यूजिक सिस्टम चालू था और उसपर मुहम्मद रफी के नगमें गुंज रहे थे। 

बीतते समय के साथ ही सूर्य की किरणें क्षीण होती जा रही थी और लग रहा था कि कभी भी सूर्य देव विश्राम करने को अस्तांचल में चले जाएंगे।

उस युवक का चेहरा निंद्रा अवस्था में और भी मासूम लग रहा था, इतना मासूम कि किसी की भी नजर लग सकती थी।....किन्तु वो ज्यादा देर तक नहीं सोया रह सका, क्योंकि अलार्म की आवाज ने अचानक ही उसके निंद में खलल डालने को उद्धत हो गया.....और उसकी आँख खुल गई। उसने आँख खुलते ही सबसे पहले कलाईं घड़ी को देखा, शाम के छ बजकर दस मिनट हो चुके थे।....उफ! वो तो बहुत देर तक सोया ही रह गया।

इस प्रकार के विचार सहज ही उसके मन में उभड़े और वो फुर्ती के साथ बेड पर उठकर बैठ गया,....साथ ही उसने अपनी नजर रूम में चारों ओर फैलाई। कहीं किसी प्रकार का बदलाव नहीं था, मतलब कि सामान्य ही था। ऐसे में अब उसे बाहर निकलना चाहिए।

सोचते ही वह उठा और चलता हुआ हॉल में आ गया और जैसे ही उसने हॉल में कदम रखा, उसकी नजर टेबल पर रखी भरी हुई शराब की बोतल पर गई। ओह!.....फेनी, मजा आ जाएगा। सहसा ही उसके मुख से निकला, क्योंकि टेबल पर "फेनी" की ही बोतल थी और यह उसके लिए सब से उम्दा शराब की क्वालिटी थी।

.....इसलिये फिर तो वो अपने-आप को रोक नहीं सका और दो ही कदमों में टेबल के पास पहुंच गया "और दूसरे ही पल शराब की बोतल उसके हाथ में थी"। फिर देर किस बात की, क्योंकि वह तो उतावला हो चुका था पीने के लिए, इसलिये उसने दांतों से काँक को खोला और गट- गट पीने लगा।

मानव मन बहुत ही अजीब है, जिसको आज तक न तो कोई समझ सका है और न ही कोई इसपर लगाम ही लगा सका है। इस "मन" ने सृष्टि के शुरु से लेकर अब तक, इसके जी में आया है, वही किया है। 

भले ही उसके परिणाम फिर दुख-दाई ही क्यों नहीं हो। बस यही हाल उस नौजवान की थी जो अभी सोकर उठा ही था और शराब को शर्बत की भांति पीए जा रहा था। यहां तक कि उसकी सांसें फूलने लगी थी,.....परंतु उसने पीना नहीं छोड़ा और बोतल को तभी अपने मुंह से हटाया, जब वह पूरी तरह से खाली हो गई। हां, बोतल खाली होते ही उसके आँखों में संतुष्टि के भाव दृष्टिगोचर हुए। फिर तो उसने खाली बोतल को टेबल पर रखा और वही रखे सोफे पर बैठ गया। इसके बाद सहसा ही उसे जैसे कुछ याद आया हो, उसने दीवाल पर लगी टीवी को आँन किया और "न्यूज तक “चैनल को लगा दिया।

परंतु जैसे ही उसकी नजर टीवी पर होते डिबेट पर गई, उसके चेहरे पर मुस्कान उभड़ आई। ओह!....यह न्यूज वाले भी न, बिना मतलब के ही कोई कार्यक्रम तड़का लगाकर जनता के सामने प्रस्तुत कर देते है और जनता देखकर पागल होती रहती है। 

इन बातों को सोचकर फिर उसके होंठों पर मुस्कान आई,....साथ ही उसे तलब भी लगी। इसलिये उसने जेब से चरस की पुड़िया निकाल ली और बनाकर चिलम भरने लगा। लेकिन उसकी नजर अनवरत ही टीवी स्क्रीन पर टिकी रही, मानो वो न्यूज समझने की कोशिश कर रहा हो। किन्तु उसके चेहरे के हाव-भाव से ऐसा नहीं लगता था कि उसके पल्ले कुछ पड़ रहा हो।.....हां, यह अलग बात थी कि उसका चिलम तैयार हो चुका था, इसलिये उसने सुलगा ली और कश खींचने लगा।

गाढे धुएँ की मोटी परत हॉल में फैल गई, लेकिन उससे-उसको क्या? उसे तो बस तसल्ली चाहिए थी और इसलिये वो तबतक कश खिंचता रहा, जब तक कि "चिलम में रखी वस्तु" राख में नहीं बदल गई। इसके बाद आँखों में संतुष्टि का भाव लिये उसने लैपटाप उठाया और उसके की-बोर्ड से छेड़छाड़ करने लगा। इसके साथ ही उसके चेहरे पर गंभीरता छा गई। 

लगा कि जैसे कोई बहुत ही महत्वपूर्ण बिजनेस डील हो, जिसे वो लैपटाप के द्वारा निपटा रहा हो। उसके चेहरे पर नितांत शांति पसरा हुआ था, चिर परिचित शांति का साम्राज्य। लेकिन आँखें, उसकी आँखें बिल्कुल भी शांत नहीं थी और लैपटाप के स्क्रीन पर दौड़ रही थी।

समय बीतता जा रहा था और वो अपने काम की गति को बढ़ाए जा रहा था। तभी अचानक ही उसके मोबाइल ने बीप दी और इसके साथ ही हॉल की लाइट जलने-बुझने लगी। इसके साथ ही वह रहस्यमयी शब्द "रति संवाद-रति संवाद" हॉल में गुंजने लगा। इसके साथ ही उस नौजवान के चेहरे के भाव भी परिवर्तित हो गए। 

ऐसा लगा कि.....उसके मासूम चेहरे पर पलक झपकते ही "खौफ" ने अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया हो। उसके आँखों के चारों ओर स्याह परत सी फैल गई और पल भर में ही वो पसीने से नहा उठा। फिर तो वो एक पल भी बैठा नहीं रह सका। उसने तेजी से सोफे को छोड़ा और उठ खड़ा हुआ, एवं तेजी से मोबाइल की ओर लपका एवं कॉल रिसीव किया।

इसके साथ ही रूम की स्थिति सामान्य हो गई। फिर तो वो फोन पर बात करने में उलझ गया और जब कॉल कट हुई, उसके चेहरे पर निश्चिंतता के भाव थे। इसके बाद तो उसने तेजी से अपने कपड़े बदले और तेजी से बाहर निकला। 

बाहर बिल्डिंग के अहाते में उसकी फिएट कार खड़ी थी, जिसमें बैठने के साथ ही उसने कार श्टार्ट करके आगे बढ़ा दी। कार जैसे ही फार्म हाउस के गेट से निकली, सड़क पर आते ही रफ्तार पकड़ लिया। फिर तो पांच मिनट भी नहीं बीते होंगे कि कार जंगल से निकल कर दिल्ली की मुख्य सड़क पर दौड़ने लगी। तब उस नौजवान ने कार के शीशे से बाहर देखा, बाहर अंधेरा ढल चुका था और इसके साथ ही शहर रोशनी से जगमग करने लगी थी।

परंतु उस नौजवान को जैसे इन बातों से कोई मतलब न हो। हां, उसे बिल्कुल भी मतलब नहीं था, क्योंकि उसे भूख लगी हुई थी और अपनी क्षुधा शांत करने के लिए वो किसी ढाबे की तलाश में था। वो ऐसे ढाबे की तलाश में था,....जहां स्वादिष्ट भोजन की सुगंध आती हो और वो जी भर कर भोजन कर सके। 

बस इसी तलाश में वो "कार" को फूल रफ्तार में भगाये जा रहा था। किन्तु.....उसके मन में एक बात बार-बार घूमर कर आ रही थी कि आखिर न्यूज वाले को क्या-क्या सूझता रहता है। बात-बे बात के भी "डिबेट" आयोजित कर देते है और "तुक्का" लगाने की कोशिश करते है। लेकिन जब सारे काम यही कर लेंगे, तो फिर पुलिस वाले की जरूरत ही क्या है?

घर्रर्रर्र......घर्र!

सहसा ही टायरों के घिसटने की आवाज से इलाका गुंज उठा। क्योंकि अचानक ही उसको तेजी से ब्रेक दबाने पड़े थे, जिसके कारण उसकी कार "कुछ दूर" तक सड़क पर घिसटती चली गई थी और ऐसा इसलिये हुआ था कि अचानक ही उसके सामने दूसरी कार आ गई थी और उसने ब्रेक न लगाए होते,....भयावह टक्कर हो जाती। लेकिन जैसे ही उसने सामने वाली कार में ड्राइविंग सीट पर बैठी हुई लड़की को देखा,...उसके हौसले पस्त हो गए। फिर तो उसने तेजी से कार पीछे ली और बगल से बड़ी सफाई से कार आगे निकाल ली। 

जब कार आगे निकली, उसके चेहरे पर राहत के भाव दृष्टिगोचर हुए। फिर तो उसने कार की रफ्तार बढ़ा दी और अपनी उखड़ी हुई सांसों को नियंत्रित करने लगा। साथ ही सोचने लगा कि आज वो बाल-बाल बचा।

उस नौजवान को शांत होने में करीब पांच मिनट लग गए। उसके बाद वो सोचने लगा। उफ!.....आज तो वो बाल-बाल बचा, नहीं तो उससे सामना हो जाता। फिर तो वह उसके बेतुके सवालों के जबाव किस प्रकार से देता? ओह गाँड!.....भला वो उस लड़की के चेहरे को किस प्रकार से भूल सकता है, उसका चेहरा तो लाखों में पहचान लिया जाए,...."ऐसी है"। परंतु गनीमत है कि आज वो बच गया। 

इतनी बातें सोचने के बाद उस नौजवान ने राहत की सांस ली और फिर कार को उस सड़क से दूसरी सड़क की तरफ दौड़ा दिया, तभी थोड़ी दूर पर ही उसकी नजर "ढोला दी ढाबा" पर गई और उसने कार रोक दिया।

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लवण्या कार को यूं ही भगाये जा रही थी, बेतहाशा, बिना किसी मकसद के। उसका तो रोज का ही काम था, दिल्ली की सड़क को छानना। बस वह एक झलक पाना चाहती थी और अचानक ही उसकी कार एक्सीडेंट होते-होते बची। 

उसे तो लगा कि उसकी कार सामने वाली कार से टकरा ही गई,.....भय से उसने आँखें बंद कर ली और जब खोली, भौचक्की रह गई। कारण भी था, क्योंकि उसने जो कल्पना नहीं किया था, आखिर वही हुआ था। उसके पांव ब्रेक पर कसे हुए थे और सामने वाली कार भी रुकी हुई थी।

खतरा टला, तो स्वाभाविक ही था कि लवण्या आर को होश आया और होश आते ही वो गुस्से से लाल-पीली हो गई। उफ!....शहर के लोग कैसे है? ड्राइव करने नहीं आती और सड़क पर कार लेकर आ जाते है। बस गुस्सा आना था और लवण्या आर बाहर निकली, एवं सामने वाली ब्लैक इनोवा कार के पास पहुंची और गुस्से से कार के शीशे को थपथपाया। 

लेकिन जैसे ही कार का गेट खुला, लवण्या आर आश्चर्य में डूब कर बुत बन गई। भला वो उस चेहरे को कैसे भूल सकती थी, जो काँलेज में उसका "हमदर्द" नाम से मशहूर था। जिसकी कोशिश ही यही रहती थी कि हमेशा "लवण्या आर" के चेहरे पर खुशी विराजमान रहे। वह नित दिन ही तो उसके होंठों की हंसी को "कायम" रखने के लिए प्रयास रत रहता था। लेकिन एक वो थी कि” कभी उसके भावना को समझने की कोशिश ही नहीं की। अन्यथा, शायद वो समझकर भी यूं ही अंजान बनती रही।

हां, सामने वाली कार में सम्यक बहल ही था, जो आश्चर्य के सागर में गोते लेता हुआ लवण्या आर को देखे जा रहा था। उस लवण्या आर को, जिसकी दीवानगी में वो काँलेज में "मजनू बहल" के नाम से मशहूर हो गया था। उस लवण्या आर को देख रहा था, जो उसके भावनाओं का कद्र करना ही नहीं जानती थी। 

लेकिन इससे क्या? चाहतों की उफान धीमी होती है? तो जबाव होगा कि नहीं,.....ऐसा बिल्कुल भी नहीं होता है। चाहत तो वो चीज है, जो सामने से पाने की आशा ही नहीं रखती। इसका तो स्वभाव ही ऐसा है कि जिसको अपना मान लिया,.....बस उसके ही होकर रह गया। इसमें स्वार्थ नहीं होता, अपितु बस अर्पित करने की इच्छा होती है। बस अपने आप में रमने की चाह में "फना" हो जाने पर भी किसी प्रकार की आनाकानी नहीं होती।

बस सम्यक बहल, उसी चाहत के अधीन हो चुका था, तभी तो लवण्या आर को अपने सामने देख कर आश्चर्य के सागर में गोते लगा रहा था। लेकिन इस स्थिति में वो ज्यादा देर तक नहीं रह सका, क्योंकि तभी लवण्या आर के होंठ हिले, परंतु आश्चर्य एवं भावनाओं के प्रबल आवेग में वो भी कुछ नहीं कह सकी। 

बस दोनों की नजरे आपस में एक दूसरे को देखती रही और बातें करती रही। लेकिन ऐसी स्थिति ज्यादा देर तक स्थाई नहीं रहने वाली थी। आखिर दोनों में से किसी को तो बात की शुरुआत करनी ही थी। इसलिये सम्यक ने जब देखा कि लवण्या चाह कर भी बोल नहीं पा रही, वो कार से बाहर निकला और उसके सामने खड़ा हो गया, फिर तो उसके होंठों से कांपता स्वर निकला।

लवण्या.....त....तुम! ओह माय गाँड! विश्वास ही नहीं होता कि तुम मेरे सामने खड़ी हो। बहुत ही मुश्किल से सम्यक अपनी बातों को कह सका, फिर वो उसके आँखों में देखने लगा।

जबकि लवण्या आर, वो तो बस अपलक सम्यक को देखे जा रही थी। उसे तो विश्वास ही नहीं हो रहा था कि......अचानक से ही उससे मुलाकात हो जाएगी, "वह भी इस प्रकार से"। ऐसे में जब उसने सम्यक की बातें सुनी, "हर्ष, आश्चर्य, दुख और अह्लाद के भाव" से वह सम्यक से लिपट गई और कांपते हुए स्वर में उसके कान के पास धीरे से बोली।

सम्यक......तुम!....यूं ही अचानक से! कहां थे अब तक तुम? 

लवण्या आर ने एक साथ प्रतिक्रिया भी दी और प्रश्न भी पुछ लिए। तब तक सम्यक काफी हद तक संभल चुका था और उसे अनुभूति हो चुकी थी कि "उन दोनों के कारण ट्रैफिक जाम की समस्या उत्पन्न हो चुकी है। दिल्ली की सड़क पर वैसे ही सेकंड में सैकड़ों गाड़ियां गुजर जाती है। 

ऐसी परिस्थिति में उन दोनों का खड़ा होना, आगे-पीछे हजारों गाड़ियां खड़ी हो गई थी। इसलिये सम्यक ने अपनी भावना को नियंत्रित किया और लवण्या आर को खुद से अलग किया। फिर उसको समझाया कि " यहां खड़े होकर बात करने की अपेक्षा किसी काँफी शाँप में चलते है।

उसकी बाते सुनकर लवण्या आर मुस्कराई और उसने काँफी शाँप चलने की बजाए किसी वियर बार में चलने को कहा। इसके बाद तो, दोनों ने कार श्टार्ट की और एक ही लीक में कर लिया और फिर दोनों की कार आगे-पीछे सरपट सड़क पर दौड़ने लगी। दिल्ली की सड़क, रात में भी रोशनी में नहाई हुई “जगमग" करती। 

उसपर दौड़ती हुई गाड़ियां, उसके बीच दोनों की कार सरपट भागती जा रही थी और फिर "अशोका वियर बार" के सामने ही जाकर रुकी। अशोका वियर बार, रोशनी में जगमग करती हुई दुल्हन की तरह लग रही थी।

कार के रुकते ही दोनों बाहर निकले और वियर बार के बिल्डिंग की ओर बढे। गेट से प्रवेश करते ही उनकी आँखें चमक उठी। कारण, इस वियर बार में ज्यादातर शाम को काँलेज के छात्र ही आते थे, शाम को इंज्वाय करने और दोनों की नजरे दो परिचित चेहरे से टकरा गई। 

इसलिये ही उन दोनों की आँखों में चमक आई थी। फिर दोनों उसी टेबल की ओर बढे, जहां उनके काँलेज के दोस्त इशांत एवं संभ्रांत बैठे थे। चलते हुए जैसे ही दोनों उस टेबल के करीब पहुंचे, इशांत एवं संभ्रांत भी हर्ष एवं आश्चर्य युक्त होकर चौंके। फिर तो सम्यक एवं लवण्या वहां रखी खाली कुर्सी पर बैठ गए। तब तक इशांत खुद पर नियंत्रण कर चुका था, इसलिये आश्चर्य मिश्रित स्वर में बोला।

तुम दोनों......अचानक ही इतने दिनों बाद! वह भी एक साथ इस वियर बार में?.....इशांत ने प्रश्न पूछा, फिर अपनी नजर दोनों के चेहरे पर टिका दी। जबकि उसके प्रश्न सुनकर सम्यक सहज ही मुस्कराया, फिर उसने हॉल में नजर घुमाई। आधुनिक सुविधाओं से युक्त इस वियर बार की बात ही निराली थी। 

जो शाम होते ही ग्राहकों के अवर-जबर से गुलजार हो जाता था। उस पर यहां के वेटरों की चुस्ती-फुर्ती, जो ग्राहकों की सेवा में तत्पर रहते थे। सम्यक और लवण्या अनेकों बार यहां आ चुके थे, क्योंकि यह वियर बार उन्हें बहुत पसंद था। आज भी तो, नीली रोशनी में हॉल चमक रहा था। जिसे देखने के बाद सम्यक शर्माकर बोला।

यार इशांत......मैं तो आज भी यहां नहीं आता। लेकिन अचानक ही लवण्या मुझे मिली और उसने आने के लिए कहा।

इसके बाद सम्यक उसे बतलाने लगा कि किस प्रकार से "लवण्या जब उसे इग्नोर करने लगी थी। उसने काँलेज आना छोड़ दिया था और अपने अपार्ट मेंट में कैद होकर रह गया था और आज अचानक ही वर्षों बाद उसे लवण्या मिली। सम्यक अपनी बातें कहता जा रहा था और लवण्या पछतावा और वेदना में पिघलती जा रही थी। 

तब तक वेटर "वियर  की बोतल" सर्व कर गया। इसके बाद तो, संभ्रांत ने पैग बनाने की जिम्मेदारी संभाल ली, जबकि सम्यक की बातें खतम होते ही इशांत ने लवण्या से उसके बारे में पूछा।....लवण्या उसके प्रश्न सुनकर एक पल को मौन होकर सोचती रही, फिर बतलाने लगी कि किस प्रकार से वो अपने जीवन के फैसले लेने में धोखा खा गई और "व्यर्थ प्रेम के जाल में फंस गई"।

किस प्रकार से "गर्वित सक्सेना " ने उससे प्रेम किया और फिर सान्या सिंघला के जाल में फंस कर उसका साथ छोड़ दिया। लवण्या अपने बीते दिनों के "कड़वे अनुभवों को" बतलाने लगी। इस दौरान उन चारों में पीने-पिलाने का दौर शुरु हो चुका था। जब लवण्या ने अपनी बात खतम की, इशांत दोनों की तकलीफ समझ चुका था। 

वह जानता था कि लवण्या और सम्यक में वार्तालाप की जरूरत है, तभी उनके बीच के गिले-शिकवे दूर हो सकते है।....इसलिये उसने पीने-पिलाने के दौरान ही दोनों में बात शुरु करवा दी।.....फिर तो दोनों घंटों बात करते रहे और "अलग होने के बाद" के खट्टे-मीठे अनुभव बताते रहे। लेकिन सम्यक से लवण्या को बस इतनी ही शिकवा-शिकायत थी कि जब वो उसको चाहता था,....तो उसने अपने प्रेम का इजहार क्यों नहीं किया।

*********

रात के नौ बज चुके थे, इसलिये आस-पास के इलाके में अब धीरे-धीरे शांति पसरने लगी थी। उसी शांति के आभास में तो सभी जीते है,.....परंतु हॉल में अभी शांति नहीं थी, क्योंकि टी. बी. मध्यम आवाज में अभी भी चल रहा था। हां, इतना जरूर था कि सलिल सोफे पर ही बेसुध होकर सोया हुआ था, दिन-दुनिया से बेखबर होकर और ऐसा होना भी अतिशयोक्ति नहीं था। लगातार तीन दिन की मेहनत और दो रातों का जागरण, उसे तो ऐसा सोना ही चाहिए था।.....उसपर भी दारु ने उसपर असर किया और दिमाग को रीलिफ पहुंचते ही वो सो गया।

सोते समय खूंखार स्वभाव का सलिल मासूम लग रहा था।....किन्तु” पता नहीं कि उसके नसीब में कितने समय चैन की निंद लिखी थी,.....क्योंकि दुर्घटना घटित होने में समय नहीं लगता और वैसे भी इस समय शहर में "सीरियल मर्डर कांड" का सिलसिला चल रहा था। 

समय बीतता जा रहा था, तभी अंदर "बेडरूम" से रोमील उठकर आया। इस समय उसकी आँखें लाल-लाल अलसाई हुई थी। लगता था कि अचानक ही उसकी आँख खुली थी और टीवी की आवाज सुनने पर वह हॉल में आया था। हां, टीवी के आवाज के कारण ही वो जगकर हॉल में आया था.....इसलिये ही तो आते ही उसने हॉल में देखा, फिर टीवी को बंद किया।

अब वो क्या करें? प्रश्न सहज ही उसके दिमाग में कौंधा। वैसे भी चार घंटे चैन की निंद ले- लेने के कारण उसकी निंद पूरी हो चुकी थी। अतएव उसने एकबार सलिल को देखा और फिर किचन की ओर बढ़ गया और जब लौटा, हाथ में काँफी का मग लिए था। फिर खाली सोफे पर बैठकर काँफी की चुस्की लेने लगा, साथ ही सोचने लगा। 

हाश! आज तो शांति से बीते, नहीं तो फिर से वही भागदौड़। इतनी बातें दिमाग में आते ही सहसा उसने कलाईं घड़ी पर नजर डाली और....दिमाग में  घंटी बजी। उफ! टेंशन का भार कितना अजीब और भयावह होता है, यह तो जिसपर बीतता है,....वही बतला सकता है।

काश कि आज की रात शांति से गुजरे। वैसे तो "अपराध " घटित होने का समय हो चुका था। यानी कि रात के नौ बजकर दस मिनट हो चुके थे और अब कभी भी फोन आ सकता था। काँफी पीते हुए रोमील के अंतर्मन से आवाज आई, "हे भगवान" आज का दिन तो मंगलमय तरीके से बीतने दो। परंतु रोमील कहां जानता था कि उसके द्वारा कीगई प्रार्थना, सिर्फ मन की संतुष्टि के लिए है,.....क्योंकि जो घटित होना होता है, "घटित होकर ही रहता है" । 

तभी तो टेबल पर रखे  सलिल की मोबाइल ने बीप दी। सलिल तो बेसुध सोया हुआ था, इसलिये रोमील ने ही कॉल रिसीव की और उधर से जो कहा गया। रोमील सोफे पर उछल पड़ा, उसके हाथ कांपे और काँफी का कप छूटते-छूटते बचा।

उधर से जानकारी ही ऐसी दी गई थी। उसने तो सिर्फ इतना ही सुना था कि "होटल सन्याल" में इस समय खूबसूरत लड़की की हत्या हो गई है और उसके होश फाख्ता हो गए थे। इसके बाद तो कॉल कट जाने के बाद भी मिनटों तक बुत बना रहा और जब होश में आया। दिमाग में यही सवाल आया कि बाँस को जगाए कैसे? 

परंतु जगाना तो था ही, इसलिये उसने हिम्मत जुटाई और सलिल को जगा दिया। "कच्ची" निंद से जगने के कारण सलिल झल्ला कर उसे डपटने वाला ही था कि उसने बतला दी कि "होटल सन्याल" में वारदात घटित हो चुका है। बस इतनी सी बात और सलिल के भी होश फाख्ता हो गए। क्रोध तो कहां गया पता नहीं, सोच में भँवें सिकुड़ने लग गई।

बात गंभीर था, इसलिये फोन लगाकर उसने पुलिस स्टेशन में जानकारी दी,....फिर बाँस "मृदुल" शाहा को फोन लगा दिया। इसके बाद वो रुका नहीं, तेजी से उठा और बाहर की ओर लपका। फिर क्या था, रोमील ने भी उसका अनुसरण किया और दो मिनट बाद ही दोनों स्काँरपियों में थे और कार सरपट सड़क को रौंदती जा रही थी। 

किन्तु विचार" जो कि सलिल के दिमाग में हिलोरे ले रहे थे, उससे वह किस प्रकार से बचता। उसके बाँस ने तो तत्काल राहत के लिए इस केस में तांत्रिक "भूत नाथ" की एंट्री करवा दी थी। लेकिन उसे पता था कि अब क्या होने वाला है। अब मीडिया के उलझे हुए सवालों से खुद को बचाना और जनता के विश्वास को कायम रखना, कितना दुष्कर होगा, यह तो उसकी अंतरात्मा ही बतला सकती थी। इसलिये आने वाले समय से "फाईट करने" के लिए वो खुद को तैयार कर रहा था।

सर!.....इस परिस्थिति में अब हम लोग किस प्रकार से आगे कदम बढ़ाएंगे? सलिल सोच ही रहा था, तभी ड्राइव करते हुए रोमील ने उसकी ओर "प्रश्न के बम" को छोड़ा। जिससे उसका मन आहत हुआ, उसकी इच्छा हुई कि अभी रोमील को "डाँट की घुट्टी" पिला दे। किन्तु नहीं, ऐसा करना ठीक नहीं होगा, सोचकर सलिल ने खुद को नियंत्रित किया और संयमित होकर बोला।

रोमील!.....अभी तो फिलहाल हम लोग घटना स्थल पर चलते है। वहां पर चलकर देखते है कि परिस्थिति किस प्रकार की है, उसके अनुसार ही फिर कार्रवाई करेंगे। सलिल ने कहा और फिर उसने चुप्पी साध ली। ऐसे में बात खतम हुआ ही समझो, फिर तो रोमील की हिम्मत ही नहीं हुई कि बात आगे बढ़ाए।

इसके बाद तो उसने ड्राइविंग पर ध्यान केंद्रित की। कार सरपट सड़क पर दौड़ती रही और पीछे ऊंची-ऊंची इमारत और दुकान छूटते रहे। फिर तो कार "होटल सन्याल" के प्रांगण में ही रुकी। कार से निकलते ही सलिल की नजर कंपाऊंड में खड़ी पुलिस की गाड़ियों पर गई और वो आश्वस्त हो गया। 

इसका मतलब था कि पुलिस टीम वहां पहुंच गई थी और उन्होंने कार्रवाई शुरु कर दी थी। फिर तो दोनों होटल बिल्डिंग की ओर बढे और आगे बढ़ते हुए सलिल ने सरासरी निगाहें होटल बिल्डिंग पर डाली। बहुमंजिला इमारत, आर्टिटेक्ट की दृष्टि से बेहतर बनावट और विशाल क्षेत्रफल में फैला हुआ "भव्य होटल"।

वे दोनों चलते हुए उस रूम में पहुंचे, जहां वारदात घटित हुई थी। वहां पहुंचने पर सलिल ने देखा कि फिंगर एक्सपर्ट और डाँग स्क्वायड वाले अपने काम में जुटे हुए थे। इसके बाद सलिल की नजर रूम में लगी बेड पर गई, जिसपर सुन्दर सी दिखने वाली युवती मृत अवस्था में पड़ी हुई थी। 

उसकी फैली हुई आँखें आश्चर्य और वेदना की गवाही दे रही थी। सलिल ने देखा कि उसके बदन पर भी लेशमात्र कपड़े न थे। फिर भी उसकी अनुभवी आँखों ने अंदाजा लगा लिया कि "युवती" यही बीस वर्ष के करीब की होगी। इसके बाद सलिल ने रोमील को साथ लिया और "होटल" की तलाशी लेने के लिए उस रूम से बाहर निकला, क्योंकि वो जानता था कि यहां रुकने का कोई मतलब नहीं है। पुलिस वाले तो कार्रवाई कर ही रहे है, तबतक उसे होटल के एक चक्कर लगा लेने चाहिए।

इसके बाद सलिल और रोमील ने पूरे होटल को छान लिया, लेकिन उनके हाथ काम की चीज नहीं लगी। ऐसे में दोनों सी. सी. टी.बी रूम में पहुंचे, वहां से डाटा एसेस किया और फिर वारदात वाले रूम में लौट आए। वहां आने पर पता चला कि उनकी टीम अपना काम खतम कर चुकी थी। 

अतः सलिल ने आदेश दिया कि "मृत बाँडी" को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया जाए। साथ ही उसकी नजर रूम के कोने में दुबके बैठे लड़के पर गई। जरूर यह लड़की का साथी होगा और यहां रात गुलजार करने आया होगा। सोचकर सलिल ने रोमील को आदेश दिया कि होटल के स्टाफ और इस लड़के को गिरफ्तार कर लो। आदेश मिलते ही रोमील वहां से चला गया, तब सलिल होटल के मुख्य गेट की ओर बढ़ा। 

लेकिन हॉल में ही उसकी मुलाकात मीडिया बालों से हो गई। सलिल जानता था कि बिना मीडिया बालों के सवालों के जबाव दिए वह बच नहीं सकता। इसलिये वो मीडिया बालों को संतुष्ट करने की कोशिश करने लगा।

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रात के ग्यारह बज चुके थे। 

अब तो वियर बार में भीड़ छंटने लगी थी और संभवतः घंटे भर बाद बंद भी होने वाला था। ऐसे में सम्यक ने लवण्या के आँखों में देखा, फिर गंभीर स्वर में बोला।

लवण्या.....मेरे विचार से रात बहुत हो चुकी है और ऐसे में हमें चलना चाहिए। बोलने के बाद उसने लवण्या की आँखों में देखा। लवण्या तो पहले से ही उसके चेहरे पर नजरें जमाए हुए बैठी थी, क्योंकि इशांत और संभ्रांत कब के दोनों को एकांत में छोड़ कर जा चुके थे। एक तो रात, दूसरे एकांत, लवण्या चाहती थी कि सम्यक थोड़ी देर और बैठे।....परंतु सम्यक को उकताया हुआ देखकर लवण्या ने गहरी सांस लेकर कहा।

ठीक है,....जब तुम चाहते हो, तो चलते है।

तो क्या तुम और वियर पीना चाहती हो? सम्यक ने उसकी बातें सुनते ही तत्काल प्रतिक्रिया दी। जबकि उसकी बातें सुनकर लवण्या चिढ गई। बस उसका यही स्वभाव, जिसके कारण लवण्या उसके भावना को नहीं समझ सकी थी और उनका मिलन न हो सका था।....ऐसे में लवण्या चिढकर बोली।

नहीं श्रीमान....कुछ नहीं, बस चलते है। 

बोलने के बाद लवण्या सीट से उठ खड़ी हो गई और कैश काउंटर की ओर बढी। जबकि सम्यक, वो लवण्या के द्वारा कहे गए अंतिम शब्दों को समझने की कोशिश करता रहा और जब उसके "पल्ले" कुछ नहीं पड़ा, वह भी उठा और लवण्या के पीछे हो लिया। फिर तो बील पेमेंट करने के बाद दोनों बाहर निकले और अगले दिन मिलने का वादा कर अपने-अपने कार में सवार हो गए। 

वैसे भी सम्यक के द्वारा दिए गए "प्रतिसाद" से लवण्या थोड़ा क्रोधित और थोड़ा हताश हो गई थी। इसलिये उसने कार को श्टार्ट किया और तेजी से आगे बढ़ा दी। 

लवण्या, इस समय उसके दिमाग में घमासान मचा हुआ था। भला......,उसने सम्यक को समझने में भूल कैसे कर दी?....जबकि वह तो जानती थी कि वो उसके पीछे लट्टू है और फिर सम्यक स्मार्ट भी था, सुंदर भी था। ऐसी कोई बात नहीं थी कि उसे इग्नोर किया जा सके। तो फिर वह उसके प्रेम को समझ क्यों नहीं सकी और गर्वित सक्सेना की ओर क्योंआकर्षित हो गई?

वह उससे प्रेम करने लगी, जो कि " प्रेम शब्द " का महत्व ही नहीं जानता था। वह तो सिर्फ सुंदरता का पुजारी था, तभी तो उसके दामन को छोड़ कर "सान्या सिंघला" के दामन को थाम लिया। बस इतनी सी बात के लिए कि वह शादी से पहले "इंटरकोर्स" करना चाहता था और लवण्या इसे शादी से पहले गलत मानती थी।

उसे अभी तक याद है कि जब उसने गर्वित के प्रस्ताव को ठुकराया था। गर्वित बौखला गया था, उसने लवण्या का मजाक भी उड़ाया था और फिर धीरे- धीरे उससे दूर होता चला गया।

....परंतु लवण्या समझ ही नहीं सकी उसको, जो कि सच्चे अर्थ में उसको चाहता था। उसके घनी जुल्फों का दीवाना था और उसकी गुलामी के लिए भी तत्पर रहता था। किसलिये,....."शायद इस कारण से ही कि वो सामने वाले की इच्छा नहीं समझ पाता था"।....उसे जल्दी ही मिलन में ऊब होने लगती थी, तभी तो आज भी, वो वियर बार में थोड़ा समय उसके साथ और भी बिताना चाहती थी,....किन्तु उसे तो घर जाने की जल्दी थी।

लवण्या आर सोच रही थी और कार रफ्तार से भागती जा रही थी। तभी वह चौंकी, उसके विचार को तेज झटका लगा,....क्योंकि उसकी नजर ने देखा, सान्या सिंघला की कार बगल से निकली थी।....लवण्या धोखा नहीं खा सकती, वह सान्या सिंघला ही थी, जो अजनबी नौजवान के साथ कार में जा रही थी। उसको देखते ही लवण्या के विचारो की गति बदल गई। किस प्रकार से? 

वो इस समय दूसरे युवक के साथ है और अगर दूसरे नौजवान के साथ है, तो गर्वित सक्सेना कहां है और उसका क्या हुआ? उसके दिमाग में यह प्रश्न उभड़ा और उसने कार घुमा कर "सान्या सिंघला" के पीछे लगा दी।

उसके दिमाग में प्रश्न था, विचारों के झंझावात थे और साथ ही वह जानना चाहती थी कि आखिर "सान्या सिंघला" जा कहां रही है। ऐसे में उसको ज्यादा समय नहीं लगा और उसकी कार सान्या सिंघला के कार के पीछे-पीछे चलने लगी। 

परंतु उसके दिमाग में तो सवाल उमड़- घुमड़ रहे थे। वो कार ड्राइव करती हुई सोचती जा रही थी कि आखिर बात क्या है कि सान्या सिंघला इतनी रात गए दूसरे नौजवान के साथ जा रही है? इतना ही नहीं, उसे विश्वास भी था कि जब सान्या मिल गई है, तो गर्वित भी जरूर मिल जाएगा। फिर वो उससे अपने प्रश्न पुछ सकेगी कि आखिर उसने ऐसा क्यों किया? क्या कमी थी उसमें, जो उसके प्रेम का निरादर करके सान्या सिंघला के साथ हो गया?

इतना ही नहीं, लवण्या मन ही मन शंकित भी हो रही थी कि कहीं गर्वित ने सान्या का भी साथ तो नहीं छोड़ दिया? लवण्या जानती है ऐसे आशिक मिजाज भंवरे के स्वभाव को। आखिरकार इस प्रकार के स्वभाव के लड़के ऐसे ही तो होते है। 

वे किसी एक लड़की से दिल लगाकर नहीं रह सकते,....उन्हें तो मन बहलाने के लिए नित नई लड़कियां चाहिए होती है। जरूर!....ऐसी ही बात सान्या के साथ भी हुई होगी, अन्यथा इस प्रकार से वो रात के इस समय दूसरे नौजवान के साथ नहीं होती। सोचती हुई लवण्या कार ड्राइव में भी ध्यान दे रही थी। उसे डर था कि कहीं "सान्या सिंघला" की कार आगे नहीं निकल जाए और वो पीछे छूट जाए।

लवण्या सावधान रहना चाहती थी और अपने ऊपर किसी विचार को हावी नहीं होने देना चाहती थी।.....लेकिन " विचार " तो स्वेच्छित है, जो रोकने से नहीं रुकती। मानव मन की गति ही इतनी है कि यह स्वतः ही विचारों के जाल में जाकर उलझ जाता है। ऐसे में विचारों को नियंत्रित करना, मन को नियंत्रित करने जितना ही दुष्कर है।.....तभी तो लवण्या भी "अपने मन में आते विचारों को नियंत्रित नहीं कर पा रही थी"। 

आखिर नियंत्रित करती भी तो कैसे? उसके बीते हुए अतीत की परछाईं को लेकर ही तो "विचार" उसके ऊपर हावी हो रहा था। वो भले ही सावधानी पूर्वक कार चला रही थी,.... किन्तु खुद को विचारों की श्रृंखला से आजाद नहीं कर पा रही थी।

उसके अतीत की परछाईं से एक जीवंत करेक्टर उसके सामने था और " कार में आगे-आगे भागा जा रहा था"। फिर वो अपने विचारो को किस प्रकार से रोक पाती। वह तो बस सान्या और गर्वित के बारे में ही सोचती जा रही थी,.....क्योंकि उस कारण से ही उसने वर्षों तक अपनी रातें "दिल्ली की सड़कों पर गुजारी थी"। 

उफ!.....जीवन के उस कड़वे अनुभव को वो किस प्रकार से भुलाती, जब वो पागलों की तरह रात-रात भर दिल्ली की सड़कों को छानती रहती थी। बस अपने उलझे हुए सवालों का जबाव जानने के लिए और इसलिये ही तो..... वो सान्या के कार के पीछे लगी थी।

लवण्या ने कलाईं घड़ी पर नजर डाली, रात के बारह बजने को थे। तभी वो चौंकी, क्योंकि उसने देखा कि सान्या सिंघला की कार "होटल सम्राट" के गेट की ओर मुड़ी और कंपाऊंड के अंदर चली गई। वह अब क्या करें?.....रात के इस समय होटल के अंदर जाए या नहीं? 

क्योंकि, जहां तक उसको जानकारी थी," होटल सम्राट" अपने अंदर होते अय्याशियों के लिए बदनाम था। ऐसे में सुनसान रात और वो अकेली,....होटल के अंदर जाना ठीक होगा या नहीं? अंत में लवण्या के "विवेक" की जीत हुई और उसने होटल में जाने का विचार त्याग दिया। लेकिन उसके दिमाग में विचारों की घंटी बजी,.... रात के समय, इस बदनाम होटल में अनजान नौजवान के साथ "सान्या" क्या करने गई होगी? लवण्या अपने मन में उठे सवाल के जबाव से भी अंजान नहीं थी। 

तो क्या सान्या अपनी काम पूर्ति के लिए इतनी भटक गई है कि वो नौजवान युवक के साथ होटल में। सोचते हुए लवण्या के मन में घृणा के भाव भर गए, लेकिन उसे सान्या से अपने प्रश्नों का जबाव चाहिए था,....इसलिए उसने वहीं पर रुक कर "सान्या का" इंतजार करने का फैसला कर लिया।

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रात के बारह बजने को ही था, तभी सम्यक की कार अपार्ट मेंट के अहाते में आकर लगी। फिर वो तेजी से बाहर निकला और अपने फ्लैट की ओर बढ़ा, लॉक खोली और अंदर प्रवेश कर गया। अंदर धूप्प अंधेरा था, ऐसे में हाथ को हाथ नहीं दिखाई दे रहे थे। ऐसे में सम्यक ने आँखों को अंधेरे में देखने का अभ्यस्त बनाया, फिर स्वीच बोर्ड के सभी बटन को आँन कर दिया। फिर तो झबाका हुआ और पूरी फ्लैट रोशनी से नहागयी।

लेकिन वह कुछ मिनटों तक ऐसे ही हॉल में खड़ा रहा, शायद खुद पर नियंत्रण करने की कोशिश कर रहा था,....क्योंकि लवण्या से मिलने के बाद उसको जो खुशी हुई थी, उसने उसके शरीर में "बाईब्रेशन" पैदा कर दिया था। जिसकी धमक अब तक थी और उसकी धमनियां अभी तक कंपित हो रही थी। ऐसे में जब उसे थोड़ी शांति महसूस हुई, वह किचन में जाकर अपने लिए गरमागरम काँफी बना लाया और हॉल में रखे सोफे पर बैठकर चुस्की लेने लगा।

....परंतु उसका मन तो कहीं और था,...."हां, लवण्या के पास"। तभी तो वो जबसे उससे जुदा हुआ था, उसके बारे में ही सोचे जा रहा था। उफ!....वह तो जिंदगी की त्रासदी से तंग ही हो चुका था, तभी उसको आज लवण्या मिला, “सावन के मीठे-मीठे शीतल फुहारों की तरह"।

 उसका यूं अचानक ही मिलना और वो अपने जीवन की सारी तपिश, सारे दुःख पल भर में ही भूल गया। आज जो अचानक ही उससे लवण्या मिली, लगा कि उसके जख्मों पर नर्म-नर्म मक्खन लग गए हो और उसे "परम शांति मिल गई हो"। 

बात सही भी था, क्योंकि लवण्या के बिना उसका जीवन अधूरा-अधूरा लगता था और जब वो मिल गई है,....."उसके जीवन में सतरंगी इंद्रधनुष अपने-आप सज कर निखर जाएंगे। सोचते-सोचते उसने काँफी खतम की, तभी उसके मन में खयाल आया कि लवण्या का मिलना महज संयोग ही नहीं। यह जरूर ईश्वर की असीम अनुकंपा है, जिसने मेरे विरह वेदना से द्रवित होकर ऐसे परिस्थिति बना दिया कि लवण्या "वर्षों बाद अचानक मिल गई।

इतनी बातें दिमाग में आते ही उसने ईश्वर को मन ही मन धन्यवाद कहा। सम्यक ईश्वर में सच्ची आस्था रखता था और उसे प्रतीत हो रहा था कि आज जो भी कुछ हुआ, वह ईश्वर की ही कृपा थी। अन्यथा तो ऐसे लवण्या का अचानक से मिल जाना, वर्षों बाद हुआ, जो कि महज संयोग नहीं हो सकता। 

यह तो उसके दिल को पता था कि "लवण्या की अहमियत उसके लिए कितनी थी"। वह तो कोई उससे पुछे कि उसके जुदा हो जाने पर न जाने कितनी रातों तक सम्यक ने जाग कर गुजारे थे। उसे लगने लगा था कि उसकी जिंदगी वीरान हो गई है। ऐसे में वह काँफी और पुस्तकों के टेबल तक सिमट कर रह गया था।....लेकिन अब लवण्या मिल गई है, तो ईश्वर कृपा से सब कुछ अच्छा ही होगा।

सम्यक ने काँफी खतम कर लिया था और यह सोचने के बाद कि "ईश्वर कृपा से सब कुछ अच्छा ही होगा “अपनी जगह से उठा और वाथरुम में चला गया। फिर दस मिनट बाद बाहर निकला, तो उसके बदन भीगे हुए थे, यानी कि उसने स्नान किया था। फिर तो वो पुजा रूम की ओर बढ़ा, उस रूम की ओर, जहां उसके बेचैन मन को शांति मिलती थी।

....पुजा रूम की सजावट बेहतरीन तरीके से की गई थी और उसमें एक छोटा सा मंदिर स्थापित था। जिसमें "भगवान राम" की प्रतिमा रखी हुई थी, जिनका कि सम्यक आराधना करता था। तभी तो उसने मंदिर के आगे दीप प्रज्वलित किए, अपने कपड़े बदले और फिर ध्यानस्थ मुद्रा में मंदिर के सामने बैठ गया और भगवान की आराधना करने लगा।

*********

रात के बारह बज चुके थे, जब सलिल पुलिस स्टेशन लौटा और कार पार्क होते ही अपने ऑफिस की ओर बढ़ गया, जबकि रोमील गिरफ्तार आरोपियों को लेकर लॉकअप की ओर बढ़ गया। सलिल ने ऑफिस में पहुंचते ही फ्रीजर खोला और ठंढा पानी की बोतल निकाल कर होंठों से लगा लिया।....फिर तो जब बोतल खाली हुआ, तब ही उसके होंठों से हटा।

फिर वो अपनी सीट पर आकर बैठ गया और रोमील का इंतजार करने लगा।....वैसे ही लगातार तीन रातों तक जागरण करने के कारण उसकी आँखें लाल थी। उसके चेहरे पर थकावट के चिन्ह थे और इसी इंतजार में था कि रोमील आए, तो वो चैन की निंद ले सके। लेकिन रोमील का अता-पता नहीं था, ऐसे में वो सोचने लगा कि आखिर इस मामले पर नियंत्रण किस प्रकार से करें। 

वैसे भी उसे कल कई काम निपटाने थे और साथ ही पुलिस मूख्यालय जाकर बाँस से भी मिलना था।.....आखिर तीसरी हत्या हो चुकी थी और अब बाँस आगे क्या आदेश करते हैं, जानना था।

सलिल अभी सोच ही रहा था कि तभी ऑफिस के गेट पर पदचाप उभड़ी।.....रात के समय कौन हो सकता है? सलिल सोच ही रहा था कि तभी ऑफिस गेट पर मृदुल शाहा जिन्न की तरह प्रगट हो गए और फिर तो सलिल हड़बड़ा कर उठ खड़ा हुआ और इतना ही नहीं जोड़दार सैल्यूट दिया। 

लेकिन शाहा ने उसके सैल्यूट की कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और आगे बढ़ कर कुर्सी पर बैठ गए।.....उनके बैठते ही सलिल भी बैठ गया, तब तक रोमील भी आ चुका था और सैल्यूट देने के बाद बैठ गया। किन्तु ऑफिस में शांति छाई रही, न तो एस. पी. साहब ने बात की शुरुआत की और न सलिल एवं रोमील बोलने की हिम्मत कर सके।

ऐसे में ऑफिस में शांति छा गई, सर्द खामोशी कि अगर सुई भी गिरे, तो जोरदार धमाका हो। समय तेजी से आगे की ओर भागा जा रहा था और इसी के साथ सलिल की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। वो सोच रहा था कि बात की शुरुआत हो,.....लेकिन किस प्रकार से? वह जानता था कि अगर उसने सामने से कोई बात अगर कह दी, जानता था कि गलत प्रतिक्रिया भी हो सकती थी। 

वह जानता था अपने बाँस के स्वभाव को, इसलिये चुप रहने में ही भलाई समझता था।.....जबकि रोमील,....वो तो जानता था कि दो-दो सीनियर अगर सामने हो, वहां चुप्पी साधने में ही भलाई है। परंतु ऑफिस की चुप्पी ज्यादा देर तक कायम नहीं रह सकी, क्योंकि एस. पी. साहब ने चुप्पी तोड़ी और गंभीर होकर बोले।

सलिल.....आगे क्या करना है? इसका ब्लू-प्रिंट है तुम्हारे दिमाग में?

