शहर में उस दिन रमज़ान की शाम कुछ जल्दी उतर आई थी।
मस्जिद की मीनार से अज़ान की आवाज़ अभी पूरी तरह फैली भी न थी कि चौक की भीड़ को चीरती हुई एक ऐसी आवाज़ उठी, जिसने कुछ क्षणों के लिए आसमान को भी जैसे बहिरा कर दिया।
धुआँ उठा।
लोग भागे।
दुकानों के शटर गिरने लगे। किसी ने चीखकर कहा—“बम!”
किसी ने अपने बच्चे को छाती से चिपका लिया। किसी ने सड़क पर पड़े आदमी को उठाने की कोशिश की। किसी के हाथ में किसी का जूता था, किसी के हाथ में किसी की टोपी।
कुछ ही देर में चौक, जो थोड़ी देर पहले रोज़मर्रा की जिंदगी से भरा था, अस्पताल की ओर जाती एंबुलेंसों और रोते हुए लोगों से भर गया।
छह आदमी घर नहीं लौटे।
सौ से अधिक लोग अपने शरीर पर उस शाम की आग लेकर लौटे।
लेकिन सबसे बड़ी चोट शरीर पर नहीं लगी थी।
वह लोगों के विश्वास पर लगी थी।
दूसरे दिन अखबारों में खबरें थीं। तीसरे दिन बयान थे। चौथे दिन शक था। और पाँचवें दिन शक ने धर्म का रंग पहन लिया।
कुछ लड़कों को पकड़ लिया गया।
उनके घरों में पुलिस आई। माँओं ने दरवाजे पर खड़े होकर पूछा—“मेरा लड़का कहाँ ले जा रहे हो?”
जवाब मिला—“पूछताछ के लिए।”
पूछताछ कभी-कभी इतनी लंबी होती है कि आदमी की जवानी निकल जाती है।
एक बूढ़ा पिता थाने के बाहर बैठा रहता था। उसके हाथ में बेटे की तस्वीर थी।
हर आने-जाने वाले सिपाही से पूछता—
“साहब, एक बार उससे मिलने तो दीजिए।”
सिपाही कहता—
“जाँच चल रही है।”
बूढ़ा पूछता—
“कब तक चलेगी?”
सिपाही कंधे उचकाकर आगे बढ़ जाता।
जाँच का कोई चेहरा नहीं होता।
उसकी कोई उम्र नहीं होती।
उसकी कोई तारीख नहीं होती।
वह केवल चलती रहती है।
फिर एक दिन जाँच की दिशा बदल गई।
एक अधिकारी ने पुराने कागजों को फिर से देखा। किसी वाहन का नंबर सामने आया। किसी मशीन के पुर्जे का हिसाब निकाला गया। किसी मुलाकात का जिक्र मिला। कुछ नाम एक-दूसरे के पास आने लगे।
अब कहानी दूसरी तरफ मुड़ रही थी।
जिन्हें पहले शक की नजर से देखा गया था, वे निर्दोष होने की उम्मीद करने लगे। और जिन पर कभी किसी ने उंगली नहीं उठाई थी, उनके घरों के दरवाजों पर दस्तक होने लगी।
एक ईमानदार अधिकारी देर रात तक फाइलें पढ़ता।
उसकी मेज पर चाय ठंडी हो जाती।
कभी वह किसी कागज पर लाल पेंसिल से निशान लगाता, कभी किसी बयान को दोबारा पढ़ता।
उसका विश्वास था कि अपराध का कोई धर्म नहीं होता।
अपराधी का धर्म हो सकता है, नाम हो सकता है, वर्दी हो सकती है, पद हो सकता है—लेकिन अपराध का अपना कोई धर्म नहीं होता।
उसने अपने साथियों से कहा था—
“अगर हम अपराधी को उसके नाम से पहचानेंगे, तो एक दिन निर्दोष को भी उसके नाम से पहचानने लगेंगे।”
फाइल आगे बढ़ी।
कुछ बैठकों के विवरण सामने आए। कुछ संगठनों के नाम आए। हथियारों और विस्फोटकों की चर्चा सामने आई। एक बड़े उद्देश्य की बातें कहीं गई थीं। अभियोजन ने उन बातों को एक ऐसी विचारधारा से जोड़ा, जिसमें एक अलग राजनीतिक-सामाजिक व्यवस्था की कल्पना की गई थी।
लेकिन अदालत में कहानी अखबार से अलग होती है।
अखबार पूछता है—
“क्या हुआ?”
