Tuesday, June 16, 2026

गौरी

बरगवां गाँव बहुत बड़ा नहीं था। पचास-साठ घरों का एक साधारण-सा गाँव। चारों ओर खेत, बीच में पीपल का पुराना पेड़, उसके पास छोटा-सा मंदिर और थोड़ी दूर पर पंचायत भवन। बाहर से देखने पर गाँव शांत दिखाई देता था, जैसे वहाँ सब कुछ ठीक हो।
लेकिन गाँवों की शांति कई बार नदी की उस सतह जैसी होती है जिसके नीचे तेज धाराएँ बह रही होती हैं।
उसी गाँव में गौरी रहती थी।
कोई बीस-बाईस वर्ष पहले जब वह दुल्हन बनकर इस घर में आई थी, तब उसके सपने भी बाकी लड़कियों जैसे ही थे। उसने सोचा था कि अपना छोटा-सा संसार होगा, पति होगा, बच्चे होंगे, सुख-दुख बाँटने वाला कोई साथी होगा।
परंतु जीवन मनुष्य के सपनों से नहीं, परिस्थितियों से चलता है।
शुरुआत के कुछ वर्ष ठीक गुज़रे। फिर धीरे-धीरे रघु को शराब की लत लग गई।
शराब पहले आदत बनी, फिर ज़रूरत बनी और अंत में मालिक बन गई।
अब घर में जो कुछ था, उसका असली स्वामी रघु नहीं, उसकी शराब थी।
रोटी कम पड़ जाए तो कोई बात नहीं।
बच्चा बीमार पड़ जाए तो कोई बात नहीं।
पत्नी के शरीर पर कपड़े फट जाएँ तो कोई बात नहीं।
लेकिन शराब की बोतल कम नहीं पड़नी चाहिए।
गौरी ने बहुत कोशिश की थी।
समझाया था।
रोई थी।
झगड़ा भी किया था।
फिर चुप भी हो गई थी।
क्योंकि एक गरीब स्त्री के पास विरोध करने के अवसर बहुत कम होते हैं।
समाज उसे बचपन से यही सिखाता है कि सहना ही उसका धर्म है।
जब वह बेटी होती है तो कहा जाता है—
"बेटियाँ ज्यादा नहीं बोलतीं।"
जब वह बहू बनती है तो कहा जाता है—
"ससुराल में सिर झुकाकर रहो।"
जब वह पत्नी बनती है तो कहा जाता है—
"पति जैसा भी हो, भगवान होता है।"
और जब वह माँ बनती है तो कहा जाता है—
"बच्चों के लिए सब सह लो।"
जीवन भर उसे सहने की शिक्षा मिलती है।
केवल एक बात कोई नहीं सिखाता—
कि अन्याय के सामने खड़ा कैसे हुआ जाता है।
गौरी भी सहती रही।
एक दिन।
एक महीना।
एक वर्ष।
फिर दस वर्ष।
धीरे-धीरे सहना उसकी आदत बन गया।
उसे स्वयं भी लगने लगा कि शायद उसका जीवन ऐसा ही है।
शायद हर औरत की किस्मत ऐसी ही होती है।
शायद दर्द ही उसका भाग्य है।
और यही अत्याचार की सबसे बड़ी विजय होती है।
जब पीड़ित व्यक्ति अपने दुख को सामान्य मानने लगे।
10 जून की शाम थी।
आसमान में बादल थे।
गौरी चूल्हे के सामने बैठी रोटियाँ बना रही थी।
आटा कम था।
लकड़ियाँ गीली थीं।
धुआँ आँखों में भर रहा था।
उसी समय रघु शराब पीकर घर लौटा।
उसकी चाल से ही पता चल रहा था कि आज फिर वह होश में नहीं है।
"खाना कहाँ है?"