नहीं तो सर,.....वैसे अभी मैंने इस बारे में सोचा ही नहीं है।  एस. पी. साहब की बातें सुनकर सलिल ने तत्परता के साथ जबाव दिया। जबकि उसके उत्तर सुनकर एस. पी. साहब मुस्कराए, फिर बोले। 

तो सुनो,....सबसे पहले तो तुम तांत्रिक भूत नाथ के पास चले जाना और उसको लेकर "होटल" चले जाना। वहां पर मीडिया वाले पहले ही पहुंच चुके होंगे। उसके बाद पोस्टमार्टम रिपोर्ट लेने के लिए हाँस्पिटल जाना और वहां से सीधे मेरे पास पहुंचना।

यश सर!......एस. पी. साहब ने जैसे ही अपनी बात खतम की, सलिल ने तत्पर होकर बोला। लेकिन एस. पी. साहब ने शायद उसकी बात सुनी नहीं। वे पूर्ववत ही गंभीर होकर आगे बोले।

और सुनो,....पोस्टमार्टम की रिपोर्ट किसी हालत में मीडिया बालों के हाथ नहीं लगने चाहिए, इस बात का ख्याल खासकर रखना।

इसके बाद एस. पी. साहब उसे आगे की योजना समझाने लगे। सलिल उनकी बातों को ध्यान पूर्वक सुन रहा था और जहां उसे लग रहा था कि कमी है, वो अपनी शंकाओं को बता रहा था।.....एस. पी. साहब शांत होकर उसके शंका का समाधान करते जा रहे थे और जब उन लोगों के बीच बातचीत खतम हुई, रात के एक बज चुके थे।.....ऐसे में एस. पी. साहब ने वहां से विदा ली, जबकि उनके जाने के बाद सलिल सोचने लगा कि उसका बाँस कितना " काईंया" है। 

उन्होंने मीडिया बालों को उलझाने के लिए ही "तांत्रिक भूत नाथ" को इस केस में एंट्री करवाया था। सलिल समझता था कि "तांत्रिक भूत नाथ" के एंट्री ने इस केस में ट्वीस्ट उत्पन्न कर दी थी। ऐसे में पब्लिक और मीडिया, दोनों को इसमें ही उलझ जाना था और पुलिस को इस केस को साँल्व करने में अधिक समय मिलना था।

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एस. पी. साहब के जाने के बाद सलिल गहरी निंद में सोया था और इसके कारण ही उसको राहत की अनुभूति हो रही थी। उसने देखा कि रोमील के चेहरे पर भी ताजगी थी और उस ताजगी को देखकर समझ गया था कि उसके सोने के बाद वह भी सो गया होगा। अब तो सुबह हो चुका था, इसलिये सलिल अपनी सीट से उठा और बाहर निकला। उसका बाहर निकलना और रोमील ने उसका अनुसरण किया।

फिर दोनों बाहर निकले, कार में बैठे और कार श्टार्ट होकर पुलिस स्टेशन से बाहर निकली और सड़क पर दौड़ने लगी। ऐसे में ड्राइव करते हुए सलिल ने रोमील की ओर देखा, उसके कान में लीड लगी थी और आँखें बंद थी। शायद वो गीत सुनने में मस्त था, ऐसे में उससे बात करने का कोई मतलब नहीं था। 

इसलिये उसने ड्राइव पर ध्यान केंद्रित की और सोचने लगा कि आगे क्या करना है?....वो जानता था कि अगर थोड़ी सी भूल-चुक हो गई, तो मामला बिगड़ भी सकता था। मामला संगीन था, ऐसे में संभल-संभल कर कदम उठाने की जरूरत थी। किन्तु.....सलिल जानता था कि मामला ही ऐसा है, जो धोखा दे सकता है। 

सुबह के समय, चारों तरफ नव प्रभात किरणों से जगमग कर रहा था। सुबह का समय होने के कारण हर तरफ ताजगी महसूस हो रही थी। सड़क पर सुबह-सुबह दौड़ती गाड़ियां और किनारे पैदल चलते लोग, लगता था कि "दिल्ली जग कर सड़क पर उमड़ आया हो। ऐसे में सलिल को भी "ताजगी पाने के लिए" काँफी की जरूरत महसूस हुई और उसने टी-स्टाल के सामने गाड़ी खड़ी कर दी। फिर तो दोनों ने वहां पर काँफी पी और फिर सफर पर चल पड़े और पहुंच गए तांत्रिक भूत नाथ के पास। 

जब दोनों ने झोंपड़े में कदम रखा, देखा कि आसन पर बैठा हुआ भूत नाथ गेट की ओर ही टकटकी लगाए देख रहा था। ऐसे में भूत नाथ का आदेश मिलते ही दोनों रखी कुर्सियों पर बैठ गए। तब बोलने को उत्सुक रोमील बोल ही पड़ा।

स्वामी जी!

हां बोलो वत्स!.....रोमील की बातें सुनकर स्वामी भूत नाथ ने तत्काल प्रतिक्रिया दी। जिसे सुनते ही रोमील तत्काल बोल पड़ा।

स्वामी जी!.....हम लोगों ने अंदर आते हुए देखा कि आप गेट की ओर ही देख रहे थे, शायद हम लोगों के आने का ही इंतजार कर रहे थे? रोमील ने प्रश्न पूछा और अपनी नजर भूत नाथ पर टिका दी। जबकि उसके इस प्रकार से बात करने पर सलिल की भँवें तनिक चढी,....परंतु देखने के बाद भी रोमील  ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया। जबकि उसके प्रश्न सुनकर तांत्रिक भूत नाथ ने मंद-मंद मुस्करा कर कहा।

हां, जरूर ऐसा ही है!.....मैं आप लोगों की राहें ही देख रहा था। बोलने के बाद भूत नाथ थोड़ी देर के लिए रुका, फिर आगे बोला। बात ही कुछ ऐसी है, क्योंकि जब से मैं होटल से लौटा हूं, थोड़ा उलझन में हूं। बोलने के बाद भूत नाथ मौन हो गया, जबकि उसकी बातें सुनकर सलिल चौंककर बोला।

बात ही ऐसी है,....से आपका क्या मतलब है? आप कहना क्या चाहते है, स्पष्ट कहें?

कहने की बात बस इतनी है कि जब से मैं होटल से लौटा हूं, लग रहा है कि कुछ अनिष्ट होने वाला है। कोई ऐसी शक्तिशाली आत्मा है, जिसकी छवि स्पष्ट नहीं हुई है। सलिल के बातों के उत्तर में भूत नाथ बोला, फिर अपनी बातों की प्रतिक्रिया को सलिल के चेहरे पर देखने के लिए रुका, इसकेबाद बोला। जहां तक मेरा अंदाजा है कि इस आत्मा को नियंत्रित करने के लिए बहुत बड़ा अनुष्ठान करना होगा, वह भी शीघ्र।

तो....आप चाहते क्या है? भूत नाथ की बातें सुनकर चौंक कर बोला सलिल, जबकि उसके चौकने के प्रतिक्रिया स्वरूप भूत नाथ के होंठों पर फिर मुस्कान उभड़ी, जिसे रोक कर वो बोला।

मिस्टर सलिल, चाहना मुझे नहीं बल्कि आपको है। आप अनुष्ठान की तैयारी करवाइए, फिर देखिए कि "वारदात" किस प्रकार से रुकता है। बोलने के बाद भूत नाथ ने चुप्पी साध ली।

सलिल उसके प्रतिक्रिया स्वरूप बोलना ही चाहता था, तभी वहां पर सुंदर सी युवती काँफी का ट्रे थामे हुए आई। उसने सभी के हाथों में कप थमाया और उलटे पांव लोट गई। उस युवती को देखते ही सलिल के दिमाग में आया कि भूत नाथ का जीवन कितना विलास पूर्ण है। 

कहने को तो वो एक तांत्रिक है, लेकिन अपनी सेवा में कमायनी सी सुंदर युवती को रखे हुए है। फिर भी दुनिया उसकी पुजा करती है, तभी तो उसका दुकान धड़ल्ले से चल रहा है। सोचते हुए सलिल ने अपनी काँफी खतम की और वहां रखे टेबल पर रखा। भूत नाथ और रोमील पहले ही काँफी पी चुके थे, ऐसे में अब वहां रुकने का कोई मतलब ही नहीं था।

तभी तो तीनों बाहर निकले और कार में बैठ गए। इस बार ड्राइव रोमील ने संभाल रखी थी। उसने कार श्टार्ट की और आगे बढ़ा दिया, लक्ष्य था "होटल सन्याल। कार रफ्तार से भागी जा रही थी, जबकि अंदर सन्नाटा पसरा हुआ था। इस सन्नाटे से रोमील ऊब चुका था, वो बात करना चाहता था, लेकिन भूत नाथ की मौजूदगी के कारण नहीं कर पा रहा था। 

फिर तो इसी सन्नाटे भरी चुप्पी में पूरा रास्ता निकल गया और कार होटल सन्याल के प्रांगण में जा लगी। इसके बाद तीनों कार से बाहर निकले और होटल बिल्डिंग की ओर बढ़ गए। तभी होटल प्रांगण में मीडिया बालों की भी गाड़ी आने लगी और जैसे ही भूत नाथ ने मीडिया बालों को देखा, उसमें गजब की फुर्ती आ गई।

इसकेबाद तीनों को उस रूम में पहुंचने में ज्यादा समय नहीं लगा, जिसमें बीती रात दुर्घटना घटित हुई थी। वहां पर पहले से ही पुलिस बालों द्वारा पुजा पाठ की तैयारी कर ली गई थी। इसलिये "भूत नाथ" जैसे ही वहां पहुंचा, तांत्रिक क्रियाओं को करने में जूट गया।

....जबकि सलिल ने देखा कि मीडिया वाले "तांत्रिक क्रिया कलापों का कबरेज कर रहे थे" ऐसे में उसका वहां रुके रहने का कोई मतलब नहीं था। इसलिये उसने मन ही मन फैसला कर लिया कि इस समय "होटल बिल्डिंग" की तलाशी लेगा। इसलिये वो रोमील के साथ उस रूम से बाहर निकला और होटल बिल्डिंग की तलाशी लेने लगा।

उसे आशा थी कि "कहीं कोई सबूत, जो कि अपराधी के द्वारा भूल बस वहां छूट गया हो, उसके हाथ लग जाए"। किन्तु उसके मनोकामना की सिद्धि नहीं हो सकी। उसने पूरे दो बार बहुत ही बारीकी से "होटल बिल्डिंग" की तलाशी ली,....परंतु उसके हाथ ऐसा कुछ नहीं लगा, जिसे वो सबूत कह सकता और अपराधी तक पहुंच पाता।.....ऐसे में वो निराश होकर वापस उसी रूम में लौट आया, जिसमें तांत्रिक क्रियाएँ हो रही थी। 

उसने देखा कि "मीडिया बालों की मौजूदगी के कारण" भूत नाथ कुछ ज्यादा ही उत्साहित था और शायद इसलिए ही वह मंत्रों को तनिक ऊँचे स्वर में उच्चारण कर रहा था और मीडिया वाले भी "उस तांत्रिक अनुष्ठान" को कबरेज करने में अच्छी-खासी दिलचस्पी ले रहे थे और यह जानना सलिल के लिए आश्चर्य से कम न था।

वह अच्छी तरह से जानता था कि ये जो तांत्रिक क्रियाएँ करवाई जा रही है, बस मीडिया बालों और जनता का ध्यान भटकाने के लिए। अन्यथा वो अच्छी तरह से जानता था कि इस केस में भूत-प्रेत जैसी कोई बात नहीं है। हां, ये केस जरूर इस तरह से उलझा हुआ था कि किसी को भी "पहली नजर में ही" भूत-प्रेत की करामात लगे।

.....इस बात की पुष्टि आज पोस्टमार्टम रिपोर्ट करने वाली थी, सलिल यह भी अच्छी तरह से जानता था। फिर भी तांत्रिक भूत नाथ ने अघोरी माया फैलाने में कोई कोर- कसर नहीं छोड़ी थी। वह तांत्रिक साधना का इस तरह से प्रयोग कर रहा था, मानो भूतों ने ही हत्याएँ की है और अब वो उसे पकड़ लेगा।

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अपने ऑफिस में लौटते-लौटते सलिल को दस बज गए। करीब दस बजे वह अपने ऑफिस में पहुंचा और पहुंचते ही चौंक गया। उसने जैसे ही ऑफिस में कदम रखा, अपने टेबल पर रखे हुए लिफाफे को देखकर उसे चार सौ चालीस बोल्ट का झटका लगा। 

बात ही कुछ ऐसी थी, टेबल पर कोर्ट का शील बंद लिफाफा रखा हुआ था।  देखते ही सलिल की भँवें तन गई, फिर वो आगे बढ़ा और अपनी सीट पर बैठ गया, तब तक रोमील भी ऑफिस में कदम रख चुका था और उसकी भी नजर लिफाफे पर पड़ चुकी थी।

तब तक तो सलिल ने लिफाफे को उठाकर खोल लिया था और उसमें रखे हुए पेपर को निकाल कर पढने लगा था। जबकि रोमील अपनी सीट पर बैठ गया था और उसकी नजर सलिल के चेहरे पर टिक गई थी। उसके मन में उत्कंठा जग रही थी कि आखिर उस पेपर में क्या लिखा है?

.....इसलिये वो सलिल के चेहरे को गहरी नजरों से देख रहा था। साथ ही उसके मनोभाव को पढने की कोशिश कर रहा था, किन्तु उसमें सफलता नहीं मिल रही थी।.....क्योंकि इस समय सलिल का चेहरा सपाट था, ऐसे में उसके चेहरे से उसके मनोभावों को पढना आसान नहीं था।

लेकिन उसे ज्यादा समय तक इंतजार नहीं करना पड़ा,.....क्योंकि सलिल ने "कोर्ट नोटिस" को पढ लिया था और अब उसने पेपर टेबल पर रख दिया और मोबाइल उठाकर बाँस को कॉल लगा दिया।....कॉल रिसीव होते ही सलिल मृदुल शाहा को बतलाने लगा कि किस प्रकार से नोटिस भेजा है। सलिल के बात करने से ही रोमील को पता चला कि इस मर्डर केस में "तांत्रिक भूत नाथ " की एंट्री का कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया है। 

कोर्ट को इस बात का जबाव चाहिए कि पुलिस इस प्रकार से अंध विश्वास का शिकार कैसे हो सकती है और मीडिया के साथ ही जनता को भ्रम में किस प्रकार से डाल सकती है? बस इसलिये ही इस केस में स्पष्टीकरण के लिए पुलिस को कोर्ट में दिन के बारह बजे लाइन हाजिर होने को कहा है। फिर रोमील ने सुना कि बाँस सलिल को समझा रहे थे कि आगे क्या करना है।

इसके बाद सलिल ने फोन कॉल डिस्कनेक्ट किया और अपनी सीट से उठकर बाहर निकला। फिर क्या था,.....रोमील ने उसका अनुसरण किया और फिर दोनों कुछ पल बाद ही स्काँरपियों में बैठे थे। 

कार ड्राइव रोमील कर रहा था, जबकि सलिल बगल में बैठा हुआ था। कार सड़क पर फूल रफ्तार से भागी जा रही थी। लेकिन ड्राइव करते हुए रोमील अपने विचारों में ही उलझा हुआ था और इन्हीं विचारों के जबाव पाने का इच्छुक था।.....परंतु किस प्रकार से? वह कैसे अपने बाँस से प्रश्न पुछे?.....क्योंकि वो जानता था कि उसकी जुवान तनिक भी इधर-उधर हुई,..."बाँस उसपर राशन-पानी लेकर चढ दौड़ेगा"। इसलिये मन ही मन वो खुद ही उलझन को सुलझाने की कोशिश कर रहा था, तभी सलिल अचानक ही बोला।

लगता है,....तुम कोर्ट के ही नोटिस पर उलझे हुए हो? सलिल ने प्रश्न पूछा और अचानक ही पुछे गए प्रश्न से रोमील चौंक कर बोला।

ज...जी सर!....मैं इस प्रश्न पर उलझा हुआ हूं कि अब आगे क्या होगा? रोमील गंभीर स्वर में बोला, फिर अपनी नजर ड्राइव पर टिका दी। कार सरपट सड़क पर दौड़ती जा रही थी। आगे-पीछे भागते गाड़ियों की लाइन और इस तरह से भागती हुई प्रतीत होती सड़कें।

रोमील....अब तो कोर्ट रूम में जाने पर ही पता चलेगा कि आगे क्या किया जा सकता है। वैसे अभी तो फिलहाल पोस्टमार्टम रिपोर्ट लेने के लिए हाँस्पिटल चलते है और वहां से सीधे मूख्यालय चलेंगे, बाँस के पास।

इतनी बात बोलने के बाद सलिल ने चुप्पी साध ली।....फिर तो रोमील की हिम्मत ही नहीं थी कि आगे कोई प्रश्न पुछ सके। बस उसने कार ड्राइव पर ध्यान केंद्रित कर दिया, जबकि सलिल, वो सोच रहा था कि आगे उसे क्या-क्या करना है। 

उसे अपनी कार्यवाही को आगे बढ़ाने के लिए सबसे पहले पोस्टमार्टम रिपोर्ट की जरूरत थी, इसलिये वो सरकारी हाँस्पिटल जा रहा था, डा. संजीव पाहूजा के पास। फिर वहां से निकलेगा, तो सीधे पुलिस मूख्यालय जाए और बाँस को रिपोर्ट सौंपेगा। उसके बाद बाँस से आदेश लेगा कि "कोर्ट नोटिस" पर किस प्रकार की कार्रवाई करनी है।

घर्र.....घर्रर।

सहसा अचानक ही कार झटके के साथ रुकी, जिसके कारण टायरों के घिसटने की आवाज से पूरा इलाका गुंज उठा और इस अचानक लगने वाले झटके से सलिल की तंद्रा भी टूट गई। फिर उसने देखा कि कार हाँस्पिटल के प्रांगण में खड़ी थी। 

इसलिये रोमील के साथ कार से उतरा और उधर बढ़ गया, जिधर डाक्टर संजीव पाहूजा की ऑफिस थी।.....मन में इस विचार को लिए हुए कि डाक्टर इस केस में क्या जानकारी देता है। बात भी तो वहीं टिकी थी, रिपोर्ट आने के बाद ही इस केस में आगे कार्रवाई संभव था। इसलिये तेज कदमों से चलता हुआ वह डाक्टर के ऑफिस में पहुंचा, तो देखा कि डाक्टर फाइलों में उलझा हुआ था। संजीव पाहूजा की नजर जैसे ही दोनों पर गई, बैठने के लिए इशारा किया और बैठ जाने के बाद उनकी ओर देखकर धीरे से बोला।

कहिए सर!.....आपकी क्या सेवा करुं? 

सेवा करने की जरूरत नहीं है डाक्टर साहब, बस आप मुझे पोस्टमार्टम रिपोर्ट दीजिए और इस केस के महत्वपूर्ण बिंदुओं को बताइए। डाक्टर की बातें सुनकर सलिल तपाक से बोला और फिर पाहूजा के चेहरे को व्यग्र नजरों से देखने लगा। उसकी बातें और चेहरे के हावभाव देखकर  को समझ कर डाक्टर पाहूजा के होंठों पर मुस्कान आ गई और फिर बोले।

लगता है सलिल सर......आप बहुत जल्दी में है, तभी तो व्यग्र हो रहे है?

हां डाक्टर साहब,.....बात ही कुछ ऐसी है। कोर्ट ने इस केस में संज्ञान ले लिया है और बारह बजे कोर्ट में भी पेश होना है। पाहूजा की बातें सुनकर सलिल पूर्ववत बोला, जबकि उसकी बातें सुनकर डाक्टर पाहूजा ने एक फाइल उसके हाथों में थमाया और बोला।

सर.....ये रही तीनों डेड बाँडी की पोस्टमार्टम रिपोर्ट। परंतु आश्चर्य की बात है कि इन तीनों हत्याओं में साइनाइड जहर का उपयोग हुआ है। किन्तु इससे भी बड़ी आश्चर्य की बात ये है कि इस हत्या में डेड बाँडी के शरीर से जो कांच निकला है,....वो ड्रेसिंग बोर्ड के शीशे का ही टुकड़ा है,.....है न आश्चर्य की बात। अपनी बातें बोलने के बाद पाहूजा ने अपनी नजर सलिल के चेहरे पर टिका दी और उसके आँखों में देखने लगा। जबकि उन्हें अपनी ओर देखता पाकर सलिल बोला।

डाक्टर साहब.....यह तो ठीक है, परंतु इसके आगे कोई खास बात? सलिल ने प्रश्न पूछा, जिसके जबाव में पाहूजा  एक पल मौन होकर कुछ सोचने लगा, फिर गंभीर होकर बोला।

नहीं सर,.....ऐसी बात नहीं है सर। उसमें भी अभी तक बिसरा कारिपोर्ट नहीं आया है, इसलिये इस विषय में ज्यादा कुछ नहीं बतला सकता।

बोलने के बाद पाहूजा ने मौन साध लिया। डाक्टर के मौन साधते ही सलिल समझ चुका था कि अब पाहूजा बात करने के मूड में नहीं है। इसलिये डाक्टर से विदा लेकर सलिल और रोमील वहां से निकले और कार में बैठते ही श्टार्ट करके आगे बढ़ा दी। फिर तो कार हाँस्पिटल गेट से निकलते ही सरपट दौड़ने लगी। 

इस दरमियान कार के अंदर चुप्पी छाई रही,.....क्योंकि सलिल बात करने के मूड में नहीं था और रोमील की हिम्मत नहीं थी कि बात की शुरुआत कर सके। ऐसे में बस कार के इंजन की आवाज ही कार में गुंज रही थी। फिर तो कार "पुलिस मूख्यालय " के प्रांगण में ही रुकी और गाड़ी के रुकते ही दोनों बाहर निकले और तेजी से एस. पी. साहब के ऑफिस की ओर बढे,....मन में जिज्ञासा के साथ ही भय को लेकर।

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दिन के बारह बजे।

रोहिणी कोर्ट का प्रांगण, हलचल होता हुआ, वहां हर एक को जल्दी थी। किसी को अग्रिम जमानत चाहिए था, इस कारण से वकीलों से उलझा हुआ था। तो किसी के केस तारीख की पेशी थी। ऐसे में कोर्ट रूम के बाहर वकील भी अपने-अपने सेटिंग में लगे हुए थे। अंदर कोर्ट रूम में अभी सन्नाटा पसरा हुआ था, क्योंकि लंच टाइम का ब्रेक जो हुआ था।

लेकिन वकीलों को इससे क्या? जिसकी चलती थी, वो अपने क्लाइंट से पैसे के लेन-देन के बारे में बातें कर रहा था। तो जिसकी चलती नहीं थी, वह क्लाइंट यानी कि मुल्ले की तलाश कर रहा था। अजीब सा हलचल मचा हुआ था चारों तरफ।....तभी कोर्ट रूम के मुख्य द्वार से सलिल की स्काँरपियों ने प्रवेश किया और पार्किंग में आ कर लगी।

..फिर तो सलिल एवं रोमील कार से बाहर निकले और वकील राघव जुनेजा के ऑफिस की ओर बढे।....उस राघव जुनेजा के ऑफिस की ओर बढे, जिनके बारे में कहावत थी कि वो "केस हारते नहीं"। ऐसे में दोनों चलते हुए जुनेजा के ऑफिस में पहुंचे और वहां पहुंचते ही चौंके।

.....उनके चौंकने का कारण भी तो विशिष्ट था, क्योंकि वकील जुनेजा, दुनिया से बेफिक्र होकर गहरी निंद में सोया हुआ था। उसके पैर टेबल पर रखे हुए थे और सिर कुर्सी पर टिकी हुई थी। सामने वीजिटिंग चेयर खाली ही थी, जिससे प्रतीत होता था कि उसके पास कोई काम नहीं हो।

.....परंतु ऐसी बात तो बिल्कुल भी नहीं थी, जुनेजा का तो सिर्फ नाम बिकता था। भरा-भरा गोल चेहरा, आँखों पर चश्मा, घुंघराले बाल और गठा हुआ शरीर, उसपर नीली आँखें और कड़क मूँछें। राघव जुनेजा की यही विशिष्ट पहचान थी। लेकिन उसमें एक खासियत थी कि वो बिना मतलब के केस हाथ में लेता ही नहीं था। इसलिये ही उसके ऑफिस में अनावश्यक भीड़ जमा नहीं होती थी।

उसे इस प्रकार से गहरी निंद में खोया हुआ देखकर सलिल और रोमील सकते में आ गए। उन्हें इस परिस्थिति में समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या करें। अगर उन्होंने जुनेजा को कच्ची निंद से जगा दिया और वो खामखा ही बुरा मान गया तो।

....सलिल जानता था कि इस बात की संभावना ज्यादा थी,....क्योंकि जुनेजा मूडियल इंसान था। ऐसे में सलिल उलझन में फंसा हुआ था कि अब क्या करें?....तभी ऑफिस में मृदुल शाहा ने कदम रखा और उन्होंने एक बार गहरी नजरों से राघव जुनेजा को निंद में खोए हुए देखा और मुस्कराए,...फिर ऊँचे स्वर में बोले।

मिस्टर जुनेजा.....अब निंद से जगो भी!....देखो, हम लोग आ चुके है। एस. पी. साहब ने कहा और उसकी प्रतिक्रिया भी हुई। जुनेजा की आँख खुल गई और जब उसने उन लोगों को खड़े देखा, हकबका कर संभल कर बैठ गया और खुद पर नियंत्रण करके बोला।

साँरी सर.....आप लोग आए और मैं सो गया था।.....आप लोग बैठिए न। बोलने के बाद जुनेजा एस. पी. साहब के चेहरे को देखने लगा। जबकि तीनों आगे और बैठ गए, तब मृदुल शाहा बोले।

मिस्टर जुनेजा.....इसमें साँरी कहने जैसी कोई बात नहीं है। मैं आपके व्यक्तित्व और कार्य करने के तरीकों से पूर्ण परिचित हूं। बोलने के बाद एस. पी. साहब एक पल के लिए रुके और जुनेजा के चेहरे को देखते हुए थोड़ा आगे झुके, फिर बोले। वैसे मिस्टर जुनेजा.....आप से बात की थी, उसी कार्यवाही के सिलसिले में हम लोग आए हैं।

नो टेंशन सर.....मैं हूं न, देख लूंगा। आप चिन्ता मत कीजिए और निश्चिंत रहिए। कोर्ट का तो काम ही है, फटी में टांग अड़ा देना,.....लेकिन हम वकील लोग है न उस समस्या के निवारण के लिए। एस. पी. साहब की बातें खतम होते ही जुनेजा तपाक से बोला।

फिर अचानक ही उसने कलाईं घड़ी को देखा, जो दिन के साढे़ बारह बजने की सूचना दे रही थी। बस जुनेजा अपनी सीट से उठकर ऑफिस से बाहर निकला और कोर्ट रूम की ओर बढ़ गया। तो तीनों ने भी जुनेजा का अनुसरण किया और वे लोग कोर्ट रूम में आ गए। कोर्ट रूम में पहुंच कर एस. पी. साहब ने देखा कि कोर्ट रूम की कार्यवाही शुरु ही होने वाली थी। 

दर्शक दीर्घा पूरी तरह से भर चुका था और वकील भी अपने-अपने सीट पर बैठ चुके थे। अतः एस. पी. साहब सलिल और रोमील के साथ राघव जुनेजा के बगल में बैठ गए। तभी जज वाय. एस. सिंन्हा ने कोर्ट रूम में कदम रखा और सभी ने उनका उठकर स्वागत किया, इसके बाद कोर्ट कार्यवाही की शुरुआत हुई और जज साहब ने स्वतः संज्ञान का नोटिस उठाकर बोला।

कोर्ट ने शहर में हो रहे तात्कालिक अपराध के संदर्भ में पुलिस को नोटिस दिया था, उसपर ही सुनवाई होनी है। तो .....पुलिस विभाग के तरफ से इस नोटिस का जबाव कौन देगा?.....जज साहब ने अपनी बात कही और नजर उठाकर कोर्ट रूम में देखा। जबकि उनकी बातें सुनने के बाद राघव जुनेजा अपनी जगह से उठा और आगे बढ़कर जज साहब के सामने पहुंचा,....फिर अपने शब्दों में दुनिया भर की मिठास भरकर बोला।

मिलार्ड....कोर्ट नोटिस का जबाव देने के लिए पुलिस विभाग द्वारा मुझे हायर किया गया है। बोलने के बाद जुनेजा ने अपने हाथों में थामी हुई फाइल को जज साहब की ओर बढ़ाया, फिर पूर्ववत बोला।....मिलार्ड!...पुलिस इन अंधविश्वास पर कभी भी विश्वास नहीं करता और न ही चाहता है कि " अंधविश्वास" का फैलाव जन मानस के बीच हो। 

तो फिर शहर में हो रहे अपराध पर "तांत्रिक भूत नाथ" को हायर करना और इस तांत्रिक क्रियाओं का मीडिया कबरेज करवाना? इसके मतलब क्या है? इसपर आप स्पष्टीकरण करेंगे। जुनेजा की बातें खतम होते ही जज साहब तनिक तल्ख लहजे में बोले। जबकि जुनेजा के चेहरे पर इन बातों की कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई हो जैसे, वो पूर्ववत ही बोला।

मिलार्ड!.....इस संदर्भ में पुलिस विभाग ने स्पष्टीकरण कर  दिया है, जो कि आपको दी गई फाइल में मौजूद है। बोलने के बाद जुनेजा एक पल के लिए रुका, फिर आगे बोला। मिलार्ड....जहां तक "तांत्रिक भूत नाथ" की बात है, तो कभी-कभी ऐसी परिस्थिति भी बन जाती है, कि न चाह कर भी हमें ऐसे कार्य करने पड़ते है, जिसे हम कभी स्वीकार नहीं कर सकते।

फिर भी.....मिस्टर जुनेजा,.....इस केस को सुलझाने की अपेक्षा पुलिस "तंत्र-मंत्र" का सहारा लेकर इस केस पर लीपा पोती- कर रही है। जो कि कानून की दृष्टि से अनुचित है और इसलिये कोर्ट पुलिस को आदेश देती है कि इस केस को जल्द से जल्द सुलझाए और इस केस में जो भी "अपराधी" है, उसे जकड़ कर कोर्ट के सामने पेश करें। जुनेजा की बात खतम होते ही जज साहब तल्ख लहजे में बोले और फिर वो नोट-पेड पर इस संदर्भ में आदेश लिखने लगे। 

ऐसे में जुनेजा समझ चुका था कि जज साहब आगे किसी भी बात को सुनने के मूड में नहीं है। अतः वह पलटा और कोर्ट रूम से बाहर निकल गया। उसे जाते देखकर एस. पी. साहब भी उसके पीछे-पीछे चल दिए। ऐसे में सलिल समझ चुका था कि यहां अब रुके रहने का कोई फायदा नहीं।  इसलिये वो रोमील के साथ कोर्ट रूम से बाहर निकला और कार के पास पहुंचा। 

फिर तो रोमील ने ड्राइविंग सीट संभाल ली, जबकि सलिल बगल वाली सीट पर बैठ गया। इस विचार में उलझा हुआ कि अब आगे क्या होगा?.....सवाल तो उसका सही ही था, परन्तु इसका उत्तर देने के लिए वो खुद ही जिम्मेदार था। अब वो बाँस से तो नहीं कह सकता था कि तंत्र क्रिया करवा कर आपने जान परेशानी में ला दी।

बाँस को तो जो करना था, उन्होंने कर दिया था।....परंतु इस उलझे हुए मामले को किस प्रकार से सुलझाना है, उसे ही सोचना था और प्रयास भी करना था। साथ ही नितांत जरूरी हो गया था कि "अपराधी" को जल्द ही पकड़ लिया जाए। 

अन्यथा कोर्ट और मीडिया बालों के सामने पुलिस की किरकिरी होने से कोई नहीं बचा सकता था और उसकी जिम्मेदारी भी उसके माथे ही आनी थी।....फिर बाँस के क्रूर चेहरे से टपकता हुआ आग। उफ!....सोच कर ही सलिल का रोम-रोम सिहर उठा। तब तक रोमील ने स्काँरपियों श्टार्ट करके आगे बढ़ा दी थी और गाड़ी ने सड़क पर आते ही फूल रफ्तार पकड़ लिया था।

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दोपहर के एक बजने को थे।

चौदह अक्तुबर, जैसा कि अमूमन होता है, इस महीने में गर्मी का असर खतम होने लगता है और ठंढी अपनी प्यारी सी दस्तक देती हुई प्रतीत होती है। तभी तो सम्यक अभी तक चादर ताने हुए सोया हुआ था। एक तो उसको सोने में ही रात के दो बज गए थे और दूसरी बात लवण्या से मिलने के बाद उसको शांति मिल गई थी। इसलिये गहरी निंद में खोया हुआ था। लेकिन कब तक? निंद की भी एक सीमा होती है और उससे ज्यादा चाहकर भी कोई नहीं सो सकता।

तभी तो सम्यक की आँखें खुल गई और जब उसने समय देखा, बेड पर उछल कर बैठ गया। उफ!. वह तो बहुत देर तक सोया ही रह गया। इतनी बात दिमाग में आते ही वो उठ खड़ा हुआ और वाथरुम में चला गया और जब वाथरुम से निकला,....काफी हद तक खुद को रिफ्रेश महसूस कर रहा था। 

इसके बाद तो किचन से अपने लिए काँफी बना लाया और फिर बेड पर बैठकर काँफी की चुस्की लेने लगा।....साथ ही सोचने लगा कि उसने बहुत दिनों से "पापा से बात नहीं की है"। सच ही तो था, जब से वह लवण्या से बिछुड़ा था, उसका तो जैसे संसार की सभी वस्तुओं से मोह भंग हो गया था। ऐसे में वो अपने पिता से भी दूरी बना चुका था।

 लेकिन अब नहीं, लवण्या से मिलने के बाद उसे रिश्तों की अहमियत समझ आ गई थी। वह समझ चुका था कि उसने गलती की है, अपने पिता के दिल को दुखा कर, जिसका अधिकार उसे बिल्कुल भी नहीं था। लेकिन कोई बात नहीं,.....वो अपने इस गलती को सुधार लेगा। 

वो आज ही अपने "पापा" से जाकर मिलेगा और उनसे अपने गलती की माफी भी मांग लेगा। वो जानता है कि उसके पापा उसको माफ भी कर देंगे, क्योंकि वह तो उनका लाडला बेटा है। सोचते-सोचते सम्यक ने अपनी काँफी खतम की और मोबाइल उठा कर देखा और आश्चर्य से उछला। क्योंकि लवण्या के सुबह से लेकर अब तक दस मिस कॉल थे।

क्या सोच रही होगी लवण्या?.....सहज ही उसके मन में प्रश्न उठा। प्रश्न उठना भी लाजिमी ही था, क्योंकि लवण्या उसे वर्षों बाद मिली थी,....ऐसे में उसके पहले कॉल को भी रिसीव नहीं कर सका। बात परेशानी की ही थी क्योंकि.....उसके इस हरकत से लवण्या परेशान हो गई होगी। 

न जाने उसके दिमाग में कैसे-कैसे विचार पनप रहे होंगे। .....लेकिन अब किया क्या जा सकता था, क्योंकि गलती तो हो-ही गई थी। इसलिये गलती सुधारने के लिए उसने लवण्या को फोन लगाया,....परंतु उधर तो घंटी जाती रही, लेकिन फोन नहीं उठाया गया। ऐसे में सम्यक पल भर में ही बेचैन हो गया और उसने नंबर दुबारा डायल कर दिया।

कॉल रिसीव हुआ,.....सामने लवण्या ही थी, तभी तो फोन लाइन पर उसकी खनकती हुई आवाज गुंजी। सामने लवण्या ही थी, तभी तो उसकी खनकती हुई आवाज सुनकर सम्यक का हृदय वाग-वाग हो उठा। इसके बाद तो लवण्या की थोड़ी शिकायत के बाद वे अलक- मलक की बातें करने लगे और शायद न जाने कब तक बातें करते, तभी सम्यक के मोबाइल पर दूसरा नंबर डिशप्ले हुआ। 

सामने हर्षित बहल थे, उसके पापा "हर्षित बहल"। उन्होंने बहुत दिनों बाद ही कॉल किया था, इस कारण से सम्यक ने लवण्या को फोन रखने को कहा और अपने पिता के कॉल रिसीव कर लिए।

पिता शब्द तो अतुल्य ममता के छाँव का एहसास है, जो कि अभिव्यक्ति करना नहीं जानता। परंतु.....इससे उसका महत्व कम नहीं होता। पिता दबंग भाव से आदेश दे सकता है, क्योंकि यह इस शब्द का मूल स्वभाव है, किन्तु प्रेम का भाव इसमें अदृश्य रुप से घुला होता है। 

तभी तो सम्यक के कॉल रिसीव होते ही उसके पिता का रोबीला स्वर गुंजा। लेकिन जैसे ही सम्यक की बातें सुनी, उसके पिता अपने शब्दों का रौब कायम नहीं रख सके,...."वे तो बच्चे की मानिंद रोने लगे"। भला रोते कैसे नहीं, सम्यक के अलावा उनका दुनिया में उनका था ही कौन? जिसे वे अपना कहते और वही सम्यक उनसे कटा-कटा सा रहता था।

ऐसे में उनके हृदय में वेदना तो रही ही होगी, तभी तो उनके होंठों से करुण क्रंदन फूट पड़ा। जिससे उनके हृदय में असह्य वेदना के घाव की अनुभूति सम्यक को भी हो गई।....वह कि कर्तव्य विमूढ़ हो गया और बस इतना ही कह सका कि पापा!.....मैं अभी आपके पास आ रहा हूं। 

इसके बाद उसने फोन डिस्कनेक्ट कर दिए। फिर बेड पर से उठा और ऐसे कपड़े पहनने लगा, जो कि उसके व्यक्तित्व को मैच करें।....पूर्ण रुप से तैयार होने के बाद सम्यक अपार्ट मेंट से बाहर निकला, मुख्य गेट को लॉक किया और अपनी इनोवा कार में जा बैठा और फिर कार को श्टार्ट करके सड़क पर दौड़ा दी,.. "लक्ष्य था अमरावती बिला"।

वह बिला जो उसका निवास स्थान था और जिसमें उसके पिता रहते थे। सम्यक कार को सड़क पर आने के बाद फूल रफ्तार में आगे दौड़ाने लगा। साथ ही उसने म्यूजिक सिस्टम आँन कर दी।....जिससे कार में मधुर संगीत गुंजने लगी और उस संगीत को सुनकर सम्यक अपने-आप को तरोताजा महसूस करने लगा। सही ही तो था,....बहुत दिनों बाद उसके हृदय पटल पर खुशियों ने दस्तक दी थी। 

ऐसे में वो इस समय का भरपूर आनंद उठाना चाहता था।....तभी तो उसकी आँखें ड्राइव पर टिकी जरूर थी,.....किन्तु वो गाने के धुन पर झूमता जा रहा था। दिल्ली की सड़क, दिन के दो बजे थे, ऐसे में ट्रैफिक की रफ्तार थोड़ी सी थमी थी।

लेकिन ड्राइव करते हुए सम्यक चौंका, उसके चौंकने का कारण भी तो था। एक काले रंग की मर्सिडीज उसके कार के आगे तेजी से निकली और फूल रफ्तार में आग चलने लगी।.....लेकिन यह उसके चौंकने का कारण बिल्कुल भी नहीं था, क्योंकि ऐसा होना तो आम बात था। 

गाड़ियां अकसर ही टेकओवर करके आगे निकलती रहती है।.....सम्यक तो चौंका इसलिये था कि उसने मर्सिडीज पर जिसे ड्राइव करते हुए देखा था, "उस चेहरे को कभी भी भूल नहीं सकता था"। हां, आगे निकलने वाली कार के ड्राइविंग सीट पर उसने "गर्वित सक्सेना" को देखा था और यह उसकी भूल नहीं हो सकती थी। वह तो लाखों में भी.....गर्वित को पहचान सकता था।

हां, वो गर्वित ही था! इतनी बात ध्यान में आते ही सम्यक ने भी अपनी कार की रफ्तार बढ़ा दी। वो गर्वित से मिलना चाहता था,....उससे पुछना चाहता था कि वो अभी कहां पर है और क्या कर रहा है?....उसे गर्वित के तत्काल के हालात के बारे में जानना था। इसलिये नहीं कि गर्वित ने उसके साथ धोखा किया था, “उसके प्रेम पर डाका डाला था”। उसे तो बस उससे मिलकर इतना ही जानना था कि "आजकल वो खुश है कि नहीं"। वैसे सम्यक को विश्वास था कि इस प्रकार के इंसान कभी भी खुश नहीं रहते।....क्योंकि उनकी स्वच्छंद मानसिकता उन्हें चैन से जीने ही नहीं देती।

जिनका जीवन चरित्र इस प्रकार का होता है, वे "आभासी सुख की तलाश में दर-दर भटकते है"। उनकी अंतरात्मा हमेशा ही अतृप्त रहती है और ऐसे लोग दूसरों को तो तकलीफ पहुंचाते ही-है, खुद भी दर्द सहने को विवश होते है। इसलिये ही सम्यक गर्वित से मिलना चाहता था कि वो उसके वर्तमान के बारे में जान सके। 

वैसे तो लवण्या ने जो उसके बारे में बतलाया था, उस से यही प्रतीत होता था कि सान्या सिंघला और गर्वित के रास्ते अलग-अलग हो चुके थे। बस इसी बातों की पुष्टि करने के लिए सम्यक "गर्वित" के कार के पीछे अपनी कार भगाए जा रहा था।

इस दरमियान उसने कितनी ही बार हौर्न बजा कर कोशिश की कि आगे वाली कार उसकी बातें समझे और रुके।.....परंतु लगा कि जैसे ही आगे वाले को यह अनुभव हुआ कि पीछे की कार द्वारा उसका पीछा किया जा रहा है,....मर्सिडीज की रफ्तार भी बढ़ गई। 

फिर तो दोनों कार में होड़ सी लग गई आगे दौड़ने की। समय आगे की ओर बढ़ता जा रहा था और उसी रफ्तार से दोनों कार भी सड़क पर भागती जा रही थी। सम्यक की कोशिश यही थी कि किसी भी तरह से अगली कार के करीब पहुंच जाए और....उस कार में बैठे शख्स से मिल ले।

...किन्तु उसकी यह इच्छा असंभव सी प्रतीत होने लगी,....क्योंकि धीरे-धीरे दोनों कार का फासला बढ़ने लगा और फिर आगे की कार आँखों से ओझल हो गई।....फिर तो सम्यक ने काफी कोशिश की, परंतु "मर्सिडीज" सड़क से गधे के सिंग की तरह गायब हो गई। सम्यक बेचैन हो गया,....उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि अगली कार को जमीन निगल गई, या आसमां। ऐसे में उसने कार को "अमरावती बिला" की ओर मोड़ दिया।

*************

मर्सिडीज को वह युवक आगे की ओर सरपट भगाए जा रहा था।हां, वह गर्वित सक्सेना ही था, जो कि सम्यक के आँखों से बचाकर कार को निकाल तो लाया था। परंतु उसके चेहरे पर खौफ स्पष्ट देखा जा सकता था। उसका सुंदर चेहरा पसीने से लथपथ था। 

आज तो उसे लगा था कि वो सम्यक के जाल में फंस ही गया,....अगर उसने समय रहते फुर्ती नहीं दिखाई होती, तो वास्तव में फंस चुका होता।....लेकिन जो फंस जाए, वो गर्वित सक्सेना नहीं हो सकता।....वैसे तो गर्वित की सम्यक के साथ कोई जातिगत अदावत नहीं थी....किन्तु फिर भी वो सम्यक का सामना करने से डरता था।

उसे बस इसी बात का खौफ था कि कहीं सम्यक उससे यह न पुछ बैठे कि "तुमने लवण्या को मुझसे छीन तो लिया, परंतु उसका साथ क्यों नहीं निभासके"? बस एक यही सवाल और वो निरुत्तर हो जाता। क्योंकि उससे भूल तो हुई थी और अब समय भी नहीं था कि अपने भूल को सुधार ले।

....वैसे भी प्रेम तो विश्वास के आधार पर टिका होता है और इसमें जैसे ही स्वार्थ आ जाए, प्रेम विकृत हो जाता है। वह अपना वास्तविक रुप और माधुर्य खो देता है। यही तो गर्वित के द्वारा भी किया गया था, तब वो अपने भूल को किस प्रकार से सुधार सकता था। कहते है न कि समय के कमान से चुक रुपी वाण निकल जाता है, तो वो इंसान के आनंद को वेधकर ही लौटता है।

बस इसलिये ही तो गर्वित अपने जान- पहचान बालों से खुद को बचाए रखता था।....क्योंकि उसमें इतनी हिम्मत ही नहीं थी कि वो सत्य का सामना कर सके।....सत्य का सामना करने के लिए हिम्मत और धैर्य दोनों ही चाहिए। क्योंकि इस परिस्थिति में आपको पता ही नहीं होता कि आगे किन परिस्थितियों का निर्माण हो सकता है। फलस्वरूप ज्यादातर व्यक्ति इन परिस्थिति से बचना ही चाहता है और "गर्वित भी उन्हीं व्यक्तियों में था। तभी तो सम्यक का सामना करने की बजाए खुद को बचाकर निकल आया था।