अदालत पूछती है—
“साबित क्या हुआ?”
इन दोनों प्रश्नों के बीच कभी-कभी सत्रह वर्ष का अंतर होता है।
फिर शहर ने उस अधिकारी को भी खो दिया।
एक दूसरी रात, दूसरे शहर में, दूसरे हमले के बीच वह अधिकारी अपने साथियों के साथ गोलियों का सामना करते हुए मारा गया।
लोगों ने कहा—
“वह आदमी चला गया, जो सच के पीछे जा रहा था।”
किसी ने कहा—
“अब यह केस कौन पूरा करेगा?”
किसी ने जवाब नहीं दिया।
क्योंकि किसी आदमी की मौत से केवल उसका परिवार अनाथ नहीं होता; कभी-कभी उसकी अधूरी जाँच भी अनाथ हो जाती है।
वर्ष बीतते गए।
सरकारें बदलीं।
अधिकारी बदले।
जाँच एजेंसियाँ बदलीं।
फाइलों के कवर पुराने होते गए।
मगर चौक पर मरे लोगों के घरों में कैलेंडर बदलने का कोई अर्थ नहीं था।
एक माँ हर साल उसी तारीख को अपने बेटे के कपड़े निकालकर बैठ जाती।
कपड़े वैसे ही थे।
बेटा नहीं था।
एक बच्ची, जो धमाके के समय अपने पिता की उँगली पकड़े हुए थी, अब जवान हो चुकी थी। उसे अपने पिता का चेहरा धुँधला याद था, लेकिन उनकी आवाज़ अब भी याद थी।
वह अपनी माँ से पूछती—
“अम्मी, अब्बा को किसने मारा था?”
माँ चुप रहती।
फिर धीरे से कहती—
“पता नहीं।”
बेटी फिर पूछती—
“इतने साल में भी नहीं पता?”
माँ के पास इस प्रश्न का उत्तर नहीं था।
क्योंकि अदालत में कुछ लोग आरोपी थे।
जाँच में कुछ लोग संदिग्ध थे।
बयानों में कुछ लोग दोषी बताए गए थे।
लेकिन कानून को अंततः प्रमाण चाहिए था।
और जब अदालत ने वर्षों बाद फैसला सुनाया, तो उसने कहा कि अभियोजन अपने आरोपों को उस स्तर तक सिद्ध नहीं कर सका जहाँ कानून किसी मनुष्य को अपराधी ठहरा सके।
कुछ लोग बाहर निकल आए।
कुछ चेहरे कैमरों के सामने थे।
कुछ हाथों में मिठाई थी।
और चौक पर मारे गए लोगों के घरों में वही पुराना सन्नाटा।
एक पिता ने अखबार मोड़ा और कहा—
“तो फिर मेरा बेटा किसने मारा?”
उस कमरे में बैठे लोगों के पास कोई उत्तर नहीं था।
कानून ने कहा था—
“अपराध सिद्ध नहीं हुआ।”
लेकिन एक पिता का प्रश्न इससे बड़ा था—
“अपराध हुआ था या नहीं?”
और उससे भी बड़ा प्रश्न था—
“अगर हुआ था, तो किसने किया?”
