Thursday, June 11, 2026

दूसरा बैल

दूसरा बैल

सुबह का समय था। सूरज अभी पूरी तरह निकला नहीं था, लेकिन खेतों में काम शुरू हो चुका था। गाँव के किसान अपने-अपने बैलों के साथ खेतों की ओर जा रहे थे।
रामसेवक अपने घर के बाहर चौखट पर बैठा था। उसकी आँखें सामने बँधे खाली जुए पर टिकी थीं।
कल तक वहाँ दो बैल हुआ करते थे।
अब एक ही बचा था।
दूसरा अचानक मर गया था।
बैल कोई साधारण पशु नहीं होता। किसान के लिए वह खेत का हाथ होता है। उसके बिना खेत ऐसा लगता है जैसे आदमी बिना एक बाँह के खड़ा हो।
रामसेवक सारी रात सो नहीं पाया था।
घर में पैसे नहीं थे। साहूकार का पुराना कर्ज़ पहले से सिर पर था। नया बैल खरीदने की बात सोचना भी उसके लिए वैसा ही था जैसे कोई भूखा आदमी महल का सपना देखे।
उसकी पत्नी गंगा चूल्हे के पास बैठी थी। चूल्हे में आग कम थी और चिंता अधिक।
"आज खेत नहीं जाओगे?" उसने धीरे से पूछा।
रामसेवक ने सिर झुका लिया।
"एक बैल से क्या होगा?"
गंगा कुछ देर चुप रही। फिर उठी और बाहर चली गई।
आँगन में खड़ा बचा हुआ बैल चारा खा रहा था।
गंगा उसकी ओर देखती रही।
उसे अपने बच्चों के चेहरे याद आए। घर का खाली अनाज का डिब्बा याद आया। पिछली बार साहूकार की धमकी याद आई।
उसने एक लंबी साँस ली।
"चलो खेत।"
रामसेवक ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा।
"कैसे?"
"जैसे गरीब जीता है।"
थोड़ी देर बाद खेत में एक विचित्र दृश्य था।
जुए की एक ओर बैल था।
दूसरी ओर गंगा।
रामसेवक पीछे से हल पकड़े हुए था।
धरती चीरती हुई फाल आगे बढ़ रही थी।
गंगा के कंधे काँप रहे थे।
पैर मिट्टी में धँसते थे।
माथे से पसीना टपककर धरती में मिल जाता था।
लेकिन वह रुकी नहीं।
रामसेवक कई बार चाहता कि हल छोड़ दे, सब कुछ छोड़ दे। मगर छोड़कर जाता कहाँ?
भूख आदमी को बहुत कुछ करा देती है।
दोपहर तक खेत का एक हिस्सा जोता जा चुका था।
आस-पास के किसान काम छोड़कर देखने लगे।
कुछ की आँखों में दया थी।
कुछ की आँखों में लाचारी।
क्योंकि वे जानते थे कि आज जो इस खेत में हो रहा है, वह किसी एक घर की कहानी नहीं है।
यह उन सबकी कहानी है जिनके हाथों की मेहनत से अन्न उगता है, पर जिनके घरों में अक्सर सबसे पहले अभाव प्रवेश करता है।
शाम को काम समाप्त हुआ।
गंगा थककर मेड़ पर बैठ गई।
उसके कंधे छिल गए थे।
रामसेवक ने उसकी ओर देखा।
पहली बार उसे लगा कि उसकी पत्नी केवल उसकी जीवनसंगिनी नहीं है।
वह उसके दुख की साझीदार है।
उसकी भूख की साझीदार है।
उसकी लड़ाई की साझीदार है।
और आज तो वह सचमुच उसका दूसरा बैल बन गई थी।
दूर कहीं सूर्य अस्त हो रहा था।
उसकी लालिमा खेत पर बिखरी हुई थी।
ऐसा लगता था मानो धरती स्वयं उस स्त्री के घायल कंधों पर अपना हाथ रखकर कह रही हो—
"मैं तुम्हारा दर्द जानती हूँ। क्योंकि मेरे सीने पर हल चलाने वाले हाथ हमेशा सबसे अधिक घायल रहे हैं।"