...फिर भी उसके मन को तसल्ली नहीं थी कि वो बचकर आ गया है, इसलिये बार -बार पीछे मुड़ कर देख लेता था कि सम्यक की कार तो पीछे नहीं है।

आखिरकार करीब काफी दूर निकल आने के बाद भी जब सम्यक की कार नहीं दिखी, वह निश्चिंत सा हो गया।....फिर उसने रुमाल निकाल कर अपने चेहरे पर छलक आए पसीने को पोंछा और शांत मन से ईश्वर को धन्यवाद देने लगा।

....हां, यह ईश्वर की ही तो कृपा थी, नहीं तो आज सम्यक से उसका सामना हो ही जाता और उसमें इतनी भी सामर्थ्य नहीं थी कि "सम्यक से नजर भी मिला पाता। लेकिन खतरा भी टल चुका था और अब गर्वित भी सामान्य हो चुका था। उसकी उखड़ी हुई सांसे सामान्य हो गई थी और उसने ड्राइव पर अपने ध्यान केंद्रित कर दिया था।

साथ ही उसे याद आ चुका था कि उसकी तो वाइन "फेनी" भी खतम हो चुकी है और उसे तो रात बिताने के लिए शराब चाहिए ही।....उसने जैसे खुद ही मन ही मन खुद को समझाया कि "फेनी नहीं है तो क्या हुआ, वोडका खरीद लेता हूं"। इतनी बातें सोचते ही उसने कार की रफ्तार धीमी की, अपनी चौकन्नी नजर के साथ कि कहीं "आगे-पीछे पहचान वाला तो नहीं"। 

फिर एक वाइन शाँप के सामने उसने कार रोक दी, कार से बाहर निकला और दुकान की तरफ बढ़ा और जब लौटा, " उसके हाथों में " वोडका" की पूरी कार्टन ही थी। जिसे उसने कार की पिछली सीट पर रखा और फिर ड्राइविंग सीट पर आकर बैठ गया। इसके बाद फिर से उसने चारों तरफ देखा कि "कोई देख तो नहीं रहा"।

इसके बाद तो उसकी नजर स्वतः ही कलाईं घड़ी पर चली गई, जो कि दोपहर के तीन बजने की सूचना दे रही थी और जैसे ही उसने समय देखा, बौखला गया। उफ!.....बहुत देर हो चुकी है उसे अपने फार्म हाउस से निकले, अब तक तो उसे वहां पर पहुंच जाना चाहिए था। 

गर्वित होंठों में बुदबुदाया, जैसे कि खुद को सुना रहा हो। फिर तनिक ऊँचे स्वर में बोला। पर हमें कहां पता था कि "सम्यक से इस तरह मुलाकात हो जाएगी और उसे खुद को बचाने के लाले पड़ जाएंगे। इतनी बातें बोलने के बाद गर्वित ने कार श्टार्ट की और आगे की ओर बढ़ा दिया।.....फिर तो उसकी कार दिल्ली की बीजी सड़क पर सरपट दौड़ने लगी।

और करीब बीस मिनट बाद ही उसकी कार ने जंगल में प्रवेश कर लिया और फार्म हाउस "चंद्रिका वन" के अहाते में जा लगी। इसके बाद तो उसने देरी नहीं की, शराब की कार्टन को उठाकर अंदर ले गया और जब हॉल में वापस लौटा, वोडका की बोतल और गिलास लिए था। फिर तो सोफे पर बैठने भर की देर थी और जाम बनने लगे, लगा कि उसे शराब की जोड़ो की तलब जगी हो। 

हां, उसको तलब ही तो लगी थी, तभी तो लगातार तीन पैग उसने हलक में उतार लिए। शराब उसके अंदर पहुंची और वो थोड़ी देर के लिए रुका और फिर चरस की पुड़िया और चिलम निकाल ली। लगा कि जैसे उसे शराब और चरस की काँकटेल नहीं मिले, उसके हृदय को सुकून ही नहीं पहुंचेगा।

उसका "चरस" को आराम से बनाना और चिलम में भरना और होंठों से लगाकर सुलगा लेना, फिर तो उसके द्वारा लिया गया लंबा कश। हॉल में धुएँ का गुबार भर गया, काले-काले धुएँ के बादल। लेकिन वो यहीं तक नहीं रुका, तब तक कश खिंचता रहा, जब तक कि चिलम खाली नहीं हो गई। इसके बाद तो परम शांति.....हां, उसके चेहरे पर शांति की अनुभूति स्पष्ट दिखने लगी। 

लेकिन कब तक?....सहसा ही उसे जैसे कुछ याद आया हो, उसने लैपटाप निकाल लिया और उसके की-बोर्ड पर अंगुलियां चलाने लगा। लैपटाप पर काम करते समय उसके चेहरे पर गंभीरता विराजमान हो गई थी। वो तेजी से अपने कार्यों का संपादन करता जा रहा था और फिर उसने लैपटाप बंद करके साइड में रख दिया। प्याले में शराब उड़ेली और होंठों से लगा कर गटक गया फिर उठकर बाहर की ओर निकला।

बाहर आकर उसने स्वीमिंग पुल के एक चक्कर लगाए और "छपाक" से स्वीमिंग पुल में कूद गया। ठंढे पानी से जैसे ही उसका बदन भीगा, वह तैरने लगा और पल-प्रति पल उसकी रफ्तार बढ़ने लगी। गर्वित ऐसे ही स्वीमिंग पुल में घंटों तक तैरता रहा और फिर बाहर निकला। 

भीगा बदन, जैसे कि कमल दल पर पानी की बुंदे। उसकी सुंदरता पानी के स्पर्श से और भी निखर चुकी थी। परंतु उसे तो जैसे इन चीजों से कोई मतलब ही नहीं हो, तभी तो चलता हुआ हॉल में पहुंचा और पल भर में ही अपने कपड़े बदल लिए। इसके बाद किचन में गया और अपने लिए पनीर भुजी उठा लाया। 

शायद उसे तेज की भूख लगी थी, तभी तो उसने प्लेट टेबल पर टिकाई और सोफे पर बैठ गया। लेकिन बिना शराब के, मजा ही नहीं आएगा उसे, तभी तो फिर से वो अपने लिए पैग तैयार करने लगा। जाम को हाथ में थामा और तभी "बिल्डिंग की लाइट जलने- बुझने लगी" साथ ही तीव्र संगीत के साथ स्वर गुंजने लगा, "रति संवाद-रति संवाद"। उफ!.....इस शब्द ने तो जैसे उस पर कहर ढाया हो, थोड़े पल पहले कूल दिखने वाला गर्वित अचानक ही बेचैन हो गया। 

उसकी सांसे तेज-तेज चलने लगी और उसके हाथ से जाम छूट गया। फिर तो.... उसने तनिक भी देर नहीं लगाई और सोफे से उछल कर खड़ा हो गया, जैसे उसमें स्प्रिंग लगे हो। इसके बाद उसने अपनी मोबाइल ढूंढी और कॉल रिसीव किया और इसके साथ ही थोड़े पल पहले बेचैन दिखने वाला गर्वित शांत हो गया।

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कोर्ट से निकलने के बाद सलिल संजीव पाहूजा के पास गया था और वहां डाक्टर से इस केस के बारे में विचार- विमर्श किया था। साथ ही उसे "डेड बाँडी" को उनके परिवार को भी सुपुर्द करना था। इसलिये उसे इस काम को निपटाने में काफी समय लगे। इसके बाद वो अब यानी दिन के तीन बजे हाँस्पिटल से निकला था और इस समय स्काँरपियों मैं बैठा हुआ था। स्काँरपियों ड्राइव कर रहे रोमील की नजर करीब-करीब उसपर ही टिकी हुई थी। वह चाहता तो था कि बात की शुरुआत करें, परंतु उसके अंदर हिम्मत की कमी थी।

वैसे भी सलिल थक चुका था और आगे भी उम्मीद नहीं के बराबर ही थी कि आराम मिल पाएगा। इसलिये वो थोड़ी देर के लिए शांत होकर इस केस पर मंथन भी करना था।....साथ ही अभी तो बाँस के पास जाना था और पता नहीं कि बाँस किस बात की खुन्नस निकाल ले। इसलिये सलिल ने आँखें बंद कर ली और सोच में डूब गया। जबकि रोमील अपनी भावनाओं को मन में दबाए ही ड्राइव करता रहा और कार दिल्ली की सड़क पर सरपट दौड़ती रही। रोमील इतना तो समझता था कि उसका बाँस ताजा बने हालात में उलझा हुआ है और उसी विषय पर मनोमंथन कर रहा है।

बात सही ही था, सलिल मनोमंथन ही तो कर रहा था, इन विषयों पर। किस प्रकार से इस केस में एक के बाद एक घटना क्रम बदला था और कैसे एक-एक कर तीन हत्याओं को अंजाम दे-दिया गया था। फिर भी इस केस की गुत्थी" उलझी की उलझी ही थी" और वो दावे के साथ कह सकता था कि इस केस को जल्द सुलझा कर अपराधी को पकड़ा नहीं गया, तो शहर में हत्याओं का सिलसिला रुकने वाला नहीं है। 

ऐसे में पुलिस विभाग की सिरदर्दी और बढेगी,....फिर तो मीडिया कुछ भी कर जाए, कम ही होगा।....वैसे भी मीडिया वाले पुलिस से खार खाए रहते है और उसपर टी आर पी का स्वार्थ। बस पुलिस बालों की वर्दी पर इतना कीचड़ उछालेंगे कि जीना मुश्किल हो जाएगा।

बस यही नहीं चाहता था सलिल और इसलिये सोच रहा था कि वो क्या करें? जिससे जल्द ही अपराधी की गर्दन उसके गिरफ्त में हो। परंतु उसे कोई उपाय नहीं सूझ रहा था। उसे उपाय सूझता भी तो कैसे? अभी तक तो सब सिर्फ अंधेरे में था,....यहां तक कि हत्याएँ क्यों की जा रही है? उस कारण को भी नहीं जानता था। ऐसे में "अपराधी को पकड़ कर अपराध पर शिकंजा कसना" भूसे के ढेर से सुई तलाशने के समान था। 

वस्तुस्थिति ऐसी थी कि सलिल उलझ कर रह गया था इस केस में, उसपर आफत ये कि उसके बाँस का तुगलकी फरमान। तभी तो कोर्ट रूम में पुलिस की आज बेइज्जती होते-होते रह गई थी। किन्तु इससे बाँस को क्या? उनका तो काम था आदेश देना, अब वो फंसेगा, तो बाँस सीधे हाथ खड़ा कर देगा।

अब तो परिस्थिति ऐसी बन गई थी कि सलिल को समझ ही नहीं आ रहा था कि वो क्या करें। वो उलझा हुआ था इन्हीं बातों में, तभी उसे सड़क पर आगे गेरुआ वस्त्रों में लिपटा कोई महात्मा जाता दिखा। बस सलिल ने रोमील को कार धीमी करने के आदेश दिए और महात्मा के करीब ले जाकर रुकवा दिया। 

उधर जैसे ही महात्मा ने महसूस की कि कोई कार उसके करीब रुकी है, महात्मा जी पलटे और एक पल के लिए सलिल की आँखें चुँधिया गई। माथे पर जटा का रुप लिए बाल, लंबा ललाट, जो चंदन से सुशोभित हो रहा था। लंबी दाढी, बदन पर गेरुआ वस्त्र और पैरो में खड़ाऊँ। भव्य व्यक्तित्व था महात्मा जी का। जिन्हें देखकर सलिल अभिभूत हुए बिना नहीं रह सका, जबकि महात्मा जी उसे देखकर मंद-मंद मुस्करा रहे थे।

इसके बाद तो सलिल ने महात्मा जी को कार में बैठने के लिए आग्रह किया और महात्मा जी बिना कोई प्रतिक्रिया दिए कार में बैठ गए।....बस रोमील ने गाड़ी आगे बढ़ा दी, परंतु सलिल, वह तो "महात्मा जी के व्यक्तित्व से काफी प्रभावित था"। ऐसे में वो समझ ही नहीं पा रहा था कि बात की शुरुआत किस प्रकार से करें और करें भी तो कहां से? लेकिन उसे अपने प्रश्नों में ज्यादा उलझना नहीं पड़ा, क्योंकि महात्मा जी शायद उसके मनोभाव को समझ गए थे। तभी तो उन्होंने सलिल के चेहरे को देखा और मुस्करा कर बोले।

बच्चा!.....तुम शायद इस उलझन में हो कि मेरे साथ किस  प्रकार से बात की शुरुआत करोगे? ......परंतु जब तक अपने मन के संशय खुलकर नहीं बताओगे, हल कहां से मिलेगा? बस तुम खुलकर अपने मन के संशय बतलाओ और फिर देखो, ईश्वर की कैसे कृपा होती है। महात्मा जी ने शांत एवं सुमधुर स्वर में कहा और फिर सलिल के चेहरे को देखने लगे, जबकि सलिल ने " महात्मा " जी के बात को सुनकर अपने अंदर हिम्मत को जुटाया, फिर गंभीर स्वर में बोला।

स्वामी जी!.....वैसे तो मैं आजकल के साधु-संतों की बातों पर विश्वास नहीं करता। किन्तु आपके व्यक्तित्व को देखा, तो बस अपनी आशंकाओं का समाधान चाहता हूं।

कोई बात नहीं बच्चा!....तुम तो बस अपनी शंका को बताओ। श्री हरि की कृपा हुई, तो मैं जरूर तुम्हारे शंका का समाधान दे सकूंगा। सलिल की बातें खतम होते ही महात्मा जी पूर्ववत बोले।....जबकि उनकी बातें सुनकर सलिल थोड़ा आश्वस्त हुआ, फिर बोला।

स्वामी जी!....बात कुछ इस तरह से है कि शहर में हो रहे "सीरियल हत्याकांड" से परेशान हूं। इस परिस्थिति में मुझे कोई रास्ता ही नहीं सूझता, तो क्या करूं? सलिल ने प्रश्न पूछा और अपनी नजर महात्मा जी के चेहरे पर टिका दी। जबकि महात्मा जी उसके प्रश्न सुनकर मुस्कराए, साथ ही उन्होंने सलिल की आँखों में आँख पिरोया और बिल्कुल शांत स्वर में बोले।

बच्चा!....श्री हरि इच्छा बलवान। वैसे न तो तुम पार्थ हो और न मुझमें "केशव" की झमता है कि मार्गदर्शन कर सकूं। फिर भी,....इतना तो कहूंगा कि तुम बस अपने पथ पर बढ़ते जाओ, तुम्हें जल्द ही सफलता मिलेगी।

स्वामी जी!....मैं आपकी बातों को समझ नहीं सका, कृपया स्पष्ट बताएँ। महात्मा जी की बातें सुनकर सलिल विकल होकर बोला। जिसे सुनकर महात्मा जी ने सहमति में सिर हिलाया और बोले।

बच्चा!.....इस होते हुए अपराध को रोकने की न तो क्षमता तुम में है और न ही समय में। क्योंकि जो होना है, वो घटित होकर रहेगा। लेकिन मैं इतनी बातें दावे के साथ कह सकता हूं कि बस आज की रात एक और हत्या और कल अपराधी तुम्हारे कब्जे में। लेकिन छवि कुछ धुंधला सा है, इसलिये स्पष्ट नहीं कि अपराधी तुम्हें जिंदा मिलेगा या नहीं।

बस इतनी बातें बोलने के बाद महात्मा जी ने चुप्पी साध ली। उनका इस प्रकार से मौन होना और सलिल आगे एक शब्द नहीं कह सका। फिर तो अंदर इंजन की ही आवाज गुंजती रही और फिर एक जगह महात्मा जी ने कार रुकवा दी और कार रुकते ही उतर कर एक तरफ को चले गए। उन्हें इस प्रकार से जाता हुआ सलिल चमत्कृत नजरों से देखते रहे और जब महात्मा जी नजर से ओझल हुए, सलिल की तंद्रा टूटी। 

फिर तो उसने रोमील को गाड़ी आगे बढ़ाने के लिए इशारा किया और रोमील ने ड्राइव पर नजर केंद्रित कर दी। बस कार आगे बढी और एक पल में ही रफ्तार पकड़ लिया। परंतु रोमील,....वह तो उलझन में उलझ ही गया था और महात्मा जी द्वारा कहे शब्द उसके दिमाग में चक्कर काट रहे थे। ऐसे में रोमील अपने-आप को रोका हुआ था, लेकिन कितने देर तक। आखिरकार रोमील अपने-आप पर नियंत्रण नहीं सका और बोल पड़ा।

सर!...आपको महात्मा जी के द्वारा कहे गए शब्दों पर विश्वास है? 

हां, जरूर है, क्योंकि बात महात्मा जी की नहीं बल्कि उनके कहने के अंदाज से है और फिर तुमने देखा न कि महात्मा जी कितने ढृढता के साथ बोले थे। बस आज के रात की बात है और कहते है न "हाथ कंगन को अरशी क्या?" सलिल रोमील के प्रश्न सुनकर बोला और फिर मौन हो गया। बस रोमील ने भी समझ लिया कि उसका बाँस अब बोलने के मूड में नहीं है। वैसे भी उसे अपने प्रश्नों का जबाव मिल चुका था, इसलिये उसने ड्राइव पर ध्यान केंद्रित कर दिया।

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आलोक, लंबा कद, पतली कद-काठी, घने-घुंघराले बाल और बिल्लौरी आँखें। उस पर गोरा रंग, जो कि उसके सुंदर व्यक्तित्व को आकर्षक बनाता था। आलोक इस समय काँलेज से निकला था और अब घर जा रहा था। लेकिन उसकी आँखें तो किसी को तलाश रही थी। ऐसे किसी सुंदर वाला को, जिसके साथ वो जीवन के मजे लूट सके, "अपनी रात रंगीन कर सके वो।

वैसे वो इस मामले में निपट अनाड़ी था, क्योंकि इतना सुंदर और स्मार्ट होने के बावजूद भी अब तक उसकी कोई गर्लफ्रेंड नहीं बनी थी। परंतु मन की इच्छाएँ तो अनंत होती है और फिर वो जवान हो चुका था। बस बात इतनी सी होती, तो कोई बात नहीं, परंतुवह तो दोस्तों के साथ कोठे पर जाकर जिस्म का आनंद उठा चुका था। बस उसी आनंद की तलाश उसके मन को रहती थी।

तभी तो उसकी खोजी नजर तलाश कर रही थी कि कोई ऐसी मिल जाए, जिससे वो अपने वासना की भूख मिटा सके।....किन्तु अफसोस!.... ऐसी कोई वाला उसके नजर में नहीं टकराई और वो थोड़ा निराश सा होने लगा।

वैसे तो उसके दोस्त बतला रहे थे कि काँलेज के आस-पास ऐसी लड़कियां बहुतायत में मिल जाती है, जो सहर्ष ही रात रंगीन बनाने को राजी हो जाती है।.....परंतु हाय रे उसका नसीब! जो उसे इस प्रकार की एक भी वाला नहीं दिखी। ऐसे में उसने अपने नसीब को कोसा और अपने कार की तरफ बढ़ गया। इस सोच के साथ कि अगर कोई न मिली, वह कोठे पर ही चला जाएगा। 

बस इतनी बात सोचने भर की देर थी, वो कार में बैठा, कार श्टार्ट की और आगे बढ़ा दी। साथ ही उसने समय देखा, शाम के पांच बजने वाले थे। ऐसे में वो अभी घर नहीं जाएगा।किसी और जगह जाकर थोड़ा इंज्वाय करेगा, फिर आगे क्या करना है? सोचने के बाद ही वह घर को लौटेगा।

वैसे भी आलोक का गर्म खून उसे बार- बार उत्तेजित कर रहा था कि आज वो कुछ ऐसा करें, जिससे कि आज उसे "फेंटाशी" की अनुभूति हो और आज के नौजवान बस शराब , कबाब और शबाब में ही "फेंटाशी" को ढूंढते है। तो फिर आलोक की सोच अलग किस प्रकार से हो सकती थी। 

उसके शरीर में भी तो नौजवानी का गर्म-गर्म खून उफान मार रहा था। इसलिये उसने कार तेज की और सरपट सड़क पर दौड़ाने लगा। साथ ही सोचने लगा कि वो करें तो क्या?....पहले तो उसने सोचा कि दोस्तों को बुला ले और किसी वियर बार में जाए और वहीं से किसी कालगर्ल को हायर करें। लेकिन यह ठीक नहीं होगा, यह विचार दूसरे ही पल उसके मन में घूमने लगी।

वह अच्छी तरह से जानता था कि ऐसे मामलों में ज्यादा संगी-साथी जुटाना ठीक नहीं होता। क्योंकि ये काम सब इस प्रकार के है कि इसमें जरा सी चूक हुई और "बदनामी हुआ ही समझो"। वैसे भी वो बदनामी "शब्द" से बहुत भय खाता था, क्योंकि एक तो उसके पिता बहुत बड़े बिजनेस मेन थे और दूसरे वो सिद्धांत के पक्के थे। ऐसे में उसकी थोड़ी सी भूल उसके लिए आफत ला सकती थी। इसलिये उसने दोस्तों को बुलाने का प्लान त्याग दिया। उसे इस समय यही सही लगा कि किसी वियर बार में जाकर गला तर करें, फिर आगे की सोचे।

फिर जैसा कि उसने सोचा था, "रश्मिका वियर बार आते ही उसने कार की रफ्तार धीमी कर दी और फिर पार्किंग में जाकर खड़ी कर दी और बाहर निकल कर वियर बार के बिल्डिंग की ओर बढ़ा। साथ ही उसकी नजर वियर बार के बिल्डिंग पर गई। जो कि अब सजाई गई दुल्हन की तरह प्रतीत होने लगी थी।....क्योंकि सूर्य देव अस्तांचल को चले गए थे और ढली हुई संध्या कभी भी रात का आवरण ओढ सकती थी। ऐसे में वियर बार की सभी लाइटें जला दी गई थी, जिससे पूरा बिल्डिंग जगमग होने लगा था। आलोक ने एक बार चारों तरफ देखा और गेट के अंदर प्रवेश कर गया।

अंदर विशाल हॉल में ग्राहकों के लिए बेहतर व्यवस्था थी। वहां का आर्टिटेक्ट संपूर्ण पश्चिमी देश के अनुसार की गई थी, जो कि आँखों को सुकून देने वाली थी।.....किन्तु अभी हॉल में ग्राहकों की मौजूदगी नाम मात्र की थी, हां ये बात जरूर था कि ग्राहकों के आने का सिलसिला शुरु हो चुका था। 

लेकिन आलोक को इससे कोई खास मतलब नहीं था, इसलिये उसने कोने की एक टेबल संभाल ली और जैसे ही वो बैठा, वेटर लगभग दौड़ता हुआ उसके करीब पहुंचा। स्वाभाविक था कि ऑर्डर लेने आया था, इसलिये उसने वोडका की बोतल एवं काजू स्लाइश के ऑर्डर कर दिए और फिर अपनी नजर हॉल के गेट पर टिका दी।

और उसकी आँख चुँधिया ही गई, क्योंकि तभी हॉल में सान्या सिंघला ने कदम रखा था। रुप सुंदरी सान्या ने हॉल में कदम रखते ही चारों ओर नजर घुमाई और जैसे ही उसकी नजर आलोक पर गई, एक पल के लिए वो रुक गई।....फिर उसने आलोक के टेबल की तरफ ही अपने कदम बढ़ाए और नागिन सी बल खाकर चलने लगी। सुंदरी हसीना को इस प्रकार से अपनी ओर देखना और फिर अपनी ओर कदम बढ़ाते देखना। 

आलोक तो बस शीला सा जम गया हो जैसे। उसके होंठों से ठंढी आह निकली और उसकी आँखें "सान्या सिंघला" के मदमस्त मटक रहे कुल्हों पर ही टिक गई। बात सही भी था,....आज तक उसने अपने जीवन में ऐसी कमनीय वाला को नहीं देखा था।

मिस्टर!....क्या मैं आपके करीब बैठ सकती हूं? आलोक मंत्रमुग्ध सा उसके सुंदरता में खोया हुआ था, तभी सान्या ने खनकते हुए स्वर में कहा और आलोक को लगा कि कहीं दूर मंदिर में घंटी बजी हो। सान्या के संबोधन ने उसे जादुई लोक से हकीकत के धरातल पर उतार दिया और फिर वो हकला कर इतना ही बोल सका।

स...स्योर मैम! बैठिए, आपका स्वागत करता हूं। आलोक ने बोला और फिर अपनी नजर सान्या के लालित्य लिए चेहरे पर टिका दी। जबकि सान्या ने उसका बात सुना और मुस्कराई, फिर उसके बगल में बैठने के बाद उसने आलोक के आँखों में झांका और बोली।

मिस्टर!....लगते तो तुम हाँट हो, तुम्हारा नाम जान सकती हूं।

हां, क्यों नहीं, आलोक भंडारी....आलोक भंडारी नाम है मेरा। आलोक स्वप्न लोक में डूबा हुआ बोला। आखिरकार सान्या लगती ही अप्सरा जैसी थी, ऐसे में उसकी नजर सान्या के चेहरे से हट ही नहीं पा रही थी। जबकि उसकी बातें और उसके चेहरे की दशा देखकर ही सान्या समझ चुकी थी कि वह उसके जादू में डूब चुका है, इसलिये मुस्करा कर बोली।

वैसे मिस्टर आलोक भंडारी.....मैं सान्या सिंघला, स्वच्छंद विचार की हूं और आज की शाम आपका साथ चाहती हूं, तो आपके विचार क्या है, बस जानना चाहती हूं? सान्या ने मादक स्वर में कहा, जबकि उसके मादक स्वर सुनकर आलोक सहर्ष बोला।

क्यों नहीं-क्यों नहीं सान्या.....हम तो फ्री ही है और आपका साथ मिल जाए, इससे ज्यादा सौभाग्य की बात क्या हो सकती है।

आलोक ने कहा और फिर अपनी नजर सान्या के मादक जिस्म पर टिका दी और आँखों ही आँखों में उसके जिस्म को तौलने लगा। तब तक वेटर उनके ऑर्डर भी सर्व कर गया था, इसलिये सान्या पैग बनाने में जूट गई। जबकि आलोक, वह तो बस अपनी भूखी नजरों से सान्या को देखे जा रहा था। इस समय उसकी स्थिति उस भूखे इंसान के समान हो गई थी, जिसके सामने खाने के लिए व्यंजन की थाल रख दी गई हो। 

बस क्या होगा? भूखा इंसान खुद पर नियंत्रण नहीं कर पाएगा और भोजन पर टूटपड़ेगा। बस यही उसकी मन: स्थिति थी। वह तो बस सान्या को अपने आगोश में ले-लेना चाहता था और उसमें डूब जाना चाहता था। ऐसे में समय बीतता जा रहा था और उसकी बेचैनी बढ़ती जा रही थी।...तभी सान्या ने उसके हाथों में तैयार पैग थमाया और दोनों "चियर्स" बोलने के साथ जाम हलक में उतारने लगे। तब तक हॉल में ग्राहकों की भीड़ भी बढ़ने लगी थी।

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शाम के सात बज चुके थे।

अंधेरे ने पूरे शहर को अपने आगोश में समेट लिया था और इसके साथ ही शहर का बदन रोशनी से नहा कर जगमग करने लगा था। वैसे ही दिल्ली की तो बात ही निराली है, क्योंकि इसकी गिनती महानगरों में की जाती है। ऊंची-ऊंची भव्य इमारतें और बिछा हुआ सड़कों का जाल, जिसपर रोशनी फैलाती हुई गाड़ियां गुजर रही थी। वैसे भी शाम बीतने के साथ ही रात के दस बजे तक दिल्ली की सड़क पर गाड़ियों की आमद ज्यादा ही रहती है,.....लेकिन त्योहार का सीजन होने के कारण आज- कल सड़क पर गाड़ियों की तादाद ज्यादा ही रहा करती थी।

ऐसे में लवण्या अपने घर से निकल चुकी थी, गर्वित को खोजने के लिए। वैसे तो उसे सम्यक मिल चुका था और उससे मिलने के बाद वो काफी खुश भी थी। परंतु फिर भी....वो गर्वित से एक बार मिलना चाहती थी,....क्योंकि उसको अपने प्रश्नों के उत्तर लेना था। 

वो यह बात जानना चाहती थी कि उसको धोखा देने के बाद गर्वित खुश था कि नहीं। बस इसी बात को जानने की उसकी इच्छा थी और इसलिये ही वो अपने घर से निकली थी कि.....गर्वित अगर मिल जाएगा तो ठीक, नहीं तो वह फिर सम्यक के साथ किसी पव में चली जाएगी। लवण्या अपनी सोच में उलझी हुई कार की रफ्तार बढ़ाए जा रही थी। किन्तु” उसको खुद नहीं पता था कि उसके कार को कुछ दूर निकलते ही सम्यक ने पीछा करना शुरु कर दिया था।

हां, वह सम्यक की ही कार थी, जो लवण्या के कार के पीछे लगी थी। सम्यक आज बहुत ही प्रसन्नचित्त था और इसलिये ही वो लवण्या को सरप्राईज देना चाहता था। आज जो उसकी पिता के साथ मुलाकात हुई थी और उसके पापा ने उसके सारे अपराध भूला कर गले लगा लिया था, इससे उसे बहुत ही खुशी मिली थी। साथ ही वो लवण्या को बतलाना चाहता था कि किस प्रकार से आज उसकी गर्वित से भेंट हो गई थी।हां, उसने गर्वित को देख लिया था और.....लवण्या को उसके बारे में बताने को बेचैन था। लेकिन अभी नहीं....पहले वो देखेगा कि लवण्या आखिर जाती कहां है, फिर उससे मिलेगा और बात करेगा।

दोनों की ही कार फूल रफ्तार से सड़क पर आगे-पीछे भागी जा रही थी। एक तो सड़क पर भारी ट्रैफिक, दूसरे रात का समय, लवण्या इस बात से बिल्कुल भी अंजान थी कि उसकी कार के पीछे सम्यक की कार है। वो तो बस अपनी ही गुण धुन में खोई हुई कार को सरपट दौड़ाए जा रही थी। 

समय आगे की ओर बढ़ता जा रहा था, अपनी गति के साथ। तभी अचानक ही रश्मिका वियर बार आते ही लवण्या ने अपनी कार को उसके ग्राऊंड की ओर मोड़ दिया और पार्किंग में ले जाकर खड़ी कर दी। फिर वो बिल्डिंग के गेट की ओर बढ़ गई। उसे अंदर जाने की देर थी कि सम्यक की भी कार वियर बार के कंपाऊंड में जा लगी।

फिर तो सम्यक भी तेजी से बाहर निकला और बिल्डिंग के मुख्य द्वार की ओर बढ़ गया और अंदर हॉल में कदम रखते ही उसकी आँखें चुँधिया गई।....अंदर हॉल में मस्ती का आलम था, चारों तरफ प्यालों में छलकता हुआ जाम और नशे में झूमते हुए लोग। 

साथ ही सम्यक की नजर लवण्या पर गई, जिसकी नजर एक टेबल पर टिकी हुई थी। उसे इस प्रकार से उस टेबल की ओर देखते पाकर सम्यक चौंका और उसकी नजर उस टेबल पर ही जाकर टिक गई। फिर क्या था,.....उसके आश्चर्य की सीमा नहीं रही, क्योंकि उसने जो देखा था, वह उसके विश्वास के लायक नहीं था। सम्यक की आँखों ने देखा था कि उस टेबल पर "सान्या सिंघला अंजान लड़के के साथ जाम गटक रही थी"। साथ ही दोनों आपस में ऐसे लिपट-चिपट रहे थे,....मानो कि उनकी इच्छाएँ नियंत्रित नहीं हो पा रही हो।

उसने जो देखा था, उसपर उसको विश्वास नहीं हो रहा था, फिर भी....उसकी आँखें देख रही थी, तो गलत तो नहीं ही हो सकता था। वैसे भी सम्यक ने "सान्या सिंघला" को वर्षों बाद देखा था, वह आज-कल कितनी बदली-बदली हुई लग रही थी। खैर जो भी हो! उसने मन ही मन सोचा और अपने कदम लवण्या की ओर बढ़ा दिए और जब वो लवण्या के करीब पहुंचा, लवण्या चौंके बिना नहीं रह सकी। 

किन्तु वह जब तक कुछ बोल सके,....सम्यक ने उसका हाथ पकड़ा और एक खाली टेबल के पास खींच कर ले गया।....फिर तो दोनों वही बैठ गए और उनके बैठने की देर थी, उनके पास वेटर पहुंच गया और ऑर्डर लेकर चला गया।

सम्यक तुम!.....इस प्रकार से, मैं समझ ही नहीं पाई कि तुम कब आए?....लवण्या सम्यक के चेहरे को देखकर आश्चर्य भरे स्वर में बोला। जबकि उसकी बातें सुनकर सम्यक मुस्कराया, फिर बोला।

लवण्या!....मैं अभी नहीं आया, जबकि तुम्हारे पीछे तब से लगा हूं, जब तुम मुख्य सड़क पर आई। लवण्या, आज मैं बहुत खुश हूं क्योंकि मैं आज अपने पापा से मिला और उन्होंने मुझे माफ कर दिया।

इसके बाद सम्यक उसे बतलाने लगा कि किस प्रकार से जब वो अपने पिता से मिलने के लिए चला था, उसका टकराव "गर्वित" के साथ हो गया। गर्वित का नाम सुनकर लवण्या आश्चर्य के सागर में गोते खाने लगी,....जबकि सम्यक उसे बतलाने लगा कि उसने किस प्रकार से "गर्वित" का पीछा किया था। परंतु धोखे से....उससे तनिक भूल हुई और आज गर्वित बचकर निकल गया। 

फिर सम्यक जब अपनी बातें खतम कर चुका, लवण्या आगे बोलना ही चाहती थी कि तभी वेटर ऑर्डर सर्व कर गया। फिर तो दोनों वियर को गिलास में भरकर गटकने लगे। लेकिन उन दोनों की नजर सान्या सिंघला पर ही टिकी थी। वे दोनों गौर से उसके कामुक हरकतों को देख रहे थे। किन्तु वे भी अंजान थे कि कोई तीसरी भी नजर थी, जो सान्या पर ही टिकी थी।

हां, वो बलजीत ही था, जो कोने वाले टेबल पर बैठा हुआ शराब की चुस्कियां ले रहा था। लेकिन वह सिर्फ इस वियर बार में शराब की चुस्कियां लेने के लिए ही इस वियर बार में नहीं आया था।.....वह तो सान्या का पीछा करते हुए ही इस वियर बार में आया था, क्योंकि उसके द्वारा किया गया अपमान" अब तक वो भूल नहीं पाया था"। किस प्रकार से सान्या उसके करीब आई थी और फिर उसके मर्दानगी का अपमान करके किसी तीसरे के पास चली गई थी,....उसने बलजीत की मर्दानगी को ललकारा था, उसके अहं को चोट पहुंचाया था और इसलिये ही वो बदला लेना चाहता था। यह सच था कि बलजीत की हालत चोट खाए हुए नाग की भांति हो रही थी और वो मौके की तलाश में था कि जैसे ही मौका मिलेगा “सान्या को टपका देगा”।

इसलिये ही तो वो पूरी तैयारी के साथ आया था और अभी भी उसके हाथ कमर में खोंसे हुए रिवाल्वर के दस्ते पर चला जाता था। साथ ही उसकी बाज सी नजर "सान्या सिंघला" पर ही टिकी हुई थी। वो हिकारत भरी नजरों से सान्या के कामुक हरकतों को देख रहा था और उबलते हुए नफरत के कारण जाम पर जाम हलक में उड़ेले चला जा रहा था। इतना कि अब उस पर नशा हावी होने लगा था और अधिक शराब पी लेने के कारण उसकी आँखें लाल-लाल हो गई थी। 

लेकिन मन.... मन तो यही सोच रहा था कि नारी का यह कौन सा चरित्र है। वह पिछले दो दिनों से देख रहा था कि सान्या एक नए चेहरे के साथ ही नजर आती थी।.....फिर उसका युज एण्ड थ्रो का स्वभाव, उस लड़के के साथ एक बार संसर्ग करने के बाद उसे पलट कर भी नहीं देखती थी। ऐसे में जरूर उसके परवरिश में कोई कमी होगी,....अन्यथा इस प्रकार की हरकत, "शोभनीय तो कतई नहीं"। लेकिन उसे इससे क्या, वह तो आज फैसला करके आया है कि सान्या को ठिकाने लगा कर ही रहेगा।

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पुलिस स्टेशन भी रोशनी से जगमग हो चुका था।

शाम के सात बज चुके थे और अब तक सलिल ने अपने सभी काम निपटा लिए थे और अब बैठ कर रोमील का इंतजार कर रहा था। वैसे भी थकावट के कारण उसकी इच्छा नहीं हो रही थी अब और कुछ करने की।....हां, ये बात अलग थी कि उसके दिमाग में घमासान मचा हुआ था और अभी भी वह महात्मा जी के द्वारा कहे हुए शब्दों के मंथन में ही जुटा था।

...वैसे ही महात्मा जी ने यह कह कर उसकी टेंशन बढ़ा दी थी, कि इस केस का अपराधी "जिंदा मिलेगा या नहीं”, यह संशय है और महात्मा जी द्वारा कही बातें अगर सही हुआ तो?....उसके सामने एक प्रश्न चिन्ह बन जाना था।

इतनी बात तो तय थी कि इस वारदात को अंजाम देने वाला मुजरिम कोई साधारण इंसान तो नहीं ही था।.....नहीं तो इतनी सावधानी और सफाई के साथ वारदात को अंजाम देना कोई हंसी-खेल तो नहीं। बस यही बात सलिल को परेशान किए जा रही थी कि अगर हत्यारा चालाक हुआ,....वो किसी भी हालत में कानून के शिकंजे में फंसना नहीं चाहेगा और महात्मा जी की कही बातें सही हो जाएगी। सलिल इन्हीं बातों में उलझा हुआ था कि ऑफिस में रोमील ने कदम रखा और आते ही बैठ गया। उसे आया हुआ देखकर सलिल ने अपने विचारों को किनारे किया और रोमील से मुखातिब होकर बोला।

क्या हुआ?......तुमको जिस काम के लिए भेजा था, उसका संपादन हुआ कि नहीं?....सलिल ने प्रश्न किया और फिर अपनी नजर उस पर टिका दी। जबकि रोमील ने उसके प्रश्नों को सुना और फिर एक लंबी अँगड़ाई ली, उसके बाद बोला।

यश सर!.....काम तो हो गया, आप ने जिस प्रकार से कहा था, हमने रोहिणी जिले के तमाम होटलों की लिस्ट निकाल ली है। बोलने के बाद रोमील ने अपनी जेब से ए फोर साइज पेपर निकाला और सलिल की ओर बढ़ा दी, इसके बाद फिर बोला। वैसे सर, मुझे समझ नहीं आया कि आप इस लिस्ट का करोगे क्या?

करूंगा क्या!....एक तो इसको समझ नहीं पाओगे और समझा भी दिया, तो समझ कर करोगे क्या? सलिल ने रोमील की बातें सुनकर मुस्करा कर कहा और फिर उसने अपनी नजर उस लिस्ट पर टिका दी।....जबकि उसकी बातें सुनकर रोमील के चेहरे पर नाराजगी के भाव दृष्टिगोचर होने लगे। फिर भी उसने खुद पर नियंत्रण किया और शांत स्वर में बोला। सलिल ने कह तो दिया, परंतु उसकी बातें रोमील को चुभ सी गई,....फिर भी रोमील ने अपने शब्दों का संतुलन रखते हुए बोला।

आपने ठीक ही कहा सर!.....भला मैं इस विषय में जानकर भी क्या कर लूंगा?.....आप सीनियर है, जिस प्रकार से आदेश देंगे, मुझे उसी प्रकार से कार्य करना है और भला.....इससे आगे जानने की मुझको जरूरत ही क्या है?....बोलने के बाद रोमील एक पल के लिए रुका, फिर आगे बोला।....वैसे सर!...अगर आपने इस विषय में मुझे बतला भी दिया, तो आपका क्या बिगड़ जाएगा। रोमील ने अपनी बातें पूरी की और अपनी नजर सलिल के चेहरे पर टिका दी, जबकि उसकी बातें सुनकर सलिल मुस्कराया, फिर बोला।

अरे रोमील!....तुम तो नाराज ही हो गए, बस मैंने तो ऐसे ही बोल दिया था और तुमने इसे अपने दिल पर ले-लिया। बोलने के बाद सलिल रुका, फिर उसने पेपर से नजर हटा कर रोमील पर टिका दी, उसके बाद बोला। वैसे रोमील!... तुम ही बताओ कि भला तुम्हें बताए बिना मैंने आज तक कोई काम किया है।

इसके बाद सलिल रोमील को बतलाने लगा कि इस लिस्ट को इसलिये मंगवाया है कि इन सभी होटलों में पुलिस को तैनात कर देगा। फिर सलिल उसको समझाने लगा कि आज की रात को लेकर उसकी किस प्रकार की योजना है। 

रोमील उसकी बातों को ध्यानपूर्वक सुन रहा था और सलिल ने जब अपनी बातें खतम की, अंत में बोला कि चलो अभी किसी वियर बार में चलते है और इतनी बातें बोलने के बाद सलिल रुका नहीं। वह अपनी जगह से उठा और ऑफिस से बाहर निकला। फिर क्या था, रोमील भी उसके पीछे-पीछे लपका और कुछ मिनटों बाद ही दोनों स्काँरपियों में बैठे थे और गाड़ी सरपट सड़क पर दौड़ी जा रही थी।

हां, आज एक तबदीली जरूर थी कि ड्राइविंग सीट पर सलिल बैठा हुआ था और पूरी तन्मयता से कार ड्राइव कर रहा था। ऐसे में बगल में बैठे हुए रोमील ने मोबाइल निकाल लिया और फिर ब्लुटूथ निकाल कर मोबाइल चालू कर लिया। क्योंकि वो अच्छे से जानता था कि बाँस....पूरे रास्ते बात करेंगे नहीं और उसकी हिम्मत नहीं है कि बात की शुरुआत करें। 

ऐसे में उसके लिए यही सही था कि मोबाइल चालू कर ले। जबकि सलिल, वो भले ही ड्राइव कर रहा था, लेकिन उसके मन में "विचारों के झंझावात चल रहे थे"। सलिल अच्छी तरह से जानता था कि इस केस में अब तक नाकामयाबी मिली है,...तो अब सफलता मिल जाए, ऐसे कोई आसार नहीं है।

ऐसे में उसे जो भी कदम उठाने होंगे, बहुत ही सोच-समझ कर उठाने होंगे। अन्यथा फिर वही होगा कि हत्यारा वारदात करके निकल जाएगा और वो बस लकीर पीटता रह जाएगा।....वैसे सलिल की इच्छा तो यही थी कि अब किसी भी हालात में वारदात घटित नहीं हो। 

बस इसलिये ही वह मनोमंथन कर रहा था और किसी निष्कर्ष पर पहुंचना चाहता था। परंतु समय पर आज तक किसका चला है, जो सलिल अपनी चला लेता। वह अच्छी तरह से जानता था कि इस केस में पुलिस की स्थिति नगण्य है, क्योंकि पुलिस अभी तक यह भी समझ नहीं पाई है कि हत्याएँ किन कारणों से की जा रही है?..... तो फिर हत्या रोकनी तो दूर की बात है।

लेकिन इसका मतलब यह तो कतई नहीं कि आदमी प्रयास करना भी छोड़े दे। यही बात सलिल सोच रहा था, तभी उसकी नजर वियर बार "रश्मिका" पर गई और उसने कार को बिल्डिंग के कंपाऊंड में खड़ी कर दी। इसके बाद दोनों बाहर निकले और मुख्य द्वार की ओर बढे और जैसे ही उन्होंने हॉल में कदम रखा, उनकी आँखें चुँधिया गई। क्योंकि अंदर हॉल में जाम से जाम टकराए जा रहे थे।

मस्तियाँ बिखेरी जा रही थी और उस मादक माहौल को और भी मादक बनाने का काम बार वालाएँ कर रही थी। वो बार वालाएँ आधे कपड़ों में पश्चिमी गाने पर अपने बदन मटका रही थी। उन बार वालाओं का नाचना इतना भौंदा था कि हॉल में सीटी बजने का सिलसिला शुरु हो चुका था।

किन्तुसलिल को इससे कोई लेना- देना नहीं था। वो तो रोमील के साथ आगे बढ़ा और एक खाली टेबल पर बैठ गया और उन दोनों के बैठने की देर थी, उनके पास वेटर भी पहुंच गया।.....फिर तो सलिल ने स्कॉच की बोतल और पनीर भुजी के ऑर्डर दिए और वेटर के जाने के बाद उसने सरसरी नजर हॉल में डाली। चारों तरफ मादकता का लहर फैला हुआ था, परन्तु उसकी नजर तो सान्या सिंघला पर ही जाकर टिक गई। 

उफ!....सार्वजनिक जगहों पर इस प्रकार की हरकतें, कतई शोभा नहीं देती। फिर भी जो भी था, उसके आँखों के सामने ही हो रहा था।.....परंतु वो किसी भी परिस्थिति में इस पर रोक नहीं लगा सकता था, इसलिये उसने अपनी नजर दूसरी ओर घूमा ली। 

फिर तो उसकी नजरों ने देखा कि दूसरे टेबल पर बैठे हुए सम्यक और लवण्या की नजर भी "सान्या सिंघला" पर ही टिकी हुई थी। उससे भी बड़ी बात थी कि उनके आगे वियर की बोतल रखी हुई थी और शायद हॉल में एक अकेला वही जोड़ा था, जो नशे में टूल्ल नहीं प्रतीत होता था। किन्तु सिर्फ इतनी बातों पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना गलत होता।

इसलिये उसने नजर को दूसरी ओर घुमाया और कोने में बैठे बलजीत को देखा। जो पूरी तरह नशे में टूल्ली था, लेकिन उसकी भी नजर सान्या सिंघला पर ही टिकी थी।....फिर तो सलिल होंठों ही होंठों में बुदबुदाया कि सार्वजनिक जगहों पर अगर कोई कामुक हरकत करेगा,....तो दुनिया देखेगी ही। सलिल अभी अपने शब्दों को पूरा भी नहीं कर सका था कि वेटर उसके ऑर्डर सर्व कर गया। फिर तो रोमील और सलिल पीने में जुट गए।

