Friday, June 12, 2026

मृत्यु भोज

माँ का श्राद्ध
(प्रेमचंद की शैली से प्रेरित एक कहानी)
बरसात अभी-अभी विदा हुई थी। गाँव के बाहर पीपल के पेड़ से टपकती बूंदें अब भी धरती पर गिर रही थीं। घरों के आँगन में नमी थी और हवा में एक अजीब-सी उदासी।
रामदीन के घर भी उदासी थी।
दस दिन पहले उसकी पत्नी कौशल्या मर गई थी।
पचपन वर्षों का साथ था। लड़ते-झगड़ते, हँसते-रोते, अभावों में जीवन काटते-काटते दोनों बूढ़े हो गए थे। कौशल्या चली गई, पर रामदीन को ऐसा लगता था जैसे घर का आधा हिस्सा उखड़ गया हो।
चार बेटे थे उसके।
रघुवीर, महेंद्र, सुरेश और सबसे छोटा शुभम।
चारों के लिए कौशल्या ने एक-सा कष्ट उठाया था। किसी को कम दूध नहीं पिलाया था, किसी के बुखार में कम रातें नहीं काटी थीं।
लेकिन माँ की चिता की राख ठंडी होते-होते बेटों के दिल ठंडे पड़ गए।
श्राद्ध की तैयारी चल रही थी।
गाँव के लोग सलाह दे रहे थे।
कोई कहता, "सौ आदमी खिलाना।"
कोई कहता, "नहीं, दो सौ से कम हुए तो लोग क्या कहेंगे?"
मृत्यु पर भी लोगों को सबसे अधिक चिंता इस बात की थी कि लोग क्या कहेंगे।
रामदीन चुप बैठा सुनता रहता।
जिस स्त्री ने जीवन भर दो वक़्त की रोटी जुटाने के लिए संघर्ष किया, उसकी आत्मा की शांति अब पचास किलो घी और सौ किलो आटे पर निर्भर कर गई थी।
उसे यह बात कभी समझ नहीं आई।
एक शाम चारों बेटे बैठकर खर्च का हिसाब कर रहे थे।
बात यहीं से बिगड़ी।
रघुवीर बोला, "हम दोनों बड़े भाई अलग श्राद्ध करेंगे।"
महेंद्र ने समर्थन किया।
"हाँ, हम अलग करेंगे।"
सुरेश चौंका।
"अलग क्यों?"
"हमारी इच्छा।"
सबसे छोटा शुभम अब तक चुप था।
उसने धीरे से कहा,
"माँ एक थी। श्राद्ध दो कैसे होंगे?"
रघुवीर का चेहरा तमतमा गया।
"हम जैसा चाहें करेंगे।"
"लेकिन गाँव क्या सोचेगा?"
"गाँव को सोचने दो।"
शुभम ने पिता की ओर देखा।
रामदीन सिर झुकाए बैठा था।
वह जानता था कि यह झगड़ा श्राद्ध का नहीं है।
यह वर्षों से जमा अहंकार का झगड़ा है।
माँ तो केवल बहाना है।
उस रात बहस बढ़ी।
पुराने हिसाब खुलने लगे।
किसने किसकी मदद की।
किसने नहीं की।
किसने ज्यादा खर्च किया।
किसने कम किया।
मृत माँ धीरे-धीरे गायब हो गई।
बचे केवल जीवित लोगों के अहंकार।
शुभम बार-बार एक ही बात कहता रहा—
"चार भाई हैं तो चारों साथ करेंगे।"
उसे लगता था कि यह केवल एक रस्म नहीं, माँ के प्रति अंतिम सम्मान है।
लेकिन कभी-कभी सबसे सरल बात ही सबसे कठिन हो जाती है।
रघुवीर की आवाज़ ऊँची होती गई।
महेंद्र भी उत्तेजित हो उठा।
सुरेश बीच-बचाव करता रहा।
और फिर वह क्षण आया जो किसी ने नहीं सोचा था।
रघुवीर भीतर गया।
लौटा तो हाथ में बंदूक थी।
गाँवों में बंदूकें अक्सर सुरक्षा से ज्यादा अहंकार की वस्तु होती हैं।
लोग समझे, डराने आया है।
शुभम फिर भी नहीं डरा।
वह बोला—
"भैया, माँ के नाम पर कम-से-कम..."
वाक्य पूरा नहीं हुआ।
धमाका हुआ।
सन्नाटा छा गया।
शुभम जमीन पर गिर पड़ा।
उसकी छाती से बहता रक्त मिट्टी में समाने लगा।
वह मिट्टी, जिसमें कभी उसकी माँ ने नंगे पैर चलकर उसे स्कूल पहुँचाया था।
कुछ ही क्षणों में सब समाप्त हो गया।
लोग भागे।
औरतें चीखीं।
बच्चे रोने लगे।
पर जो होना था, हो चुका था।
माँ के श्राद्ध की तैयारी के बीच बेटे की अर्थी तैयार होने लगी।
अगले दिन रामदीन आँगन में बैठा था।
एक ओर पत्नी की तस्वीर थी।
दूसरी ओर बेटे का शव।
गाँव भर के लोग आए।
सांत्वना देने।
सलाह देने।
अफसोस जताने।
कुछ लोग घटना की चर्चा कर रहे थे।
कुछ कानून की।
कुछ प्रतिष्ठा की।
लेकिन किसी के पास उस बूढ़े पिता के लिए शब्द नहीं थे।
वह चुप बैठा रहा।
बहुत देर बाद उसने तस्वीर की ओर देखा और बुदबुदाया—
"कौशल्या, देख रही हो न?"
बस इतना ही।
उसकी आँखों से आँसू भी नहीं निकले।
कुछ दुख इतने बड़े होते हैं कि आँसू भी उनका भार नहीं उठा पाते।
श्राद्ध हुआ।
भोज भी हुआ।
लोग खाकर चले गए।
किसी ने पूड़ी की तारीफ की।
किसी ने सब्जी की।
किसी ने कहा व्यवस्था अच्छी थी।
जैसे हर मृत्युभोज के बाद कहा जाता है।
लेकिन उस घर में दो मृत आत्माओं के नाम पर बना भोजन किसी को यह नहीं बता सका कि शांति आखिर होती क्या है।
यदि आत्माएँ सचमुच देखती होंगी, तो उस दिन कौशल्या ने अवश्य सोचा होगा—
"मैंने बेटों को रोटी बाँटना सिखाया था, वे मुझे ही बाँटने लगे।"
और शायद शुभम की आत्मा ने भी यही पूछा होगा—
"जिस प्रेम को बचाने के लिए मैं खड़ा था, क्या वह इतना कमजोर था कि एक गोली से मर गया?"
गाँव में जीवन फिर सामान्य हो गया।
लोग अपने-अपने कामों में लग गए।
पर रामदीन जब भी शाम को चौखट पर बैठता, उसे लगता—
उसकी पत्नी की मृत्यु केवल एक बार नहीं हुई।
वह उस दिन दूसरी बार भी मरी थी,
जब उसके बेटे उसकी स्मृति को अपने अहंकार से छोटा साबित करने पर उतारू हो गए थे।

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