उसने घर में घुसते ही पूछा।
"बस बन रहा है।"
गौरी ने शांत स्वर में कहा।
बस इतना ही।
केवल चार शब्द।
लेकिन शराब आदमी को शब्दों का अर्थ नहीं, अपमान का भ्रम सुनाती है।
रघु भड़क उठा।
गालियाँ शुरू हो गईं।
गौरी उस दिन बहुत थकी हुई थी।
शायद शरीर से भी और मन से भी।
उसके मुँह से निकल गया—
"हर बार इतना गुस्सा क्यों करते हो?"
यह प्रश्न नहीं था।
वर्षों से दबा हुआ दर्द था।
लेकिन अत्याचारी आदमी दर्द को भी चुनौती समझता है।
रघु बाहर गया।
थोड़ी देर बाद हाथ में मोटी डाल लेकर लौटा।
फिर जो हुआ, उसे देखकर शायद पत्थर भी रो पड़ते।
हर वार के साथ केवल गौरी का शरीर नहीं टूट रहा था।
उसका आत्मसम्मान, उसका विश्वास और उसकी इंसानियत भी घायल हो रही थी।
रात गहरी हो गई।
रघु शराब के नशे में सो गया।
गौरी के शरीर में दर्द की लहरें उठ रही थीं।
लेकिन उससे बड़ा दर्द उसके मन में था।
उसे पहली बार लगा कि अगर वह आज नहीं निकली, तो शायद कभी नहीं निकल पाएगी।
वह धीरे-धीरे उठी।
दरवाज़ा खोला।
और घर से बाहर निकल गई।
गाँव सो रहा था।
कुत्ते भौंक रहे थे।
आसमान में बादल चल रहे थे।
गौरी थाने की ओर बढ़ रही थी।
उसके पैरों में चप्पल भी नहीं थी।
लेकिन उसके भीतर वर्षों से कैद साहस जाग चुका था।
विडंबना देखिए।
जिस समाज ने उसे हमेशा कहा था कि पति परमेश्वर है, उसी समाज से बचने के लिए वह रात के अँधेरे में भाग रही थी।
जिस घर को औरत का स्वर्ग कहा जाता है, उसी घर से वह अपनी जान बचाकर निकल रही थी।
वह मंदिर के पास पहुँची ही थी कि पीछे से किसी ने उसके बाल पकड़ लिए।
रघु था।
शायद उसे भागते देख लिया गया था।
मंदिर के सामने।
भगवान के सामने।
लोगों के सामने।
एक आदमी अपनी पत्नी को पीट रहा था।
और लोग खड़े देख रहे थे।
किसी ने रोकने की कोशिश नहीं की।
क्योंकि हमारे समाज में तमाशबीनों की संख्या हमेशा मददगारों से ज्यादा होती है।
सबको दया आती है।
लेकिन बहुत कम लोगों में साहस आता है।
रघु उसे घसीटकर घर ले आया।
इस बार वह सुनिश्चित करना चाहता था कि गौरी फिर कभी भाग न सके।
उसने लोहे की भारी जंजीर निकाली।
गले में डाल दी।
खंभे से बाँध दिया।
ताला लगा दिया।
गौरी अब एक कैदी थी।
फर्क केवल इतना था कि जेल का अपराधी कानून की सजा काटता है और गौरी किसी अपराध के बिना कैद थी।
लेकिन रघु की क्रूरता यहीं नहीं रुकी।
उसने लोहे की छड़ आग में रख दी।
जब वह लाल हो गई तो उसने उसे गौरी के शरीर से लगा दिया।
चीख पूरे घर में गूँज गई।
फिर दूसरी।
फिर तीसरी।
उस रात केवल गौरी नहीं जली।
मानवता भी जली।
सभ्यता भी जली।
वे सारे आदर्श भी जले जिन पर समाज गर्व करता है।
लगभग चौबीस घंटे तक वह जंजीर से बँधी रही।
भूख लगी।
प्यास लगी।
घाव जलते रहे।
लेकिन उससे भी ज्यादा उसकी आत्मा जल रही थी।
वह सोचती रही—
क्या उसका अपराध केवल इतना था कि उसने पुलिस तक पहुँचने की कोशिश की?