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रात के आठ बज चुके थे।

और अब तो सान्या सिंघला और आलोक नशे में पूरी तरह डूब चुके थे। साथ ही उन दोनों की उत्तेजना इतनी बढ़ गई थी कि अब वे खुद पर नियंत्रण नहीं रख सकते थे। इसलिये दोनों एक साथ ही उठ खड़े हुए और बील चुकाने के लिए कैश काउंटर की ओर बढे, बील चुकाया और हॉल के बाहर की ओर बढे।

फिर क्या था, सम्यक एवं लवण्या ने भी उनका अनुसरण किया। सम्यक और लवण्या इस बात को अच्छी तरह से जानते थे कि अगर थोड़ी सी भी भूल हुई। सान्या सिंघला का साथ छूट जाएगा और फिर....दिल्ली इतना बड़ा शहर है कि "सान्या" को ढूंढना इतना आसान नहीं होगा। इसलिये सम्यक एवं लवण्या ऐसी गलती नहीं करना चाहते थे। इसलिये वे दोनों भी पीछे-पीछे बाहर निकल आए और बाहर आकर देखा कि सान्या आलोक के साथ अपनी कार में बैठ चुकी है।

...फिर क्या था, सम्यक और लवण्या भी अपनी-अपनी कार में जा बैठे। लेकिन उनको क्या पता था कि तीसरा कोई और भी था, जो सान्या के साथ ही बाहर निकला था।

हां, बलजीत था वो, जिसने सान्या को जैसे ही बाहर निकलते देखा था, वह भी बाहर निकल आया था। भले ही उसका शरीर अधिक नशा कर लेने के कारण उसके नियंत्रण में नहीं था, लेकिन उसका दिमाग अभी भी एक्टीव था और उसके दिमाग में यही चल रहा था कि किस प्रकार से "सान्या को ठिकाने लगा दे"। 

वो सान्या से इस तरह से खार खाए बैठा था कि उसका बस चलता, तो रिवाल्वर की पूरी गोली कब का सान्या के बदन में उतार चुका होता।.....परंतु एक बात यह भी थी कि वह कानून के शिकंजे में भी फंसना नहीं चाहता था। तभी तो उसकी नजर मौके की तलाश कर रही थी कि कब मौका मिले और "सान्या को टपका दे"।

बलजीत सोच ही रहा था कि सान्या की कार श्टार्ट होकर ग्राऊंड से बाहर निकल गई। उफ!... उसे इतना नशा नहीं करना चाहिए था,....नहीं तो उसके नजर के सामने से सान्या बच कर निकल नहीं पाती। बस इतनी बातें सोचना था कि वो अपनी कार के करीब पहुंचा और कार श्टार्ट करते ही आगे बढ़ा दी। तब तक तो सम्यक एवं लवण्या की कार भी सान्या के पीछे लग चुकी थी। 

तभी सलिल भी हॉल से बाहर निकला। उसे हॉल में ही यह समझ नहीं आया था कि सान्या को घुरने वाले तीनों उसके बाहर जाते ही उसके पीछे हो लिये थे। ऐसे में उसके दिमाग में घंटी बजी और वो सोचने को विवश हो गया कि "आखिर माजरा क्या है"।

वैसे भी पुलिस की नौकरी में यही सिखाया जाता है कि हर एक बात पर शक करो। अपने आस-पास होने वाले क्रिया-कलापों को शक भरी नजरों से देखो। फिर तो....कहीं न कहीं, कोई न कोई तुम्हारे हत्थे चढ ही जाएगा। उसमें भी सलिल की तो विशेष खासियत थी, तभी तो उन लोगों के निकलने के बाद सलिल भी रोमील के साथ बाहर निकला और अपने गाड़ी की ओर बढ़ा और फिर गाड़ी में बैठते ही श्टार्ट करके आगे बढ़ा दी। फिर तो, आगे-आगे सान्या की कार, उसके पीछे लवण्या और सम्यक और उसके पीछे बलजीत की कार। उन सभी के पीछे सलिल कार को दौड़ाए जा रहा था, जबकि रोमील बगल में बैठा मोबाइल में उलझा हुआ था, तन्मय होकर।

एक तो रात का आलम, दूसरे सड़क पर काफी ट्रैफिक, सलिल को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा था, आगे वाली कारों का ट्रैक करने में। सलिल इस बात को अच्छी तरह से जानता था कि थोड़ी सी भी भूल हुई नहीं कि आगे वाली कार का उसके आँखों से ओझल होने में देर नहीं लगेगा।

....इसलिये वो बहुत ही सावधानी के साथ ड्राइव कर रहा था, जबकि रोमील मोबाइल में बीजी था। रोमील इस बात को भलीभांति जानता था कि बाँस के सामने बिना वजह के बातों की शुरुआत करना, मतलब "आ बैल मुझे मार"। जबकि इस सलिल की इच्छा हो रही थी कि रोमील बात करें,....जिससे सफर का बोझिल पन कम हो। लेकिन वो कैसे कह सकता था कि "रोमील बातें करो"।

बीतते समय के साथ ही ये सभी गाड़ियां एक लाइन में सरपट आगे भागी जा रही थी और फिर होटल "श्लोका" के आते ही सान्या की गाड़ी होटल गेट की तरफ मुड़ी और होटल कंपाऊंड में जाकर लग गई। इसके बाद "सान्या सिंघला" आलोक का सहारा लिए कार से निकली और बिल्डिंग की ओर बढ़ गई। 

इस समय भी दोनों की कामुक हरकतें कम नहीं हुई थी और उन्हें देख कर कोई भी अंदाजा लगा सकता था कि वे दोनों "रति क्रिया" के लिए व्यग्र हो रहे थे। उधर सान्या एवं आलोक ने जैसे ही होटल के अंदर प्रवेश किया,....वैसे ही सम्यक और लवण्या की कार भी होटल प्रांगण में आकर लगी। उन दोनों की कार को खड़े हुए अभी दो मिनट भी नहीं गुजरा था कि बलजीत की कार भी आ लगी।

और सबके पीछे सलिल की स्काँरपियों "होटल प्रांगण" में आकर लगी। सलिल की आँखों ने देखा कि पहले तो सम्यक और लवण्या होटल के अंदर गए, उसके बाद बलजीत भी तेज कदमों से चलता हुआ अंदर चला गया। जबकि उन लोगों को अंदर जाते हुए देखकर सलिल ने मन ही मन फैसला कर लिया कि वह यही पार्किंग में रुकेगा।.....वैसे भी उसकी नजर ने गेट पर सादे लिबास मेंखड़े पुलिस वाले को देख लिया था। 

उधर अंदर हॉल में सम्यक और लवण्या खाली टेबल देखकर बैठ गए,....जबकि बलजीत वाथरुम की ओर बढ़ गया।....लेकिन इन सब चीजों से सान्या को मानो कोई मतलब नहीं था, या यूं कहा जा सकता था कि उसे जानकारी ही नहीं थी कि "वियर बार से लगातार उसका पीछा किया जा रहा है।

तभी तो सान्या आलोक के सहारे सर्विस काउंटर पर खड़ी होकर रूम की चाबी ले रही थी। साथ ही उसकी नजर होटल के लक्जरी हॉल में भी घूम रही थी। हां, इस होटल की सजावट ही इस तरह से की गई थी कि अय्याशी करने बालों के लिए स्वर्ग लगे। 

तभी तो ये होटल "सान्या सिंघला" के पसंदीदा होटलों में शुमार थी और वो आलोक को लेकर यहां पर आ गई थी। लेकिन वो ज्यादा देर तक हॉल में नजर को नहीं घुमा सकी, क्योंकि चाबी लेने के बाद आलोक ने उसके कमर में अपने हाथ को फंसाया और उसे लगभग अपनी ओर खींचता हुआ बुक रूम की ओर बढ़ गया।....स्पष्ट था कि आलोक की बेताबी बढ़ गई थी, तभी तो वो "सुख के सागर में गोते लगाने के लिए व्याकुल हो चुका था।

हां, यह बात सही था कि आलोक के हृदय की बेचैनी बढ़ गई थी। एक तो उसने अपने जीवन में ऐसी रुप सुंदरी को नहीं देखा था और फिर उसके द्वारा दिया गया खुला निमंत्रण। आलोक नौजवान भी था और हैंडसम भी, ऐसे में उसकी भावनाएँ तरंगित हो रही थी। तभी तो रूम में पहुंचते ही उसने रूम को अंदर से लॉक किया और फिर सान्या पर टूट पड़ा। 

एक तो वैसे ही रूम दिव्य लोक सा लग रहा था और दूसरे स्वप्न सुंदरी उसके सामने थी। इसलिये उसने सान्या को बेड पर पटक दिया और फिर उसके ऊपर सवार हो गया।....इसके बाद तो उसके हाथ "सान्या सिंघला" के बदन से कपड़े उतारने में जुट गए, जबकि उसके होंठ सान्या के होंठों पर चिपक गए और वो होंठों से पराग कण चूमने लगा।

लेकिन जैसे ही सान्या पूर्ण रुप से आदम अवस्था में पहुंची, रूम की लाइटें जलने बुझने लगी। अचानक से रूम की बदली हुई परिस्थिति से दोनों ही घबरा गए।.....वैसे ही उन्होंने शहर में होते हुए वारदात को सुन रखा था, जिससे भय के कारण दोनों के चेहरे पीले पड़ गए। 

जबकि अचानक ही रूम में "रति संवाद- रति संवाद" का संगीत मय स्वर गुंजने लगा। फिर तो अचानक ही ड्रेसिंग टेबल का शीशा तेज आवाज के साथ टूट कर बिखरा और कांच का एक टुकड़ा सान्या के पेट में आकर धंस गया।....फिर क्या था, सान्या अत्यधिक पीड़ा के कारण तड़पने लगी और दो मिनट बाद ही तड़प कर शांत हो गई। जबकि आलोक, उसके तो हाथ-पांव ठंढे हो चुके थे और भय से चेहरा पीला पड़ चुका था। कहां तो उसने सोचा था कि आज की रात वो जन्नत की सैर करेगा और कहां उसके साथ हादसा घटित हो गया था।

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सलिल पार्किंग में खड़ा- खड़ा बोर होने लगा था। वैसे ही पिछले तीन रातों के जागरण ने उसके हौसले को तोड़ कर रख दिया था। दूसरे बिना मतलब के "श्लोका होटल" के पार्किंग में खड़ा होना,....उसे खुद के द्वारा लिया गया निर्णय ही समझ नहीं आ रहा था। उफ!....कभी-कभी तो किसी से भी गलतियां हो जाती है, ऐसा उसका मन सोच रहा था। वैसे तो उसने पुलिस स्टेशन फोन करके जानकारी ले-ली थी और अब वो आश्वस्त था, क्योंकि सभी होटलों में "पुलिस" की तैनाती कर दी गई थी और पुलिस स्टेशन से उनको कोओर्डिनेट किया जा रहा था, फिर भी अंजान भय।

सलिल अच्छी तरह से जानता था कि वो बस अंधेरे में ही तीर चला रहा है। ऐसे में पता नहीं कि उसकी योजना कामयाब होगी भी या नहीं।.....दूसरी बात कि हत्यारा अंजान और चालाक भी है। ऐसे में वो किस रुप में आता है और किस तरह से "अपराध" को अंजाम देता है, इस बात से पुलिस कर्मी अंजान है। तो फिर उसको अपराध करने से किस प्रकार से रोका जा सकता है। 

बस इसी बात का डर उसके हृदय के स्पंदन को बढ़ाए हुआ था और इस स्थिति में सलिल की हार्दिक इच्छा थी कि रोमील उसके साथ बात करें। लेकिन कैसे?.....वह अच्छी तरह से जानता था कि जब तक वो बात की शुरुआत नहीं करेगा, रोमील बात करने की हिम्मत ही नहीं जुटा सकता। बस बात की शुरुआत उसे ही करना होगा, इतनी बातें दिमाग में आते ही वो रोमील से बोला।

रोमील!.....तुम्हें क्या लगता है कि आज भी हत्यारा वारदात को अंजाम देने में कामयाब हो जाएगा? बोलने के बाद सलिल रोमील की ओर देखने लगा। वैसे तो होटल के प्रांगण में रोशनी की समुचित व्यवस्था नहीं थी, जिससे कि वो रोमील के चेहरे के भावों को स्पष्ट देख पाता। फिर भी उसकी नजर रोमील पर टिक गई।.....जबकि रोमील, जो कि अब तक मोबाइल में उलझा हुआ था, अचानक ही उसके द्वारा पुछे गए प्रश्न सुनकर बौखला गया और फिर अटपटे स्वर में बोला।

आप भी न सर!.....गजब के प्रश्न पुछते है। आप अच्छी तरह से जानते है कि अपराधी अंजान है और इस परिस्थिति में उसके मेंटालिटी को जज कर पाना इतना तो आसान नहीं।....ऐसे में भला मैं कैसे बतला पाऊंगा कि वो क्या करेगा, अथवा क्या कर पाएगा।

लेकिन फिर भी.....तुम कुछ अनुमान तो बताओ। जैसे ही रोमील ने अपनी बात खतम की, सलिल तपाक से बोल पड़ा और उसकी बातें सुनकर रोमील ने सलिल को देख कर शंकित स्वर में बोला।

सर!.....इस बारे में मैं ज्यादा तो नहीं कह सकता। परंतु अब तक हुए अपराध से इतनी तो तय बात है कि अपराधी हद तक चालाक है। ऐसे में वो अपने टार्गेट को छोड़ने की भूल नहीं करेगा।

इतनी बातें बोलने के बाद रोमील ने अपनी नजर सलिल पर टिका दी। जबकि सलिल, उसने रोमील की बातों को सुना और उसकी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। हां, उसने जरूर अपने कलाईं घड़ी को देखा, जो रात के नौ बज कर पंद्रह मिनट होने की सूचना दे रही थी। बस सलिल के धड़कन धड़कने की स्पीड बढ़ गई, उसके होंठ सूखने लगे और चेहरे पर घबराहट सी छाने लगी। 

अपराध घटित होने का समय हो चुका था और पता नहीं कब उसके फोन की घंटी घनघना कर "घटित हुए अपराध की सूचना उसे दे-दे। सही अर्थों में देखा जाए, तो सलिल की जिम्मेदारी थी कि "घटित हो रहे अपराध" को रोके और वह चाहता भी था कि जितनी हत्याएँ होनी थी, हो चुकी, किन्तु अब नहीं हो। उसके बढ़ते हुए धड़कन की वजह का कारण भी यही था।

और जिसका उसको अंदेशा था, वही घटित हो भी गया, लेकिन इसकी जानकारी उसे मोबाइल से नहीं मिली। वे दोनों पार्किंग में खड़े थे, तभी होटल के अंदर हो रहे तेज शोर-शराबा की आवाज दोनों के कान से टकराई। आवाज सुनकर सलिल की धड़कन और भी तेज हो गई।

,....आवाज सुनकर उसके धमनियों में तीव्रता से रक्त प्रवाहित होने लगा। साथ ही उसके दिमाग में जो पहला शब्द उभर कर टकराया कि "कहीं इसी होटल में ही तो नहीं अपराध घटित हो गया"। फिर तो सलिल एवं रोमील बिल्डिंग के गेट की ओर दौड़ ही पड़े और जब हॉल में पहुंचे।

उन्होंने देखा कि होटल में मौजूद सभी ग्राहक एवं स्टाफ उस रूम की ओर भाग रहे थे, जिसमें सान्या की हत्या हुई थी। उन दोनों ने जब पब्लिक को उस रूम की ओर देखा, उन्हें समझ तो कुछ नहीं आया, लेकिन वे भी उसी रूम की ओर दौड़े और रूम में पहुंच कर चौंके।  

कारण कि उनकी आँखों ने जो देखा, वही तो उनके हृदय में आशंका थी। हां, बेड पर सान्या सिंघला की लाश पड़ी थी और कोने में आलोक दुबका हुआ बैठा था। आलोक का चेहरा इस समय खौफ के कारण सफेद जर्द हो चुका था। लेकिन सब से बड़ी बात थी कि सान्या की लाश भी पूर्ण नग्न थी, जिसे देखकर सलिल को शर्मिंदगी सी महसूस हुई।

वैसे उसे शर्म आए, ऐसी कोई बात नहीं थी,....क्योंकि उसकी डियूटी ही ऐसी थी कि शर्म करने से काम नहीं चल सकता था। लेकिन इस समय वहां पर पब्लिक होने के कारण स्वाभाविक ही था कि शर्म आए। इसलिये उसने रोमील को इशारा किया कि वहां से पब्लिक को हटाये।....फिर क्या था, रोमील बाँस का आदेश पालन करने में जूट गया और दो मिनट बाद ही पूरा एरिया खाली हो गया। 

इसके बाद तो सलिल ने पुलिस स्टेशन फोन किया और यहां के हालात के बारे में जानकारी दी और यहां डाँग स्क्वायड एवं फिंगर एक्सपर्ट को भेजने के लिए बोला। उसके बाद उसने एस. पी. साहब को फोन मिलाया और उन्हें सिलसिलेवार घटना के बारे में जानकारी देने लगा।

फिर तो फोन डिस्कनेक्ट होते ही उसने रोमील को उसी रूम में छोड़ दिया और खुद "होटल की तलाशी" लेने के लिए निकल पड़ा। लेकिन पूरा होटल छान मारने के बावजूद भी उसके नजरों में ऐसी वस्तु नहीं दिखी, जिसे कि वो सबूत कहता। ऐसे में उसने सी. सी. टीवी रूम का रुख किया और जब वहाँ से डेटा लेकर उस रूम में पहुंचा। जहां घटितहुआअपराध रिकार्डहोचुका था। 

क्योंकि उसने देख लिया था कि उसकी टीम आ चुकी थी और अपने काम में जुट गई थी। ऐसे में सलिल को सिर्फ एक ही बात की चिन्ता थी कि "कहीं मीडिया वाले न आ जाए"। सलिल मीडिया बालों के स्वभाव से अच्छी तरह से परिचित था। उसे पता था कि मीडिया वाले अगर अभी यहां पर आ गए, तिल का ताड़ बना देंगे।

सलिल ने ऐसे में समझदारी की, वो अभी रिश्क लेने के मूड में नहीं था, इसलिये उसने रोमील को होटल के हॉल में भेज दिया और खुद गलियारे में चहलकदमी करने लगा। लेकिन उसके दिमाग में तो झंझावात चल रहे थे। सलिल विचारों की श्रृंखला में उलझ गया था और ऐसे में उसकी सोच आज दोपहर में मिले महात्मा पर जाकर टिक जाती थी। 

वैसे ही उसने जैसे ही महात्मा जी के चेहरे की आभा देखी थी, पहली ही नजर में वे पहुंचे हुए फकीर प्रतीत हो रहे थे। तो क्या कुछ पल बाद या बाद में "अपराधी की भी डेड बाँडी" ही मिलेगा। महात्मा जी ने यही तो इशारा किया था और अब उनकी कही एक बात सही हुई थी, तो दूसरा भी सत्य ही होगा, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता था।

अगर महात्मा जी की कही बातें सही हो गई, उसके बाद वो क्या करेगा?.....बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह था। इसलिये ही तो उसके हृदय की धड़कन बढी हुई थी,....वह इन्हीं बातों में उलझा हुआ था। तभी उसकी नजर सामने आ रहे सम्यक, लवण्या और बलजीत पर गई। 

एक तो वो टेंशन में उलझा हुआ था और दूसरे सामने से आ रहे लोग। इन्हीं लोगों को तो उसने सान्या के पीछे लगे हुए थे। ऐसे में स्वाभाविक ही था कि उसे आश्चर्य हो। वो तो इन लोगों को खोजता, लेकिन बाद में,...किन्तु वे तो सामने से आ रहे थे। तभी उसके करीब आकर उसके ऑफिसर ने सूचना दी कि लाश का पंच नामा भरकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया था।

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रात नौ बजकर बीस मिनट।

होटल श्लोका के पिछले भाग से मर्सिडीज निकली और गेट पर आते ही उसने रफ्तार पकड़ ली। फिर तो होटल गेट से निकलने के बाद कार ने रफ्तार पकड़ लिया। इस समय ड्राइविंग सीट पर बैठा हुआ गर्वित सावधानी के साथ कार ड्राइव कर रहा था। लेकिन उसके चेहरे से ऐसा प्रतीत नहीं हो रहा था कि उसको कहीं भी जाने की जल्दी हो। वह आराम से कार के अंदर बज रहे म्यूजिक पर झूमता हुआ ड्राइव कर रहा था और उसका सिर मस्ती में झूम रहा था।.....वो कहते है न कि सिर का डाँस, हां, वो सिर को डाँस ही करा रहा था।

आज उसे बहुत खुशी थी, क्योंकि उसने बीते हुए जीवन के विषम अध्यायों को आज क्लोज कर दिया था। वह बीते हुए अध्याय, जो उसके हृदय में कांटा बनकर चुभते थे और बिना कुरेदे ही लहूलुहान कर देते थे। फिर तो वह भय, व्यथा एवं दुश्चिंता के भार तले दब जाता था, परंतु उसके होंठों से कराह भी निकल नहीं पाती थी। उफ!....जिंदगी जब उलझ जाती है, इंसान चाह कर भी इसे सुलझा नहीं पाता। 

वह जितनी भी कोशिशें इसको सुलझाने की करता है, इसमें और भी उलझता चला जाता है। ऐसे में उसके पास सिर्फ एक ही विकल्प बचता है कि वो "उन अध्यायों को ही बंद कर दे, जो उसको तकलीफ पहुंचाते है।

जीवन बहुधा शांत होकर पटरी पर नहीं चलती, कभी तो यह तरंगित होकर उछाले मारती है, तो कभी धसमस नदी के प्रबल धारा के समान वेगवान हो जाती है। बस यही चक्रव्यूह व्यक्ति समझ नहीं पाता और इसलिये ही वह निर्धारण नहीं कर पाता कि उसे करना क्या चाहिए। हां, उसे जो मालूम हो जाए कि उसके क्या करने से उसे क्या परिणाम मिलेंगे, वो बहुत ही सोच समझ कर ही कदम उठाएगा। 

लेकिन ऐसा बहुधा कहां होता है, नहीं तो भीष्म पितामह जैसे व्यक्तित्व अपने ही "वचन" से प्रतिबद्ध होकर वाणों की शैया पर नहीं पड़े होते। जीवन ही तो इंसान को बिना मतलब के भी शंकित करता है, भ्रमित करता है और उलझाए रखता है। 

गर्वित भी तो इसी प्रकार से जीवन के द्वारा भ्रमित हो गया था। उसने सोचा तो नहीं था कि उसे इस प्रकार से जीवन पथ पर छल से सामना करना पड़ेगा। उसने तो कभी सोचा ही नहीं था कि कभी परिस्थिति ऐसी भी बन जाएगी कि उसे न चाह कर भी ऐसे कदम उठाने होंगे, जो उसको पसंद नहीं। गर्वित सक्सेना, सुलभ सक्सेना का इकलौता वारिस और सुलभ सक्सेना नाम ही काफी था। यह नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं था। बहुत बड़े बिजनेस मेन सुलभ सक्सेना, स्वभाव से मृदुल। 

उन्होंने गर्वित को अच्छे ही संस्कार दिए थे, उसे अच्छी तरह से समझाया था कि जीवन हकीकत में क्या है?.....किन्तु गर्वित, शायद वह अपने पिता द्वारा दिए गए पाठ को पढ नहीं सका था, वह समझ ही नहीं सका था कि उन दिए गए पाठों को अंगीकार भी करना है। तभी तो वह समझ भी नहीं सका था कि सही और गलत में किस प्रकार से भेद किया जाए।

सहसा ही कार ने हिचकोले लिए और गर्वित की तंद्रा टूटी और फिर उसने कार की रफ्तार को धीमा किया। फिर उसे अनुभूति हुई कि उसे भूख लगी है, इसलिये उसने कलाईं घड़ी पर नजर डाली। रात के दस बजने वाले थे और उसे अब भोजन कर लेना चाहिए। बस इतनी बातें दिमाग में आते ही उसने नजर दौड़ाई और उसकी नजर सड़क किनारे ढाबे पर गई।

...फिर तो उसने कार ढाबे के प्रांगण में खड़ी की और फिर उधर बढ़ गया, जिधर टेबल लगी थी। इसके बाद तो उसके बैठने की देर थी कि वेटर उसके करीब पहुंचा। उसके बाद तो गर्वित ने वहां छक कर भोजन किया, पैसे चुकाए और फिर कार में आकर बैठ गया।

इसके बाद फिर से वही सफर, सड़क पर सरपट भागती कार और उसी रफ्तार से "उसके भागते हुए विचार"। गर्वित के दिमाग में बीते दिनों की बहुत सी गुत्थियाँ मानो कि अचानक ही आकर जमा हो गई थी। हां, बिजनेस मेन का लाडला होने के कारण उसके अंदर अहं की प्रवृति थी। अकूत दौलत का इकलौता वारिस होने के कारण वो बचपन से ही मिलनसार नहीं था। 

उसे तो बस, जहां उसकी स्वार्थ पूर्ति होती थी, वही संबंध अच्छा लगता था। बाकी तो वह अपने पास आने वाले करीब-करीब सभी व्यक्तियों को हेय दृष्टि से देखता था। उसकी समझ इतनी ही थी कि वह अपने स्वार्थ पूर्ति के लिए हर वो संभव उपाय करता था, बिना सही-गलत का विचार किए और फिर अपने उद्देश्य को पूरा भी कर लेता था।

 हालांकि उसके पापा ने कितनी ही बार उसे-उसके स्वभाव के बारे में सख्त हिदायत दी थी।....... परंतु उसे "जीवन के अमूल्य सीख से जैसे कोई मतलब ही नहीं था। तब उसे कहां पता था कि” वह जो जीवन के साथ मजाक करने के मूड में रहता है, जीवन जब मजाक करने के मूड में उतरेगी, वो सहन ही नहीं कर पाएगा। तब तो उसे यही लगता था कि जीवन की धरातल समतल है, मखमली है और इच्छाओं के अनुरूप ढलने वाली है। 

किन्तु उसे इस बात की बिल्कुल भी अनुभूति नहीं थी कि जीवन की धरातल हकीकत में अति कठोर है। अगर भूल से भी इसके साथ छल किया गया, यह प्रतिफल बनकर खुद ही छल करने वाले के अंतर्मन को छलनी-छलनी कर देता है, उसके सुख-चैन छीन लेता है।

तभी तो उसके द्वारा किया गया छल जब परिणाम में परिणत हुआ, उसका जीवन वे पटरी हो गया। गर्वित, जो कि दूसरों को हेय दृष्टि से देखता था, समय ने परिस्थिति का इस प्रकार से निर्माण कर दिया कि "वह खुद हेय हो गया"। जो जीवन उसे मखमली लगती थी, पलक झपकते ही कांटों के जाल में परिणत हो गए।उफ!.....कभी-कभी जब इंसान द्वारा किए हुए कर्म विष फल बनकर उसके सामने आते है।

 उसे पचाना उसके लिए बहुत ही मुश्किल हो जाता है। उसकी बुद्धि कुंद हो जाती है और उसे दुश्चिंता के बादल घेर लेता है। फिर तो....वो लाख कोशिश करता है कि अपने किए हुए भूल को सुधार ले, उसकी कोशिशें नाकामयाब हो जाती है। वो फिर तो जितने भी हाथ-पांव मार ले, उसे किनारा नहीं मिलता, क्योंकि वो भँवर में फंस चुका होता है।

गर्वित शायद न जाने कब तक विचारों के जाल में उलझा रहता, लेकिन उसकी तंद्रा टूट गई,....क्योंकि उसकी कार ने "चंद्रिका वन" के गेट में प्रवेश कर लिया था। इसलिये उसने कार पार्क की और हॉल में पहुंचा, फिर तो वह किचन से जाकर पीने के लिए वोडका की बोतल और गिलास उठा लाया और हॉल में बैठ कर पीने में जूट गया। फिर तो उसने लगातार तीन पैग हलक में उतार लिये, फिर चिलम बना कर पी और धुएँ को अंदर खींचने के बाद "परम शांति" को महसूस किया। इसके बाद वो लैपटाप निकाल कर उसपर काम करने लगा। 

हां, आज गर्वित की हार्दिक इच्छा यही थी कि” अपने काम पूर्ण कर ले। अब वो समय से और इस जीवन से, दोनों से ही उकता चुका था। इसलिये अपने काम को अधूरा नहीं छोड़ना चाहता था।.....तभी तो जैसे ही उसकी अंगुलियाँ लैपटाप के की-बोर्ड पर थमी, उसने हिचकी ली और सोफे पर लुढ़क गया। गर्वित शांत हो गया, स्थिर हो गया वह भी सदा के लिए। 

उसकी सांसें थम गई और उसके मुंह से झाग निकलने लगे। तो स्पष्ट ही था कि उसने जहर खाया था, जिसका असर पूर्ण रुप से हो चुका था। हां, अब उसको मुक्ति मिल गई थी दुश्चिंताओं के बादल से, जीवन के कंकड़ीले पथ पर चलने से। तभी तो वो बिल्कुल शांत होकर सोफे पर पसरा हुआ था, क्योंकि उसकी" मृत्यु हो चुकी थी"।

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सलिल अपने पूरे दल-बल के साथ पुलिस स्टेशन लौट आया था और अभी फाइलों में उलझा हुआ था। जबकि उसके आदेश अनुसार रोमील ने होटल स्टाफ एवं आलोक को ले जाकर लॉकअप में बंद कर दिया था और सम्यक, लवण्या एवं बलजीत को गेस्ट रूम में बिठा दिया था। 

वैसे तो सलिल की इच्छा थी कि इन लोगों से जल्द से जल्द बात करें, परंतु पहले ऑफिस के काम भी निपटाने थे। ऐसे में वो रात बारह बजे तक फाइलों की खाना पूर्ति करता रहा और फिर काम निपटाने के बाद गेस्ट रूम में पहुंचा। वहां पहुंचते ही उसकी आँखों ने सर्वप्रथम देखा कि रोमील गहरी निंद में सो रहा था, जबकि सम्यक, लवण्या और बलजीत कुर्सी पर बैठे थे और उनकी उचटती नजर रूम में घूम रही थी।

अच्छा!....तो तुम ही वो लोग हो, जो सान्या का पीछा कर रहे थे?....सलिल ने रोमील को सोते हुए ही रहने दिया और उन तीनों के करीब कुर्सी खींच कर बैठते हुए बोला, साथ ही उसकी नजर तीनों पर अटक गई। जबकि तीनों उसके आने के कारण चौंक उठे थे, उसपर पूछा गया प्रश्न, तीनों ही एक साथ बोल पड़े।

ज.....जी सर!

वो तो ठीक है, परंतु तुम तीनों उसका पीछा क्यों कर रहे थे? उन तीनों के जबाव सुनकर सलिल ने दूसरा प्रश्न दाग दिया और जैसे ही उसने प्रश्न पूछा, बलजीत उतावले पन के साथ बोला।

सर!....मैं तो उसके पीछे इसलिये लगा था कि मौका मिलते ही टपका दूंगा। लेकिन वो तो बहुत कुत्ती चीज थी। न जाने उसके कितने दुश्मन थे, जो उसे कोई दूसरा ही टपका गया। अपने अंतिम शब्द बलजीत हिकारत भरे स्वर में बोला। जबकि उसके जबाव सुनकर सलिल चौंका, फिर उसने बलजीत से दूसरा प्रश्न किया।

लेकिन तुम उसको टपकाना क्यों चाहते थे?

हां सर, मैं ने कहा न कि वो बहुत कुत्ती चीज थी?

 सलिल के प्रश्न का जबाव बलजीत ने नफरत भरे स्वर में दिया, जिसे सुनकर सलिल की आँखें आश्चर्य से फैल गई। जबकि उसके बाद बलजीत उसे बताने लगा कि किस प्रकार से वो पहली बार "सान्या सिंघला" से मिला था और उसने किस प्रकार से बलजीत के पुरुषत्व का अपमान किया था।

...भला वो किस प्रकार से अपने साथ हुए अपमान को सहन कर सकता था। इस कारण से ही उसने सोच लिया था कि सान्या को ठिकाने लगाकर ही रहेगा।....किन्तु उसकी योजना जबतक कि कामयाब होती, कोई दूसरा ही उसको टपका गया। इतनी बातें बोलने के बाद बलजीत ने लंबी सांस ली और फिर मौन हो गया। उसे मौन हुआ देखकर सलिल समझ चुका था कि उसके पास आगे की जानकारी नहीं है। इसलिये वो सम्यक एवं लवण्या से मुखातिब हुआ।

फिर तो सम्यक एवं लवण्या ने उसे जो बतलाया, उसके होश उड़ाने के लिए काफी था। दोनों ने पहले तो उसे यह बतलाया कि दोनों ही हत्यारे को और सान्या को अच्छी तरह से जानते थे।....उनके इतना भर बोलने से कि वे हत्यारे को जानते है,....सलिल की उत्कंठा बढ़ गई।

जबकि सम्यक उसे बतलाने लगा कि” किस प्रकार से काँलेज के समय से वे सभी आपस में सहपाठी थे। लेकिन सान्या सिंघला की अति तीव्र महत्वाकांक्षा ने ही उसके जीवन को लील लिया। वो उसके अय्याश मिजाजी के बारे में बतलाने लगा। साथ ही उसे यह भी बतलाया कि किस प्रकार से गर्वित और सान्या एक दूसरे के अत्यधिक करीब आ गए थे।

सलिल आश्चर्य के सागर में गोते ही लगा रहा था कि” लवण्या उसे बतलाने लगी कि सान्या की हत्या गर्वित सक्सेना ने ही की है।....किन्तु किन कारणों से उसने इस प्रकार के जघन्य अपराध किए है, इसकी जानकारी उसे नहीं है। वैसे भी सान्या के स्वभाव के बारे में बलजीत ने पहले ही बतला दिया था, तो अभी फिलहाल सलिल की इच्छा आगे जानने की बिल्कुल भी नहीं थी।

..वह तो इस बात को अच्छी तरह से जानता था कि हत्यारे के नाम का खुलासा हो ही चुका है। तो बाकी बाते हत्यारे से पुछ लेंगे। अभी तो उसकी प्राथमिकता थी कि हत्यारे को पकड़ ले। इसलिये उसने सम्यक से इस बात की जानकारी लेनी चाही कि गर्वित कहां मिलेगा?....परन्तु सम्यक ज्यादा नहीं बता सका, हां, उसने बताया कि गर्वित का यमुना किनारे जंगलों में बहुत बड़ा फार्म हाउस है।

बस इतनी ही हिंट मिलने की जरूरत थी सलिल को, उसने रोमील को जगा दिया। अचानक ही इस प्रकार से कच्चे निंद से जगाए जाने पर रोमील बौखलाया हुआ था, जबकि सलिल ने उसकी हालत नहीं देखी और साथ चलने का आदेश सुना दिया। 

फिर क्या था, वे लोग बाहर निकले और स्काँरपियों के करीब पहुंचे। हां, सलिल ने इस बात का ध्यान रखा था कि उसने सम्यक एवं लवण्या को साथ ले-लिया था। फिर तो उन लोगों के बैठते ही रोमील ने कार श्टार्ट की और कंपाऊंड से निकाल कर सड़क पर दौड़ा दिया। गाड़ी ने रफ्तार पकड़ा और सलिल के विचारों ने भी रफ्तार पकड़ लिया।

सलिल के दिमाग में यही बात चलने लगा कि कहीं उसे उस परिस्थिति से सामना न हो जाए, जिसकी भविष्यवाणी महात्मा जी ने की है। क्योंकि उन्होंने जो कहा था, उसमें एक बात तो सत्य हो चुकी थी। ऐसे में इस बात की प्रबल संभावना थी कि दूसरी बातें भी सत्य ही होगा। इस परिस्थिति में वह क्या करेगा?.....क्योंकि फिर तो गुत्थियां सुलझने की बजाए और भी उलझ जाएगा। 

सलिल इस बात को भली-भांति समझता था कि "अगर हत्यारा" ही जीवित हाथ नहीं लगे, उस परिस्थिति में केस को सुलझाना टेढी खीर खाने के समान था। बस इसी बात की आशंका को लेकर वह व्यग्र हो चुका था, लेकिन अपनी व्यग्रता किससे कहे?

रोमील के सामने अभी फिलहाल तो वो अपनी आशंका को बयान नहीं कर सकता था। क्योंकि अभी कार में मौजूद लवण्या एवं सम्यक उसके लिए दुविधा थे। बस इन्हीं बातों को विचार ही रहा था कि तभी स्काँरपियों ने "चंद्रिका वन" के गेट से प्रवेश किया और प्रांगण में रुकी। 

कार रुकते ही सभी फटाफट बाहर निकले और बिल्डिंग की ओर बढे और जैसे ही उन्होंने हॉल में कदम रखा,.....उन लोगों के होंठों से चीख निकलते-निकलते बची। क्योंकि बात ही ऐसी थी। वहां टेबल पर लैपटाप औंधे रखा हुआ था एवं सोफे पर गर्वित पसरा हुआ था। उसकी पथराई आँखें छत की ओर देख रही थी और मुंह से निकला झाग सुखकर नीला पड़ चुका था।

सलिल की अनुभवी आँखों ने देखकर समझ लिया कि "गर्वित के प्राण पखेरू उड़े ज्यादा समय नहीं हुआ था"। इधर लवण्या ने जैसे ही गर्वित की लाश देखी, दहाड़े मार कर रोने लगी। इस परिस्थिति में मामला और न बिगड़े, इसलिये सलिल ने सम्यक की ओर देखा और सम्यक लवण्या को संभालने में लग गया। जबकि सलिल ने कलाईं घड़ी देखी, रात के एक बज चुके थे। 

तब उसने पुलिस स्टेशन फोन करके इसकी जानकारी दी, साथ ही आगे की कार्रवाई के लिए निर्देश दिए। फिर फोन डिस्कनेक्ट होने के बाद उसने रोमील को समझाया कि उसे क्या करना है।

रोमील को तो आदेश मिलने की देर थी, उसने लैपटाप उठाया और ले जाकर स्काँरपियों में रख आया। इधर सलिल उन लोगों को छोड़कर बिल्डिंग को देखने के लिए निकला। उसकी नजर आगे बढ़ते हुए एक-एक चीज पर फिसलती जा रही थी,....किन्तु उसके आँखों में एक भी ऐसी वस्तु नहीं टकराई, जो उसके काम की हो। इस तरह से उसने पूरी बिल्डिंग छान मारा, लेकिन उसे काम की एक भी चीज नहीं मिली। 

फिर वो वापस हॉल में लौट कर आया, तब तक उसकी टीम आ चुकी आ चुकी थी और उन्होंने काम की शुरुआत भी कर दी थी। समय बीतने के साथ ही लाश का पंच नामा भर दिया गया और लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया।

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रात के तीन बजे सलिल अपने पूरे लाव-लश्कर के साथ "चंद्रिका वन" से निकला और जैसे ही वहां से निकला, सभी को पुलिस मूख्यालय चलने के आदेश सुना दिए। वह जानता था कि मामला अत्यंत गंभीर है, ऐसे में रिश्क लेना उचित नहीं होगा। इसलिये वो पुलिस मूख्यालय पहुंचकर बाँस को इस केस की सिलसिलेवार जानकारी देना चाहता था। परंतु अभी तो एक घंटे का समय लगना था पुलिस मूख्यालय पहुंचने में।....तो क्यों नहीं थोड़ा काम ही कर लिया जाए, सोचकर उसने " गर्वित के लैपटाप को निकाल लिया" और खोलने की कोशिश करने में तल्लीन हो गया।

वैसे भी इस समय उसके साथ गाड़ी में सम्यक, लवण्या एवं ड्राइव कर रहे रोमील के अलावा कोई नहीं था,....अतः किसी प्रकार की सूचना लीक होने का डर बिल्कुल भी नहीं था। इसलिये उसने थोड़े से प्रयास किए और कंप्यूटर का लॉक खुल गया,....क्योंकि अचानक ही उसे सुझा था कि इस केस में "रति संवाद" कोर्ड वर्ड के रुप में इस्तेमाल किया गया था। 

लैपटाप खुलते ही सलिल के होंठों पर "सहज ही प्यारी" मुस्कान छा गई।.....फिर तो वो फाइलों को खंगालने लगा और जो उसके हाथ सफलता लगी, वह खुशी से उछल ही तो पड़ा। फिर तो वो  "रति संवाद" नाम के फोल्डर को खोलकर उसमें स्टोर किए फाइलों को पढने लग।

फिर क्या था!.....जैसे-जैसे वो फाइलों को पढता जा रहा था, उसके चेहरे पर आश्चर्य के भाव बढ़ते जा रहे थे। उसे तो विश्वास ही नहीं हो रहा था कि क्या ऐसा भी होता है?.....जीवन किसी के साथ इतना क्रूर मजाक भी करती है क्या?....क्या संपन्न परिवार में जनम लेने के बाद भी इंसान "हताशा" का शिकार हो सकता है?....ये प्रश्न ऐसे थे, जिसका जबाव उन फाइलों में लिखा था। 

ऐसे में विश्वास करने या नहीं करने का तो कोई मतलब ही नहीं था। इसलिये वो दिलचस्पी के साथ उन फाइलों में लिखे इबारतों को पढता जा रहा था और आश्चर्य के सागर में गहरा और गहरा उतरता जा रहा था, तल्लीन होकर।

उसे इस प्रकार से आश्चर्य के सागर में गोते लगाते देखकर रोमील के मन में भी जिज्ञासा उत्पन्न हो रही थी इस बात को जानने की, जिसने उसके बाँस को आकंठ आश्चर्य में डुबा दिया था।.....वैसे तो रोमील ड्राइव करने में तल्लीन था, वह इस बात को अच्छी तरह से जानता था कि अभी उसकी गाड़ी महानगर की सड़क पर है। ऐसे में थोड़ी सी भी चुक हुई और "दुर्घटना घटते देर नहीं लगेगी"। इसलिये वो पूरी दक्षता के साथ ड्राइव कर रहा था, लेकिन वो अपने मन का क्या करें?

...जो कि सलिल के चेहरे के भावों को देखकर व्यग्र होता जा रहा था, इस बात को जानने के लिए कि बाँस आखिरकार इतने तल्लीन होकर क्या पढ रहे है?....वैसे तो उसकी इतनी हिम्मत ही नहीं थी कि बाँस से सीधा प्रश्न पुछ ले, परंतु इसका मतलब यह तो नहीं कि उसके अंदर इस बात को जानने की इच्छा ही नहीं जगे।

इधर सम्यक एवं लवण्या की भी नजर सलिल के उपर ही टिकी थी। वैसे तो दोनों बीच वाली सीट पर बैठे थे, इसलिये सलिल के चेहरे के भावों को नहीं देख पा रहे थे।.....किन्तु उसकी तल्लीनता को देखकर इतना तो जरूर समझ गए थे कि सलिल ने इस केस से जुड़ी कोई जानकारी "गर्वित के लैपटाप में देख ली है, तभी तो वो इतना तल्लीन होकर पढे जा रहा है। 

लेकिन उसके हाथ ऐसी क्या जानकारी लगी होगी?...यह प्रश्न थे, जो दोनों के दिमाग में उठे थे और वे दोनों इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए लालायित भी थे।.....परंतु किस प्रकार से?....यह भी तो एक प्रश्न ही था, क्योंकि सलिल से दोनों की किसी प्रकार की पहचान नहीं थी। आज से पहले दोनों ने ही सलिल को नहीं देखा था, तो किस प्रकार से बातचीत की शुरुआत करें? किस प्रकार से सलिल को कहे कि सर!....आप जो पढ रहे हो, उसके बारे में हमें भी बतला ही दो। उसपर आफत ये कि सलिल के स्वभाव से दोनों ही अंजान थे, ऐसे में उन्होंने बात की शुरुआत की और सलिल बुरा मान गया तो?

यह भी तो एक गंभीर प्रश्न ही था, जिस कारण से दोनों ने चुप्पी साध रखी थी। इधर सलिल इन सभी बातों से बेखबर हो कर चुपचाप फाइलों को पढता ही जा रहा था, तभी तो उसे पता ही नहीं चला कि कार ने मूख्यालय गेट से प्रवेश किया और प्रांगण में पार्क हो गई। लेकिन गाड़ी ने जब हिचकोले लिया, सलिल की तंद्रा टूटी और उसने नजर उठाकर देखा, उसकी कार मूख्यालय के कंपाऊंड में खड़ी थी। 

ऐसे में उसने कलाईं घड़ी देखी, सुबह के चार बज चुके थे, फिर उसने लैपटाप कार में ही रख दिया और सम्यक एवं लवण्या को समझाया कि उनके आने तक दोनों "कार के अंदर ही रहे"। इसके बाद सलिल, रोमील के साथ कार से बाहर निकला और मूख्यालय बिल्डिंग की ओर बढ़ गया, सधे हुए कदमों के साथ।

और जैसे ही उसने एस. पी. साहब के ऑफिस में कदम रखा, चौंका!....उसके चौंकने का कारण था कि एस. पी. साहब इंस्पेक्टर विजय गोत्रा से बात कर रहे थे। सलिल के लिए एस. पी. साहब के साथ बात करना कोई नई बात नहीं थी। उसके लिए चौंकने का तो कारण यह था कि इंस्पेक्टर विजय करप्ट और भ्रष्ट था।.....ऐसे में इस समय उसकी उपस्थिति, आखिर मामला क्याहै? 