इन दोनों प्रश्नों के बीच न्याय की पूरी कहानी पड़ी थी।
कुछ लोगों ने कहा—जाँच शुरू से गलत थी।
कुछ ने कहा—सबूत ठीक से जुटाए नहीं गए।
कुछ ने कहा—बाद की जाँच ने पहले की जाँच को कमजोर कर दिया।
कुछ ने कहा—यह सब संस्थागत भूल थी।
कुछ ने इससे भी आगे जाकर अधिकारियों पर जानबूझकर सबूत कमजोर करने के आरोप लगाए।
लेकिन आरोप और प्रमाण के बीच भी वही खाई थी, जो उस शाम धुएँ और आसमान के बीच बन गई थी।
फिर एक दिन खबर आई कि जिस अधिकारी पर इतने वर्षों तक मुकदमा चला, उसे सेना में अगली पदोन्नति मिली है।
एक मंत्री ने उसकी तस्वीर साझा की और बधाई दी।
साथ में एक वाक्य लिखा गया—
“सरकार देशभक्तों के साथ खड़ी है।”
शहर में फिर बहस शुरू हो गई।
किसी ने कहा—
“यह उसका अधिकार है।”
किसी ने कहा—
“अदालत ने उसे बरी किया है।”
किसी ने कहा—
“फिर सवाल क्यों?”
लेकिन चौक के उस बूढ़े पिता ने केवल इतना कहा—
“मुझे उसकी पदोन्नति से क्या?”
लोग चुप हो गए।
वह बोला—
“मुझे तो बस यह बता दो कि मेरा बेटा क्यों मरा।”
उसकी आवाज़ में क्रोध नहीं था।
क्रोध तो बहुत पहले जलकर राख हो चुका था।
अब केवल थकान थी।
वह थकान जो किसी ऐसे आदमी के भीतर पैदा होती है जिसने वर्षों तक दरवाजे पर दस्तक दी हो और हर बार भीतर से यही आवाज़ आई हो—
“जाँच चल रही है।”
उसने धीरे से अखबार मेज पर रख दिया।
“अगर वे निर्दोष हैं,” उसने कहा, “तो उन्हें निर्दोष कहने में मुझे कोई दुख नहीं। निर्दोष को सजा मिले, इससे बड़ा अन्याय क्या होगा?”
वह कुछ क्षण रुका।
“लेकिन अगर कोई दोषी है, तो उसे केवल इसलिए मत छोड़ देना कि हमारी जाँच कमजोर थी।”
कमरे में फिर सन्नाटा था।
“मुझे बदला नहीं चाहिए,” उसने कहा, “मुझे सच चाहिए।”
बाहर शाम उतर रही थी।
शहर अपने काम में लौट चुका था।
चौक पर फिर दुकानें खुलती थीं। बच्चे खेलते थे। मोटरसाइकिलें गुजरती थीं। चाय की दुकान पर लोग राजनीति पर बहस करते थे।
लेकिन उस शहर के इतिहास में एक जगह ऐसी थी जहाँ समय अब भी रुका हुआ था।
वहाँ छह लोगों की अनुपस्थिति हर शाम दिखाई देती थी।
वहाँ सौ से अधिक घाव अब भी शरीर से अधिक स्मृति में थे।
और वहाँ एक सवाल हवा में लटका हुआ था—
न्याय केवल निर्दोष को बचा लेने का नाम है, या उस मृतक तक सच पहुँचाने का भी, जो अब अपनी ओर से कोई गवाही नहीं दे सकता?
शायद किसी दिन किसी पुरानी फाइल से कोई कागज निकले।
शायद किसी भूले हुए गवाह को कुछ याद आए।
शायद किसी जांच की गलती सामने आए।
शायद कुछ भी न मिले।
लेकिन तब तक उन घरों में एक बात जीवित रहेगी—
मरे हुए लोग अदालत में गवाही नहीं देते।
उनकी जगह उनका सच गवाही देता है।
और अगर सच भी खो जाए,
तो न्याय की इमारत खड़ी तो रह सकती है,
लेकिन उसकी नींव के नीचे
किसी माँ की आवाज़ दब जाती है—
“मेरा बेटा किसने मारा था?”