क्या उसका अपराध केवल इतना था कि वह जीना चाहती थी?
अगले दिन रघु बोला—
"पंचायत के सामने कसम खानी होगी कि कभी पुलिस नहीं जाओगी।"
गौरी ने सिर झुका दिया।
उसे पता था कि अभी विरोध करना मृत्यु को बुलाना है।
कभी-कभी साहस का अर्थ लड़ना नहीं, सही समय तक जीवित रहना भी होता है।
रघु पंचायत बुलाने चला गया।
घर में सन्नाटा था।
गौरी अकेली थी।
तभी उसकी नज़र एक पत्थर पर पड़ी।
साधारण-सा पत्थर।
वही पत्थर जिसे शायद लोग रोज़ ठोकर मारकर निकल जाते होंगे।
लेकिन उस दिन वह पत्थर आशा बन गया।
इतिहास गवाह है—
जब-जब इंसान के हाथ से सारे हथियार छिन गए हैं, तब-तब उसने पत्थर से शुरुआत की है।
गौरी घिसटती हुई वहाँ पहुँची।
पहली चोट।
ताला नहीं टूटा।
दूसरी चोट।
कुछ नहीं हुआ।
तीसरी चोट।
हाथ काँपने लगे।
आँखों से आँसू बहने लगे।
लेकिन उसने हार नहीं मानी।
क्योंकि कुछ लड़ाइयाँ जीतने के लिए नहीं, जीने के लिए लड़ी जाती हैं।
चौथी चोट।
पाँचवीं चोट।
और फिर...
ताला टूट गया।
उस क्षण कोई शोर नहीं हुआ।
कोई जयकार नहीं हुई।
कोई तालियाँ नहीं बजीं।
लेकिन एक स्त्री के भीतर वर्षों से कैद स्वतंत्रता मुक्त हो गई।
जंजीर जमीन पर गिर गई।
और उसके साथ भय का एक बड़ा हिस्सा भी।
वह चल पड़ी।
छह किलोमीटर का रास्ता।
घायल शरीर।
जलते घाव।
नंगे पैर।
लेकिन इस बार वह भाग नहीं रही थी।
इस बार वह अपने अधिकार की ओर जा रही थी।
जब वह थाने पहुँची तो पुलिस वाले कुछ क्षणों तक उसे देखते रह गए।
उसके गले में जंजीर का टूटा हिस्सा लटक रहा था।
शरीर पर घाव थे।
आँखों में आँसू थे।
लेकिन उन आँसुओं से भी अधिक चमक उसके साहस में थी।
लोग अक्सर पूछते हैं—
दुनिया की सबसे मजबूत चीज़ क्या है?
लोहा?
पत्थर?
जंजीर?
ताला?
नहीं।
दुनिया की सबसे मजबूत चीज़ वह इच्छा है जो इंसान को कहती है—
"मैं हार नहीं मानूँगा।"
इस कहानी का सबसे भयावह पात्र रघु नहीं है।
रघु जैसे लोग हर युग में रहे हैं।
सबसे भयावह पात्र वह समाज है जो देखता रहता है।
जो कहता है—
"यह उनका निजी मामला है।"
जो पीड़िता से पूछता है—
"तुमने उसे नाराज़ क्यों किया?"
लेकिन अत्याचारी से नहीं पूछता—
"तुम्हें अत्याचार करने का अधिकार किसने दिया?"