चौंकने के साथ ही सलिल के जेहन में यह प्रश्न दौड़ गया। जबकि एस. पी. साहब ने जैसे ही उन दोनों को देखा, उनके होंठों पर मुस्कान उभड़ी। फिर उसने दोनों को बैठने के लिए इशारा किया और उनके बैठते ही सलिल के आँखों में झांककर धीरे से बोले।

सलिल!....ये है इंस्पेक्टर विजय और इनको मैंने ही यहां बुलाया है। वैसे मैं बात को लंबा नहीं करना चाहता, इसलिये सीधे ही बतला देता हूं कि इंस्पेक्टर विजय अब आगे इस केस की विवेचना करेंगे। अतः तुमने अब तक इस केस में जितनी भी छानबीन की है, इन्हें बतला दो।

लेकिन सर!....इससे तो केस और भी उलझ जाएगा! एस पी साहब की बात सुनते ही सलिल दबी जुवान में बोला। जबकि उसकी बातें सुनकर एस. पी. साहब गंभीर होकर बोले।

सलिल!.....तुम इसकी चिन्ता छोड़ दो ओर मैंने जो कहा है, उस आदेश का पालन करो।

एस. पी. साहब ने कहा और इसके बाद चुप्पी साध ली। इसके बाद तो, सलिल समझ चुका था कि अब कुछ नहीं होने वाला है। इसलिये वह इंस्पेक्टर विजय को "इस केस के बारे में सब कुछ बता दिया, सिर्फ लैपटाप की बरामदगी को छोड़ कर। इसके बाद तो एस. पी. साहब ने " प्रेस रीलिज" बुलाया और मीडिया वाले को इस केस के बारे में बताने लगे। 

उन्होंने तथ्यों को तोड़- मरोड़ कर मीडिया के सामने पेश किया। उन्होंने मीडिया को बताया कि "इस हत्याकांड को भूत ने अंजाम दिया है और तांत्रिक भूत नाथ ने अब उस भूत को नियंत्रित कर लिया है"। लेकिन अफसोस कि पुलिस उन चार लड़की और एक लड़का "गर्वित सक्सेना" को नहीं बचा सकी।

इसके बाद सुबह छ बजे प्रेस रीलिज खतम हुई। इसके बाद सलिल एस. पी. साहब से अनुमति लेकर उनके ऑफिस से निकला,....अपने मन में ढेरो सवाल लिए। सलिल सोचने पर विवश हो चुका था कि आखिर एस. पी. साहब ने इस प्रकार का कदम क्यों उठाया, जबकि उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था? 

सलिल जानता था कि एस. पी. साहब ईमानदार और कर्तव्य निष्ठ है, तो फिर इस प्रकार के फैसले?.....सलिल इस बात को भी भलीभाँति जानता था कि एस. पी. साहब किसी के दबाव में भी आने वाले नहीं है। तो फिर उन्होंने सिर्फ अपनी भूल को सत्य करने के लिए ऐसी हरकत की?....हां, यही बात हो सकता था। सलिल इन्हीं बातों को सोचते हुए गाड़ी के पास पहुंचा, गाड़ी में बैठा और गाड़ी चल पड़ी।

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पंद्रह अक्तुबर के सुबह आठ बजे।

इलेक्ट्राँनिक मीडिया एवं प्रिंट मीडिया में "रति संवाद" सुर्खियों में छाया हुआ था। स्वाभाविक ही था कि यह जन- मानस के बीच चर्चा का केंद्र बने। ऐसे में शहर के हर इक गली, हर एक चौक चौराहे पर बस एक ही बात हो रही थी कि "क्या भूत होते है और वे इस प्रकार की हत्याओं को अंजाम देने में सक्षम भी होते है?....प्रश्न ऐसे थे, जिसका जबाव किसी के पास भी नहीं था, परंतु खबर भी ऐसी थी कि किसी के गले उतरे, इतना आसान नहीं था।

किन्तु मीडिया वाले दिखा रहे थे, तो अविश्वास भी नहीं किया जा सकता था। वह भी उस परिस्थिति में, जब पुलिस वाले खुद सामने आकर कह रहे हो कि हां," इन हत्याओं के पीछे प्रेतात्मा का हाथ है"। साथ ही वे कह रहे हो कि अब डरने की कोई बात नहीं है, क्योंकि तांत्रिक भूत नाथ ने प्रेतात्मा को कैद कर लिया है। 

ऐसे में सामान्य जन मानस तो थोड़ी ना-नुकर के बाद इसे स्वीकार करने को तैयार ही थी। लेकिन सम्यक एवं लवण्या इस बात को किस प्रकार से स्वीकार करते। अभी दोनों टीवी के सामने बैठकर न्यूज ही देख रहे थे और मीडिया बालों की रिपोर्टिंग देखकर आश्चर्य के सागर में डूबते जा रहे थे।

वैसे वे अभी दस मिनट पहले ही मुक्ता अपार्ट मेंट पर लौटे थे और आते ही न्यूज देखने के लिए टीवी के सामने जम गए थे। वैसे ही सम्यक रात की बातों को लेकर घबराहट में था, तभी तो लवण्या को वो अपने साथ ले आया था। परंतु टीवी पर आते हुए न्यूज को देख कर दोनों ही घबराहट भूल गए थे और उसकी जगह आश्चर्य ने उनके चेहरे पर डेरा जमा लिया था। 

बात ही ऐसी थी कि जो उनके आँखों देखी घटना थी, “पुलिस के द्वारा उसपर पर्दा डाला जा रहा था। ऐसे में उन दोनों के हृदय में हलकी बेचैनी भी जगह बनाने को आमादा थी। क्योंकि दोनों ही जानते थे कि "हत्या जैसी वारदात बिना कारण के अंजाम नहीं दिया जाता"।

वैसे भी दोनों गर्वित सक्सेना से अच्छी तरह परिचित थे और जानते थे कि "गर्वित चाहे लाख बुरा हो,....किन्तु ऐसा तो बिल्कुल भी नहीं था कि इस प्रकार के काम करें"। इस प्रकार से सीरियल हत्याओं को अंजाम देना,....फिर खुद को भी खतम कर लेना। 

यह तो संभव ही नहीं था कि बिना किसी कारण के हो। वे जानते थे कि गर्वित जिंदा दिल इंसान था, भले ही अय्याशी उसका शौक़ हो, परंतु बाकी मामलों में तो ठीक ही था। फिर उसने इस प्रकार के कदम को क्यों उठाया?... उसकी ऐसी क्या मजबूरी थी कि इस प्रकार के "वारदात करने को उद्धत हो गया?

प्रश्न अतिशय गंभीर था, किन्तु इसके उत्तर मिलने की गुंजाइश नहीं के बराबर थी। क्योंकि जिससे आशा थी कि इस केस के बारे में खुलासा करेंगे और इसके "राज" से पर्दा उठाएंगे। उन्होंने ही, यानी पुलिस ने इस पर पर्दा डाल दिया था और इसे "भुतिया" कांड साबित करने पर तूली हुई थी। 

ऐसे में क्या किया जा सकता था?.....मंथन करने पर भी उनको रास्ता नहीं सुझा, तब सम्यक ने लवण्या को काँफी बनाने को कहा। फिर क्या था, लवण्या किचन में चली गई और सम्यक फिर से मंथन करने में जूट गया। फिर तो लवण्या काँफी बना कर ले आई और दोनों काँफी पीने लगे और जब दोनों को ताजगी महसूस हुई, सम्यक ने सुझाव दिया कि हमें इंस्पेक्टर सलिल से मिलना चाहिए और उसकी बाते सुनते ही लवण्या ने अपने स्वीकृति की मुहर लगा दी।

बस, फिर क्या था, दोनों अपार्ट मेंट से बाहर निकले, कार में बैठे और कार श्टार्ट करके सड़क पर दौड़ा दी। लेकिन ड्राइव करता हुआ सम्यक अभी भी इन्हीं बातों में उलझा था कि अब क्या होगा?.......क्या सलिल उसकी मदद करेगा अपने ऑफिसर के विरुद्ध जाकर?.....क्या इस केस के "महत्वपूर्ण तथ्य" बाहर आ सकेगा?....या फिर उसकी सारी कोशिशें व्यर्थ हो जाएगी। 

सम्यक इन बातों को भलीभाँति जानता था कि कोई भी ऑफिसर अपने सीनियर के विरुद्ध जाने की हिम्मत नहीं कर पाता, या यूं कहें कि वो रिश्क लेना नहीं चाहता। ऐसे में सलिल की प्रतिक्रिया क्या होगी?....इसका जबाव तो भविष्य के गर्त में था।

परंतु सम्यक बस इतनी बातों को लेकर अपने प्रयास तो नहीं छोड़ सकता। उसकी इच्छा यही थी कि "इस केस के वे तथ्य, जिसके लिए हत्याएँ की गई है, बाहर आए। उसे तो बस यही जानना था कि” किन कारणों से "गर्वित ने इन हत्याओं को अंजाम दिया था"?

किन्तु इस राज पर से तो पर्दा तभी उठेगा, जब सलिल की रजामंदी होगी। बस इन्हीं बातों को सोचते हुए सम्यक कार को दौड़ाए जा रहा था और ठीक साढे़ नौ बजे वो सलिल के आवास पर पहुंचा। कार पार्क करने के बाद दोनों बाहर निकले और मुख्य द्वार की ओर बढे।.....लेकिन अभी वो गेट के करीब पहुंचे भी नहीं थे कि गेट खुला और रोमील उनकी ओर बढ़ा।

रोमील उनको लेकर अंदर हॉल में आ गया, जहां सलिल सोफे पर बैठा हुआ था और उसकी नजर टीवी पर आ रहे न्यूज पर ही टिकी थी। जब उन लोगों ने हॉल में कदम रखा, सलिल ने उन्हें बैठने के लिए इशारा किया, परंतु नजर टीवी पर ही टिकाए रहा। जबकि रोमील उन लोगों को छोड़ कर किचन की ओर बढ़ गया, एवं थोड़ी देर में ही काँफी बना लाया। 

फिर तो वे सभी काँफी पीने लगे, लेकिन इस दरमियान भी सलिल की नजर एक पल के लिए भी टीवी स्क्रीन से नहीं हटी। ऐसे में  सम्यक एवं लवण्या को लगने लगा कि कहीं सलिल उन्हें इग्नोर तो नहीं कर रहा। परिस्थिति भी तो ऐसी ही थी, उन दोनों को आए हुए पंद्रह मिनट हो चुके थे, किन्तु सलिल के मुख से एक भी शब्द नहीं निकला था।

सम्यक एवं लवण्या!.....तुम दोनों जो सोच रहे हो, ऐसी कोई बात नहीं। मैं तो बस न्यूज को देख रहा था और समझने की कोशिश कर रहा था कि” किस प्रकार से न्यूज को तोड़- मरोड़ कर पेश किया जा सकता है। तुम लोग मेरे पास जरूर आओगे, यह मैं जानता था, इसलिये उपेक्षा करने वाली बात सही नहीं है। अचानक ही सलिल उन दोनों की ओर मुड़ा और गंभीर होकर बोला। जबकि उसकी बातें सुनकर सम्यक एवं लवण्या अचंभित होकर एक साथ बोले।

सर!.....ऐसी बात बिल्कुल भी नहीं है।

बात नहीं है से मतलब? ऐसा ही है, तुम लोग उपेक्षित महसूस कर रहे थे, इसलिये मुझे बोलना पड़ा। सलिल उन दोनों की बात खतम होते ही मुस्करा कर बोला। जबकि उसकी बातें सुनकर सम्यक हौसला जुटाकर बोला।

तो फिर सर!.....आप यह भी जानते ही होंगे कि मैं यहां पर क्यों आया हूं?.....सम्यक ने अपनी बात पूरा किया और नजर सलिल के चेहरे पर टिका दी। जबकि उसकी बातें सुनकर सलिल गंभीर होकर बोला।

हां, जानता हूं तुम लोगो के आने का कारण। सच मानो तो मैं भी जब से बंगले पर लौटा हूं, इसी मंथन में लगा हूं कि इस केस में क्या किया जा सकता है। बोलने के बाद सलिल एक पल के लिए रुका, फिर आगे बोला।....परन्तु तुम जितना समझ रहे हो, यह उतना आसान नहीं है, यह बात समझ लो।

इसके बाद दोनों में बहुत देर तक बातें होती रही। इस बीच रोमील एवं लवण्या चुप ही रहे, जबकि सम्यक अपने मन की दुश्चिंताओं को सलिल से बताता रहा और सलिल उसकी बातों का उत्तर देता रहा। इसके बाद सलिल ने दोनों को आश्वस्त किया कि "जल्द ही इस मामले में ऐसा कोई कदम उठाया जाएगा, जिससे इस केस को पूर्ण न्याय मिल सके। 

सलिल के द्वारा कहे जाने पर सम्यक आश्वस्त हो गया। उसे इस बात की भलीभाँति जानकारी थी कि सलिल ऐसे ही कोई बात नहीं बोलता। जरूर इसके लिए उसके दिमाग में कोई योजना चल रहा होगा। इसलिये सम्यक एवं लवण्या ने सलिल से विदा ली और हॉल से निकल गए।

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सम्यक एवं लवण्या जा चुके थे, किन्तु सलिल अपनी जगह से हिला भी नहीं था। उसकी आँखें शून्य में टिकी हुई थी, तो स्वाभाविक ही था कि वो किसी महत्वपूर्ण विषय पर उलझा हुआ हो। उसे इस प्रकार से विचार मग्न देखकर रोमील बेडरूम में सोने के लिए चला गया था, क्योंकि उसकी जानकारी के अनुसार इस केस में करने लायक कुछ भी तो नहीं बचा था।

लेकिन सलिल, वो किस प्रकार से अपने मन को मनाता, क्योंकि इस केस में उसने कितनी कोशिशें की थी, इसे साँल्व करने के लिए दिन रात एक कर दिया था। परंतु उसके मेहनत पर तुषारापात हुआ हो जैसे। उसके बाँस ने उसकी परवाह किए बिना ही अपना तुगलकी फरमान सुना दिया था। 

तो फिर अब बचा ही क्या रह गया था, बस अफसोस करने के सिवा। लेकिन सलिल, वो किस प्रकार से सच्चाई से आँख मुंद ले। उसे तो याद भी नहीं कि जिंदगी में उसने कभी हार माना हो। उसने आज तक जिस बात को भी ठाना, पूरा करके ही दम लिया। किन्तु.....जीवन में पहली बार वो अपने-आप को इस तरह से लाचार महसूस कर रहा था।

बात इतनी सी भी होती, तो चल जाती। परंतु सम्यक एवं लवण्या ने आकर उसके हृदय की धड़कन को बढ़ा दिया था। उसने देखा था उन दोनों के आँखों में, आशाएँ थी, सलिल के कर्तव्य निष्ठा के प्रति एक अजीब सा विश्वास था। अब भला सलिल उनको किस प्रकार से समझाता कि तुम लोग जो विश्वास लेकर आए हो, वह सब व्यर्थ है। मैं भी तो सरकारी मुलाजिम हूं और मेरे काम करने की सीमा का भी निर्धारण किया गया है। 

तुम लोग जैसा समझ रहे हो, उतना स्वतंत्र नहीं हूं मैं कि हर एक फैसले खुद ही ले-लूं।.....सरकार ने मेरे ऊपर भी बाँस बिठा रखे है और यहां बाँस का फैसला ही अंतिम फैसला होता है। यहां पर खुद से फैसले लेने की अनुमति नहीं है, क्योंकि यह पुलिस डिपार्टमेंट है।

परंतु....उसमें इतनी साहस नहीं थी कि इन बातों का सामना कर सकता। या फिर उन दोनों को साफ लहजे में कह देता कि तुम लोग व्यर्थ यहां आए हो। तुम जानते हो कि हम लोग पुलिस महकमे में है और हमारी सीमाएँ निर्धारित कर के रखी गई है।....हम अपने बाँस के निर्णय की खिलाफत नहीं कर सकते और इसलिये "मैं तुम लोगों की मदद करने में असमर्थ हूं।....नहीं कह सका वो इन बातों को, तभी तो दोनों के जाने के बाद भी बैठा हुआ विचारों की माला गूंथ रहा था।

....बात ऐसी भी नहीं थी कि उसे थकावट नहीं थी, लगातार चार रातों की भागदौड़ ने उसके शरीर को तोड़ कर रख दिया था। उसे इस समय आराम की सख्त जरूरत थी,....परंतु सम्यक एवं लवण्या से मिलने के बाद उसका मन "चैन ही नहीं ले रहा था"।

उसके मन की अजीब सी स्थिति थी, अजीब से घुटन को वो महसूस कर रहा था। तभी उसने देखा कि गेट के अंदर किसी ने कदम रखा हो जैसे। हां, वे महात्मा जी ही थे, जो उसकी तरफ बढे चले आ रहे थे। बस उसके हृदय में अनुराग एवं श्रद्धा का प्रष्फुटन हुआ। 

फिर तो सलिल सोफे से उठा, आगे बढ़ा और महात्मा जी के चरण में शीश को झुका दिया। महात्मा जी ने भी स्नेह से उसके सिर पर हाथ फेरा और फिर दोनों आकर सोफे पर बैठ गए। किन्तु वहां नितांत चुप्पी छाई रही, जिसे महात्मा जी ने यह कह कर तोड़ा कि सलिल, तुम्हें अभी एनर्जी की जरूरत है।....तुम काँफी बनाकर लाओ, हम भी पीएंगे और बातें करेंगे। बस महात्मा जी का आदेश, सलिल काँफी बनाकर ले आया, फिर दोनों पीने भी लगे, लेकिन उनके बीच चुप्पी छाई ही रही। जिसे महात्मा जी ने अपने शब्दों से तोड़ा।

वत्स!....देख रहा हूं कि तुम किसी बात को लेकर शंकित हो?

हां, बाबा!....इस केस में अंतिम मुहाने पर उलझ गया हूं। अब समझ ही नहीं पा रहा हूं कि कदम किधर को बढ़ाऊँ। क्योंकि एक तरफ जाता हूं, तो दायित्व भंग होता है और दूसरी तरफ कोप भाजन बनने का डर है। महात्मा जी की बातें सुनते ही सलिल बोल पड़ा। जबकि महात्मा जी उसकी बातों को सुनकर मुस्कराए, फिर उसकी आँखों में झांककर बोले।

वत्स!.....वैसे तो दायित्व का निर्वहन ही मनुष्य के लिए उत्तम मार्ग होता है। क्योंकि धर्म का यही पथ है और इससे डिगना, मतलब खुद का नुकसान करना। बोलने के बाद महात्मा जी एक पल रुके, फिर बोले। वैसे तुम बीच का मार्ग भी अपना सकते हो। इससे तुमपर अंगुलियां उठने के आसार कम ही रहेंगे और तुम्हारा दायित्व भी पूर्ण हो जाएगा। महात्मा जी ने अंतिम के शब्दों पर जोड़ देकर कहा और सलिल की आँखों में देखने लगे। जबकि उनकी बातें सुनकर सलिल उत्साहित होकर बोला।

समझ गया बाबा!.......आपने जो कहा अक्षरशः: समझ गया हूं।

इसके बाद महात्मा जी करीब पंद्रह मिनट तक सलिल से बातें करते रहे और फिर उन्होंने विदा ली। उनके जाने के बाद सलिल भी अपनी जगह से उठा और तैयार होने के लिए वाथरुम में चला गया। वैसे भी महात्मा जी के बातों ने उसके अंदर नवीन ऊर्जा का संचार कर दिया था। सलिल जब बंगले से बाहर निकला, सुबह के साढे़ नौ बज चुके थे, किन्तु उसे समय की चिन्ता बिल्कुल भी नहीं थी।

.....तभी तो वो स्काँरपियों में बैठा, श्टार्ट की और आगे बढ़ा दी। इस बात का विचार करते हुए कि वो वकील शांतनु देव से मिलेगा। शांतनु देव उसका मित्र था और उसकी सहायता जरूर करेगा, यह उसको विश्वास था। तभी तो गाड़ी को तेज रफ्तार में दौड़ाए जा रहा था, नवीन आशाओं से पल्लवित होकर।

आखिरकार उसने कार को रोहिला अपार्ट मेंट के सामने खड़ी की। उसे मालूम था कि इस पूरे बिल्डिंग में वकीलों के ही ऑफिस है। इसलिये कार खड़ी होते ही वह बाहर निकला और बिल्डिंग के मुख्य द्वार की ओर बढ़ गया। चलते-चलते उसने समय भी देख लिया, दिन के दस बजे थे।

....तो शांतनु देव अभी अपने ऑफिस में ही होगा। सोचते हुए सलिल एक ऑफिस के सामने रुका, जिसपर "शांतनु देव" का बोर्ड लगा था, फिर तो तेजी से अंदर प्रवेश कर गया। अंदर अत्याधुनिक ऑफिस में रिवाल्विंग चेयर पर बैठा हुआ तेईस-चौबीस वर्ष का युवक, जिसकी आँखें लैपटाप के स्क्रीन पर टिकी थी और हाथ की-बोर्ड पर चल रहे थे।

शांतनु देव, लंबा छरहरा बदन, घुंघराले बाल, पतली नाक, आँखों की उजली पुतली और श्यामला रंग। लेकिन चेहरे की बनावट आकर्षक थी, जो उसे सुंदर दिखाती थी। शांतनु देव ने जैसे ही गेट खुलने की आवाज सुनी, नजर उठाकर देखा और सलिल को देखकर हर्ष, आश्चर्य एवं उत्साह के साथ उठ खड़ा हुआ और फिर सलिल के पास आने पर हाथ मिलाया, फिर बैठने के लिए इशारा किया और जब दोनों बैठ गए, तब शांतनु देव आश्चर्य मिश्रित स्वर में बोला।

सलिल तुम!.....विश्वास ही नहीं होता कि” तुमने इस गरीब खाने पर कदम रखा है, वैसे सब खैरियत तो है।

अबे.....शांतनु देव के बच्चे!....मसका लगा रहा है क्या? ये तेरा गरीब खाना है, जो मैं आया हूं।अबे....दोस्त हूं तेरा, तो बस तेरी याद आ गई और आ गया। शांतनु देव की बातें सुनकर सलिल मुस्करा कर बोला। जिसे सुनकर शांतनु देव भी मुस्करा पड़ा, फिर बोला।

वैसे बता.....क्या लेगा?....ठंढा या गरम? शांतनु देव मजाकिया लहजे में बोला।

जबकि उसकी बातें सुनते ही सलिल अचानक ही गंभीर हो गया। उसे समझ ही नहीं आ रहा था की बात की शुरुआत कहां से करें। वैसे तो "शांतनु देव" उसका लँगोटियाँ यार था, जिससे कुछ भी छिपाने जैसी बात नहीं थी। सलिल यह भी जानता था कि शांतनु देव उसे इस परिस्थिति से निकलने में जरूर मदद करेगा। फिर भी बात की शुरुआत तो करनी ही होगी, लेकिन कहां से? 

यही तो उसे समझ में नहीं आ रहा था। इधर उसे इस प्रकार से उलझा देखकर शांतनु देव ने उसके ऊपर नजर जमा दी। उसे इतना तो समझ में आ गया था कि सलिल उलझन में है, लेकिन किस प्रकार की?....प्रश्न तो उसके मन में उठा, किन्तु उसे किसी प्रकार की जल्दी नहीं थी। वो चाहता था कि सलिल पूरी तरह सामान्य होने के बाद ही बोले।

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दिन के ग्यारह बज चुके थे और बढ़ते समय के साथ ही "भाव्या बिला में भीड़ बढ़ती जा रही थी"। बात ही कुछ ऐसी थी, कि इस "बिला के खुशियों की नींव में भूकंप ला दिया था।.....आखिर राजीव सिंघला ने कब सोचा था कि वे जिस आजादी का समर्थन करते है, वही आजादी उनके खुशियों को आग लगा देगा। लेकिन अब तो दुर्घटना घट चुकी थी और अब उनके पास सिर्फ पछतावा करने के सिवा कुछ बचा नहीं था। अब तो उनकी दुनिया लूट चुकी थी और अब वे लूटे-लूटे से मातम मना रहे थे।

परंतु किस बात का मातम?....आग तो उनके द्वारा खुद ही लगाया गया था। लेकिन उन्हें कहां मालूम था कि वे जिस दावानल को फूँक मारकर भड़काते आ रहे है, एक दिन उनकी खुशियों को ही लपेटे में ले- लेगा।....किन्तु अब तो घटना घटित हो चुकी थी और अब पछतावा करने से भी कुछ हासिल होने वाला नहीं था। राजीव सिंघला, उन्हें जैसे ही सान्या के मौत की खबर मिली।

सकते में आ गए थे और तब से अब तक हॉल में ही बैठे हुए थे, बिल्कुल मौन होकर।....लेकिन उनके हृदय में तो घमासान मचा हुआ था। वेदना थी कि उनके हृदय को बींध कर बाहर आ जाने को तत्पर थी, परंतु आँख ने तो जैसे आँसू बहाने से बिल्कुल मना कर दिया था।

अंतःकरण की असह्य वेदना से व्याकुल होकर राजीव सिंघला बैठे हुए हर एक आने-जाने वाले को देख रहे थे। लोगों द्वारा दिए जा रहे सांत्वना के शब्द उन्हें तीर की तरह चुभ रहा था।...किन्तु वे किसी को रोक भी तो नहीं सकते थे, क्योंकि यही तो रीति है। 

आने वाला आगंतुक को आपके भावना से मतलब थोड़े ही न होता है, वो तो बस सामाजिक नियमों से बंधा हुआ अपना कर्तव्य समझ कर आपको सांत्वना के दो शब्द सुना जाता है। अब इससे क्या मतलब कि आपको पसंद आता है या नहीं।.....यही तो दुनियादारी है दिखावे भर की, कहेंगे कि हम तो आपके ही साथ है, आपके सुख-दुःख में सम्मिलित है,....परंतु हकीकत में होते नहीं है।

लेकिन वहां पर मौजूद सिंघला की सेक्रेटरी ज्योत्सना ही एक ऐसी थी, जो उनकी व्यथा समझ रही थी। भला वो कैसे नहीं समझ पाती?....उसने तो न जाने कितनी ही बार "उनके स्वार्थ को लेकर चेताया था।....आज जो घटित हुआ था, उसका अंदेशा उसे तो पहले से ही था। 

ऐसे में एक वही थी, जो उनके मन में उठ रहे ज्वार-भांटा का सही-सही आकलन कर सकती थी। तभी तो वो खड़ी -खड़ी शांत नजरों से उनके चेहरे को देखती जा रही थी और सोचती जा रही थी कि आज जो इन्होंने पाया है, इसके बीज को तो बहुत पहले ही बोया था। आज तो उस बीज ने अपने अकार- प्रकार को ग्रहण कर फलीभूत हुआ था। लेकिन जो भी हो, ज्योत्सना उन्हें सहानुभूति भरी नजरों से देख रही थी।

उस राजीव सिंघला को देख रही थी, जो बिजनेस टायकुन कहलाता था। जिसकी धमक तो राजनीतिक गलियारों में थी। लेकिन वही राजीव सिंघला आज बहुत कमजोर था, खुद को लाचार महसूस कर रहा था। क्योंकि जिस संपत्ति को उन्होंने विभिन्न उपक्रम कर के कमाया था। 

वो आज बेकार साबित हुआ था,...क्योंकि उसे भोगने वाला कोई बचा नहीं था। अब इस परिस्थिति में राजीव सिंघला को धैर्य रहता भी तो कैसे?.....उसने जिस संस्कृति को अपने स्वार्थ की खातिर पोषित किया था, उसने ही उनके खुशियों को लील लिया था।....किन्तु उन्हें कहां मालूम था कि वे जिस विष बेल को लगा रहे है, कभी वही उनके लिए अभिशाप साबित होगा।

बीतते समय के साथ शोक व्यक्त करने के लिए आने बालों की तादाद बढ़ती ही जा रही थी। राजीव सिंघला चाहते थे कि अभी उन्हें अकेला छोड़ दिया जाए। वे बिल्कुल भी नहीं चाहते थे कि आने वाला हर एक इंसान उनसे यही पुछे "कि आखिर यह सब कैसे हो गया?

"......आखिर कार इसमें उनकी ही बदनामी थी, क्योंकि मीडिया बालों ने तो मामला पहले ही उजागर कर दिया था। ऐसे में आने बालों में ज्यादातर के शब्दों में सांत्वना कम और उपहास अधिक था। किन्तु हालात भी विपरीत था और इस समय उनकी स्थिति भी ऐसी नहीं थी कि "वे आने बालों को कहने से रोक पाते"। इसलिये हार कर उन्होंने कलाईं घड़ी देखी, दिन के साढे़ ग्यारह बज चुके थे।

अब तो पोस्टमार्टम की प्रक्रिया हो चुकी होगी। अब तो उन्हें सदर हाँस्पिटल पहुंच कर "सान्या" के डेड बाँडी को ले आना चाहिए। आखिर उसके आत्मा की शांति के लिए अंतिम संस्कार भी तो करना है। लेकिन किस हौसले के साथ वो हाँस्पिटल जाए, आखिर कार जिसे बचपन से लेकर अब तक जीती-जागती गुड़िया की तरह देखा है, उसे निष्प्राण किस प्रकार से देख सकेंगे?

... फिर भी उनको ही हौसला करना था, तभी तो "सान्या सिंघला" की अंतिम क्रिया हो सकती थी। इसलिये वे अपनी जगह से उठे और बाहर निकले। उन्हें बाहर की ओर जाता देख कर ज्योत्सना उनके साथ लग गई और दोनों बाहर आकर कार में बैठे।

उनके कार में बैठने की देर थी कि ड्राइवर ने कार आगे बढ़ा दिया और कारजिस रफ्तार से आगे सड़क पर सरपट दौड़ने लगी” राजीव सिंघला के विचार भी दौड़ने लगे। भला इस परिस्थिति में, जब उनकी दुनिया उजड़ चुकी थी, अपने मन को शांत कैसे रख सकते थे। उनके हृदय में तो विचारों का झंझावात चल रहा था और वेदना को उत्सर्जित कर रहा था।

...आज उनको लग रहा था कि "धन का अधिक लोभ इंसान से पाप करवाता है और वही पाप उसकी खुशियों को निगल जाता है"। हां, वो अगर ज्यादा कमाने के चक्कर में नहीं पड़े होते और सान्या पर बचपन से ध्यान दिया होता, उसे बचपन से अच्छे संस्कारों से सिंचित किया होता। काश उन्होंने ऐसा किया होता, तो शायद परिस्थिति आज कुछ और ही होती।

लेकिन नहीं, उन्हें तो अपने धन का, अपने विशाल ऐश्वर्य का घमंड था। उन्हें हमेशा यही लगता था कि बच्चे की सभी जरूरतें पूरी करो, उसे मनमाना खर्चे करने के लिए पैसे दो और जिम्मेदारी खतम।हां,....उन्होंने ऐसा ही तो सोचा था, तभी तो उनको आज ऐसा दिन देखना पड़ रहा था। दोष तो उनके नीति में था, तो दोष वे किस प्रकार से नियति को दे सकते थे।

....बस अब क्या? अब तो प्रतिफल मिल चुका है किए हुए कर्मों का, तो अब उसके कड़वे रसास्वादन से बचना मुमकिन ही नहीं। सोच कर राजीव सिंघला ने लंबी सांस ली और फिर उन्होंने नजर उठाकर देखा।

उनकी कार सदर हाँस्पिटल के प्रांगण में खड़ी थी। फिर क्या था, वो कार से बाहर निकले और ऑफिस बिल्डिंग की ओर बढ़ गए।.....साथ में ज्योत्सना कदम से कदम मिला कर चल रही थी। लेकिन फिर भी राजीव सिंघला को तसल्ली नहीं थी। उन्हें चैन आता भी तो कैसे?

...उनकी तो दुनिया ही लूट गई थी। फिर भी उन्हें अपने दायित्व का निर्वहन करना तो था ही, तभी तो उन्होंने ऑफिस के सारी कार्रवाइयों को निपटाया। फिर उन्हें सान्या की डेड बाँडी को सुपुर्द कर दिया गया। लेकिन उनके अंदर हिम्मत जागृत नहीं हो रहा था कि सान्या के मुख मंडल को देख सके।....आज वो किस प्रकार से निस्तेज हुए सान्या को देखे, जिन्हें उन्होंने मुस्कराते देखा था। इसलिये उन्होंने सान्या की बाँडी को एँबुलेंस में डलवाया और निकल पड़े।

इसके बाद "सान्या" की बाँडी को दर्शन के लिए भाव्या बिला ले जाया गया। वहां श्मशान जाने की तैयारी पहले से ही कर ली गई थी। इसलिये वहां से उसे श्मशान ले जाया गया।....बात राजीव सिंघला की थी, इसलिये श्मशान में भीड़ उमड़ पड़ी। फिर वह भी समय आ गया, जब सान्या को मुखाग्नि देनी थी। राजीव सिंघला हिम्मत तो नहीं कर पा रहे थे कि उस लाडली को आग के हवाले कर दे, जिसे गोद में खिलाया था। लेकिन इस कर्म का निर्वहन तो करना ही था, इसलिये हिम्मत कर के उन्होंने सान्या की चिता को मुखाग्नि दे-दी।

**************

करीब आधा घंटा हो चुका था सलिल को आए हुए। लेकिन अभी तक उसके मुख से एक शब्द भी नहीं निकला था। अजीब सी उसकी मन: स्थिति थी, जिसे शांतनु देव समझ नहीं पा रहा था। वैसे तो शांतनु देव को रोज ही अलग-अलग परिस्थितियों का सामना करना पड़ता था, जिसमें सामने वाला अलग-अलग परिस्थितियों के कारण उसके सामने बात रखने से हिचकता था। किन्तु वो बात होती थी.....एक क्लाइंट एवं वकील के बीच। लेकिन सलिल तो.....उसके जिगर के समान था, फिर उसे किस बात की हिचक थी।

वैसे तो उन दोनों ने इस दरमियान दो बार काँफी पी ली। फिर भी सलिल न तो अपने अंदर हिम्मत जुटा सका और न ही समझ सका कि उसका जो उद्देश्य है, उसकी पूर्ति के लिए बात की शुरुआत किस तरह से करें। ऐसे में शांतनु देव से नहीं रहा गया, वैसे भी वो सलिल के इस उलझन भरी हरकत से बोर होने लगा था। उसे तो उम्मीद ही नहीं थी कि सलिल इस प्रकार का बर्ताव करेगा। अब इस प्रकार से कब तक चलेगा, क्योंकि उसे कोर्ट भी तो जाना है। इसलिये उसने सलिल की आँखों में देखा और बोला।

अमा यार सलिल!....तुम तो किसी जरूरी काम से मेरे पास आए थे, लेकिन देख रहा हूं कि तुम उलझन में हो? शायद तुम सोच रहे हो कि कहीं मुझे बता दिया.....और तुमको नुकसान न हो जाए?....यही बात है न?

नहीं, ऐसी बात बिल्कुल भी नहीं है शांतनु!....तुम गलत सोच रहे हो। शांतनु देव की बातें सुनकर सलिल तपाक से बोला और फिर एक पल रुककर बोला। शांतनु....भला मुझे तुमसे उस बात को शेयर नहीं करना होता, तो फिर मैं तुम्हारे पास आता ही क्यों?......परन्तु मैं दुविधा में हूं कि शुरुआत कहां से करुं।

शुरुआत ही करने की बात है.....तो जो भी है, उलटा- सीधा, बोलते जाओ। मैं सभी बातों को सीधी करके समझ लूंगा। जैसे ही सलिल ने अपनी बात पूरी की, शांतनु झट बोल पड़ा और सलिल के चेहरे की ओर देखने लगा।

जबकि शांतनु देव की बातें सुनकर सलिल ने कुर्सी पर अपने पहलू को बदला और गंभीर होकर उसे बतलाने लगा कि किस प्रकार से पिछले चार दिनों से सीरियल हत्याकांड हुआ था और इस वारदात को अंजाम देने वाला भी अब दुनिया में नहीं था। फिर एस. पी. साहब के निर्णय को, तांत्रिक भूत नाथ के बारे में एवं सम्यक व लवण्या के मिलने की बातें। 

उन तमाम बातों को उसने शांतनु देव को बता दिया और लंबी सांसे लेकर चुप्पी साध ली। शांतनु देव, जो शांति से उसकी बातों को सुन रहा था, उसकी बातें खतम होते ही गहरी सांसे ली, फिर गंभीर होकर बोला।

हूं....तो यह बात है!.....तुम इस कारण से ही उलझन में हो?

बात इतनी सी होती, तो कोई बात नहीं थी। बात तो और भी बहुत कुछ है। बीच में ही हल्की आवाज में सलिल बोल पड़ा, जिसे सुनकर शांतनु देव के होंठों पर मुस्कान आ गई, उसने सलिल के देखा और बोला।

अमा यार सलिल.....तुम्हारे पास धैर्य की कमी है। पहले पूरी बात तो सुन लो, फिर बोल भी लेना। बोलने के बाद शांतनु देव ने सलिल के आँखों में झांका, फिर बोला। तुम चाहते हो सलिल कि....इस केस की हकीकत जन-मानस तक पहुंचे और तुम्हारा नाम भी बीच में नहीं आए। आई एम राईट?

हां यार हां, मैं बस यही चाहता हूं। शांतनु देव की बातें सुन कर सलिल जोर से बोला। जबकि उसकी बातें सुनी ही नहीं गई हो, तभी तो शांतनु देव बोला।

लेकिन यह होगा कैसे?.....है कोई ठोस सबूत तुम्हारे पास, जिससे कि मैं कोई योजना बना सकूं?....उसने सीधा ही प्रश्न पुछ लिया।

जबकि उसके प्रश्न सुनकर सलिल ने सहमति में सिर को हिलाया, फिर बतलाने लगा कि किस प्रकार से "गर्वित के पास से मिले लैपटाप को उसने छिपा लिया है"। शांतनु देव के यह पुछने पर कि वह लैपटाप कहां है, सलिल ढृढता से बोला कि मेरे पास है। फिर सलिल उठकर बाहर चला गया और लैपटाप को उठा लाया और खोलकर शांतनु देव के सामने रख दिया और खुद मौन होकर बैठ गया। इधर शांतनु देव की नजर जैसे ही फाइल के काँटेंट पर गई, वह चौंका, फिर उस फाइल में लिखे इबारत को पढने लगा। 

करीब दो घंटे लगे उसको पूरी फाइल को पढने में, तब तक तो सलिल निंद की गोद में समा चुका था और कुर्सी पर बैठे-बैठे ही सो रहा था। पूरी फाइल को पढ लेने के बाद शांतनु देव ने उस काँटेंट को अपने मोबाइल में एसेस किया, लैपटाप बंद की और कलाईं घड़ी पर नजर डाली। दिन के एक बज चुके थे, ऐसे में आज उसका कोर्ट जाना केंसिल हो चुका था। 

तो उसने मन बना लिया कि आज वह पूरे दिन सलिल के साथ ही रहेगा। यही सोचकर उसने सलिल के चेहरे पर नजर डाली और मुस्कराया। उसका मासूम दोस्त वास्तव में बहुत ही अच्छा है। अन्यथा आजकल किस को जरूरत होती है कि मुसीबत मोल लेकर किसी के लिए परेशान हो। लेकिन कोई बात नहीं,.....जब वो खुद उसके साथ है, सभी मुसीबतों को पार कर लेगा।

इतनी बातें सोचने के बाद शांतनु देव फिर से मुस्कराया। फिर तो उसने सलिल को निंद से जगाया और कच्ची निंद टूटने के कारण सलिल हकबका कर उठकर खड़ा हो गया। लेकिन शांतनु देव ने उसे शांत रहने केलिए इशारा किया, उसके चेहरे को पानी से धुलवाया और जब सलिल शांत हुआ, उसे सम्यक के पास चलने को कहा। फिर दोनों लैपटाप लेकर ऑफिस से बाहर निकले और बाहर आ गए। 

बाहर शांतनु देव की इनोवा खड़ी थी, जिसमें सलिल को बैठने के लिए इशारा किया और खुद ड्राइविंग सीट संभाल ली। फिर जैसे ही सलिल बैठा, उसने कार श्टार्ट की और सलिल के इशारे पर कार चलाने लगा। इस बीच उन दोनों के दरमियान किसी प्रकार की बातचीत नहीं हुई, हां, कार के इंजन का स्वर गूंजता रहा।

 और जब वे दोनों मुक्ता अपार्ट मेंट पहुंचे, दिन के दो बज चुके थे। कार पार्क करने के बाद दोनों बाहर निकले और मुख्य द्वार की ओर बढे और उन्होंने हॉल में कदम रखा, तो देखा कि सम्यक एवं लवण्या चिंतन की अवस्था में बैठे है। लेकिन हॉल में कदम रखते ही सम्यक की नजर उनपर पड़ गई.....और उठकर उसने दोनों का स्वागत किया। फिर उनको बैठाने के बाद किचन से पानी ले आया। 

इसके बाद उन लोगों में बातें होने लगी। सलिल ने शांतनु देव से उन लोगो को परिचय करवाया, फिर आने का उद्देश्य बताया।.....उसके बाद कुछ पल के लिए वहां शांति छाई रही,....फिर शांतनु देव सम्यक को आगे के प्लान के बारे में समझाने लगे।

शांतनु देव ने पहले तो सम्यक को "गर्वित के पास मिले लैपटाप एवं उसमें लिखित बातों की जानकारी दी। फिर उसे बतलाया कि उसे किस प्रकार से कोर्ट के संज्ञान में इस विषय को लाना है और फिर इस केस में वादी पक्ष वन कर मीडिया के सामने लाइम- लाइट होना है और जब परिस्थिति बदलती हुई लगे, उससे आकर संपर्क कर लेना है। सम्यक शांतनु देव के द्वारा कहे जा रहे शब्दों को ध्यान पूर्वक सुन रहा था और समझने की कोशिश भी कर रहा था। 

साथ ही, जहां उसे एरर लगता था, वह अपनी शंकाओं को व्यक्त कर रहा था। जिसे सुन कर शांतनु देव शांति से उसकी शंकाओं का समाधान कर रहा था। 

फिर शांतनु देव ने "गर्वित सक्सेना" के लैपटाप को उसके पास ही छोड़ दिया और साथ ही उसे हिदायत दी कि” इसमें लिखित सभी बातों को ध्यानपूर्वक पढ ले और इसे अपने ही पास रखे।....उसकी बातों को सुनकर लवण्या और सम्यक ने सहमति में सिर हिलाया। 

फिर तो सम्यक ने उन दोनों से काँफी के लिए पूछा, किन्तु सलिल ने मना कर दिया और सलिल एवं शांतनु देव ने उनसे विदा ली। उन दोनों के जाने के बाद सम्यक ने लवण्या की ओर देखा, जहां कुछ देर पहले तक छाई हुई चिन्ता का अब नामों-निशान नहीं था। हां, आँखों में नए विश्वासको अंगड़ाई लेते देखा था, जिसे महसूस करके सम्यक ने पूर्ण संतुष्टि महसूस की।

*************

दिन के तीन बजने को थे।

इंस्पेक्टर विजय ने अब तक ऑफिस के काम को निपटा लिया था। वैसे तो रोहिणी पुलिस स्टेशन का चार्ज अभी तक सलिल के पास ही थी, किन्तु एस. पी. साहब ने तत्काल प्रभाव से उसकी नियुक्ति की थी। इसलिये विजय इसी प्रयास में था कि एस. पी. साहब के आदेशानुसार कार्य करेगा, तो उनके गुड बुक में शामिल हो जाएगा।..... फिर तो "रोहिणी थाना" का चार्ज उसे परमामेंट मिल जाएगा।

विजय अच्छी तरह से जानता था कि रोहिणी थाना कमाने के लिए बहुत उत्तम है। वह जानता था कि इस थाने में पोस्टिंग मिले,.....समझो पांचों अंगुली घी और सिर कराही में। वैसे उसे इस बात की भी आशंका थी कि कहीं एस. पी. साहब ने उसे युज करने के बाद मक्खी की तरह निकाल कर न फेंक दे। इसलिये ही तो वो अब तक फाइलों की खाना पूर्ति में लगा था।

....वह जानता था कि घी अगर सीधी अंगुली से नहीं निकले, तो अंगुली टेढी भी कर दो। फिर मामला फिट ही हुआ समझो।.....साथ ही उसके मन में दूसरी आशंका यह भी थी कि कहीं सलिल कोई ऐसा कदम न उठा ले, जिससे कि पाँसा उलटा पड़ जाए,....परंतु इसकी संभावना नगण्य थी।

विजय इस बात को अच्छी तरह से जानता था कि "सलिल इस तरह से बाँस के खिलाफ जाकर कोई कदम उठा ले"। फिर तो पानी में रहकर मगर से वैर लेना भी तो आसान नहीं,....लेकिन फिर भी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता था कि सलिल इस तरह के कदम नहीं उठा सकता है। इसलिये उसे इस तरफ से भी सचेत होकर रहना था। 

तभी तो ऑफिस से निकलने के बाद विजय पुलिस जिप्सी की ओर बढ़ा, गाड़ी में बैठ कर श्टार्ट की और आगे बढ़ा दी। उसे जल्दी थी अपने घर पर पहुंचना था,....तभी तो वो अपने नेटवर्क को सक्रिय कर सकता था, जिससे कि सलिल पर नजर रखा जा सके और अपने काम पूरा किया जा सके।

बस इसी विचार में विजय उलझा हुआ था और गाड़ी फूल रफ्तार से सड़क पर भागी जा रही थी और ठीक शाम के चार बजे वो अपने अपार्ट मेंट पर पहुंचा । हॉल में कदम रखते ही उसने न्यूज देखने के लिए टीवी आँन की और जैसे ही किचन की ओर कदम बढ़ाने को हुआ, उसके कदम ठिठक गए। 

बात ही ऐसी थी, उसने न्यूज तक लगाया हुआ था और वहां पर "शहर में बीते दिनों हुई हत्याओं पर खुलासा किया जा रहा था"। बार- बार चैनल पर सम्यक एवं लवण्या को दिखाया जा रहा था, जो प्रेस कांफ्रेंस करके इस बात की घोषणा कर रहे थे कि "शहर में हुई वारदात को गर्वित सक्सेना ने अंजाम दिया था और फिर उसने भी खुद सुसाईड कर लिया था" जो कि पुलिस बालों के द्वारा छिपाया जा रहा है।

बस न्यूज देखते ही विजय के हौसले फाख्ता हो गए। अभी तो कुछ घंटे पहले उसने कोर्ट में हलफनामा पेश किया था कि इन हत्याओं में पैरानार्मल शक्तियों का हाथ है और यह क्या?.....इससे तो उसकी लुटिया डूबा ही समझो। इसलिये इसके बाद उसने एक- एक कर सभी न्यूज चैनल को बदल कर देखा, लेकिन हर एक जगह उसी समाचार को हाई- लाइट किया जा रहा था। 

उफ!.....मारा गया रे बाबा, कहीं ऐसा हुआ तो सच में ही मारा जाएगा। बौखलाहट में विजय ने सोचा और टीवी आँफ किया, किचन में गया, फ्रीजर से स्कॉच की बोतल निकाली और एक बार भरपूर घटकने के बाद बोतल को यथास्थान रखकर बाहर निकला।

शराब की दो घूंट जैसे ही उसके अंदर गई, उसके हृदय में "हौसला" का संचार हुआ। किन्तु वो जानता था कि यह राहत फौरी है,....इसके बाद की स्थिति को वह अच्छी तरह से जानता था। वैसे उसे जिस बात की आशंका थी, वह घटित हो चुका था, लेकिन उसका अंदाजा गलत निकला। 