मस्जिद की मीनार से अज़ान की आवाज़ अभी पूरी तरह फैली भी न थी कि चौक की भीड़ को चीरती हुई एक ऐसी आवाज़ उठी, जिसने कुछ क्षणों के लिए आसमान को भी जैसे बहिरा कर दिया।
धुआँ उठा।
लोग भागे।
दुकानों के शटर गिरने लगे। किसी ने चीखकर कहा—“बम!”
किसी ने अपने बच्चे को छाती से चिपका लिया। किसी ने सड़क पर पड़े आदमी को उठाने की कोशिश की। किसी के हाथ में किसी का जूता था, किसी के हाथ में किसी की टोपी।
कुछ ही देर में चौक, जो थोड़ी देर पहले रोज़मर्रा की जिंदगी से भरा था, अस्पताल की ओर जाती एंबुलेंसों और रोते हुए लोगों से भर गया।
छह आदमी घर नहीं लौटे।
सौ से अधिक लोग अपने शरीर पर उस शाम की आग लेकर लौटे।
लेकिन सबसे बड़ी चोट शरीर पर नहीं लगी थी।
वह लोगों के विश्वास पर लगी थी।
दूसरे दिन अखबारों में खबरें थीं। तीसरे दिन बयान थे। चौथे दिन शक था। और पाँचवें दिन शक ने धर्म का रंग पहन लिया।
कुछ लड़कों को पकड़ लिया गया।
उनके घरों में पुलिस आई। माँओं ने दरवाजे पर खड़े होकर पूछा—“मेरा लड़का कहाँ ले जा रहे हो?”
जवाब मिला—“पूछताछ के लिए।”
पूछताछ कभी-कभी इतनी लंबी होती है कि आदमी की जवानी निकल जाती है।
एक बूढ़ा पिता थाने के बाहर बैठा रहता था। उसके हाथ में बेटे की तस्वीर थी।
हर आने-जाने वाले सिपाही से पूछता—
“साहब, एक बार उससे मिलने तो दीजिए।”
सिपाही कहता—
“जाँच चल रही है।”
बूढ़ा पूछता—
“कब तक चलेगी?”
सिपाही कंधे उचकाकर आगे बढ़ जाता।
जाँच का कोई चेहरा नहीं होता।
उसकी कोई उम्र नहीं होती।
उसकी कोई तारीख नहीं होती।
वह केवल चलती रहती है।
फिर एक दिन जाँच की दिशा बदल गई।
एक अधिकारी ने पुराने कागजों को फिर से देखा। किसी वाहन का नंबर सामने आया। किसी मशीन के पुर्जे का हिसाब निकाला गया। किसी मुलाकात का जिक्र मिला। कुछ नाम एक-दूसरे के पास आने लगे।
अब कहानी दूसरी तरफ मुड़ रही थी।
जिन्हें पहले शक की नजर से देखा गया था, वे निर्दोष होने की उम्मीद करने लगे। और जिन पर कभी किसी ने उंगली नहीं उठाई थी, उनके घरों के दरवाजों पर दस्तक होने लगी।
एक ईमानदार अधिकारी देर रात तक फाइलें पढ़ता।
उसकी मेज पर चाय ठंडी हो जाती।
कभी वह किसी कागज पर लाल पेंसिल से निशान लगाता, कभी किसी बयान को दोबारा पढ़ता।
उसका विश्वास था कि अपराध का कोई धर्म नहीं होता।
अपराधी का धर्म हो सकता है, नाम हो सकता है, वर्दी हो सकती है, पद हो सकता है—लेकिन अपराध का अपना कोई धर्म नहीं होता।
उसने अपने साथियों से कहा था—
“अगर हम अपराधी को उसके नाम से पहचानेंगे, तो एक दिन निर्दोष को भी उसके नाम से पहचानने लगेंगे।”
फाइल आगे बढ़ी।
कुछ बैठकों के विवरण सामने आए। कुछ संगठनों के नाम आए। हथियारों और विस्फोटकों की चर्चा सामने आई। एक बड़े उद्देश्य की बातें कहीं गई थीं। अभियोजन ने उन बातों को एक ऐसी विचारधारा से जोड़ा, जिसमें एक अलग राजनीतिक-सामाजिक व्यवस्था की कल्पना की गई थी।
लेकिन अदालत में कहानी अखबार से अलग होती है।
अखबार पूछता है—
“क्या हुआ?”