और इस कहानी का सबसे सुंदर दृश्य भी ताला टूटने का नहीं है।
सबसे सुंदर दृश्य वह क्षण है जब गौरी ने पत्थर उठाया।
क्योंकि उसी क्षण उसने दुनिया को बता दिया था कि इंसान को हमेशा जंजीरें नहीं बाँधतीं।
कई बार जंजीरें टूट जाती हैं।
और जब एक स्त्री भय के विरुद्ध खड़ी हो जाती है, तब उसकी मुक्ति केवल उसकी अपनी नहीं रहती।
वह उन हजारों स्त्रियों की आशा बन जाती है, जो अब भी किसी अदृश्य जंजीर में बँधी हुई हैं।
उस दिन बरगवां में केवल एक ताला नहीं टूटा था।
उस दिन एक स्त्री ने यह सिद्ध कर दिया था कि अत्याचार कितना भी पुराना क्यों न हो, साहस उससे हमेशा एक दिन बड़ा होता है।

Friday, June 12, 2026

मृत्यु भोज

माँ का श्राद्ध
(प्रेमचंद की शैली से प्रेरित एक कहानी)
बरसात अभी-अभी विदा हुई थी। गाँव के बाहर पीपल के पेड़ से टपकती बूंदें अब भी धरती पर गिर रही थीं। घरों के आँगन में नमी थी और हवा में एक अजीब-सी उदासी।
रामदीन के घर भी उदासी थी।
दस दिन पहले उसकी पत्नी कौशल्या मर गई थी।
पचपन वर्षों का साथ था। लड़ते-झगड़ते, हँसते-रोते, अभावों में जीवन काटते-काटते दोनों बूढ़े हो गए थे। कौशल्या चली गई, पर रामदीन को ऐसा लगता था जैसे घर का आधा हिस्सा उखड़ गया हो।
चार बेटे थे उसके।
रघुवीर, महेंद्र, सुरेश और सबसे छोटा शुभम।
चारों के लिए कौशल्या ने एक-सा कष्ट उठाया था। किसी को कम दूध नहीं पिलाया था, किसी के बुखार में कम रातें नहीं काटी थीं।
लेकिन माँ की चिता की राख ठंडी होते-होते बेटों के दिल ठंडे पड़ गए।
श्राद्ध की तैयारी चल रही थी।
गाँव के लोग सलाह दे रहे थे।
कोई कहता, "सौ आदमी खिलाना।"
कोई कहता, "नहीं, दो सौ से कम हुए तो लोग क्या कहेंगे?"
मृत्यु पर भी लोगों को सबसे अधिक चिंता इस बात की थी कि लोग क्या कहेंगे।
रामदीन चुप बैठा सुनता रहता।
जिस स्त्री ने जीवन भर दो वक़्त की रोटी जुटाने के लिए संघर्ष किया, उसकी आत्मा की शांति अब पचास किलो घी और सौ किलो आटे पर निर्भर कर गई थी।
उसे यह बात कभी समझ नहीं आई।
एक शाम चारों बेटे बैठकर खर्च का हिसाब कर रहे थे।
बात यहीं से बिगड़ी।
रघुवीर बोला, "हम दोनों बड़े भाई अलग श्राद्ध करेंगे।"
महेंद्र ने समर्थन किया।
"हाँ, हम अलग करेंगे।"
सुरेश चौंका।
"अलग क्यों?"
"हमारी इच्छा।"
सबसे छोटा शुभम अब तक चुप था।
उसने धीरे से कहा,
"माँ एक थी। श्राद्ध दो कैसे होंगे?"
रघुवीर का चेहरा तमतमा गया।
"हम जैसा चाहें करेंगे।"
"लेकिन गाँव क्या सोचेगा?"
