“अरे बुधई काका! तैयार हो गए कि नहीं? ट्रैक्टर निकल जाएगा फिर मत कहना कि बताये नहीं…”
बाहर से आती आवाज सुनकर बुधई ने अपनी टूटी खाट से उठने की कोशिश की। घुटनों में जैसे किसी ने गरम सीसा भर दिया हो। दीवार पकड़कर धीरे-धीरे उठा और कोने में टंगी अपनी मटमैली कमीज पहनने लगा।
“आ रहे हैं भइया… इतना भी क्या हड़बड़ी है…”
दरवाजे पर खड़ा हरिचरण हँस पड़ा—
“हड़बड़ी नहीं करेंगे तो सौ रुपया कैसे मिलेगा काका! नेताजी खुद दे रहे हैं। बस भी है, खाना भी मिलेगा। ऊपर से शहर घूमना अलग।”
“हाँ रे… सौ रुपया…”
बुधई ने जैसे खुद से कहा।
पूरा घर नजरों के सामने घूम गया।
छप्पर से टपकता पानी।
चूल्हे के पास खाली कनस्तर।
कोने में खाँसती उसकी बीमार पत्नी फूलमती।
और चारपाई पर बैठी उसकी पोती गुड़िया, जो सुबह से रोटी माँगते-माँगते अब चुप हो गई थी।
बुधई ने जाते-जाते फूलमती से कहा—
“देख, शाम तक आ जाऊँगा। सौ रुपया मिलेगा। आते में दवा भी लेता आऊँगा… और गुड़िया के लिए बिस्कुट भी…”
फूलमती ने बस उसे देखा।
वह जानती थी—इस घर में अब सपने भी उधार पर पलते हैं।
गांव के बाहर पहले से ही कई ट्रैक्टर-ट्रॉलियाँ खड़ी थीं। हर ट्रॉली में आदमी ऐसे भरे थे जैसे बोरे में आलू। कुछ लोग झंडे पकड़े थे, कुछ को अभी तक यह भी नहीं पता था कि रैली किस बात की है।
एक लड़का झंडे बाँटता हुआ चिल्ला रहा था—
“सब लोग याद रखना! जब नेताजी हाथ उठाएँ तो जोर से बोलना—‘नेताजी जिंदाबाद!’”
भीड़ में किसी ने पूछा—
“नेताजी आएँगे किसलिए?”
दूसरा बोला—
“अरे वही… गरीबों के विकास के लिए।”
सब हँस पड़े।
बुधई भी हल्का मुस्कुराया, फिर खाँसी का दौरा पड़ गया।
ट्रॉली चल पड़ी।
धूल उड़ाती सड़क पर घंटों हिचकोले खाते हुए लोग शहर पहुँचे। बुधई ने शायद पहली बार इतना बड़ा शहर देखा था। ऊँची-ऊँची इमारतें, चमचमाती दुकानें, बड़े-बड़े पोस्टर जिनमें नेताजी मुस्कुरा रहे थे—ठीक वैसे जैसे कोई आदमी फोटो में मुस्कुराता है, असल जिंदगी में नहीं।
रैली मैदान में जनसमूह उमड़ा पड़ा था।
लाउडस्पीकर फट रहे थे—
“गरीबों का मसीहा कौन?”
भीड़ चिल्लाती—
“नेताजी! नेताजी!”
बुधई को प्यास लगी थी। सुबह से उसने सिर्फ आधी सूखी रोटी खाई थी। पानी लेने गया तो वहाँ भी लंबी लाइन।
उधर मंच पर नेताजी हेलीकॉप्टर से उतरे।
भीड़ अचानक पागल हो उठी।
लोग धक्का देने लगे।
झंडे हवा में लहराने लगे।
किसी ने बुधई को पीछे से ऐसा धक्का दिया कि वह गिर पड़ा।
उसके ऊपर कई पैर चढ़ गए।
“अरे बचाओ…”
उसकी आवाज नारों में दब गई।
किसी तरह एक लड़के ने उसे उठाया।
“काका मरना है क्या? किनारे बैठो!”
बुधई हाँफता हुआ मैदान के कोने में बैठ गया। दूर मंच पर नेताजी गरज रहे थे—
“हम गरीबों के सम्मान की लड़ाई लड़ रहे हैं!”