अदालत पूछती है—
“साबित क्या हुआ?”
इन दोनों प्रश्नों के बीच कभी-कभी सत्रह वर्ष का अंतर होता है।
फिर शहर ने उस अधिकारी को भी खो दिया।
एक दूसरी रात, दूसरे शहर में, दूसरे हमले के बीच वह अधिकारी अपने साथियों के साथ गोलियों का सामना करते हुए मारा गया।
लोगों ने कहा—
“वह आदमी चला गया, जो सच के पीछे जा रहा था।”
किसी ने कहा—
“अब यह केस कौन पूरा करेगा?”
किसी ने जवाब नहीं दिया।
क्योंकि किसी आदमी की मौत से केवल उसका परिवार अनाथ नहीं होता; कभी-कभी उसकी अधूरी जाँच भी अनाथ हो जाती है।
वर्ष बीतते गए।
सरकारें बदलीं।
अधिकारी बदले।
जाँच एजेंसियाँ बदलीं।
फाइलों के कवर पुराने होते गए।
मगर चौक पर मरे लोगों के घरों में कैलेंडर बदलने का कोई अर्थ नहीं था।
एक माँ हर साल उसी तारीख को अपने बेटे के कपड़े निकालकर बैठ जाती।
कपड़े वैसे ही थे।
बेटा नहीं था।
एक बच्ची, जो धमाके के समय अपने पिता की उँगली पकड़े हुए थी, अब जवान हो चुकी थी। उसे अपने पिता का चेहरा धुँधला याद था, लेकिन उनकी आवाज़ अब भी याद थी।
वह अपनी माँ से पूछती—
“अम्मी, अब्बा को किसने मारा था?”
माँ चुप रहती।
फिर धीरे से कहती—
“पता नहीं।”
बेटी फिर पूछती—
“इतने साल में भी नहीं पता?”
माँ के पास इस प्रश्न का उत्तर नहीं था।
क्योंकि अदालत में कुछ लोग आरोपी थे।
जाँच में कुछ लोग संदिग्ध थे।
बयानों में कुछ लोग दोषी बताए गए थे।
लेकिन कानून को अंततः प्रमाण चाहिए था।
और जब अदालत ने वर्षों बाद फैसला सुनाया, तो उसने कहा कि अभियोजन अपने आरोपों को उस स्तर तक सिद्ध नहीं कर सका जहाँ कानून किसी मनुष्य को अपराधी ठहरा सके।
कुछ लोग बाहर निकल आए।
कुछ चेहरे कैमरों के सामने थे।
कुछ हाथों में मिठाई थी।
और चौक पर मारे गए लोगों के घरों में वही पुराना सन्नाटा।
एक पिता ने अखबार मोड़ा और कहा—
“तो फिर मेरा बेटा किसने मारा?”
उस कमरे में बैठे लोगों के पास कोई उत्तर नहीं था।
कानून ने कहा था—
“अपराध सिद्ध नहीं हुआ।”
लेकिन एक पिता का प्रश्न इससे बड़ा था—
“अपराध हुआ था या नहीं?”
और उससे भी बड़ा प्रश्न था—
“अगर हुआ था, तो किसने किया?”