"गाँव को सोचने दो।"
शुभम ने पिता की ओर देखा।
रामदीन सिर झुकाए बैठा था।
वह जानता था कि यह झगड़ा श्राद्ध का नहीं है।
यह वर्षों से जमा अहंकार का झगड़ा है।
माँ तो केवल बहाना है।
उस रात बहस बढ़ी।
पुराने हिसाब खुलने लगे।
किसने किसकी मदद की।
किसने नहीं की।
किसने ज्यादा खर्च किया।
किसने कम किया।
मृत माँ धीरे-धीरे गायब हो गई।
बचे केवल जीवित लोगों के अहंकार।
शुभम बार-बार एक ही बात कहता रहा—
"चार भाई हैं तो चारों साथ करेंगे।"
उसे लगता था कि यह केवल एक रस्म नहीं, माँ के प्रति अंतिम सम्मान है।
लेकिन कभी-कभी सबसे सरल बात ही सबसे कठिन हो जाती है।
रघुवीर की आवाज़ ऊँची होती गई।
महेंद्र भी उत्तेजित हो उठा।
सुरेश बीच-बचाव करता रहा।
और फिर वह क्षण आया जो किसी ने नहीं सोचा था।
रघुवीर भीतर गया।
लौटा तो हाथ में बंदूक थी।
गाँवों में बंदूकें अक्सर सुरक्षा से ज्यादा अहंकार की वस्तु होती हैं।
लोग समझे, डराने आया है।
शुभम फिर भी नहीं डरा।
वह बोला—
"भैया, माँ के नाम पर कम-से-कम..."
वाक्य पूरा नहीं हुआ।
धमाका हुआ।
सन्नाटा छा गया।
शुभम जमीन पर गिर पड़ा।
उसकी छाती से बहता रक्त मिट्टी में समाने लगा।
वह मिट्टी, जिसमें कभी उसकी माँ ने नंगे पैर चलकर उसे स्कूल पहुँचाया था।
कुछ ही क्षणों में सब समाप्त हो गया।
लोग भागे।
औरतें चीखीं।
बच्चे रोने लगे।
पर जो होना था, हो चुका था।
माँ के श्राद्ध की तैयारी के बीच बेटे की अर्थी तैयार होने लगी।
अगले दिन रामदीन आँगन में बैठा था।
एक ओर पत्नी की तस्वीर थी।
दूसरी ओर बेटे का शव।
गाँव भर के लोग आए।
सांत्वना देने।
सलाह देने।
अफसोस जताने।
कुछ लोग घटना की चर्चा कर रहे थे।
कुछ कानून की।
कुछ प्रतिष्ठा की।
लेकिन किसी के पास उस बूढ़े पिता के लिए शब्द नहीं थे।
वह चुप बैठा रहा।
बहुत देर बाद उसने तस्वीर की ओर देखा और बुदबुदाया—
"कौशल्या, देख रही हो न?"
बस इतना ही।
उसकी आँखों से आँसू भी नहीं निकले।
कुछ दुख इतने बड़े होते हैं कि आँसू भी उनका भार नहीं उठा पाते।
श्राद्ध हुआ।
भोज भी हुआ।
लोग खाकर चले गए।
किसी ने पूड़ी की तारीफ की।
किसी ने सब्जी की।
किसी ने कहा व्यवस्था अच्छी थी।
जैसे हर मृत्युभोज के बाद कहा जाता है।
लेकिन उस घर में दो मृत आत्माओं के नाम पर बना भोजन किसी को यह नहीं बता सका कि शांति आखिर होती क्या है।
यदि आत्माएँ सचमुच देखती होंगी, तो उस दिन कौशल्या ने अवश्य सोचा होगा—
"मैंने बेटों को रोटी बाँटना सिखाया था, वे मुझे ही बाँटने लगे।"
और शायद शुभम की आत्मा ने भी यही पूछा होगा—
"जिस प्रेम को बचाने के लिए मैं खड़ा था, क्या वह इतना कमजोर था कि एक गोली से मर गया?"