उसने तो सोचा था कि सलिल उसके काम को बिगाड़ सकता है, लेकिन हुआ था ठीक इसके विपरीत। उसने तो जिस बात की कल्पना भी नहीं की थी, वह घटित हो चुका था। लेकिन अब?....यह सवाल उसके दिमाग में घूमने लगा और वो हॉल से बाहर तेजी से बाहर निकला, गेट लॉक किया और जिप्सी में बैठते ही पुलिस स्टेशन दौड़ा दी।

जहां तक उसकी समझ थी, वह यही समझता था कि पुलिस स्टेशन पहुंचने के बाद ही इस बारे में सोचेगा कि आगे क्या करना है?.....वैसे उसे इस बात को लेकर उम्मीद थी कि मामला एस. पी. साहब से जुड़ा था और अगर वो फंसता है, तो एस. पी. साहब की भी खैर नहीं। 

ऐसे में एस. पी. साहब जरूर "डैमेज कंट्रोल" करेंगे। इसलिये पुलिस स्टेशन पहुंचते ही उसने गाड़ी पार्क की और तेजी से ऑफिस की ओर बढ़ा। लेकिन ऑफिस में तो दूसरी ही मुसीबत उसका इंतजार कर रही थी,....तभी तो ऑफिस में कदम रखते ही वो आश्चर्य से उछल पड़ा। बात ही कुछ ऐसी थी, जिसने विजय के अंदर बची-खुची हिम्मत को भी खतम कर दिया।

इंस्पेक्टर विजय ने तो सोचा भी नहीं था कि वो जैसे ही ऑफिस में पहुंचेगा। स्वागत में कोर्ट के स्वतः संज्ञान का नोटिस मिलेगा। फिर क्या था,...उसने नोटिस को बाहर निकाल कर पढना शुरु किया और पढते- पढते पसीने से पूरी तरह भीग गया। अब तो उसने नोटिस भी पढ लिया था और समझ भी गया था कि "अब खेल खतम हुआ ही समझो"। 

लेकिन उसके पास अंतिम आशा के रुप में एस. पी. साहब बचे हुए थे और एक वही थे, जो कि अब इस मामले को सुलझा सकते थे। इसलिये वो वापस पलटा और बाहर की ओर निकला। बाहर अंधेरा ढलने को था, और कभी भी शहर के आँचल पर अंधेरे का साम्राज्य स्थापित हो सकता था।

उसे भी तो अपने आगे का जीवन अंधकार मय लगने लगा था। तभी तो वह तेजी से जिप्सी के पास पहुंचा, बैठा, श्टार्ट की और प्रांगण से बाहर निकाल कर सड़क पर दौड़ा दिया, उलझे विचारों के साथ। सड़क पर भागती हुई ट्रैफिक और इसके बीच ड्राइव करता हुआ विजय। घबराहट में पूरी तरह से भीगा हुआ और अपने कल के बारे में सोचता हुआ। 

वैसे ही उसकी गिनती अच्छे ऑफिसरों में नहीं की जाती थी, वो तो पहले से ही अपने "भ्रष्टाचार को लेकर बदनाम जो था"। लेकिन अब तक ऐसी परिस्थिति नहीं आई थी कि वह कहीं फंस जाए। किन्तु अब?.....उसने तो खुद ही सामने से कहा था कि आ बैल मुझे मार।

उसने तो इसके परिणाम के बारे में सोचा ही नहीं था, नहीं तो कभी भी जलते हुए आग में हाथ नहीं डालता। परंतु उसने तो सोचा था कि साहब है, तो डरने की जरूरत ही क्या है?....भला उसे कहां मालूम था कि मामला निपटते-निपटते इस प्रकार से मोड़ ले-लेगा। 

लेकिन अब तो जो होना था, वह तो हो चुका था। अब तो यही सोचना था कि इस मामले से किस प्रकार से बचा जाए?.....सोचते-सोचते उसे पता ही नहीं चला कि कब जिप्सी पुलिस मूख्यालय पहुंचकर प्रांगण में लग गई। गाड़ी खड़ी होते ही वो बाहर निकला और ऑफिस बिल्डिंग की ओर बढ़ा।

और जब वो एस. पी. साहब के ऑफिस में पहुंचा, उन्हें टीवी के सामने चिपके देखा। हां, वे न्यूज देख रहे थे, पूरी तरह शांत होकर। लेकिन विजय के कदम रखते ही उन्होंने जान लिया और उसे बैठने का इशारा किया। किन्तु उनकी नजर टीवी के सामने से हटी नहीं। हां उन्हें इस प्रकार से शांत देखकर विजय को आश्चर्य भी हुआ और शांति भी मिली। विजय इस बात को अच्छी तरह से जानता था उनके दिमाग को। अगर वो इस हालात में भी शांत है, मतलब कि उनके दिमाग में कुछ तो चल रहा है। बस उसने राहत महसूस किया और इस बात का इंतजार करने लगा कि "कब साहब फ्री होते है और उससे बात करते है।

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सोलह अक्तुबर की सुबह के आठ बजे थे। 

सलिल निंद से जग चुका था और बेडरूम से बाहर आकर किचन की ओर बढ़ गया था, जबकि रोमील अभी निंद के आगोश में समाया ही हुआ था। वैसे भी उन दोनों ने एक दिन का अवकाश ले लिया था, क्योंकि पुलिस स्टेशन में उनका काम ही नहीं था। फिर भी.....सलिल कितनी देर तक सोता ही रहता, वैसे भी उसे ज्यादा सोने की आदत नहीं थी।....तभी तो जगकर सीधा किचन रूम में पहुंचा था अपने लिए काँफी बनाने के इरादे से।

दूसरी बात कि उसने प्लानिंग कर ली थी कि आज रोमील के साथ बाजार जाकर पूरे महीने की खरीदारी करेगा। फिर......रूम पर आकर ऊधम मचाएगा और शाम तो किसी वियर बार में कटेगी। बस यही सोचते हुए उसने दो कप काँफी बनाई और सीधे हॉल में पहुंचा। 

तब तक रोमील भी आँखें मलते हुए बेडरूम से चला आया और फिर दोनों ने काँफी पी। परंतु उन्हें कहां मालूम था कि उनकी काँफी खतम भी नहीं होगी कि एस. पी. साहब आ धमकेंगे। अभी तो दोनों ने कप खाली करके मेज पर टिकाया ही था कि मृदुल शाला ने इंस्पेक्टर विजय के साथ हॉल में कदम रखा।

उन्हें आया हुआ देखकर दोनों ही उठ कर खड़े हो गए और सैल्यूट दी, किन्तु.....एस. पी. साहब ने किसी प्रकार की प्रतिक्रिया नहीं दी। वे तो विजय के साथ आगे बढे और सोफे पर बैठ गए। उनके इस प्रकार के व्यवहार से सलिल एवं रोमील की धिग्धी बंध गई। 

सलिल ने तो उनसे काँफी के लिए भी पूछा, परंतु उन्होंने इनकार कर दिया। ऐसे में सलिल समझ गया कि जरूर कोई बात है। हां, बात तो था ही, तभी तो जब से एस. पी. साहब आए थे, उनकी नजर सलिल और रोमील पर ही टिकी थी। लेकिन वे कुछ बोल नहीं रहे थे और यह परिस्थिति सलिल के लिए असह्य था, इसलिये बोला।

सर!....कोई बात हो गई है?.....जो आप इतनी सुबह ही, क्या हुआ है सर?

बात तो हुई है,.....और इसके अपराधी को जानता भी हूं मैं। वैसे सलिल!......तुम शायद न्यूज नहीं देखते हो, तभी तो इस तरह के सवाल करते हो। सलिल के चुप होते ही एस. पी. साहब ने उसके आँखों में झांक कर प्रश्न दाग दिया और उसके चेहरे की प्रतिक्रिया को देखने लगे। जबकि उनके प्रश्न सुनकर सहज ही सलिल बोला।

सर!.....आप किसकी बात कर रहें है, समझ नहीं पा रहा हूं? वैसे कल शाम को हम दोनों ने फ्री होने का जमकर मजा लिया और खुब पार्टी की।

सलिल!....तुम भले ही कितना भी बनने की कोशिश कर लो, परंतु जानता हूं कि यह सब कुछ तुम्हारा ही किया- धरा है। सलिल के चुप होते ही एस. पी. साहब ने गंभीर होकर बोला। जबकि उनकी बातों से शंकित होकर इस बार रोमील बोला।

सर!....आप किस विषय के बारे में बोल रहे है, हमें इसके बारे में जानकारी नहीं?.....रोमील ने अपनी बातें खतम करके चुप्पी साध ली। जबकि उसकी बातों को सुनकर एस  पी. साहब पूर्ववत बोले।

देखो,....तुम दोनों के साथ अभी मैं सही-गलत के झमेले में नहीं पड़ना चाहता। बस ये समझो कि तुम दोनों को पंद्रह दिनों के लिए स्वैच्छिक अवकाश दे रहा हूं। फिर मामले से निपटने के बाद तुम दोनों को देखूंगा। बस इतनी बातें बोलने के बाद एस. पी साहब उठे और बाहर जाने के लिए कदम बढ़ा दिया,....फिर क्या था, विजय उनके पीछे -पीछे चल पड़ा।

जबकि उन्हें इस प्रकार से जाता देखकर सलिल के होंठों पर मुस्कान उभड़ी। हां, रोमील आश्चर्य चकित होकर उन दोनों को जाते हुए देखता रहा, क्योंकि उसे मालूम ही नहीं था कि आखिर मामला क्या है?....... उधर एस. पी. साहब के साथ विजय उनकी कार में बैठा और कार चल पड़ी। 

फिर तो कार सड़क पर सरपट दौड़ने लगी। किन्तु कार के अंदर चुप्पी छाई रही, क्योंकि विजय की बोलने की हिम्मत नहीं थी और एस. पी. साहब बोलना नहीं चाहते थे। वे परिस्थिति को भलीभाँतिजानते थे, जो कि उनके पक्ष में नहीं था। फिर तो.....उन्होंने इस मुसीबत को सामने से निमंत्रण दिया था। अब ऐसे में जब वे फंस ही चुके थे, तो बस शांत होकर इस विचार में लगे हुए थे कि इससे बचा कैसे जाए?

बचा किस प्रकार से जाए?....यही तो सवाल था, जिसके जबाव को ढूंढने के लिए एस. पी. साहब हृदय में मंथन कर रहे थे, परंतु उन्हें जबाव मिल नहीं रहा था और सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि "अगले के पास किस प्रकार का सबूत था?".....बस यही तो मालूम नहीं था उन्हें कि "अगले ने किस तरह की जानकारी मीडिया और कोर्ट को दी है"। 

पता नहीं उनके हाथ ऐसा क्या लग गया है कि इस केस में पुलिस को चुनौती देने की हिम्मत कर बैठे है?....कहीं ऐसा तो नहीं कि सलिल ने उन लोगों को पोस्टमार्टम की काँपी दे-दी हो?.....नहीं-नहीं, सलिल एवं रोमील में इतनी तो हिम्मत नहीं है कि उसके खिलाफ जाने की भी सोचे। फिर तो उनके चेहरे पर भी इस तरह के भाव नहीं थे, जिससे लगता कि सब उनका किया-धरा है।

खैर जो भी होगा, देख लेंगे। सोचने के बाद एस. पी. साहब ने गहरी सांस ली और कार के शीशे से बाहर देखा। स्वप्न लोक सा लगता शहर, सूर्य की रोशनी में खिला-खिला। सरपट कार के दौड़ने से प्रतीत हो रहा था कि ऊंची-ऊंची बिल्डिंगे सरपट पीछे की ओर भागती जा रही हो। 

देखते-देखते उनकी कार कोर्ट गेट से प्रवेश करके प्रांगण में रुक गई। फिर तो एस. पी. साहब ने विजय को कार में ही रुकने को बोला और फिर बाहर निकल कर वकील राघव जुनेजा के ऑफिस की ओर बढ़ गए। वहां राघव जुनेजा अभी फाइलों में उलझा हुआ था और जैसे ही उसकी नजर एस. पी. साहब पर पड़ी, उसने इशारे से बैठने के लिए कहा।फिर एस. पी. साहब के बैठने के बाद उनकी ओर मुखातिब होकर बोला।

सर!.....आप लोग भी न, "आ बैल मुझे मार" के मुहावरे को चरितार्थ करते है। अपनी बातें बोलने के बाद जुनेजा ने उनके चेहरे पर नजर टिका दी। जबकि उसकी बातों को सुनकर एस. पी. साहब धीरे से बोले।

मिस्टर जुनेजा!.....तुम भी न, औरो की तरह उलाहना देने की बजाए अब इससे बचने के बारे में बताओ। अब तो जो घटित हो चुका है, उसकी तो बात ही जाने दो। बोलने के बाद मृदुल शाहा ने अपनी नजर उसके चेहरे पर टिका दी, जबकि उनकी बातें सुनकर जुनेजा शंकित स्वर में बोला।

सर!.....आप भी न, परिस्थिति को समझने की कोशिश नहीं कर रहे। आपको क्या लगता है कि मामला इतना आसान है। सर....परिस्थिति ऐसी है कि अभी हम लोग अंधेरे में है। हमें तो यह भी नहीं पता कि सामने वाले ने किस आधार पर इस मामले को चैलेंज किया है?....... ऐसे में मैं आपको क्या कहूं?

तुम भी न जुनेजा!.....बिना मतलब की बातों को कह रहे हो। अब तुम इस प्रकार से कहोगे,....तो मेरा बेड़ा गरक हुआ ही समझो। बोलने के बाद एस. पी. साहब ने कातर निगाहों से जुनेजा को देखा, जिसे सुनकर राघव जुनेजा गंभीर होकर बोला।

सर!....आप भी न, खैर कोई बात नहीं। देखता हूं कि इस मामले में क्या किया जा सकता है। 

बोलने के बाद राघव जुनेजा उठ खड़ा हुआ,...फिर तो एस. पी. साहब ने उसका अनुसरण किया और दोनों कोर्ट रूम की ओर बढ़ चले। फिर तो..... विजय भी कार से निकला और उन लोगों की ओर लपका। फिर वे लोग कोर्ट रूम की ओर बढ़ चले। इधर कोर्ट रूम में भीड़ बढ़ने लगी थी, क्योंकि दिन के दस बज चुके थे और कभी भी जज साहब वहां पर कदम रख सकते थे। ऐसे में वे लोग कोर्ट रूम में कदम रखते ही उधर बढे, जिधर राघव जुनेजा बैठा करता था।

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साढे़ दस बजे का कांटा जैसे ही घड़ी की सुई ने छूआ, जज साहब ने कोर्ट रूम में कदम रखा और उनके कदम रखते ही कोर्ट रूम में सभी उनके सम्मान में खड़े हो गए। इसके बाद जज साहब अपनी सीट पर बैठने के साथ ही सभी को इशारा किया बैठने के लिए और जैसे ही सभी ने सीट ग्रहण की, उन्होंने कोर्ट की कार्रवाई को शुरु करने के आदेश दिए।

फिर तो राघव जुनेजा अपनी जगह से उठा और आगे आकर उसने दलील दी, पुलिस को मिले नोटिस के संदर्भ में।....किन्तु जज साहब ने उसकी एक नहीं सुनी और शहर में सीरियल हत्याकांड के संदर्भ में वादी पक्ष को कोर्ट में हाजिर होने के आदेश दिए। तभी गेट से शांतनु देव के साथ सम्यक एवं लवण्या ने प्रवेश किया। उन्हें आया हुआ देखकर सभी की नजरें उनपर ही टिक गई। जबकि शांतनु देव ने दोनों को दर्शक दीर्घा में बैठने को कहा और खुद जज साहब के सामने पहुंचा, सम्मान में सिर को झुकाया, फिर बोला।

मिलार्ड!.....अभी-अभी हम आ रहे थे और तभी रास्ते में लवण्या ने हमें काँफी पीने के लिए कहा। हम लोग दुकान में गए और वहां पर वेटर ने हमारे सामने में काँफी रखा, परंतु जोर देकर बोला," अहो जी साहब!....लो शराब पीओ"। शांतनु देव ने अपनी बात पूरी की और जज साहब की ओर देखने लगा, जबकि पूरे कोर्ट रूम में ठहाके गूंज उठे। आश्चर्य चकित तो जज साहब भी हुए, फिर उन्होंने बोला।

ऐसा भी कहीं होता है" शांतनु देव!....तुम यहां पर सभी को बेवकूफ बना रहे हो।

मिलार्ड!.....यही तो, मैं भी तो यही कहना चाहता हूं कि पुलिस हत्या जैसी वारदात को भूतों की कहानी बनाने पर तूली हुई है। जज साहब ने अभी अपनी बाते खतम भी नहीं की थी कि शांतनु देव गंभीर स्वर में बोला। जबकि उसकी बातें खतम होते ही जज साहब बोले।

इस बात के कोई सबूत है तुम्हारे पास?

हां, है न मिलार्ड,....किन्तु उससे पहले मैं आपको इस वारदात से पहले की कहानी बताना चाहता हूं। परंतु मिलार्ड,....इसके लिए मीडिया बालों को कोर्ट रूम में आने की अनुमति दीजिए।

शांतनु देव ने अपनी बात पूरी की और सम्यक की ओर देखा। सम्यक उठा और जज साहब के करीब पहुंच कर "गर्वित के लैपटाप को उनकी ओर बढ़ा दिया"। जिसके बारे में शांतनु देव ने जज साहब को बताया। फिर क्या था, जज साहब ने एक घंटे के लिए कार्रवाई को स्थगित कर दिया। ऐसे में दोनों पक्ष अपने- अपने वकील के साथ उसके चैंबर में चले गए। 

फिर तो.... एक घंटे बाद कोर्ट की कार्रवाई की शुरुआत हुई और कार्य शुरु होते ही जज साहब ने शांतनु देव को बीते घटना क्रम के बारे में बतलाने को कहा। अदालत कक्ष में इस समय विभिन्न मीडिया कर्मी मौजूद थे,....ऐसे में शांतनु देव ने कहना शुरु किया।

मिलार्ड!....पिछले दिनों जो शहर में वारदात की घटनाओं को अंजाम दिया गया, वह अप्रत्याशित हुई घटना नहीं था। इस घटना क्रम को समझने के लिए हमें "गर्वित सक्सेना" के जीवन को समझना होगा। बोलने के बाद शांतनु देव एक पल के लिए रुका, फिर बोला। मिलार्ड!....कहते है न कि प्रतिशोध की भावना मानव जीवन के लिए अत्यंत ही दुख-दाई होता है। तभी तो खुद तो इंसान इससे जलता ही है, जब तक सामने वाले को जला नहीं देता, उसे शांति नहीं मिलती।

आप कहना क्या चाहते है मिस्टर शांतनु देव?.....उसकी बातों को सुनकर जज साहब से नहीं रहा गया, तब वे बोले, जबकि राघव जुनेजा अपनी जगह से उठा और जज साहब के सामने आकर बोला।

आँब्जेक्सन मिलार्ड!....मैं मिस्टर शांतनु देव की बातों पर एतबार नहीं करता। यह क्या बात हुई कि "किसी मामले का रुख मोड़ने के लिए मन गढंत कहानियाँ बनाने लगे। अब तो ऐसे मिस्टर शांतनु देव को कहानियां लिखने का काम करना चाहिए, जहां उन्हें अच्छी पब्लिसिटी मिलेगी। 

बोलने के बाद राघव जुनेजा एक पल के लिए रुका, फिर बोला। मिलार्ड!....जहां तक मैं समझता हूं कि अदालती कार्रवाइयां सिर्फ और सिर्फ सबूतों पर चलती है। इस बात का ख्याल मेरे काबिल दोस्त को रखना चाहिए। राघव जुनेजा ने अपनी बात पूरी की और फिर उसने जज साहब की ओर नजर टिका दी। जबकि उसकी बातों को सुनकर शांतनु देव मुस्करा कर बोला।

मिलार्ड!....शायद हमारे काबिल दोस्त के पास धैर्य की कमी है, तभी तो वे बचकानी बातें बोलते है।....नहीं तो मिलार्ड!....कोर्ट रूम में किसी भी विषय पर तभी जिरह की जाती है, जब उसके बारे में पुख्ता सबूत हो। बोलने के बाद शांतनु देव थोड़े समय के लिए रुका, फिर बोला। मिलार्ड!....वैसे भी अभी इस केस में जिरह की तो शुरुआत ही नहीं हुई है। 

अभी तो मैं अदालत को यह बताने की कोशिश कर रहा हूं कि किन कारणों से इस वारदात को अंजाम दिया गया।....क्योंकि पहले तो यह जानने की जरूरत है, इसलिए जरूरत है कि विषय इस समाज का है, विषय इस राष्ट्र का है। बोलने के बाद शांतनु देव ने चुप्पी साध ली और अपनी नजर जज साहब के चेहरे पर टिका दी। जबकि उनकी बातें सुनने के बाद जज साहब ने राघव जुनेजा को देखा,....फिर गंभीर होकर बोले।

मिस्टर जुनेजा!....आप अपनी जगह पर जाकर बैठ जाइए और अपने बोलने की बारी आने का इंतजार कीजिए। जब इस केस में जिरह होगी,....तो आपको फिर पूरा मौका दिया जाएगा, अपनी बात बोलने के लिए। जज साहब ने बोलने के बाद चुप्पी साध ली। मजबूर होकर राघव जुनेजा अपनी जगह पर जाकर बैठ गया, तब शांतनु देव बोलने लगा।

मिलार्ड!.....पिछले दिनों जो शहर में वारदात को अंजाम दिया गया, वो अपने-आप में अजूबा है। मिलार्ड!.....जहां तक मेरा मानना है कि किसी भी अपराध को अंजाम देने के लिए कोई न कोई कारण तो जरूर होता है। किसी भी वारदात के घटित होने के लिए या तो सामाजिक पृष्ठभूमि होती है, या तो राजनीतिक पृष्ठभूमि होती है। 

मिस्टर शांतनु देव!.....आप भूमिका बांधने में समय न जाया करें। आप को जो कोर्ट को बतलाना है, उसपर बात कीजिए। आप व्यर्थ समय न गंवा कर मूल बिंदु पर आए और बतलाइए कि घटित घटना के कारण क्या है?..... शांतनु देव को बीच में ही जज साहब ने टोका। उनकी बातों को सुनकर शांतनु देव मुस्कराया और फिर पहलू बदल कर बोला।

मिलार्ड!.....मैं मुख्य मुद्दे पर ही आ रहा हूं। लेकिन उससे पहले यह तो बताना जरूरी ही-है कि अपराध घटित होने की भूमिका क्या होती है?....बोलने के बाद शांतनु देव एक पल के लिए रुका, फिर बोला। मिलार्ड!...इस वारदात  को अंजाम देने वाले "गर्वित सक्सेना" के जीवन का पहलू स्टडी करने योग्य है। उसके जीवन को पढने पर सभी के लिए शिक्षा मिलने वाली बात है। 

"गर्वित सक्सेना" अमीर पिता की इकलौती संतान, जो कि "गोवा" के चर्चित फेनी शराब को पीने का शौकीन था। जिसके अंदर खुद के लिए अहंकार की भावना थी, क्योंकि वो अमीर बाप का बेटा था। उसके घर में दौलत का अंबार लगा हुआ था,....इसलिये उसके शौक भी ऊँचे थे। ऐसे स्वभाव के "गर्वित सक्सेना" के जीवन में सान्या सिंघला ने प्रवेश किया और फिर घटना क्रम बदलता चला गया।

बोलते-बोलते शांतनु देव बीते दिनों में चला गया। शांतनु देव बोलता जा रहा था और पूरा अदालत कक्ष शांति से उसकी बातों को सुन रहा था, धैर्य के साथ। बात ही इतनी दिलचस्प थी कि कोई भी एक भी शब्द बोल कर इसमें खलल नहीं डालना चाहता था। यहां तक कि मीडिया वाले भी, हां मीडिया बालों ने अदालती कार्रवाई की लाइव रिपोर्टिंग शुरु कर दी थी, जिसे पूरा देश देख रहा था।

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एन. एन. टी. साइंस काँलेज दिल्ली!

गर्वित ने जब से काँलेज में कदम रखा था, उसकी दुनिया ही बदल गई थी। रोज-रोज खूबसूरत हसीना को नजदीक से निहारना, उसे बहुत मजा आता था। वैसे तो वो लवण्या से प्रेम करता था। इस बात के चर्चा पूरे काँलेज में होने लगे थे। किन्तु लवण्या ने जिस दिन से उससे जिस्मानी संबंध बनाने से इनकार कर दिया था, लवण्या उसे बेकार सी लगने लगी थी।

ऐसे में उसकी प्यासी नजर किसी ऐसे लड़की की तलाश में थी, जो बिना कोई सवाल किए उसे अपना जिस्म सौंप दे। जो बोल्ड हो, हाँट हो और खुले विचारो की हो। जो उसके एक इशारे पर ही खुद को उसकी बांहों में समर्पित कर दे। गर्वित जिस प्रकार की इच्छा रखता था, उसकी पूर्ति भी हो गई। उसने जैसा चाहा था, वैसी ही लड़की उसे मिल भी गई। 

हां, "काँलेज में सान्या सिंघला ने प्रवेश लिया" और पूरा काँलेज ही उसका दीवाना हो गया। काँलेज का करीब-करीब नौजवान लड़का सान्या को जब चलते देखता था, आहें भरता था और जिनमें हिम्मत थी, वो पीछा भी करता था। लेकिन सान्या के व्यवहार को देखकर लगता नहीं था कि "किसी की दाल गलने वाली है"।

फिर भी कहते है न कि दीवानों को कभी भी हराया नहीं जा सकता। तभी तो लड़के नित नए प्रयास करते रहते थे,.....लेकिन सफलता गर्वित को मिली। वो चाहता था कि "सान्या सिंघला" के कोमल बदन ,कमायनी रुप एवं उसकी चंचलता पर उसका ही एकाधिकार हो और उसे अपनी इच्छा पूर्ति करने का मौका भी मिला। उसने सान्या सिंघला से अपने मुहब्बत का इजहार किया और सान्या ने इसे स्वीकृति भी दे-दी। 

फिर तो.....दोनों केबीच मुहब्बत का सिलसिला शुरु हो गया। उनकी क्लास छूटने लगी और एकांत में मिलने के दोनों ने ही मौके तलाशने शुरु कर दिए।

कहावत है न कि....इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपता, तभी तो दोनों मुहब्बत की पायदान चढने लगी और इस के साथ काँलेज में चर्चा का दौर भी शुरु हो गया। जिसे देखो, वही उन दोनों के प्यार- मुहब्बत की बातों को चटखारे लेकर एक-दूसरे को सुनाने लगा। बात साधारण होती,....तो चल जाती, परन्तु यहां तो सान्या के लिये चाहत "सभी के दिलों में थी"। 

फिर अकेले ही "गर्वित उस फल को, जिसे सभी खाने को लालायित थे, ले उड़ा था"। ऐसे में स्वाभाविक ही था कि उनसे जलने बालो की एक बहुत बड़ी फौज थी। जो अब उन दोनों को बदनाम करने के लिए अवसर तलाशती रहती थी। तभी तो दोनों की "प्रेम कहानी" काँलेज में इतनी तेजी के साथ फैलती चलीगयी।

परंतु.....न तो गर्वित सक्सेना को इन बातों की चिन्ता थी और न ही सान्या सिंघला इन बातों को सोचने वाली थी। उन्हें तो जो मन में भाये, वही करना था। तभी तो उस शाम "गर्वित ने सान्या को होटल सम्राट में चलने के लिए आँफर दिया और सान्या राजी भी हो गई"। 

आखिर मिलन के अंतिम सोपान को तय करने के लिए आकांक्षा दोनों के ही हृदय में थी। दोनों ही चाहते थे कि एकांत मिले कि समाज के सभी सीमाओं को तोड़ कर दोनों एकाकार हो जाए। ऐसे में गर्वित के द्वारा दिया गया आँफर, एक फर्मलिटी भर था, जिसे सान्या ने हृदय से स्वीकार कर लिया।

तभी तो उस शाम को गर्वित तैयार होकर अपनी कार लेकर सान्या के फ्लैट पर पहुंचा। सान्या तो कब से तैयार थी, तो फिर वह भी कार में बैठ गई और कार सरपट दिल्ली की सड़क पर दौड़ने लगी। शाम का सुहाना समय, दोनों के दिलों में उमड़ती ख्वाहिशें और कार की रफ्तार। कार ड्राइव करते हुए गर्वित की तिरछी नजर सान्या के "कोमल चेहरे पर ही टिकी थी"। 

जिसने उसकी आतुरता को बढ़ा दिया था, वो उसके होंठों से मधुर पराग रस कण को चूमना चाहता था। उसे पूरी तरह निचोड़ लेना चाहता था।.....बात ऐसी भी नहीं थी कि सान्या उसके बेताबी भरे नजरों को नहीं समझ रही थी। वो जानती थी कि आखिर गर्वित इतना बेचैन क्यों है?....फिर तो बेचैन वो भी तो थी, उसके हृदय में भी मिलन को लेकर एहसास करवट ले रहा था।

ऐसे में दोनों "होटल सम्राट" पहुंचे, जहां की सजावट ही इस प्रकार से की गई थी कि ग्राहक को लगे कि स्वर्ग में आ गए है। ऐसे में दोनों ने कार पार्क होते ही कार से निकल कर मुख्य द्वार की ओर कदम बढ़ाया और हॉल में कदम रखा। बाहर शाम ढल चुकी थी और धीरे-धीरे शहर के आँचल पर अंधेरे ने अपनी चादर डालनी शुरु कर दी थी, ऐसे में पूरा होटल रोशनी से नहा उठा था। 

इन जगमगाती हुई रोशनी में उन दोनों ने जब होटल के अंदरूनी भाग को देखा,....उन्हें एहसास हुआ कि धरती पर स्वर्ग यही है। फिर तो दोनों ने खाली टेबल देखा और बैठ गए। फिर वेटर से स्कॉच की बोतल, आईश वाउल एवं पनीर भुजी के ऑर्डर भी दे-दिया।

उनका ऑर्डर देना और मिनट भी नहीं लगे, उनके टेबल पर ऑर्डर सर्व हो गया।....फिर गर्वित ने नजर उठाकर हॉल में देखा, सभी पीने में व्यस्त थे। इसलिये वो भी जाम बनाने में व्यस्त हो गया, जबकि सान्या उसे ही देखे जा रही थी। सान्या सिंघला, उसके घर में विचारों की आजादी थी। पिता राजीव सिंघला थे, जो कि बिजनेस मेन होने के कारण अपने काम में ही व्यस्त रहते थे। 

ऐसे में सान्या को कोई रोक-टोक करने वाला नहीं था, उसकी भावनाओं को समझने वाला नहीं था। स्वाभाविक ही था कि ऐसे में उसकी भावनाएँ बहके, मन में विद्रोह की भावना जागृत हो। ऐसे में गर्वित का उससे मिलना और प्यार हो जाना, उसे बस सब कुछ सपना सा लगता था। तभी तो वो गर्वित को ही एकटक देखे जा रही थी, मानो कि "मिलन के लिए व्याकुल हो। ऐसे में जाम तैयार होने पर गर्वित ने उसके हाथों में थमाया और दोनों ने टकराया और एक स्वर में बोला।

चियर्स!

चियर्स!

और फिर....एक बार जो उनके गले से शराब का घूँट उतरा। इसके बाद तो दोनों जाम दर जाम पीने लगे और धीरे-धीरे दोनों पर नशा हावी होने लगा। एक तो दोनों युवा जिस्म, दूसरे शराब का असर, भावनाएँ भड़कते देर नहीं लगनी थी। बस एक चिंगारी छूने भर की देर थी " और उनके अंदर दबी काम वासना भड़क उठती"। तभी तो दोनों शराब भी पीते जा रहे थे और एक-दूसरे को कामुक निगाहों से निहारते भी जा रहे थे। उस पर होटल में धीमे स्वर में बजता हुआ पाँप संगीत। 

आखिर सान्या कब तक अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रख पाती, तभी तो उसने अपने रसीले अधर को गर्वित सक्सेना के होंठों पर रख दिए और गर्वित को जैसे मुंह मांगी मुराद मिल गई हो, "उसने सान्या सिंघला के होंठों को अपने होंठों में फंसा लिया और उसपर के पराग कणों को चूसने लगा"। साथ ही उसके हाथ हरकत करने लगे और सान्या के जिस्म पर इधर-उधर फिसलने लगे।

इसकेबादतो "काम वासना" का वेगवान ज्वार-भांटा दोनों के जिस्म में प्रवाहित होने लगा। इतना कि, अब उन दोनों को खुद पर नियंत्रण रखना मुश्किल हो चुका था।....उनका अगर बस चलता, तो वे इस हॉल में ही शुरु हो जाते,....किन्तु यह नामुमकिन था। 

तभी तो दोनों ने अंतिम बचे हुए पैग को हलक में उतारा, फिर गर्वित उठ खड़ा हुआ और अपने मजबूत बांहों में सान्या को उठा लिया और रूम की ओर चल पड़ा। जबकि सान्या, वह तो मिलन के लिए बेकरार ही थी, तभी तो वो खिलखिला कर हंसने लगी। उसकी मदमस्त हंसी, मानो कि आग में घी डालने के समान था, तभी तो गर्वित उसे लेकर बुक किए रूम में चला गया।

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होटल सम्राट में पहली मिलन के बाद तो जैसे गर्वित और सान्या के जिस्म की प्यास भड़क उठी हो। अब तो रोज ही दोनों एक-दूसरे के बांहों का बिस्तर तलाशने लगे। दोनों की चाहत परवान चढने लगी और ऐसा लगने लगा कि दोनों.....एक दूसरे से एक पल भी अलग नहीं रह सकते। ऐसे में काँलेज में ही एक दूसरे को बाँहों में भरकर कीश करना एवं अश्लील हरकत करना, उन दोनों के लिए अब आम हो चुका था। दोनों ही इस कदर खुल चुके थे कि क्लास रूम में भी मौका मिलते ही एक दूसरे को बांहों में भर लेते थे।

अब इस प्रकार की हरकतों से काँलेज में तीव्र प्रतिक्रिया हो, यह तो होना ही था। अतः उन दोनों की ओछी हरकतों का ब्योरा कंपलेन के रुप में प्रिंसीपल अजीत थापर के पास पहुंचा और स्वभाव से ही मृदुभाषी एवं नम्र थापर ने इस विषय पर गहन मनन किया और फिर दोनों के गार्जियन को काँलेज में तलब कर लिया। प्रिंसीपल थापर इस बात की गंभीरता को जानते थे। 

उनके नजर में काँलेज लाइफ में प्यार होना, एक सामान्य बात थी,.....किन्तु इस तरह की अश्लील हरकत, काँलेज के वातावरण को दूषित कर सकता था।....थापर साहब इस बात को अच्छी तरह से जानते थे कि इन दोनों की हरकतों का, काँलेज के अन्य छात्र भी नकल कर सकते है। ऐसे में उन्हें रिश्क लेना पसंद ही नहीं था।

फिर तो....ललित सक्सेना एवं राजीव सिंघला को बुलाया गया और उनके आने के बाद आदतन अजीत थापर उन पर बरस पड़े।.....उन्हें बताने लगे कि उनके बच्चों ने काँलेज में क्या-क्या गुल खिलाया है।.....गर्वित एवं सान्या के एक-एक अश्लील हरकतों को दोनों के सामने खोल कर रख दिया। 

साथ ही उन्हें वार्निंग भी दी,....कि अगर उनके बच्चे नहीं संभले, तो काँलेज उन पर कार्रवाई भी कर सकती है। थापर की कटीली बातों को सुनकर खुद को अपमानित हुआ समझ कर ललित सक्सेना एवं राजीव सिंघला ने आपस में बातें की और काँलेज से निकलने के बाद उन्होंने मीटिंग की।

उन दोनों की नजर में अब तक बदनामी तो हो-ही चुकी थी। अब तो डैमेज कंट्रोल करना था और इसलिए उन्होंने एक साथ ही इस निर्णय को लिया कि "गर्वित एवं लवण्या की शादी कर दी जाए" और इसी उद्देश्य से दोनों ने एक साथ ही गर्वित एवं लवण्या को बुलाया और फिर दोनों को लेकर होटल "वैभव विलास" पहुंचे। वहां पर ललित सक्सेना ने एक सुइट पहले से ही बुक कर रखा था। 

जहां पहुंचने के बाद ललित सक्सेना ने दोनों को बैठने के लिए इशारा किया। एक तो अपने-अपने गार्जियन को देखकर दोनों ही हैरान थे, उसपर इस समय होटल के सुइट में लेकर आना। दोनों वहां रखे सोफे पर बैठ गए और आश्चर्य भरी नजरों से कभी तो दोनों के चेहरे पर तो कभी होटल के भव्य सुइट को देखने लगे। जबकि उन्हें इस प्रकार से आश्चर्य में डूबा देखकर राजीव सिंघला ने बोलने की शुरुआत की।

देखो, तुम दोनों को यहां पर जो लाया गया है,....उसके विषय में आश्चर्य मत करो!....आज तुम लोगों का कंपलेन काँलेज के प्रिंसीपल द्वारा हमें मिला और हम दोनों ने फैसला कर लिया कि तुम दोनों एक हो जाओ। इस तरफ हम कदम बढ़ाएंगे।

लेकिन पापा!....आपने कोई फैसला करने से पहले एक बार हमसे पुछ तो लिया होता। पापा....अभी तो हम लोग बच्चे है, अभी तो हमें जीवन को समझना है, फिर हम शादी कर लेंगे। राजीव सिंघला की बातें सुनकर सान्या सिंघला ने विरोध भरे स्वर में कहा और राजीव सिंघला के चेहरे को देखने लगी। जबकि सान्या के चुप होते ही गर्वित ने भी स्वर में स्वर मिलाया।

हां, आप लोगों को कोई फैसला लेने के पहले हमसे जरूर पुछना चाहिए था।.....आखिर जीवन तो हमें ही जीना है और जब तक हम एक दूसरे को अच्छी तरह से समझ नहीं लेते, साथ किस प्रकार से रह पाएंगे।

लेकिन तुम दोनों अब कितना एक-दूसरे को समझोगे?..... अब तो तुम दोनों न जाने कितनी ही बार हम बिस्तर हो चुके हो।.....अब तो समझ में ही नहीं आता कि तुम दोनों के बीच बचा ही क्या है?.....सिर्फ बहाना बनाने से जिंदगी नहीं चलता गर्वित और फिर तुम दोनों ने बहुत बदनामी करवा दी है। इसलिये अब हम लोग तुम्हारी एक नहीं सुनेंगे और जो हमने फैसला किया है। उसे तुम दोनों को स्वीकार करना होगा। गर्वित की बातें खतम होते ही ललित सक्सेना बिफर कर बोले।

तो फिर.....आप लोगों ने फैसला कर ही लिया है?........ ललित सक्सेना की बातें सुनकर दोनों एक स्वर में बोले। जिसका जबाव राजीव सिंघला ने दिया।

हां, बस यही समझ लो। तुम दोनों ने हम लोगों की काफी बदनामी करवा दी है और हम लोग जहां तक समझते है कि मामला और अधिक बिगड़े। तुम दोनों को परिणय सूत्र में बांध देना चाहिए। 

राजीव सिंघला ने अभी बात भी पूरी नहीं की थी कि सान्या तुनक कर उठी और होटल रूम से पैर पटकती हुई बाहर निकल गई। उसे बाहर निकलता देख कर गर्वित भी उठ खड़ा हुआ और तेजी से बाहर निकल गया। जबकि उन दोनों को जाते हुए राजीव सिंघला और ललित सक्सेना बेबस नजरों से देखते रह गए। उन्हें तो समझ ही नहीं आ रहा था कि आखिर मामला क्या है?

.....आखिर अब उन दोनों को समझने के लिए क्या बचा रह गया है?.....लेकिन बच्चे जवान थे और उन पर निर्णय को लादा नहीं जा सकता था। दोनों इस बात से अच्छी तरह से वाकिफ थे कि कहीं उन्होंने जबरदस्ती उन लोगों पर निर्णय लादा,....वे दोनों गलत कदम भी उठा सकते थे और फिर उनके हाथ में सिर्फ पछतावा ही रह जाना था।

आखिरकार दोनों ही इस सत्य से भी वाकिफ थे कि उनके कुल का वारिस सिर्फ इकलौता ही था। इसलिये रिश्क लेना उनके लिए घातक भी हो सकता था। नहीं.....नहीं, रिश्क लेने की जरूरत नहीं है, अभी उन दोनों को निर्णय करने देते है। ऐसा उन दोनों ने सोचा और लंबी सांसे ली। जबकि होटल से बाहर निकल कर सान्या अपने कार की ओर बढी। उसे इस प्रकार से जाता देखकर गर्वित भी उसकी ओर लपका और उसके ही कार में बैठ गया। फिर तो सान्या ने कार श्टार्ट की और सड़क पर दौड़ा दी, फिर आवेश में बोली।

पता नहीं क्यों.....हमारे पैरेंट्स को समझ क्यों नहीं आता। उनका फैसला....माई पुट। आखिर मेरी जिंदगी है और इसे मैं अपने शर्तों पर जीऊँगी। सान्या ने बोला और फिर उसने अपनी नजर गर्वित के चेहरे पर टिका दी। जबकि गर्वित ने कलाईं घड़ी देखा, शाम के पांच बज चुके थे, फिर बोला।

कम आँन बेबी!....छोड़ो भी इन बातों को। इन छोटी-छोटी बातों पर अपना दिमाग खराब नहीं किया करते। अब गुस्सा त्याग भी दो और चलो, होटल सम्राट चलते है। बोलने के बात गर्वित ने अपने होंठ सान्या सिंघला के गाल पर चिपका दिए।

फिर तो सान्या का गुस्सा बर्फ की तरह पिघल गया और फिर उसने कार का रुख "होटल सम्राट" की ओर मोड़ दिया। ढलते हुए सूर्य की रोशनी में शहर लग रहा था कि श्रृंगार करने को तत्पर हो। सड़क पर आती- जाती ट्रैफिक और दौड़ता हुआ शहर। इसके बाद तो सान्या एवं गर्वित ने फैसला कर लिया कि जब तक दोनों एक-दूसरे को समझ नहीं लेते, लीव इन रिलेशनशिप में रहेंगे। 

जब उन्हें लगने लगेगा कि दोनों ने एक दूसरे को अच्छी तरह से समझ लिया है। ब्याह के बंधन में बंध जाएंगे। बस उन दोनों के विचार और दोनों ने मौन स्वीकृति दे-दी। फिर तो दोनों ने ही " चंद्रिका वन" में साथ रहने का फैसला कर लिया और दोनों वहीं पर आ गए। अब तो उन्होंने काँलेज भी जाना छोड़ दिया, जिससे उनकी पढाई भी छूट गई।

**********

इसके बाद तो फैसला होने की देर थी, सान्या एवं गर्वित "चंद्रिका वन फार्म हाउस “में रहने के लिए आ गए। अब तो उनके ऊपर किसी प्रकार की बंदिशें भी नहीं रही, तो फिर उन दोनों के हृदय की काम वासना ने जोड़ पकड़ लिया। अब तो बस उनका काम ही रह गया, जो जी को अच्छा लगे, पका कर खाना और जम कर शराब पीना। फिर जैसे ही काम वासना की ज्वाला भड़के, एक-दूसरे की बांहों में समा जाना।

उन्हें जल क्रीड़ा करना बहुत ही पसंद था और कभी तो जल क्रीड़ा करते हुए ही दोनों समागम को अग्रसर हो जाते थे। शुरु-शुरु में तो दोनों को ही यह जीवन शैली मन को बहुत भाया। गर्वित अपने लिए अकसर ही फेनी शराब के कार्टन को मंगवा लेता था, किन्तु सान्या तो स्कॉच ही पसंद करती थी। परंतु दोनों के रिश्तों में प्यार कम और स्वार्थ ज्यादा थी। 

चाहत की बातें तो सिर्फ दिखावटी थी। था तो सिर्फ जिस्म का आकर्षण, जो कि दोनों अकसर ही इसके जरूरतों को पूरी करने में रत रहते थे। लेकिन इसमें एक तबदीली होने लगी। गर्वित अब धीरे-धीरे सान्या को चाहने लगा......उसकी जरूरतों ने मुहब्बत का स्थान ले लिया। अब तो......एक पल के लिए भी अगर सान्या उसकी नजरों से ओझल होती, गर्वित तो व्याकुल होने लगता था।

जबकि सान्या सिंघला, उसे तो अब इस रिश्ते से ऊब होने लगी थी। अगर सच कहा जाए तो उसका दिल भर चुका था "गर्वित से"। वो तो अब जीवन के नए स्वाद को लेने के लिए लालायित थी। उसे अब तो "गर्वित का जिस्म" बासी रोटी के टुकड़े के समान प्रतीत होने लगा था और ऐसा होना भी अप्रत्याशित तो नहीं था। उन्होंने तो रिश्ते की नींव को ही स्वार्थ से चुना था।

तो भला वह कितनी टिकाऊ रहता। एक न एक दिन तो उन दोनों में से एक को ऊब होना ही था इस रिश्ते से। अब सान्या के मन में ऊब पनपा तो वह चंद्रिका वन फार्म हाउस से अकेले ही बाहर जाने लगी। 

बस बात इतनी सी होती, तो कोई बात नहीं था, किन्तु.....सान्या के अंदर और भी तबदीली आ चुका था। वह फार्म हाउस से बाहर जाकर रोज ही शाम को घंटों इधर से उधर दिल्ली की सड़क पर बिना वजह ही कार दौड़ाती रहती और कोई लड़का उसे जंच जाता, उसके साथ होटल में जाकर मौज उड़ाती। परंतु फार्म हाउस लौटने पर वो अकसर ही "गर्वित को संबंध बनाने से इनकार कर देती"। 

उसका यूं रोज-रोज रात को नशे में टून्न होकर लौटना और अकसर ही संबंध बनाने से इनकार करना,...."गर्वित को खटकने लगा"। परिस्थिति तो यहां तक पहुंच गई कि गर्वित इस कारण से मानसिक थकावट को महसूस करने लगा और चिड़चिड़ा सा रहने लगा।

कहते है न कि जब मन में ही मेल नहीं रहे, तो साथ रहने का कोई मतलब ही नहीं होता।....फिर तो एक- दूसरे की छोटी-छोटी हरकतों को नोटिस किया जाने लगता है और फिर यही झगड़े में तबदील हो जाता है। फिर तो स्वार्थ के नींव पर चुनी गई रिश्ते की दीवार कमजोर भी तो बहुत होती है। जहां एक शंका की दरार पड़ी नहीं कि इस दीवार को टूट कर बिखरने में समय नहीं लगता। 

फिर तो.....दोनों के ही अपने-अपने स्वार्थ थे, ऐसे में उनका रिश्ता कब तक टिकाऊ रहता।....जैसे ही दोनों के अहं का टकराव हुआ, उन दोनों में छोटी-छोटी बातों पर झगड़े भी होने लगे और एक दिन तो हद हो गई।

रात के दस बज चुके थे। चंद्रिका वन रोशनी से नहाकर गुलजार हो रहा था,....किन्तु गर्वित के हृदय में तो तूफान मचा हुआ था। वह हॉल में बैठा हुआ फेनी शराब की घूंट लगा रहा था और सोचता भी जा रहा था। हॉल में जल रहे नीले बल्ब की रोशनी में भी गर्वित के चेहरे पर तनाव देखा जा सकता था।

....उसके चेहरे पर फैले हुए उदासी और आँखों में पीड़ा के भाव, ऐसा प्रतीत हो रहा था कि "फेनी का असर भी उसपर नहीं हो रहा हो"। आखिर उसके मन में तो द्वंद्व चल रहा था। वह उन बातों को सोचे जा रहा था, जिसे उसने सान्या सिंघला के अंदर महसूस किया था।

हां, उसका अनुभव कभी भी गलत नहीं हो सकता था। हां, सान्या जरूर बदल गई थी, उसके आज-कल के हरकतों से साफ प्रतीत हो रहा था कि वह आज-कल उससे ऊब सी गई है।....अब सान्या कोउसकी जरूरत ही नहीं रही, तभी तो शाम चार बजे गए अब तक वो नहीं लौटी है। 

तो....तो स्वाभाविक ही है कि वो कहीं न कहीं तो रंगरलियां मना रही होगी। फिर तो....अब उसकी जरूरत सान्या को क्यों रहने लगी,....आखिर उससे भी बेहतर उसे कोई मिल गया होगा।....तभी तो उससे दूर-दूर सी रहने लगी है। लेकिन उसे, उसे तो सान्या के बिना एक पल भी बने, ऐसा नहीं था।

बस इतनी सी कल्पना से वह कांप उठा कि कहीं सान्या उससे अलग हो गई तो?.....सवाल गंभीर था और उसके जीवन से जुड़ा था,....फिर तो वो अब सान्या को दिली हदों तक चाहने लगा था। ऐसे में बस इतनी सी कल्पना कि सान्या उससे अलग हो जाएगी, अनजाने भय से कांप उठा और फिर तैयार पैग को उठाया और झटके से हलक में उड़ेल लिया।....किन्तु जब हृदय में तूफान उठा हो, शराब भी राहत नहीं पहुंचा सकता है। इसलिये ही तो फिर से उसने अपने लिए पैग तैयार कर लिए।

तभी बाहर कार रुकने की आवाज उभड़ी और चंद पलो बाद ही लड़खड़ाते कदमों से सान्या ने हॉल में कदम रखा और उसकी ये हालत देखकर गर्वित बौखला गया। उसके हृदय में गुस्से का ज्वार फूटा और उसने सान्या के हाथों को पकड़ कर जोड़ो से खींचा, फलस्वरूप सान्या सोफे पर धड़ाम से गिरी और पसर गई। जबकि गर्वित गुस्से में बोला।

तुम अब तक थी कहां?.....देखो तो मैं कब से तुम्हारा इंतजार कर रहा था। गर्वित अभी अपनी बातों को पूरा भी नहीं किया था कि सान्या चिढकर बोली।

हिच्च....मैं कहीं भी रहूं, कुछ भी करुं, तुम पुछने वाले कौन होते हो?.....सान्या ने चिढकर कहा और गर्वित की आँखों में देखने लगी। जबकि उसकी इतनी ही बातों ने गर्वित के तन-मन में आग लगा दिया। फिर तो वो चिल्ला कर बोला।

मैं गर्वित सक्सेना, तुम्हारा प्रेमी!....मैं तुमसे प्रेम करता हूं और इसलिये पुछने का अधिकार रखता हूं। गर्वित चिल्ला कर बोला और उसकी बातों को सुनकर सान्या उससे भी ऊँचे स्वर में बोली।

प्रेमी!....हिच्च....माई पुट, तुम मेरे जीवन के अधिकारी नहीं हो। मर्जी है मेरी, जहां जाऊँ, जो चाहूं वो करुं। सान्या ने अभी बात पूरी किया भी नहीं था कि गर्वित ने हाथ उठा दिया और थप्पड़ के रुप में सान्या के गाल पर पड़े।

तड़ाक!