तालियाँ गूँज उठीं।
“हमने हर गरीब के घर विकास पहुँचाया है!”
भीड़ फिर चीखी—
“जिंदाबाद!”
बुधई को अचानक गुड़िया याद आई।
सुबह वह कह रही थी—
“बाबा, लौटते में मेरे लिए लाल वाली टॉफी लाना…”
उसने जेब टटोली।
अभी सौ रुपया मिला नहीं था।
शाम तक रैली खत्म हुई।
अब पैसा बाँटने की बारी आई।
लोग टूट पड़े।
धक्का-मुक्की के बीच किसी ने बुधई के हाथ में एक मुड़ा-तुड़ा सौ का नोट थमा दिया। वह नोट उसने ऐसे पकड़ा जैसे कोई भूखा आदमी आखिरी रोटी पकड़ता है।
उसने राहत की साँस ली।
“चलो… दवा आ जाएगी… गुड़िया के लिए बिस्कुट भी…”
लेकिन विडंबनाएँ अभी बाकी थीं।
बसें कम पड़ गईं।
हजारों लोग सड़क पर छूट गए।
कुछ लोग ट्रैक्टरों पर चढ़ गए, कुछ पैदल निकल पड़े। बुधई भी लाठी टेकता हुआ चलने लगा।
रात घिर आई थी।
शहर से बाहर निकलते ही तेज बारिश शुरू हो गई।
बुधई एक बंद दुकान के छज्जे के नीचे खड़ा हो गया। वहीं उसे याद आया कि उसने दवा नहीं खरीदी।
पास की मेडिकल दुकान बंद हो चुकी थी।
वह देर तक बंद शटर को देखता रहा।
फिर धीरे-धीरे चल पड़ा।
रास्ते में भूख लगी तो उसने सोचा कुछ खा ले। एक ढाबे पर जाकर पूछा—
“भइया… दस रुपये की चाय मिल जाएगी?”
ढाबे वाले ने ऊपर से नीचे तक देखा—भीगा हुआ बूढ़ा, कीचड़ सनी धोती, काँपते हाथ।
“पहले पैसे दिखाओ।”
बुधई ने जेब में हाथ डाला।
जेब खाली थी।
वह घबरा गया।
दूसरी जेब टटोली।
कमीज टटोली।
धोती की गाँठ खोली।
सौ का नोट गायब था।
शायद भीड़ में… या बारिश में… या रास्ते में कहीं गिर गया था।
कुछ देर तक वह सड़क किनारे खड़ा रहा।
बारिश उसके चेहरे पर गिरती रही।
फिर अचानक वह हँस पड़ा।
धीरे-धीरे… सूखी हुई हँसी।
“गरीब के हाथ में पैसा भी मेहमान जैसा होता है… टिकता कहाँ है…”
आधी रात के करीब वह गांव पहुँचा।
गांव में अजीब सन्नाटा था।
उसका दिल घबराने लगा।
घर के बाहर लोगों की भीड़ थी।
बुधई तेजी से भीतर घुसा।
अंदर फूलमती जमीन पर बैठी थी और उसकी गोद में गुड़िया पड़ी थी।
बिलकुल शांत।
बिलकुल चुप।
फूलमती ने सूनी आँखों से उसे देखा।
“गुड़िया शाम से तड़प रही थी बुधई… बुखार बहुत तेज था… गांव में गाड़ी नहीं मिली… अस्पताल ले जाते उससे पहले…”
उसकी आवाज टूट गई।
बुधई पत्थर बना खड़ा रहा।
उसने कांपते हाथों से गुड़िया का माथा छुआ।
सुबह तक जो बच्ची लाल टॉफी माँग रही थी, अब उसकी छोटी-सी मुट्ठी हमेशा के लिए बंद हो चुकी थी।
बाहर कहीं दूर लाउडस्पीकर अब भी बज रहा था—
“गरीबों के सुनहरे भविष्य के लिए ऐतिहासिक रैली सफल रही!”
बुधई ने धीरे से अपनी खाली जेब में हाथ डाला।
फिर गुड़िया के निर्जीव चेहरे को देखते हुए बुदबुदाया—
“हाँ… रैली बहुत सफल रही…”
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