गाँव में जीवन फिर सामान्य हो गया।
लोग अपने-अपने कामों में लग गए।
पर रामदीन जब भी शाम को चौखट पर बैठता, उसे लगता—
उसकी पत्नी की मृत्यु केवल एक बार नहीं हुई।
वह उस दिन दूसरी बार भी मरी थी,
जब उसके बेटे उसकी स्मृति को अपने अहंकार से छोटा साबित करने पर उतारू हो गए थे।

Thursday, June 11, 2026

दूसरा बैल

दूसरा बैल

सुबह का समय था। सूरज अभी पूरी तरह निकला नहीं था, लेकिन खेतों में काम शुरू हो चुका था। गाँव के किसान अपने-अपने बैलों के साथ खेतों की ओर जा रहे थे।
रामसेवक अपने घर के बाहर चौखट पर बैठा था। उसकी आँखें सामने बँधे खाली जुए पर टिकी थीं।
कल तक वहाँ दो बैल हुआ करते थे।
अब एक ही बचा था।
दूसरा अचानक मर गया था।
बैल कोई साधारण पशु नहीं होता। किसान के लिए वह खेत का हाथ होता है। उसके बिना खेत ऐसा लगता है जैसे आदमी बिना एक बाँह के खड़ा हो।
रामसेवक सारी रात सो नहीं पाया था।
घर में पैसे नहीं थे। साहूकार का पुराना कर्ज़ पहले से सिर पर था। नया बैल खरीदने की बात सोचना भी उसके लिए वैसा ही था जैसे कोई भूखा आदमी महल का सपना देखे।
उसकी पत्नी गंगा चूल्हे के पास बैठी थी। चूल्हे में आग कम थी और चिंता अधिक।
"आज खेत नहीं जाओगे?" उसने धीरे से पूछा।
रामसेवक ने सिर झुका लिया।
"एक बैल से क्या होगा?"
गंगा कुछ देर चुप रही। फिर उठी और बाहर चली गई।
आँगन में खड़ा बचा हुआ बैल चारा खा रहा था।
गंगा उसकी ओर देखती रही।
उसे अपने बच्चों के चेहरे याद आए। घर का खाली अनाज का डिब्बा याद आया। पिछली बार साहूकार की धमकी याद आई।
उसने एक लंबी साँस ली।
"चलो खेत।"
रामसेवक ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा।
"कैसे?"
"जैसे गरीब जीता है।"
थोड़ी देर बाद खेत में एक विचित्र दृश्य था।
जुए की एक ओर बैल था।
दूसरी ओर गंगा।
रामसेवक पीछे से हल पकड़े हुए था।
धरती चीरती हुई फाल आगे बढ़ रही थी।
गंगा के कंधे काँप रहे थे।
पैर मिट्टी में धँसते थे।
माथे से पसीना टपककर धरती में मिल जाता था।
लेकिन वह रुकी नहीं।
रामसेवक कई बार चाहता कि हल छोड़ दे, सब कुछ छोड़ दे। मगर छोड़कर जाता कहाँ?
भूख आदमी को बहुत कुछ करा देती है।
दोपहर तक खेत का एक हिस्सा जोता जा चुका था।
आस-पास के किसान काम छोड़कर देखने लगे।
कुछ की आँखों में दया थी।
कुछ की आँखों में लाचारी।
क्योंकि वे जानते थे कि आज जो इस खेत में हो रहा है, वह किसी एक घर की कहानी नहीं है।
यह उन सबकी कहानी है जिनके हाथों की मेहनत से अन्न उगता है, पर जिनके घरों में अक्सर सबसे पहले अभाव प्रवेश करता है।
शाम को काम समाप्त हुआ।
गंगा थककर मेड़ पर बैठ गई।
उसके कंधे छिल गए थे।
रामसेवक ने उसकी ओर देखा।
पहली बार उसे लगा कि उसकी पत्नी केवल उसकी जीवनसंगिनी नहीं है।
वह उसके दुख की साझीदार है।
उसकी भूख की साझीदार है।
उसकी लड़ाई की साझीदार है।
और आज तो वह सचमुच उसका दूसरा बैल बन गई थी।
दूर कहीं सूर्य अस्त हो रहा था।
उसकी लालिमा खेत पर बिखरी हुई थी।
ऐसा लगता था मानो धरती स्वयं उस स्त्री के घायल कंधों पर अपना हाथ रखकर कह रही हो—
"मैं तुम्हारा दर्द जानती हूँ। क्योंकि मेरे सीने पर हल चलाने वाले हाथ हमेशा सबसे अधिक घायल रहे हैं।"