आवाज गुंजी हॉल में, फिर तो सान्या अपने गाल को सहलाने लगी। इसके बाद फिर तो दोनों में उठा- पटक और लात घूंसे चलने लगे और जब उन दोनों के बीच मामला थमा, सान्या पैर पटकती हुई हॉल से बाहर निकल गई। इसके बाद गर्वित के कानों में कार श्टार्ट होने की आवाज आई, वह उठकर बाहर की ओर लपका और जब बाहर पहुंचा। सान्या कार लेकर जा चुकी थी और लाँन में अब सिर्फ उसका ही कार बचा हुआ था,....उसकी तरह ही बिल्कुल अकेला। 

फिर तो गर्वित के हौसले पस्त हो गए, उसका नशा तो कब का कफूड़ हो चुका था। अब तो उसके हृदय में पछतावा और आशंका ही बचा हुआ था। आशंका इस बात की कि कहीं सान्या ने उससे संबंध तोड़ तो नहीं लिया। बस इतनी बातें दिमाग में आने के बाद वापस वो हॉल में लौट गया और सोफे पर बैठकर जार-जार रोने लगा।

**************

सान्या सिंघला के यूं छोड़ कर चले जाने के बाद गर्वित टूट सा गया। उसे लगने लगा कि......जीवन में दुःख के सिवा और भी कुछ नहीं होता। बस जीवन जीना ही है,....तो दर्द एवं अपमान के एहसास के साथ जिये। जीवन जीना है, इसलिये ही जीते रहो, बिना मकसद के। पहले तो उसे लगा था कि सान्या नाराज होकर गई है और जल्द ही उसके पास लौट भी आएगी।

लेकिन उसके मन की ये आशा बस ओस के बूंद की मानिंद ही साबित हुई। एक-एक दिन करके महीनों बीत गए और महीनों ने धीरे-धीरे छ का आंकड़ा छू लिया। फिर भी सान्या नहीं लौटी, उसे तो लौटना ही नहीं था, वह तो शायद उससे ऊब कर चली गई थी। 

तभी तो वो कितनी ही बार उसके घर गया, किन्तु राजीव सिंघला ने उससे मिलने नहीं दिया।....उसने तनिक कोशिश नहीं की थी बिगड़े रिश्ते को सुधारने के लिए।एड़ी-चोटी का जोड़ लगाया था कि सान्या मान जाए और उसके पास लौट जाए।....परंतु वह उसके पास से लौटकर आने के लिए थोड़ी न गई थी। वह तो सदा-सदा के लिए उसके पास से चली गई थी।....तभी तो इस दौरान उसके द्वारा किए गए अनगिनत फोन कॉल को उसने अवोइड कर दिया था।

किन्तु गर्वित, वह तो सच में ही सान्या से प्रेम करने लगा था। उसके जिस्म की चाहत कब दिल की चाहत में बदल गई, उसे पता ही नहीं चला।.....वह तो अब सान्या के बिना खुद के वजूद को नगण्य समझने लगा था। ऐसे में सान्या के द्वारा की गई बेवफाई ने उसको अंदर तक तोड़ दिया। 

परिस्थिति ऐसी हो गई कि वह अब हमेशा शराब के नशे में डूबा रहने लगा और तो और, उसे जब नशा नहीं होता, चरस का धुआँ भी खींचने लगा था। जो धीरे-धीरे उसकी आदत बनती चली गई।....बेवफाई के चोट से घायल गर्वित महीनों तक चंद्रिका वन में खुद को कैद किए रहा और खुद को कोसता रहा।

अब वह रिश्ते के महत्व को समझने लगा था। उसे एहसास हो चुका था कि सिर्फ स्वार्थ के लिए बनाए गए रिश्ते दिल को घाव ही देते है।....जो धीरे-धीरे नासूर बन कर इंसान के जीवन को ही निगल जाता है। वह समझ चुका था कि पश्चिमी सभ्यता का अंधा अनुकरण करना न तो व्यक्ति के हित में है, न ही समाज के हित में है और न ही देश के हित में।

....परंतु वह तो अपने रुप सौंदर्य के मद में डूबा हुआ था। उसे अपने पिता के अतुलित धन-भंडार का अभिमान था।...लेकिन गर्वित का गर्व अब टूटकर चुर-चुर हो कर बिखर चुका था। परिस्थिति तो ऐसी बन गई थी कि गर्वित खुद से ही नफरत करने लगा था। खुद के व्यक्तित्व से नफरत करने लगा था, खुद के सपनों से नफरत करने लगा था।

उसे आज भी याद था कि लवण्या उसे कितना चाहती थी, उसे कितनी तरजीह देती थी। किन्तु वह अभागा....लवण्या के उस शुद्ध निर्मल प्रेम को नहीं समझ सका। उस नवयौवना सुंदरी के प्रेम को ठुकरा दिया और सान्या के दामन में जा गिरा।

...परंतु उसे कहां पता था कि "सान्या सिंघला" का दामन तो सिर्फ कांटों से भरा हुआ है। उससे कोमल पुष्प की अपेक्षा रखना, यह तो गर्वित की भूल थी। लेकिन उससे भूल तो हो-ही गई थी। जिसका तीव्र डंख उसके हृदय को वेधता रहता था और कभी-कभी लहूलुहान कर देता था। ऐसे में उसने शराब के नशे का सहारा लिया, चरस के धुएँ में शांति को तलाशने लगा, किन्तु व्यर्थ।

जीवन जब अस्त-व्यस्त हो, मन में दुविधा के सागर हिलोरे मारते हो और जब लगे कि जीवन सिर्फ संशय में गूंथा हुआ है।....कृत्रिम संसाधन कभी भी आनंद नहीं पहुंचा सकते। हालांकि उसने लवण्या से संपर्क करने की कोशिश इस दौरान की, परंतु उसके हिम्मत ने साथ नहीं दिया। 

अब वह किस चेहरे को लेकर लवण्या का सामना कर सकेगा। फिर तो उसके अंदर इतना सामर्थ्य नहीं था कि लवण्या के नफरत का सामना कर सके। वह उसके उलझे हुए सवालों को किस प्रकार से जबाव दे सकेगा। उसके उन सवालों को, जिसके लिए उसने लवण्या का साथ छोड़ दिया था।....गर्वित इस बात को भलीभांति जानता था कि उससे भूल हो गई है। उसने जीवन के साथ ऐसी भूल की है, जिसका कोई माफी नहीं हो सकता।

इस दरमियान उसके पिता ललित सक्सेना कितनी ही बार उसके पास आ चुके थे। उसे कितनी ही बार समझाया था कि जीवन किसी एक के चले जाने से खतम नहीं हो जाती। जीवन तो निरंतर चलने का नाम है, जो साथ से छूट गए, उसको भूल कर और नए को साथ में लेकर। 

मानव को नित्य ही जीवन पथ पर गतिमान रहना चाहिए, बीते हुए को भूल कर। हालांकि उसके पिता ने उसे जीवन के यथार्थ को बतलाया था। उसे समझाने की कोशिश की थी कि "मानव जीवन किसी एक के चले जाने से रुक नहीं जाती"।परंतु गर्वित, वह तो खुद के द्वारा छला जा चुका था, खुद को ठगा-ठगा सा महसूस करता था। ऐसे में पिता के द्वारा बोले गए मर्म भरी बातों को भला वह किस प्रकार से आत्मसात कर पाता।

उसने महसूस कर लिया था कि अब वो जीवन के उस दोराहे पर आकर खड़ा हो गया है, जहां से किधर को जाना है?......उसको पता ही नहीं। फिर तो कुछ जख्म इस प्रकार के होते है, जिन्हें देख पाना तो कतई मुमकिन नहीं। परंतु हां, वे हमेशा रिसते रहते है और नासूर बन जाते है। 

गर्वित को अब तो कभी-कभी खुद पर ही गुस्सा आने लगता था कि उसे क्या सूझी कि वो सान्या के दामन में जीवन पुष्प तलाशने लगा। उसकी मानसिक स्थिति को उसके पिता ने भी समझ लिया था, तभी तो उन्होंने उसपर किसी प्रकार के दबाव को नहीं डाला। उनकी सोच यही थी कि समय बीतने के साथ ही उसके जख्म भर जाएंगे और वो पिछली बातों को भूल जाएगा,....फिर उसके बारे में सोचेंगे।

हां, उनकी सोच भी सही थी, समय बीतने के साथ गर्वित अपने जख्मों को भूलने भी लगा था। किन्तु जब वो फार्म हाउस से बाहर निकला, उस शाम सान्या को किसी अंजान लड़के के बांहों में देखा। बात बस इतनी होती, तो कोई बात नहीं थी, परंतु उसने लगातार कितने ही दिनों तक सान्या को लड़के के साथ देखा। 

लेकिन यह नई बात नहीं थी, नया तो यह था कि सान्या तो वही रहती, लेकिन उसका पार्टनर रोज ही बदल जाता। जिसे देखने के बाद गर्वित के दिमाग को तेज झटका लगा। वो समझ भी नहीं पाया कि आखिर इसका मतलब क्या है? और जब उसके समझ में आया कि सान्या हवस की पुजारिन बन चुकी है,....जिसे रोज ही नए पार्टनर की जरूरत होती है, वो बौखला गया।

कहीं ऐसा भी होता है?...उसके दिमाग में प्रश्न उभड़ा। लेकिन जो भी था, उसके आँखों के सामने था। ऐसे में काफी मनो-मंथन करने के बाद उसने फैसला कर लिया कि वो सान्या के अस्तित्व को ही समाप्त कर देगा।....किन्तु किस प्रकार से?....सवाल गंभीर था और इसका जबाव था कि प्लानिंग करना होगा। इस तरह से प्लानिंग करना होगा कि "सान्या सिंघला" के बचने के चांसेज बिल्कुल भी नहीं रहे। साथ ही उसकी हार्दिक इच्छा थी कि इन बातों को समाज के सभी वर्गों को जानकारी हो। 

ताकी जो पश्चिमी सभ्यता का अंधा अनुकरण करने को उद्धत रहते है,.....इससे बचने की कोशिश करें। समाज में इस बात का सही मैसेज जाए। इसलिये उसने महीनों की प्लानिंग की और "रति संवाद" नाम अपने योजना को दिया।

अपने प्लानिंग को धरातल पर लाने के लिए उसने "रति संवाद" नाम से म्यूजिक डिजाइन की। तेज जहर की व्यवस्था की और साथ ही छोटे-छोटे बम की व्यवस्था की। पैसे की तो उसके पास कमी थी नहीं, उसने स्लीपर सेल बनाया, जो उसकी योजना में उसकी मदद कर सके। परंतु ....फूलप्रुफ योजना बनाने के बाद भी सान्या लगातार तीन दिनों तक बचती रही।....किन्तु मरने वाली अंजान लड़कियों के लिए गर्वित के हृदय में तनिक भी अफसोस नहीं था। वह अच्छी तरह से जानता था कि इस प्रकार की लड़कियां हवस की पुजारिन होती है।

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इसके बाद गर्वित प्रतिशोध की भावना से इतना ग्रसित हो चुका था कि उसने इस बात की परवाह नहीं की कि उसके शिकार करने की जिद्द में बेकसूर लड़कियां भी मारी जा रही थी। बस उसे जिद्द था कि सान्या सिंघला के अस्तित्व को मिटा देना है और उसने अपने इस प्रयास को सफल करने के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार था। बस उसे तो शिकार करना था, इसलिये शिकारी की भांति योजना बनाई।....योजना को अमली जामा पहनाने के लिए पैसे को पानी की तरह बहाया और ऐसा स्लीपर सेल तैयार किया, जो उसकी योजना को अंतिम रुप देते थे।

फिर गर्वित ने "थिलियम" नाम के जहर को विदेश से इंपोर्ट किया, जो कि अति घातक होता है। उसने ऐसे छोटे-छोटे बम मंगवाए, जो कि रिमोट कंट्रोल से संचालित हो, किन्तु उसकी आवाज और घातकता बहुत ही निम्न हो।.....इसके बाद शुरु हुई उसकी प्रतिशोध की ज्वाला। 

मिलार्ड!....इसके बाद उसके टोही सान्या सिंघला के पीछे लग गए और जैसे ही वो किसी होटल में दिखती, उसके एजेंट उसे फोन कर देते। फिर तो थिलियम को ड्रेसिंग टेबल के शीशे पर लगा दिया जाता और उसके अंदर बम प्लांट कर दिया जाता।.....फिर तो उस रूम में म्यूजिक सिस्टम भी लगा दिया जाता था, जिससे की "रति संवाद" का स्वर गुंजे। मिलार्ड!.....इन सारी हरकतों को छिप कर गर्वित खुद आँपरेट करता था। किन्तु इसे संयोग कहे, या सान्या का लाइफ-लाइन, वो तीन दिनों तक गर्वित के शिकार होने से बचती रही।

किन्तु वो भाग्यशाली तो बिल्कुल भी नहीं थी, तभी तो चौथे दिन गर्वित के प्रतिशोध का शिकार बन ही गई। इसके बाद गर्वित ने खुद के अस्तित्व को भी उसी थिलियम नाम के जहर से मिटा दिया। मिलार्ड!.....ये तो रही अपराध एवं अपराधी की बात, परंतु गर्वित चाहता था कि उसके साथ जो घटित हुआ है। अथवा उसने जो किया है। उसकी जानकारी समाज एवं देश को जरूर हो। तभी तो उसने अपने प्लान का नाम "रति संवाद" रखा था और इतना ड्रामा क्रिएट किया था। 

किन्तु मिलार्ड!....यह हमारे समाज का दुर्भाग्य कहा जाए, या सिस्टम की कमजोरी कि इस मामले को दबा ही दिया गया था।....वह तो भला हो सम्यक एवं लवण्या का, जिसने हमें इस बात की जानकारी दी और जन-जन तक इसको पहुंचाया।

बोलने के बाद शांतनु देव ने चुप्पी साध ली। वह गर्वित के बीते अतीत के दिनों से लौट आया था।....उसने अक्षरशः वही बाते कोर्ट को बताया था, जो उसके लैपटाप में लिखा हुआ था। उसकी बातों को सभी ध्यानपूर्वक सुन रहे थे। यहां तक कि जज साहब भी। ऐसे में उसने अपनी बाते खतम की और अपनी नजर जज साहब के ऊपर टिका दी। जबकि जज साहब, जो कि अब तक आश्चर्य चकित होकर उसकी बातों को सुन रहे थे, उसके मौन होते ही उनकी तंद्रा टूटी। फिर उन्होंने शांतनु देव को गंभीर नजरों से देखा और शांत स्वर में बोले।

शांतनु देव!....आप पुलिस विभाग पर गंभीर आरोप लगा रहे है। आप यह भी जानते होंगे कि इस प्रकार के आरोप की पुष्टि के लिए पुख्ता सबूत चाहिए,...तो आप इसके बारे में क्या बोलेंगे।

मिलार्ड!....आपके सामने गर्वित का रखा हुआ लैपटाप ही तो सब से बड़ा सबूत है इसकेसका। इसमें वो सभी बाते लिखी गई है,.....जो इस अपराध में घटित हुआ। फिर भी मिलार्ड!.....मैं समझता हूं कि इस हत्याकांड के स्थल से प्राप्त वो सबूत एवं पोस्टमार्टम रिपोर्ट को आपके सामने लाया जाए, तो मामला साफ हो सकता है। बोलने के बाद शांतनु देव एक पल के लिए रुका, फिर बोला। 

मिलार्ड!.... साथ ही गर्वित के स्लीपर सेल को गिरफ्तार किया जाए, तो हकीकत सब के सामने आ जाएगा। जज साहब के चुप होते ही शांतनु देव बोला, फिर जज साहब को देखने लगा। जबकि उसकी बातें सुनकर राघव जुनेजा अपनी जगह से उठा और आगे आकर बोला।

मिलार्ड!.....हमारे काबिल दोस्त शांतनु देव ने बड़ी सफाई से इस केस में सवाल खड़े किए और पुलिस विभाग पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया। बोलने के बाद राघव जुनेजा रुका, शांतनु देव के चेहरे को देखा, फिर जज साहब की ओर देखते हुए बोला। 

किन्तु मिलार्ड!....शांतनु देव ने जो बोला, वो कोरी कल्पना के अलावा कुछ भी तो नहीं। इन्होंने बहुत ही शांति से एक काल्पनिक कहानी की संरचना की और कोर्ट को सुना दिया।....परंतु, मिलार्ड!.. अदालती कार्रवाइयां इन कहानियों पर नहीं चला करती। उसके लिए सबूत की जरूरत होती है। बोलने के बाद राघव जुनेजा चुप हो गया और जज साहब की ओर देखने लगा। जबकि उसकी बातें सुनकर शांतनु देव बोला।

मिलार्ड!.....हमारे काबिल दोस्त शायद इस केस में एक पक्ष के बचाव के चक्कर में भूल चुके है कि अगर इस केस के पात्र हकीकत में है, तो यह सिर्फ एक कहानी नहीं हो सकता।

आँब्जेक्सन मिलार्ड!.....हमारे काबिल दोस्त बेजा ही मेरे उपर कटाक्ष कर रहे है। मिलार्ड!....यह किसी भी वकील का नैतिक कर्तव्य होता है कि जिसका केस हाथ में लिया हो, उसके प्रति समर्पित रहे। मिलार्ड!.....ऐसे में पुलिस ने मुझे इस केस की जिम्मेदारी दी है,....तो स्पष्ट है कि मैं पुलिस के उन पक्ष को अदालत के सामने रखूंगा, जो कि सत्य है। राघव जुनेजा ने शांतनु देव की बात सुनते ही प्रतिक्रिया दी और जज साहब को देखने लगा। जबकि उसकी बातें सुनकर शांतनु देव ने कटाक्ष किया।

मिलार्ड!....हमारे काबिल दोस्त ने बात तो सही कहा है कि वकील का नैतिक कर्तव्य होता है कि वह अपने मुवकिल के पक्ष को अदालत के सामने रखे। किन्तु मिलार्ड!...... सिर्फ सत्य को, झूठ से वकील को बचना चाहिए, उस परिस्थिति में तो और.....जब आपको सरकार की ओर से हायर किया गया है। शांतनु देव ने अभी अपनी बातों को पूरा ही किया था कि जज साहब बोलपड़े।

कृपया आप दोनों शांति बनाये रखे और अदालत को अपना काम करने दे। आप दोनों ने अदालत को इस केस के संदर्भ में जानकारी दे-दी है। अब अदालत को भी तो कुछ करने दीजिए। फिर आपको अवसर मिलेगा इस केस के संदर्भ में अपना पक्ष रखने के लिए।

बोलने के बाद जज साहब ने एक पल के लिए चुप्पी साध ली और पेड पर कुछ नोट करने लगे। इस बीच पूरा अदालत कक्ष उन्हें ही देख रहा था। सभी यही सोच रहे थे कि जज साहब आगे क्या बोलेंगे?....फिर तो जज साहब ने अपने आदेश को सुनाने की शुरुआत की। 

उन्होंने पुलिस को आदेश सुनाया कि गर्वित के स्लीपर सेल को गिरफ्तार कर लिया जाए और उनके बयान रिकार्ड किए जाए। साथ ही इस वारदात के सभी साक्ष्य एवं पोस्टमार्टम रिपोर्ट अदालत में पेश किया जाए। आदेश देने के बाद जज साहब उठकर अपने केबिन में चले गए।

उनके उठकर चले जाने के बाद अदालत कक्ष में हलचल बढ़ गया।

इधर अदालत के आदेश को सुनते ही विजय के हाथ-पांव फूल गए। हाथ-पांव तो एस. पी. साहब का भी फूल चुका था और परिणाम स्वरूप उनके चेहरे पर घबराहट स्पष्ट रुप से देखा जा सकता था। तभी तो उन्होंने वकील राघव जुनेजा का पीछा पकड़ लिया।

जबकि विजय बौखलाया हुआ कोर्ट रूम से बाहर निकला और गाड़ी के पास पहुंच गया। उधर शांतनु देव ने कलाईं घड़ी देखी, शाम के पांच बजने वाले थे। फिर उसने सम्यक एवं लवण्या के चेहरे को विजयी मुस्कान के साथ देखा, मानो कि कहना चाहते हो कि जो चाहते थे, वो हो गया न। सम्यक एवं लवण्या ने मुस्करा कर शांतनु देव की आँखों में देखा, जैसे आभार जता रहे हो। फिर तीनों कोर्ट रूम से बाहर निकले और अपनी कार की ओर बढ़ गए।

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दोपहर के चार बजने को थे। सलिल अभी भी टीवी स्क्रीन पर बैठा हुआ कोर्ट की कार्रवाई देख रहा था। ऐसे तो कभी भी अमूमन होता नहीं है कि कोर्ट की प्रक्रिया को इस प्रकार से लाइव दिखाया जाए। किन्तु यह तो जज वाय. एस. सिंन्हा के धैर्य एवं उदारता का परिणाम था कि उन्होंने कोर्ट रूम में मीडिया को प्रवेश करने दिया था और लाइव रिपोर्टिंग की परमिशन दी थी।....अन्यथा तो न्यायपालिका के रुख बहुत कड़े होते है। फिर तो....आज जो लाइव रिपोर्टिंग हुआ था, वह समाज हित में था और इसका सकारात्मक प्रभाव होना था, समाज एवं देश पर। सलिल को इस बात की संतुष्टि थी, हालांकि वो इसके परिणाम से भी अवगत था।

वह इन बातों को समझता था कि आज जो पुलिस को कोर्ट में "पटकनी मिली है" मृदुल शाहा बौखला चुका होगा। भले ही कोई और नहीं समझे, परंतु बाँस के समझ में जरूर आ गया होगा कि.....इस मामले को उलझाने में उसका ही हाथ है। ऐसे में अगर उसका बाँस बच गया....उसके बचने के चांसेज नहीं के बराबर है। सलिल इन बातों को भी जानता था कि बाँस ने उसके पर कतरने की तैयारी शुरु कर दी होगी और हो सकता है कि जैसे ही कोर्ट का फैसला आए....उसपर गाज गिरे। 

किन्तु उसे इस बात की बिल्कुल भी चिन्ता नहीं थी....वह तो इस बात से बिल्कुल बेफिक्र था। अब तो कोर्ट का चाहे जो भी फैसला आए, गर्वित के साथ हुए हादसे को पूरी दुनिया ने जान लिया था और उसके लिए यही संतुष्टि देने वाली बात हो गई थी।

सलिल इन बातों को जानता था और जानते हुए उसने फैसला लिया था। ऐसे में अगर गर्वित को न्याय मिल जाता है, उसके लिए इससे ज्यादा खुशी की बात क्या हो सकती थी। सलिल न जाने कब तक ऐसे ही टीवी स्क्रीन पर चिपका रहता, अगर रोमील बेडरूम से बाहर नहीं निकला होता। इतनी बात जानने के बाद कि अभी नौकरी नहीं जाना है, सुबह के दस बजे ही वह सोने के लिए चला गया था और अब उसकी निंद टूटी थी। ऐसे में वह बाहर निकल कर किचन में गया और दो कप काँफी बना लाया और एक कप उसे थमा कर दूसरा खुद थामे हुए सोफे पर बैठ गया और काँफी पीते हुए बोला।

क्या हुआ सर?....कुछ रिजल्ट निकला कि नहीं?

किस बारे में पुछ रहे हो जनाब? रोमील की बातें सुनकर सलिल अपने कप को घूरते हुए बोला। जबकि उसके प्रश्न सुनकर रोमील ने दो घूंट काँफी की पी और फिर अलसाए हुए स्वर में बोला।

वही.....कोर्ट का मामला, गर्वित के बारे में बात कर रहा हूं सर!.....आप भी न सर, मामला वारदात का ही करूंगा न, क्योंकि ताजा-तरीन मामला है और फिर उस मामले में ही तो कोर्ट में आज सुनवाई थी। फिर तो.....इस मामले की ही मेहरबानी है कि हम लोग रूम पर बेजा बैठे हुए है। रोमील ने कहा और फिर काँफी पीने लगा, लेकिन उसकी तिरछी नजर सलिल पर ही टिकी थी। जिसे सलिल भाँप गया और बोला।

बाट लग गई!

लेकिन किसकी बाट लग गई सर?.....सलिल की बातें खतम होते ही रोमील चौंक कर बोला। जबकि उसकी बातें सुनते ही सलिल मुस्कराया। उसने रोमील की आँखों में देखा और बोला।

अपने बाँस की....और किसकी बाट लगनी थी। एस. पी. साहब की बाट लग गई।

आप ऐसे ही बोल रहे हो सर!.....ऐसा भी कहीं होता होगा क्या?....अपने बाँस तो बहुत ही चालाक है। सलिल की बातें सुनकर रोमील ने आश्चर्य में डूबकर प्रतिक्रिया दी। जबकि उसकी बातें सुनकर सलिल मंद-मंद मुसकाया, फिर बोला।

रोमील!....आज तक मैंने तुमको झूठ बोला है। सच में ही एस. पी. साहब की बाट लग गई।

इसके बाद सलिल रोमील को बताने लगा कि आज कोर्ट रूम में क्या हुआ। रोमील आश्चर्यचकित होकर उसकी बातों को सुन रहा था। फिर इन बातों को खतम करने के बाद सलिल ने रोमील को तैयार होने को कहा। क्योंकि उसने वियर बार में जाने का मन बना लिया था।

....भले ही, दुविधा अभी बनी ही हुई थी, किन्तु वो जानता था कि उसने एक किला फतह कर लिया है और उसका सैलीव्रेसन करना चाहता था।....वैसे तो उसकी एस. पी. साहब से किसी प्रकार से जातीय दुश्मनी नहीं थी और न कभी उन्होंने उसे निराश ही किया था। परंतु इस केस में उन्होंने जिस प्रकार से स्टैंड बदला था, वह सलिल को खल गया था।

बस इसके बाद दोनों तैयार होकर अपार्ट मेंट के बाहर निकले और स्काँरपियों में जाकर बैठे। सलिल ने ड्राइविंग सीट संभाल ली थी और वो कार श्टार्ट करके आगे बढ़ा चुका था।.....किन्तु उसकी पारखी नजर ने भांप लिया था कि पुलिस के नौजवान द्वारा उसका पीछा किया जा रहा है। वो दो थे.....यह सलिल जान चुका था और उन्हें मजा भी चखा सकता था। 

किन्तु उसने ऐसा नहीं किया....क्योंकि जानता था कि ये दोनों इंस्पेक्टर विजय के विश्वस्त है और वो "विजय के मुगालते को अभी  तोड़ना नहीं चाहता था। तभी तो उसने कार की रफ्तार बढ़ा दी। हालांकि पीछा किए जाने की बात रोमील भी समझ चुका था। परंतु वह बीच में कुछ बोलकर बाँस के कोप का भाजन नहीं बनना चाहता था।

उसे पूरा विश्वास था कि उसके बाँस के सामने किसी की भी "जासूसी" नहीं चल सकती थी। ऐसे में....बिना वजह ही बने-बनाए मूड को फिर क्यों खराब करें। इसलिये उसने चुप्पी साधे रखने में ही भलाई समझी और उसका सोचना भी सही था। 

सलिल इन बातों से अंजान नहीं था और इस विषय में उसके दिमाग में योजना आ चुकी थी।....ढलता हुए शाम एवं ढलते हुए सूर्य की रोशनी में शहर खिला हुआ लग रहा था। सड़क पर दौड़ती हुई ट्रैफिक और इसमें गूंजता हाँर्ण का शोर। दोनों तरफ बिल्डिंग के बीच जाती हुई सड़क और उसके बीच गुजरती कार। बहुत ही मनभावन लग रहा था।

चलती हुई कार के बीच सलिल की नजर वियर बार को ढूंढ रही थी और तभी उसकी नजर ललिता वियर बार पर गई। उसने कार का रुख उधर किया और प्रांगण में ले जाकर खड़ा कर दिया। फिर दोनों बाहर निकले और बिल्डिंग की ओर बढ़ गए और जैसे ही उन्होंने हॉल में कदम रखा, उनकी आँख चुँधिया गई।....बात ही कुछ ऐसी थी, अंदर लग रहा था कि इंद्र लोक हो जैसे। 

बल्ब की ब्लू रोशनी में चमकता हुआ हॉल, चारों तरफ छलकता हुआ जाम और स्टेज पर थिरकती अर्ध नग्न वार वाला। वैसे रात का अंधेरा छाने में अभी कुछ समय बाकी था.....फिर भी हॉल ग्राहकों से भर गया था। ऐसे में सलिल की आँखें खाली टेबल का तलाश करने लगी और कोने में खाली टेबल नजर आते ही दोनों उधर बढ़ गए।

और जैसे ही दोनों बैठे, वेटर उनके करीब पहुंच चुका था। ऐसे में सलिल ने दो स्कॉच की बोतल, आईश बाऊल एवं पनीर भुजी के ऑर्डर दिए। फिर उसने नजर को हॉल में घुमाया। चारों तरफ छलकता हुआ जाम, चरस का उड़ता हुआ धुआँ, हर तरफ मौज ही मौज थी। लग रहा था कि जैसे स्वर्ग लोक ही धरती पर उतर आया हो। समय बीतता जा रहा था और तभी उसका ऑर्डर सर्व हो गया। 

फिर तो रोमील पैग बनाने में जुट गया, जबकि सलिल की नजर अभी भी हॉल में घूम रही थी। हां उसकी नजर किसी को तलाश रही थी, शायद वो किसी काम को अंजाम देना चाहता था। हां, उसके दिमाग में योजना का प्रारुप तैयार हो रहा था कि किस प्रकार से विजय के जासूस को धोखा दिया जाएगा। हां, उसे सम्यक एवं लवण्या से मिलना था और केस के संदर्भ में आगे बात करनी थी। परंतु किस प्रकार से?.....बिना उन जासूसों के नजर में आए हुए अपनी योजना को सफल किस प्रकार से करें?

सर!....पैग तैयार हो चुका है। रोमील ने उसे टोका और प्याला उसके हाथों में थमा दिया। जबकि सलिल चौंका तो जरूर, लेकिन उसने किसी प्रकार की प्रतिक्रिया नहीं दी। हां, उन दोनों ने जाम टकरा कर एक स्वर में बोला।

चियर्स!

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चियर्स शब्द बोलने के साथ ही दोनों ने हलक में शराब को उतार लिया और रोमील फिर से पैग बनाने में जुट गया। जबकि सलिल की नजर गेट पर ही टिकी थी। वो हर आने -जाने वाले को ध्यान से देख रहा था और तभी उसकी नजर गेट से प्रवेश करते उन पुलिस कर्मीयों पर गई,....जो उसके पीछे लगे हुए थे। कोई दूसरा मौका होता, तो सलिल उनको पीछा करने का मजा चखा चुका होता, परंतु अभी फिलहाल उसका इरादा ऐसा नहीं था।

वह तो चाहता ही था कि इंस्पेक्टर विजय और उसके शागिर्द इसी मुगालते में रहे कि "सलिल के एक-एक एक्टीविटिज पर उनकी नजर है। किन्तु सलिल यह भी जानता था कि सम्यक एवं लवण्या से मिलना जरूरी है।....तभी तो पोस्टमार्टम करने वाले अधिकारी की जानकारी उनको दे सकेगा। किन्तु किस प्रकार से वह अपने इस काम को अंजाम दे। 

सलिल अपने दोस्त शांतनु देव से मिल नहीं सकता था, क्योंकि वहां ज्यादा खतरा था। फोन करने की जरूरत ही नहीं थी और वो इस प्रकार के हिमाकत करने से भी बचना चाहता था। क्योंकि उसका फोन सर्विलांस पर लगा हुआ था। इधर उसने फोन कॉल किया नहीं और उधर एस. पी. साहब को जानकारी हो जानी थी, जो वो नहीं चाहता था।

 इसी बीच रोमील ने उसके हाथ में जाम थमाया और इसके साथ ही उसके दिमाग में बत्ती जल गई। उसने हाथ में आए हुए जाम को हलक में उड़ेला और बगल वाली सीट पर बैठी हुई लड़की को देखने लगा। वह युवती इतनी तो सुंदर नहीं थी कि सलिल उस पर मर मिटे।

किन्तु इतनी तो कमनीय जरूर थी कि किसी नौजवान के धड़कनों को बढ़ा सके। लंबे नागिन से बाल, गोल गौर वर्ण चेहरा, कटीले नैन-नक्श और नीली आँखें। इस समय अकेली ही वो जाम को हलक में उतार रही थी। शायद उसे किसी के कंपनी की जरूरत था और उसकी आँखें इसी तलाश में थी।

फिर क्या था, सलिल अपनी जगह से उठा और उसके सामने बैठ गया। उस जैसे हैंडसम को यूं अपने पास पाकर वो लड़की इतरा उठी, शायद उसका लड़कों के साथ कंपनी का पहला अवसर था।....जबकि बैठने के बाद सलिल की नजर टेबल पर गई, जहां वियर की केन रखी हुई थी। 

लगता था कि लड़की शौक से वियर पीने आई थी और शायद सुरक्षा की दृष्टि से उसे किसी का कंपनी चाहिए था। साथ ही सलिल यह भी समझ गया था कि लड़की संभ्रांत परिवार की थी। जबकि उसको आया देख लड़की हर्षित हो गई और उससे उसके पसंद के बारे में पूछा। तब तक सलिल एक वियर केन उठाकर होंठों से लगा चुका था।

फिर उसने लड़की को ऊपर रूम में अपने साथ चलने को कहा। लड़की ने उससे सवाल नहीं पूछा और उसके पीछे चल पड़ी। दोनों चलते हुए फर्स्ट फ्लोर पर रूम नंबर इक्कीस में पहुंचे और वहां पहुंचते ही सलिल ने उसे अपना परिचय और अपने इरादे को बताया। 

साथ ही कहा कि जब तक वो लौट नहीं आता, रूम को अंदर से लॉक रखे। इसके बाद सलिल खिड़की खोल कर पाइप के सहारे होटल के पिछले भाग में उतर गया। उधर अंधेरा था, अतः उसे खुद को ज्यादा छिपाने की जरूरत नहीं हुई। फिर तो होटल के पिछले गेट से निकल कर सड़क पर पहुंचा और टेंपु पकड़ ली। फिर उसने कलाईं घड़ी देखी, शाम के सात बजे थे।

करीब रात के आठ बजे वो मुक्ता अपार्ट मेंट पहुंचा। उसे यूं अचानक ही आया देखकर लवण्या एवं सम्यक बौखला गए। दोनों तो कल कोर्ट की कार्रवाई और आने वाली मुश्किलों पर चर्चा कर रहे थे। ऐसे में अचानक ही उसका आ जाना हर्ष और आश्चर्य का विषय था। जबकि उनके मनोभाव समझकर सलिल मुस्कराया। कोई और वक्त होता, तो वो यहां बैठकर उनके साथ मजे लेता। 

किन्तु अभी तो उसके पास बिल्कुल भी समय की कमी थी, इसलिये उसने सम्यक एवं लवण्या को समझाया कि उन्हें अभी के अभी शांतनु देव के पास जाना है और उससे कहना है कि वे डाक्टर संजीव पाहूजा से मिल ले। संजीव पाहूजा शांतनु का हर संभव मदद करेंगे।

हालांकि सम्यक एवं लवण्या ने सलिल को काँफी के लिए पूछा। परंतु.....सलिल को जल्दी थी, वह जानता था कि अगर समय से वह वियर बार नहीं लौटा, मुश्किल में फंस सकता था। वैसे तो डरने की विशेष बात नहीं थी,....क्योंकि एस. पी. साहब ज्यादा से ज्यादा उसका ट्रांसफर कर सकते थे। फिर भी,....जब तक इस केस में फैसला नहीं आ जाता, बचकर रहने में हर्ज ही क्या था। 

इसलिये उसने सम्यक एवं लवण्या से विदा लिया और उलटे पांव लौट गया। मन में यह विचार लेकर कि इंस्पेक्टर विजय से किस प्रकार पीछा छुड़ाए। सोच थी कि सरपट दौर रही थी और वह वियर बार की ओर लौट रहा था।

बात भी कुछ ऐसा ही था न, इंस्पेक्टर विजय वैसे तो भ्रष्ट था, किन्तु लाभ लेने के लिए उसके पीछे लग गया था। यह जानते हुए भी कि.....उससे उलझ कर वह अपने आप को ही नुकसान पहुंचाने वाला था। ऐसे में सलिल इस बात को समझताथाकि उसकी ताकत एस पी. साहब है और अभी इस परिस्थिति में उसको नुकसान पहुंचा सकता है।

..बस इसलिये ही वह संभल कर रहना चाहता था और इसलिये ही जैसे ही वियर बार के पीछे पहुंचा, पाइप पर चढकर रूम में पहुंच गया। वो लड़की, जो कि बेड पर लेटी हुई थी,...उसे देखते ही उठ बैठी, फिर दोनों हॉल में वापस आ गए। वहां पर रोमील अभी भी शराब पीने में व्यस्त था।

जबकि सलिल ने हॉल में आते ही चारों तरफ नजर दौड़ाया और उसकी नजर इंस्पेक्टर विजय पर जाकर टिक गई,....जो कोने में बैठा हुआ शराब चुसक रहा था। जबकि उसके शागिर्द कहीं नजर नहीं आ रहे थे। ऐसे में इंस्पेक्टर विजय को देखते ही सलिल के दिमाग में सभी बात आ गई और होंठों पर मुस्कान छा गया। फिर वो रोमील के पास आकर बैठ गया।

साथ ही उसकी नजर कलाईं घड़ी पर गई, रात के नौ बज चुके थे। अब उसे वापस घर पर चलना चाहिए,....ऐसा वो अभी सोच ही रहा था कि रोमील ने उसके हाथ में जाम थमा दिया। फिर तो हाथ में जाम आ जाए, तो रुकने की बात ही नहीं थी।

इसके बाद दोनों शराब पीने में व्यस्त हो गए। समय बीतता जा रहा था और बीतते समय के साथ ही हॉल में जलवा बढ़ता जा रहा था।.....बीतता समय और छलकता हुआ जाम, इसके बीच उठता हुआ चरस का धुआँ, हर तरफ मदहोशी का आलम था। 

इसके बीच में पश्चिमी संगीत के धून पर थिरकती हुई अर्ध नग्न वार वाला। लेकिन सलिल को इससे कोई मतलब नहीं था, उसकी तो तिरछी निगाह उधर को टिकी थी, जिधर इंस्पेक्टर विजय बैठा हुआ था, लेकिन इस प्रकार से कि विजय को अंदाजा भी नहीं हो सके। आखिर रात के दस बजे सलिल एवं रोमील उठे, सलिल ने बील चुकाया और फिर दोनों बाहर निकले।

बाहर निकल कर दोनों स्काँरपियों में बैठे, हालांकि अभी रोमील ने ड्राइविंग संभाल लिया था। तभी तो उसने कार श्टार्ट की और आगे बढ़ा दिया। जबकि सलिल, वह तो आने वाले समय को लेकर विचार में डुबा हुआ था।....इस केस में इस तरह से नाट्यात्मक बदलाव हुए थे कि वह अभी समझने की कोशिश में लगा हुआ था। वह जानता था कि उसने थोड़ी सी भी भूल की, खार खाए हुए एस. पी. साहब उससे बदला लेने को तत्पर हो जाएंगे।  इस लिए अभी तो फिलहाल उसे इंस्पेक्टर विजय से बच कर रहने की जरूरत थी, साथ ही उसे हंसी भी आ रही थी इंस्पेक्टर विजय पर।

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सलिल चला गया था। परंतु अभी भी सम्यक एवं लवण्या के चेहरे के भाव सामान्य नहीं हुए थे। उन दोनों के इच्छा पर कोर्ट ने भले ही सुनवाई फास्ट ट्रैक में डाल थी, किन्तु फिर भी क्या फायदा?.....दोनों को यह बात अच्छे से पता था कि कोर्ट सिर्फ सबूत पर चलती है। वहां पर मानवीय भावनाओं का कोई मूल्य नहीं,.....ऐसे में अगर उनके हाथ कोई ठोस सबूत नहीं आता, तो क्या होगा?....परिणाम सोच कर ही उन दोनों का दिमाग चक्करघिन्नी बन कर रह गया था।

ऐसे में अचानक ही सम्यक उठा और किचन में चला गया और जब लौटा, उसके हाथ में वियर केन थी। एक वियर केन उसने लवण्या को थमाया और दूसरे का काँक खोलकर बैठ कर पीने लगा। जबकि लवण्या, वियर केन थामे हुए आश्चर्य भरी नजरों से सम्यक को देख रही थी। उसे समझ ही तो नहीं आ रहा था कि इतनी टेंशन रहने के बावजूद सम्यक इतना कूल होकर वियर किस प्रकार से पी रहा है।....जबकि उसे तो समस्या के बारे में विचार करना चाहिए था। लवण्या सोच ही रही थी कि सम्यक बोला।

लवण्या बेबी!....फिलहाल तो टेंशन छोड़ो और वियर की कुछ बूंदें गटक लो, सच कहता हूं कि राहत मिलेगा। सम्यक ने लवण्या को संबोधित करके कहा और फिर पीने में बीजी हो गया। जबकि लवण्या, उसके बात सुनकर चौंकी। कमरे में जलती नीले बल्ब की रोशनी में लवण्या के चेहरे का भाव तो स्पष्ट नहीं दिख रहा था, परंतु इतना तो जरूर दिख रहा था कि सम्यक की बातें उसको नागवार गुजरा है, तभी तो बोली।

सम्यक!.....तुम भी न, इस परिस्थिति में इतने कूल कैसे रह सकते हो?....तुम तो इस तरह से दिखने की कोशिश कर रहे हो कि जैसे कोई परेशानी ही नहीं हो। लवण्या चिढ कर बोली, जबकि उसकी बातें सुनकर सम्यक मुस्कराया फिर बोला।

लवण्या बेबी!....तुम भी न, बिना वजह ही दुःखी हो रही हो। भला....परेशान होने से भी किसी समस्या का समाधान नहीं मिलता।...तो फिर मैं परेशान क्यों कर होऊँ और अपना मूड खराब करूं। अब हम लोग वियर की चुस्कियां लेते है, फिर निकलते है शांतनु देव के पास। फिर देखेंगे कि क्या बातें होती है।

सम्यक सरलता के साथ अपनी बातें बोल गया और बातें भी सही थी। लवण्या सोचने लगी कि......खामखा ही वो अपने-आप परेशान हो रही थी। जबकि वो जानती है कि परेशान होकर भी कुछ मिलने वाला नहीं है और वे दोनों कुछ कर सके, इस परिस्थिति में भी नहीं है। 

अतः लवण्या ने भी वियर केन के काँक को खोला और होंठों से लगा लिया और तभी हटाया, जब वियर केन पूरी तरह से खाली हो चुकी थी। उधर सम्यक ने भी केन खाली कर दिया था और अब कलाईं घड़ी देख रहा था। जैसे ही उसने देखा कि रात के दस बजने को थे, उठा और हॉल से बाहर निकला। उसे बाहर निकलता देख कर लवण्या भी उसके पीछे लपकी।

दोनों बाहर आकर इनोवा में बैठे, सम्यक ने कार श्टार्ट की और आगे बढ़ा दिया। जबकि लवण्या सम्यक को ही देखे जा रही थी और सोच रही थी कि आखिर उसके दिमाग में चल क्या रहा है?....बात सही भी था, हर पल मुस्कराने वाला और बोलने वाला सम्यक इस समय खामोश था, बिल्कुल शांत था। लवण्या जो सोच रही थी, वह गलत भी तो नहीं था। सम्यक अभी विचारों में ही खोया हुआ था। सड़क पर ट्रैफिक की भीड़, उसके बीच कार को ड्राइव करता हुआ सम्यक। लेकिन इस समय उसका ध्यान सिर्फ ड्राइव पर ही नहीं था। उसके दिमाग में तो उलझन था, जिसे वो सुलझाने की कोशिश में लगा हुआ था।

बात भी कुछ ऐसा ही तो था। एक तो वर्षों की तपस्या के बाद उसे लवण्या मिली थी और वो इस परेशानी में फंस गया था। अब कहीं गर्वित के मामले में कोर्ट का निर्णय विपरीत आया, तो फिर लवण्या पर इसका क्या असर होगा।

...वैसे भी सोचने वाली बात थी कि लवण्या कहीं न कहीं तो गर्वित के भावना के साथ जुड़ी हुई थी। अब ऐसे में उसके दिमाग में एक ही बात था कि जैसे भी हो, कोर्ट से गर्वित को न्याय ही मिले। लेकिन किस प्रकार से, किस प्रकार से वो अपनी योजना बनाए और कार्यान्वित करें कि उसे सफलता मिले। सम्यक सोच ही रहा था कि तभी चौंका, क्योंकि कार शांतनु देव के बिला के सामने पहुंच चुकी थी।

उसने कार की रफ्तार धीमी की और बिला के अंदर ले लिया। फिर कार पार्क करने के बाद दोनों बाहर निकले और बिल्डिंग गेट की ओर बढ़ गए। उन्होंने जैसे ही हॉल में कदम रखा,....वे चौंके बिना नहीं रह सके, क्योंकि शांतनु देव हॉल में बैठे हुए थे और उनकी नजर गेट पर ही टिकी थी और जैसे ही उन्होंने हॉल में कदम रखा, शांतनु देव ने उनका स्वागत किया। तो क्या उनके आने की जानकारी शांतनु देव को थी, सम्यक ने सोचा। तभी शांतनु देव ने उन्हें बैठने के लिए इशारा किया और उनके बैठने के बाद बोला।

मैं अभी तुम दोनों के बारे में ही सोच रहा था....जानता था कि देर-सवेर यहां आओगे। बोलने के बाद शांतनु देव थोड़ी देर के लिए रुका, फिर बोला। तुम दोनों शायद नहीं जानते, परंतु बता दूं कि सलिल इस परिस्थिति में मुझसे डायरेक्ट नहीं मिल सकता। 

उसपर नजर रखी जा रही है और इस परिस्थिति में बचे तुम दोनों, जिसके माध्यम से वो अपनी बाते मुझ तक पहुंचा सकता है। शांतनु देव ने गंभीर होकर बोला और दोनों के चेहरे को देखने लगा। जबकि सम्यक उसकी बातें सुनकर चौंका, आश्चर्य तो लवण्या को भी हुआ था, तभीतो अचंभित होकर इस हॉल को देख रही थी।

इसके बाद सम्यक ने बताया कि सलिल ने उसको क्या संदेश देकर भेजा है। शांतनु देव गंभीर होकर उसकी बातों को सुन रहा था और जैसे ही उसने बात खतम की, शांतनु देव ने उनसे काँफी के लिए पूछा। जिसे सम्यक ने मना कर दिया और फिर तीनों उठे और हॉल के बाहर निकले। 

कार के पास पहुंच कर कार में बैठे और बैठने के साथ ही सम्यक ने कार श्टार्ट की और आगे बढ़ा दी। फिर तो कार बिला के गेट से बाहर निकली और रफ्तार पकड़ लिया। जबकि शांतनु देव, वह तो सोच में डुबा हुआ था। वह इस बात को जानता था कि......समय बिल्कुल भी अनुकूल नहीं है। उसे इस बात की भी भली भांति जानकारी थी कि एस. पी. साहब के हिटलिस्ट में वह भी जरूर होगा।

वह एस. पी. मृदुल शाहा से अच्छी तरह परिचित था। मृदुल शाहा तेज-तर्रार और काईंया किस्म का इंसान था और किसी भी परिस्थिति में हार स्वीकार कर ले, ऐसा तो बिल्कुल भी नहीं था।.....ऐसे में वह कोई न कोई ऐसा कदम जरूर उठाएगा, जिससे इस केस को प्रभावित किया जा सके। ऐसे में जब तक कोर्ट का फैसला नहीं आ जाता, उन लोगों को संभल कर रहने की जरूरत थी।....नहीं तो कभी भी पीछे से वार हो सकता था। बस इसलिये ही उसकी चौकन्नी नजर कार से बाहर चारों तरफ देख रही थी। बात सही भी था....रात के ग्यारह बजे,. जब कि सड़क पर ट्रैफिक कम थी, शांतनु देव चौंका।

उसने देखा कि उसके कार के पीछे ब्लैक रंग की स्काँरपियों फूल रफ्तार में भागती आ रही थी। शांतनु देव वैसे तो नहीं चौंकता, लेकिन उसने देखा कि स्काँरपियों के शीशे पर ब्लैक पेपर लगा हुआ था। बस शांतनु देव के दिमाग में खतरे की घंटी बजी। 

वह इस बात को समझ गया कि जिस खतरे के बारे में सोच रहा था, वह सिर पर आ चुका है और सबसे पहली बात जो उसके दिमाग में कौंधा.....कि इस परिस्थिति से बचो। फिर तो बिजली की फुर्ती के साथ ही उसने सम्यक का बांह पकड़ा और उसे खींचा। सम्यक झटके के साथ उछला और पिछली सीट पर बैठ गया। इस दरमियान कार एक पल के लिए लहराई,...किन्तु शांतनु देव ने कार को संभाल लिया, क्योंकि वो ड्राइविंग सीट पर आ चुका था और उसने कार की रफ्तार बढ़ा दी थी और तभी।

धाँय....धाँय!

गोलियों की आवाज से पूरा इलाका दहल उठा था।

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धाँय-धाँय,...तर्र-तर्र।

गोलियों की आवाज से इलाका गुंजने लगा। एक तो अर्ध रात्रि का समय होने के कारण सड़क पर ट्रैफिक में कमी आ गई थी, उसमें गोलियों की आवाज। इलाके को दहलाने के लिए काफी था। वैसे तो शांतनु देव के पास अपना खुद का लाइसेंसी रिवाल्वर रहता था,......परंतु इस समय मुकाबला करना, मतलब कि खुद के मौत को दावत देना था।....मतलब साफ था, शांतनु देव उन लोगों से टकराने के मूड में बिल्कुल भी नहीं था, इसलिये उसने कार की रफ्तार बढ़ा दी।

जिसका परिणाम भी देखने को मिला। हमलावरों की गाड़ी धीरे-धीरे पीछे छूटती चली गई और फिर नजर आनी बंद हो गई। फिर भी शांतनु देव रिश्क लेने के मूड में फिलहाल तो नहीं थे,....तभी तो उन्होंने कार की रफ्तार कम नहीं की। एक तो सुनसान रात, दूसरे हमलावरों की गोली, सम्यक एवं लवण्या तो बुड़ी तरह घबरा गए थे।.....उन्हें तो मालूम ही नहीं था कि इस तरह के परिस्थिति का भी सामना करना पड़ सकता है।

....लेकिन अभी जो घटित हुआ था, उनके सामने हुआ था और ऐसे में उनके समझ में आ चुका था कि "सलिल क्यों छिप कर आया था"। मतलब यही था कि एस. पी. साहब नहीं चाहते थे कि यह मामला तूलपकड़े और उन पर कोई खतरा आए।

सम्यक एवं लवण्या तो अभी तक सकते में थे। उन्हें तो मामला ही नहीं समझ आया था कि आखिर अचानक से क्या हुआ कि गोलियां चलने लगी?.. खौफ आखिर होता क्या है?.....उन्हें आज ही पता चला था, नहीं तो इससे पहले कभी भी उन्होंने इस प्रकार के परिस्थिति का सामना नहीं किया था। 

बस अचानक ही ऐसे परिस्थिति का निर्माण हो गया और अब, जब गोलियों की आवाज थमी, उन्होंने सिर को उठाया और शांतनु देव की ओर देखने लगे। जबकि शांतनु देव, पूरी शांति के साथ कार ड्राइव कर रहा था। उसके चेहरे से देखकर ऐसा तो बिल्कुल भी नहीं लगता था कि...."कुछ देर पहले उसने असामान्य परिस्थिति का सामना किया हो"। उसके चेहरे को इस प्रकार से भाव विहीन देख कर सम्यक एवं लवण्या आश्चर्य में डूब गए, तभी शांतनु देव बोला।

शायद तुम दोनों यही सोच रहे हो कि.....इतना बड़ा हादसा गुजर जाने पर भी मैं इतना सामान्य किस प्रकार से हूं। मैं जो सोच रहा हूं, सही है न?....शांतनु देव ने प्रश्न पूछा और कनखियों से दोनों को देखने लगा। जबकि उसकी बातें सुनकर सम्यक बोला।

हां सर!.....आपका सोचना सही है। हम लोग यही सोच रहे है कि इतनी बड़ी घटना घट गई और आप बिल्कुल निश्चिंत है।

अंशतः तुम लोगों का सोचना शायद गलत नहीं हो। डर किसे नहीं लगता है, मुझे भी लगा।....परंतु अकसर हम जैसे पेशेवर लोगों कोइनपरिस्थितिका सामना करना होता है, इसलिये घबराने से कैसे चलेगा? बोलने के बाद शांतनु देव मौन हो गया।

फिर क्या था, सम्यक एवं लवण्या समझ चुके थे कि शांतनु देव अब बातें नहीं करना चाहते। बस उन्होंने मौन धारण कर लिया। तब तक कार लीलावती अपार्ट मेंट के कंपाऊंड में लग चुकी थी और तीनों कार से निकल कर अपार्ट मेंट बिल्डिंग की ओर बढ़ चुके थे और जैसे ही उन्होंने हॉल में कदम रखा, संजीव पाहूजा को इंतजार में बैठे देखा।.....संजीव पाहूजा ने तीनों को गर्मजोशी के साथ स्वागत किया, फिर बैठने के लिए इशारा किया।....फिर उन लोगों के बीच बातचीत होने लगी। 

हालांकि इस बीच डाक्टर संजीव पाहूजा ने उन लोगों से काँफी के बारे में पूछा, जिसे उन्होंने सहज ही मना कर दिया और तब डाक्टर उन्हें इस केस के संदर्भ में महत्वपूर्ण प्वाईंट बतलाने लगा। इसके बाद पोस्टमार्टम की फाइल एवं बिसरा रिपोर्ट मेल के थ्रू भेज दिया। इसके बाद शांतनु देव ने संजीव पाहूजा से विदा ली और सम्यक एवं लवण्या के साथ बाहर निकल पड़े।

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पुलिस मूख्यालय!

रात के बारह बज चुके थे, फिर भी वहां हलचल थी। एस. पी. साहब कल कोर्ट की कार्रवाई को लेकर बेचैन थे और इसलिये ही उन्होंने अपने सभी अधीनस्थ को इस काम पर ही लगा रखा था। फिर भी उनके हृदय में अंदेशा का डंक चुभ रहा था। वैसे तो मृदुल शाला ऐसे स्वभाव के बिल्कुल भी नहीं थे कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में घबराए। लेकिन अचानक ही बदले हुए परिस्थितियों ने उनके हौसले को पस्त कर के रख दिया था।

उन्होंने तो यही सोचकर कि इस केस में पुलिस की छवि धूमिल नहीं हो, भूत-प्रेत से जोड़ दिया था और "गर्वित" के मिल जाने के बाद भी इस कहानी को कार्यान्वित रखा था। उन्हें शायद ऐसा नहीं करना चाहिए था, क्योंकि जैसे ही "गर्वित" मिला, अपराध की सच्चाई उजागर कर देते, उन्हें यह दिन नहीं देखना पड़ता। 

किन्तु नहीं,.....उन्हें तो बस अपने अहंकार की संतुष्टि चाहिए थी और वो नहीं चाहते थे कि उन्होंने जो भूत-प्रेत की थ्योरी दी है, गलत हो। बस यही पर उनसे भूल हुई और वे फंस गए। नहीं तो इंस्पेक्टर विजय जैसे भ्रष्ट ऑफिसर के चंगुल में वो क्यों फंसते। परंतु अब तो जो हो चुका, सो हो चुका। अब इससे बचा कैसे जा सकता है? बस यही सोच रहे थे।

अभी भी वे अपने ऑफिस में बैठकर इसी विषय पर मंथन कर रहे थे। चिन्ता की गहरी लकीर उनके माथे पर खींची हुई थी और चेहरे पर अवसाद विराजमान था। बात इतना आसान भी तो अब नहीं रहा था। उनकी नजर में अब स्थिति सामान्य नहीं रहा था और इसलिये ऑफिस में बैठे हुए इस विचार में उलझे हुए थे कि उलटे पड़े हुए दाव को किस प्रकार से सीधा किया जाए? दूसरी बात कि उन्हें अभी भी विश्वास नहीं हो रहा था कि सलिल इस प्रकार की हरकत कर सकता है। अब तक सलिल ही तो एक था, जो कि उनका विश्वास पात्र था। मृदुल शाहा ने सोचा भी नहीं था कि सलिल इस प्रकार से पटकनी दे देगा।

अगर उन्हें पता होता कि सलिल इस तरह की हरकत कर सकता है, वह कभी भी नहीं इस केस के रुख को मोड़ने की कोशिश करते। उनको यह अच्छी तरह से पता था कि इस केस में जो यह बदलाव आया है और उनकी सांस आफत में फंस गई है, बिना सलिल की कारस्तानी के संभव नहीं हो सकता।

...किन्तु अब तो रायता फैल चुका था और उन्हें ही अब इसे समेटना था। क्योंकि जानते थे कि यह विजय के बस की बात तो बिल्कुल भी नहीं है। बस इसी उलझन में उलझे हुए मृदुल शाहा मनोमंथन कर रहे थे, तभी उनके ऑफिस का गेट खुला और इंस्पेक्टर विजय ने अंदर कदम रखा। उसे आया देखकर एस. पी. साहब की भौंहें तन गई, जबकि उसने आकर सैल्यूट दिया।

जय हिंद सर!

जय हिंद!....कहो क्या रिपोर्ट है? मृदुल शाहा ने उसके सैल्यूट का जबाव दिया और सीधा ही प्रश्न पुछ लिया। जबकि उनके प्रश्न सुनकर विजय पहले तो सकपकाया, फिर बोला।

सर!....पहले तो मैंने सलिल एवं रोमील का पीछा किया। किन्तु....उसकी गतिविधि सामान्य ही रही। मैंने उसके पीछे अपने आदमी लगा दिए है। बोलने के बाद थोड़ी देर के लिए रुका, फिर बोला। सर!....इसके बाद मैंने गूंडो के द्वारा शांतनु देव पर हमला करवाया, लेकिन वो बचकर निकल गया। बोलने के बाद विजय रुका और उसके रुकते ही एस. पी. साहब बोले।

और तुम्हारे बस का है-ही क्या?....तुम किसी को रोक भी नहीं सकते, मामले को हैंडल किस प्रकार से करोगे? 

ज.....जी सर!.....एस. पी. साहब के बोलते ही विजय सिर्फ इतना ही कह सका।

उसकी हरकत पर मृदुल शाहा मुस्कराए बिना नहीं रह सके थे। फिर उन्होंने अपने भावों को नियंत्रित किया और फिर विजय को समझाने लगे कि उसे आगे क्या करना है। वैसे उन्हें विश्वास तो नहीं था कि विजय अपने काम को सही से संपादन कर पाएगा। फिर भी अभी कहना तो उसे ही था, काम तो उससे ही लेना था।....क्योंकि उसके पास विजय के सिवा कोई दूसरा आँप्सन भी तो नहीं था। विजय ध्यानपूर्वक उनकी बातों को सुन रहा था और जहां उसे संशय लगता था, पुछ भी लेता था।

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सुबह के दस बजने के साथ ही कोर्ट परिसर में हलचल बढ़ने लगा था। हालांकि आज की सुनवाई में मीडिया बालों  की एंट्री नहीं थी, फिर भी विभिन्न मीडिया हाउस के रिपोर्टर कोर्ट प्रांगण के चक्कर लगा रहे थे और.....इस जुगत में लगे थे कि कहीं कोई जुगाड़ फिट हो जाए और वो "सनसनीखेज न्यूज संवाददाता" बन जाए। बात साफ था, मीडिया हाउस को अपने टी. आर. पी. और रिपोर्टर को अपने प्रमोशन की चिन्ता थी।....उन्हें इस बात से बिल्कुल भी मतलब नहीं था कि "गर्वित" को न्याय मिलता है, या पुलिस की थ्योरी सही होती है।

ऐसे में अचानक ही पुलिस की गाड़ियों के आने का सिलसिला शुरु हुआ और दस मिनट बाद ही कोर्ट परिसर पुलिस छावनी में तबदील हो गया। इस अचानक बदले हुए परिस्थिति को देखकर सभी सकते में थे, तभी गेट से शांतनु देव की कार ने प्रवेश की। उसका आना और हलचल में इजाफा होना, मीडिया वाले उसकी ओर लपके। किन्तु शांतनु देव ने मीडिया बालों को कोई भाव नहीं दिया। 

हां, वो कार से निकला और सम्यक एवं लवण्या के निकलते ही उनको लेकर कोर्ट रूम की ओर बढ़ गया। स्वाभाविक ही था कि मीडिया बालों को निराशा हो। उसपर तुरुप ये कि एस. पी. साहब भी आने के बाद सीधे कोर्ट रूम में चले गए। मीडिया वाले खुद को इस तरह से इग्नोर किए जाने पर हैरान थे,....परंतु कुछ कर सके, ऐसी स्थिति में भी नहीं थे। परिणाम, सबके सब अंदर कोर्ट रूम में जाने के लिए जुगाड़ लगाने लगे।

कुछ देर बाद इंस्पेक्टर विजय ने भी राघव जुनेजा के साथ कोर्ट परिसर में कदम रखा। किन्तु मीडिया बालों ने दोनों को कोई प्रतिसाद ही नहीं दिया। फिर क्या था, दोनों ने भी कोर्ट रूम का रुख किया और जब वे कोर्ट रूम में पहुंचे। उनकी नजर कोर्ट रूम में घूमने लगी, जहां शहर के वरिष्ठ नागरिकों के बीच उसके हथियार धारी गुंडे बैठे हुए थे। फिर उसकी नजर उधर गई, जिधर शांतनु देव, सम्यक एवं लवण्या बैठे हुए थे और अंत में एस. पी. साहब को चिंतनशील मुद्रा में बैठे देखा। 

फिर मंद-मंद मुस्कराया और सोचने लगा कि कहीं अगर उसे लगा कि उसकी हार होने वाली है, बस शांतनु देव पर अटैक करवाएगा और मामला लंबित। हालांकि गूंडो के लिए सुझाव राघव जुनेजा ने दिया था और उसने बिना एस. पी. साहब को बताए ही योजना बना ली थी।

हालांकि वो आने वाले संभावित आगे के परिणामों से भयभीत भी था।....जानता था कि उसके गूंडो ने किसी प्रकार की गलती की, वह तो और भी बुड़े तरीके से फंसेगा। लेकिन कोई बात नहीं,....आगे जो भी होगा, देख लेगा। वैसे भी तो फंसने वाला ही है और ऐसे भी फंसेगा ही। सोचकर उसने अपने मन को समझाया एवं जैसे ही बैठने की कोशिश की, जज साहब ने कोर्ट रूम में कदम रखा। सभी ने खड़ा होकर उनका सम्मान किया और उनके बाद सभी बैठ गए। इसके बाद जज साहब ने हॉल में नजर फेरा, इसके बाद उन्होंने सुनवाई की अनुमति दी और शांतनु देव उठकर खड़ा हुआ, आगे बढ़ा और जज साहब के सामने पहुंच कर हाथ में थामे हुए फाइल को स्टेनो को थमाया, फिर गंभीर स्वर में बोला।

मिलार्ड!....मैंने इस फाइल में इस केस से रिलेटेड सभी काँपी अट्टैच कर दिया है।.....साथ ही गत बीती रातों के फूटेज काँपी भी मौजूद है इस फाइल में। बोलने के बाद शांतनु देव एक पल के लिए रुका और जज साहब को देखने लगा, फिर बोला। 

मिलार्ड!....जिस तरह से सबूत जुटाने के दौरान गत बीती रात को मुझपर हमला किया गया। शायद यह मेरा नसीब कहा जाए, या फिर मेरी योग्यता कि आपके सामने सही-सलामत हूं। बोलने के बाद उसने चुप्पी साध ली और नजर जज साहब पर टिका दी। जबकि जज साहब, जो कि उसके द्वारा दिए हुए फाइल को देख रहे थे, उसके रुकते ही बोले।

मिस्टर शांतनु देव!....आप अच्छी तरह से जानते है कि आरोप कितना गंभीर है। आप सीधे-सीधे पुलिस को ही आरोपित कर रहे है, क्योंकि इस मामले में पुलिस की भूमिका ही संदेहास्पद है। बोलने के बाद जज साहब ने शांतनु देव पर नजर टिका दी, जबकि शांतनु देव मुस्कराया फिर बोला।

मिलार्ड!....यह सिर्फ आरोप की बातें नहीं और भी बहुत कुछ है। सच कहा जाए, तो मिलार्ड!....कल रात शायद मेरी जिंदगी खतरे में थी और जो था, वह बतलाने में गलत ही क्या है?

आँब्जेक्सन मिलार्ड!....मेरे काबिल दोस्त इस तरह के आरोप लगाकर इस केस में मनचाहा फैसले लेना चाहते है। बीच में ही अपनी जगह पर उठकर खड़े होने के बाद राघव जुनेजा चिल्ला कर बोला। जिसे सुनकर जज साहब मुस्कराए और फिर बोले।

शांतनु देव!.....राघव जुनेजा का कहना सही भी हो सकता है, तो क्यों न केस के संदर्भ में सिर्फ बातें की जाए। बाकी की बातों को मैं बाद में देख लूंगा।

यश मिलार्ड!.....आपके आदेशानुसार ही मैं बतलाना चाहता हूं कि इस केस में सुनवाई करने जैसा कुछ भी नहीं बचा है। क्योंकि इस केस मेंनतो विक्टीम ही बचा है और न ही अपराधी ही बचा है इस दुनिया में। तो फिर पेंच कहां फंसा है, वो मैं आपको बतलाता हूं। 

इसके बाद शांतनु देव बेबाकी से इस केस के महत्वपूर्ण प्वाईंट को बतलाने लगा। जज साहब उसकी बातों को ध्यान पूर्वक सुन रहे थे, जबकि कोर्ट रूम में सन्नाटा छाया हुआ था। फिर तो शांतनु देव ने जैसे ही अपनी बातें खतम की, राघव जुनेजा अपनी जगह से उठा, आगे बढ़ा और जज साहब के करीब पहुंच कर जज साहब को देखने लगा। लेकिन उसके होंठों से एक भी शब्द नहीं निकला। ऐसे में कुछ मिनट ऐसे ही गुजर गए और तब जज साहब बोले।

मिस्टर राघव जुनेजा!....देख रहा हूं कि आप आगे तो बढे थे जोश के साथ, किन्तु मेरे करीब आकर उलझ गए है और चुप्पी साध ली है।

मिलार्ड!.....बात ऐसी नहीं है, जो आप सोच रहे है। मैं तो बस मौन होकर इसी बात का मंथन कर रहा हूं कि....मेरे काबिल दोस्त ने कितनी सफाई के साथ "स्पेक्ट्रल पाँवर के द्वारा घटित घटनाक्रम" को अपराध साबित करने पर लगे हुए है। 

मिलार्ड!....मैं अदालत को बतलाना चाहता हूं कि इस केस में सुनवाई करने जैसा कुछ भी नहीं है। बस सिर्फ अदालत एवं पुलिस के समय बर्बाद होने के अलावा। बोलने के बाद उसने नजर जज साहब पर टिका दी, जबकि उसकी बातों को सुनकर जज साहब मुस्कराए, फिर गंभीर होकर बोले।

मिस्टर राघव जुनेजा!....मुझे समझ नहीं आ रहा कि आप वकील लोग अपने आप को समझते क्या है? यह जानते हुए कि कोर्ट में इस केस के महत्वपूर्ण सबूत दस्तावेज के रुप में मौजूद है और चीख-चीख कर कह रहे हैं कि वारदात हुआ है और इसे अंजाम "गर्वित" ने दिया है। आप इसे भूत-प्रेत की कहानी बनाने पर तूले हैं।

अभी जज साहब ने बात पूरी भी नहीं की थी कि इंस्पेक्टर विजय के द्वारा बुलाए गए गुंडे, जो कि पांच की संख्या में थे, हथियार लहराते हुए तेजी से शांतनु देव की ओर बढे।....जिसकी अनुभूति शांतनु देव को हो चुकी थी, उन्होंने आने वाले खतरे को भांप लिया था, तभी तो उसने छलांग लगाई और जज साहब के पास पहुंच गया। तब तक तो अपराधियों ने फायरिंग शुरु कर दी थी और अदालत कक्ष गोलियों की तड़तड़ाहट से गुंज उठा था। ऐसे में....कोर्ट रूम में हलचल मचना तो स्वाभाविक ही था। 

स्थिति अत्यंत भयावह हो चुकी थी, किन्तु जज साहब तो कब के शांतनु देव को लेकर अपने केबिन में जा चुके थे। ऐसे में कुछ पल तक अफरातफरी का माहौल बना रहा। हालांकि एस. पी. साहब को मामला समझ नहीं आया और जब समझ आया, उन्होंने पुलिस फोर्स को बुला कर गूंडो को गिरफ्तार करवा लिया।

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कोर्ट रूम में उपद्रव करने वाले अपराधियों को पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया था। फिर भी स्थिति सामान्य होने में घंटे भर का समय लग गया।.....अचानक ही हुई गोली बारी से दर्शक दीर्घा में बैठे शहर के गणमान्य नागरिक और वकील की टीम बुरी तरह से बौखला गई थी।

..किसी को भी कुछ समझ नहीं आया कि अचानक ही ऐसा क्या घटित हुआ कि "कोर्ट रूम में गोलियों की बौछार होने लगी"। मामला तो एस. पी. साहब के भी समझ में नहीं आया और जब समझ आया, उन्होंने पुलिस को बुलाकर उन लोगों को गिरफ्तार करवा लिया था। फिर भी...उनके चेहरे पर हवाईयां उड़ रही थी।

इतना तो वे समझ ही गए थे कि ऐसे मूर्खता भरे कामों को इंस्पेक्टर विजय के अलावा और कोई अंजाम नहीं दे सकता।....जरूर वकील राघव जुनेजा ने उसको भड़काया होगा और उसने इतनी बड़ी गलती को अंजाम दे दिया। एस. पी. साहब तो समझते थे कि इस केस में हार होने पर कोर्ट उनपर विभागीय जाँच के आदेश देगा और विभाग उनका ट्रांसफर कर के संतोष की सांस ले लेगी।

....किन्तु बेवकूफ विजय ने जो गलती की थी, उसका डैमेज कंट्रोल होना एक तरह से असंभव ही था। परंतु अब क्या हो सकता था?....अब तो वाकया घटित हो चुका था और कुछ पल बाद ही इसका परिणाम भी कोर्ट के आदेश में परिणत होने वाला था।

उफ!.....इंस्पेक्टर विजय तो चुतिया किस्म का इंसान था, यह तो उनको पहले से ही जानकारी थी। फिर भी....उन्होंने विजय की सहायता ली, तो उसके परिणाम को भी तो उन्हें ही झेलना था। बस इसी बातों को सोच-सोच कर मृदुल शाहा हलकान हुए जा रहे थे, तभी कोर्ट रूम में शांतनु देव के साथ जज साहब ने कदम रखा। उन्होंने सरसरी निगाह हॉल में डाली, फिर अपनी सीट पर बैठने के बाद कोर्ट कार्रवाई को शुरु करने के आदेश दे दिए, जिसपर राघव जुनेजा अपनी जगह से उठा और आगे आकर बोला।

मिलार्ड!....कोर्ट में हुई हिंसक झड़प ने कार्रवाई को बाधित कर दिया था,....जिससे मैं अपनी बातें पूरी नहीं कर सका। लेकिन अब कहता हूं मिलार्ड!....कि इस केस में ऐसा कुछ भी नहीं, जिसकी सुनवाई की जा सके। अतः मैं कोर्ट से अपील करता हूं कि इस मामले को सिरे से खारिज किया जाए। राघव जुनेजा ने अपनी बात खतम की और जज साहब को देखने लगा। जबकि जज साहब ने उसके चेहरे को देखा और मुस्करा कर बोले।

मिस्टर जुनेजा!....यह आपका निजी राय हो सकता है, लेकिन कोर्ट का नहीं और हां,....आइंदा से दुबारा कोर्ट रूम में गंदी हरकतों को अंजाम नहीं दे।

मैं समझा नहीं मिलार्ड!....आप किन हरकतों की चर्चा कर रहे है?....राघव जुनेजा आश्चर्यचकित होकर बोला, जिसे सुनकर जज साहब की मुस्कान और भी गहरी हो गई। उन्होंने तनिक कठोर शब्दों में बोला।

मिस्टर जुनेजा!....आपने तो शांतनु देव का काम ही तमाम करवा दिया था, वह भी कोर्ट के सामने। वैसे....आप वकील लोग के फितरत से अच्छी तरह वाकिफ हूं। जो जीत सुनिश्चित करने के लिए सामने वाले को धमकाने से लेकर हत्या तक करवा देते है। 

इसके बाद राघव जुनेजा ने सफाई देने की कोशिश की, तो जज साहब ने डपट कर बिठा दिया। फिर शांतनु देव ने उनके सामने इस केस से जुड़े हुए तथ्यों को रखा। इसके बाद जज साहब ने अगले दिन फैसला सुनाने के लिए मुकर्रर किया। 

साथ ही उन्होंने एस. पी. मृदुल शाहा को तत्काल प्रभार से निलंबन के आदेश दिए, साथ ही इंस्पेक्टर विजय और राघव जुनेजा के गिरफ्तारी के आदेश भी दे दिए। उनका इस प्रकार से हरकत में आना, पूरे अदालत कक्ष में सनसनी फैल गई। किन्तु उनके दिए हुए आदेश का पालन तो होना ही था, तभी तो विजय और जुनेजा को गिरफ्तार कर लिया गया।

**********

दिन के दो बजे, सलिल टीवी स्क्रीन के सामने बैठा हुआ मुवी देख रहा था, जबकि रोमील किचन में भोजन बनाने में व्यस्त था। तभी उनके अपार्ट मेंट के बाहर गाड़ी रुकने की आवाज उभड़ी।.....इस समय अचानक ही कौन आ सकता है?....सलिल के दिमाग में प्रश्न उभड़ा, लेकिन अभी दो मिनट भी नहीं गुजरे होंगे कि मृदुल शाहा ने हॉल में कदम रखा। उन्हें देखकर सलिल उठ खड़ा हुआ और उसने सैल्यूट दी, किन्तु एस. पी. साहब ने कोई जबाव नहीं दिया।

हां, वे आगे बढे और सोफे के करीब पहुंच कर बैठ गए, फिर उन्होंने सलिल से बैठने को कहा। फिर उसके बैठते ही बताने लगे कि "आज अदालत कक्ष में क्या हुआ"। सलिल उनकी बातों को गंभीर होकर सुन रहा था। एस. पी. साहब ने उसे बताया कि वो अभी जाकर पुलिस स्टेशन का चार्ज ले-ले। हालांकि सलिल ने उनसे काँफी के लिए पूछा, परन्तु मृदुल शाहा ने इनकार कर दिया। 

फिर वे उठे और बाहर चले गए, इसके बाद सलिल ने कार श्टार्ट होने की आवाज सुनी और फिर आवाज दूर होती चली गई। इसके बाद तो, अब सलिल के हृदय में कैद खुशी की लहर बाहर आने को बेताब होने लगा।

उसका जी कर रहा था कि वह नाच उठे, भले ही उसे अकेले ही नाचना पड़े। बात खुशी की ही थी, उसने जैसे ही एस. पी. साहब की बातों को सुना था, तभी खुश हो गया था। लेकिन तब से उसने अपनी खुशी को कैद कर रखा था और अब उनके जाने के बाद....वह अपने मन की खुशी को नियंत्रित नहीं कर पा रहा था। 

आखिर उसने जो सोचा था, वही हुआ भी था, तो आनंद का लहर उठना लाजिम ही था। किन्तु इस समय किस के साथ शेयर करें, हां, रोमील है न। बस इतनी बातें ध्यान में आते ही उसने रोमील को आवाज दिया और जैसे ही रोमील ने हॉल में कदम रखा, उसे बांहों में जकड़ कर नाचने लगा।

रोमील ने किचन से ही सारी बातें सुन ली थी, इसलिये उसने सलिल को संभाला और सोफे पर बिठाया। तभी फिर से अपार्ट मेंट के बाहर गाड़ी के आने का स्वर गुंजा। अब ये कौन आ धमका?....सहज ही दोनों के मन में प्रश्न गुंजा। तभी हॉल में शांतनु देव, सम्यक एवं लवण्या ने कदम रखा। उन्हें आया हुआ देख कर सलिल एवं रोमील चौंके बिना नहीं रह सके। 

उनका इस समय आना, अचानक ही तो था। फिर भी सलिल ने उन लोगों के बैठने के लिए कहा, जबकि रोमील वापस किचन में चला गया। इधर शांतनु देव ने बैठने के साथ ही अदालत में हुए वाकया को बतलाने की शुरुआत की। सलिल को तो पहले ही पता लग चुका था, फिर भी सुनता रहा। आखिर कहता भी तो क्या?....यह कि एस. पी. साहब आए थे और उन्होंने बतला दिया है।

इसके बाद सम्यक एवं लवण्या ने सलिल का आभार व्यक्त किया। दोनों ही उसके सामने नत -मस्तक हो गए और कहने लगे कि सर!...यह सिर्फ आपके इच्छा शक्ति के कारण ही संभव हो सका है। अन्यथा तो पुलिस विभाग ने इस केस को दबा ही दिया था। सलिल उन दोनों की बातों को सुनकर अभिभूत हो चुका था, फिर उसने दोनों को समझाया कि उसने जो भी किया है, उसका नैतिक कर्तव्य था। उसने तो बस अपने फर्ज को निभाने की कोशिश की है, इसमें एहसान करने जैसी कोई बात नहीं है। 

फिर तो रोमील भी वहां पर आ गया और उसने सूचना दी कि भोजन तैयार हो चुका है। फिर क्या था, सलिल ने हॉल में ही भोजन टेबल लगाने को कहा और टेबल लगने के बाद वे सभी भोजन करने लग गए। हालांकि इस बीच उन लोगों में आने वाले कल और कोर्ट के फैसले को लेकर चर्चा होती रही। हालांकि शांतनु देव ने कोशिश तो यही की थी कि अदालत इस केस के महत्वपूर्ण प्वाईंट को नोट करें और लीव इन रिलेशनशिप पर" सरकार" के लिए आदेश दे। अब देखना यही था कि कोर्ट क्या फैसला सुनाती है।

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कोर्ट के रुख ने तो शहर में हलचल ला दिया था। साथ ही मीडिया बालों ने इस में मिर्च मसाला मिलाने में कोई कोर- कसर नहीं छोड़ा। परिस्थिति ऐसी बन गई थी कि हर गली -हर नुक्कड़ पर बस एक ही चर्चा होने लगी थी कि कल कोर्ट इस केस में क्या फैसला सुनाती है?.....बात सही भी था, इस वारदात ने जिस प्रकार से सनसनी फैलाई थी, इस पर सभी का नजर टिका होना लाजिम ही था।

इधर प्रशासन ने विभागीय जांच का दायरा बढ़ा दिया था। जिसके कारण एस. पी. मृदुल शाहा को तत्काल ही उनके पद भार से हटा दिया गया था और सलिल को टेंपररी उनका चार्ज दे दिया गया था। ....इस परिस्थिति में सलिल की जिम्मेदारी अधिक बढ़ चुकी थी, परिणाम, उसने पुलिस फोर्स की अतिरिक्त कंपनी बुलवा लिया था। वह नहीं चाहता था कि इस मामले को लेकर शहर में किसी प्रकार के उत्पात हो। 

वैसे उसे रोमील पर पूर्ण विश्वास था, वह जानता था कि रोमील जब तक साथ है, मामला नहीं बिगड़ेगा। सच बात भी तो यही था, रोमील एक तरह से उसका प्रति छाया ही था, जिस पर वो आँख मुंद कर विश्वास कर सकता था।

हालांकि शाम होते ही सलिल ने पुलिस फोर्स का फ्लेग मार्च शहर में करवाया, जिससे कि अपराधी प्रकृति के लोग सावधान हो जाए और किसी भी प्रकार की घटना को अंजाम नहीं दें। इसके बाद वो रात को जाकर शांतनु देव से मिला। 

उससे इस केस के बारे में और कोर्ट के संभावित फैसले के बारे में चर्चा की। वहां से निकलने के बाद सम्यक एवं लवण्या से मिला। दोनों के हाथ जुड़ गए सलिल के सम्मान में और आँखों से अश्रु बिंदु भी टपक पड़े। हालांकि सलिल ने उन्हें समझाया कि यह तो उनका दायित्व था.....उसने तो बस अपना फर्ज निभाया है। इसमें एहसान जैसी कोई बात नहीं।

उस रात सलिल एवं रोमील अपनी गाड़ी से शहर का पेट्रोलिंग करते रहे और अगली सुबह, यानी कि सत्रह अक्तुबर को उसने कोर्ट परिसर को पुलिस छावनी में तबदील करवा दिया।....हालांकि उसकी कोशिश यही थी कि मीडिया बालों को पूरी तरह छूट मिले। तभी तो इस फैसले के बारे में शहर की जनता जान सकती थी और इसके महत्वपूर्ण बिंदु से अवगत हो सकती थी। वैसे तो इंस्पेक्टर विजय को गिरफ्तार करके न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया था। फिर भी सलिल के मन में आशंका के बादल घूमर रहे थे।

सलिल अवगत था कि इंस्पेक्टर विजय भ्रष्ट और काईंया किस्म का छवि रखने वाला पुलिसिया था। ऐसे में खुद को मिले करारी हार को आसानी से पचा जाए, संभव ही नहीं। इसलिये उसने जाकर मृदुल शाहा से मुलाकात की और मृदुल शाहा ने सकारात्मक रुख दिखलाया। 

उसने सलिल को आश्वस्त किया कि......इस प्रकार की कोई भी घटना नहीं घटेगी, इसलिये वो निश्चिंत रहे। सारे काम निपटा लेने के बाद वो जब कोर्ट पहुंचा, दिन के दस बज चुके थे। समय हो चुका था और अब कभी भी जज साहब आकर फैसला सुना सकते थे। तभी उसकी नजर कोर्ट परिसर में प्रवेश कर रहे शांतनु देव की कार पर गई। उसने रोमील को इशारा किया और रोमील उधर की ओर लपका।

फिर तो कार से निकलते ही शांतनु देव, लवण्या एवं सम्यक को सुरक्षा के घेरे में ले लिया गया। इसके बाद तीनों कोर्ट रूम की ओर बढे। उनको कोर्ट रूम में जाता हुआ देखकर सलिल ने भी कोर्ट रूम का रुख किया और जब अंदर पहुंचा,.....अंदर की स्थिति देखकर आश्वस्त हो गया। 

आज कोर्ट रूम में ज्यादातर मीडिया वाले एवं वकील ही मौजूद थे।.....आम नागरिकों में सिर्फ उन्हें ही अंदर आने की इजाजत दी गई थी, जो वरिष्ठ थे और जन प्रतिनिधि कहलाते थे। अंदर पहुंच कर सलिल उधर बढ़ा, जिधर शांतनु देव बैठा हुआ था। उसके पास पहुंच कर सलिल उसके करीब बैठ गया और अदालत कक्ष में नजर घुमाने लगा।

तभी जज वाय. एस. सिंन्हा ने अदालत कक्ष में कदम रखा और सभी उनके सम्मान में खड़े हो गए। फिर उन्होंने बैठने के साथ ही सभी को बैठने के लिए इशारा किया और जब सब बैठ गए, उन्होंने नजर घूमा कर कोर्ट रूम को देखा। परंतु वे मौन ही रहे, जिस कारण से कोर्ट रूम में स्तब्धता छा गई। ऐसी खामोशी पसर गई कि सुई भी गिरे, तो तेज धमाका हो। कुछ पल तो ऐसे ही गुजर गया। फिर जज साहब ने अपने हाथ में एक फाइल उठाया और शांत एवं सौम्य स्वर में बोले।

मैं इस केस में फैसला देने से पहले कुछ बातों की चर्चा करना चाहता हूं.....क्योंकि जरूरत भी है और समय की मांग भी। बोलने के बाद जज साहब कुछ पल तक रुके, फिर धाराप्रवाह बोलने लगे। आज-कल कोर्ट में जितने भी मामले आते है मानवीय रिश्तों के ही आते है। जिससे हमारा संबंध होता है, हमारे समाज का संबंध होता है और हमारे देश का संबंध होता है। एक स्वस्थ एवं समृद्ध समाज की रचना तभी हो सकती है, जब वह पूर्ण रुपेन अपराध मुक्त हो।

किन्तु अपराध मुक्त होगा कैसे?....यहां तो सभी के अपने- अपने स्वार्थ निहित है और उनके स्वार्थ ही समाज में गंदगी फैलाते है। परिणाम अपराध के रुप में परिणत होता है। भला हमारे संस्कृति और सभ्यता में क्या कमी है कि हम पश्चिमी सभ्यता का अंधा-अनुकरण करते है। 

तो कहना होगा कि ये मल्टी नेसनल कंपनियां, तथाकथित बुद्धिजीवी लोग और मीडिया, इस पश्चिमी सभ्यता के हिमायती है और अपने स्वार्थ के लिए इसे हवा देते है। फिर तो युवाओं को जितनी स्वच्छंदता मिले, कम ही होता है। परिणाम जब बात बिगड़ती है, वे हताशा के शिकार हो जाते है और अपराध कर बैठते है। इसलिये हमें "अपराध को खतम करने के लिए इसके जड़ को ही मिटाना होगा, तभी इस प्रकार के अपराध रुकेंगे।

इसके बाद जज साहब ने "गर्वित एवं सान्या सिंघला की बात की"। उन्होंने फैसले में बताया कि....किस प्रकार से गर्वित और सान्या "पश्चिमी सभ्यता से आकर्षित होकर लीव इन रिलेशनशिप में रहने लगे थे"। किन्तु इस प्रकार के संबंध स्थायित्व लिए नहीं होता। 

यह तो सिर्फ शारीरिक आकर्षण के कारण बनता है, तो मन भरा नहीं कि अलग हो गए। परंतु इसका दुष्परिणाम यह होता है कि युवा हताशा के गर्त मेंसमा जाता है और "वारदात" करने को प्रेरित होता है। जज साहब ने कहा कि "शहर में पिछले दिनों हुई वारदात" इसका ताजा -तरीन उदाहरण है। 

इसके बाद जज साहब ने फैसला सुनाया कि "इस वारदात में शंलिप्त सभी अपराधी को पुलिस गिरफ्तार करें और उनपर अभियोग निर्धारित करें। साथ ही जज साहब ने केंद्र सरकार को आदेश दिया कि "सरकार इस प्रकार के कानून पारित करें, जिससे इस प्रकार के पश्चिमी सभ्यता रुपी दूषण से हमारा समाज मुक्त हो। 

साथ ही.....सरकार रचनात्मक कार्यों के द्वारा आज के युवाओं में अपनी सभ्यता के लिए आकर्षण जगाएं। क्योंकि भारतीयों के लिए सनातन सभ्यता से बेहतर तो हो ही नहीं सकता। 

जज साहब ने फैसला सुनाया और उठकर अपने केबिन में चले गए। इधर शांतनु देव की आँखों में अश्रु बिंदु थे और वो अपलक सलिल को ही देख रहा था। सलिल उसकी भावनाओं को समझ गया, उसने शांतनु देव का हाथ पकड़ा और कोर्ट रूम से बाहर निकल पड़ा। 

पीछे-पीछे सम्यक, लवण्या और रोमील चल पड़े। लेकिन बाहर आने के बाद सलिल चौंक उठा,....क्योंकि गर्वित के पिता ललित सक्सेना कोर्ट रूम के बरामदे में पाये के सहारे खड़े थे। कुछ ही दिनों में उम्र से अधिक दिखते ललित सक्सेना, उस जुआरी की भांति, जो अपना सब कुछ दांव में हार गया हो। उसकी नजर जैसे ही सलिल पर गई, उसके चरण में झुक गया, आँखों में आँसू, श्रद्धा और कृतज्ञता का भाव लिए।

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समाप्त











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