इन दोनों प्रश्नों के बीच न्याय की पूरी कहानी पड़ी थी।
कुछ लोगों ने कहा—जाँच शुरू से गलत थी।
कुछ ने कहा—सबूत ठीक से जुटाए नहीं गए।
कुछ ने कहा—बाद की जाँच ने पहले की जाँच को कमजोर कर दिया।
कुछ ने कहा—यह सब संस्थागत भूल थी।
कुछ ने इससे भी आगे जाकर अधिकारियों पर जानबूझकर सबूत कमजोर करने के आरोप लगाए।
लेकिन आरोप और प्रमाण के बीच भी वही खाई थी, जो उस शाम धुएँ और आसमान के बीच बन गई थी।
फिर एक दिन खबर आई कि जिस अधिकारी पर इतने वर्षों तक मुकदमा चला, उसे सेना में अगली पदोन्नति मिली है।
एक मंत्री ने उसकी तस्वीर साझा की और बधाई दी।
साथ में एक वाक्य लिखा गया—
“सरकार देशभक्तों के साथ खड़ी है।”
शहर में फिर बहस शुरू हो गई।
किसी ने कहा—
“यह उसका अधिकार है।”
किसी ने कहा—
“अदालत ने उसे बरी किया है।”
किसी ने कहा—
“फिर सवाल क्यों?”
लेकिन चौक के उस बूढ़े पिता ने केवल इतना कहा—
“मुझे उसकी पदोन्नति से क्या?”
लोग चुप हो गए।
वह बोला—
“मुझे तो बस यह बता दो कि मेरा बेटा क्यों मरा।”
उसकी आवाज़ में क्रोध नहीं था।
क्रोध तो बहुत पहले जलकर राख हो चुका था।
अब केवल थकान थी।
वह थकान जो किसी ऐसे आदमी के भीतर पैदा होती है जिसने वर्षों तक दरवाजे पर दस्तक दी हो और हर बार भीतर से यही आवाज़ आई हो—
“जाँच चल रही है।”
उसने धीरे से अखबार मेज पर रख दिया।
“अगर वे निर्दोष हैं,” उसने कहा, “तो उन्हें निर्दोष कहने में मुझे कोई दुख नहीं। निर्दोष को सजा मिले, इससे बड़ा अन्याय क्या होगा?”
वह कुछ क्षण रुका।
“लेकिन अगर कोई दोषी है, तो उसे केवल इसलिए मत छोड़ देना कि हमारी जाँच कमजोर थी।”
कमरे में फिर सन्नाटा था।
“मुझे बदला नहीं चाहिए,” उसने कहा, “मुझे सच चाहिए।”
बाहर शाम उतर रही थी।
शहर अपने काम में लौट चुका था।
चौक पर फिर दुकानें खुलती थीं। बच्चे खेलते थे। मोटरसाइकिलें गुजरती थीं। चाय की दुकान पर लोग राजनीति पर बहस करते थे।
लेकिन उस शहर के इतिहास में एक जगह ऐसी थी जहाँ समय अब भी रुका हुआ था।
वहाँ छह लोगों की अनुपस्थिति हर शाम दिखाई देती थी।
वहाँ सौ से अधिक घाव अब भी शरीर से अधिक स्मृति में थे।
और वहाँ एक सवाल हवा में लटका हुआ था—
न्याय केवल निर्दोष को बचा लेने का नाम है, या उस मृतक तक सच पहुँचाने का भी, जो अब अपनी ओर से कोई गवाही नहीं दे सकता?
शायद किसी दिन किसी पुरानी फाइल से कोई कागज निकले।
शायद किसी भूले हुए गवाह को कुछ याद आए।
शायद किसी जांच की गलती सामने आए।
शायद कुछ भी न मिले।
लेकिन तब तक उन घरों में एक बात जीवित रहेगी—
मरे हुए लोग अदालत में गवाही नहीं देते।
उनकी जगह उनका सच गवाही देता है।
और अगर सच भी खो जाए,
तो न्याय की इमारत खड़ी तो रह सकती है,
लेकिन उसकी नींव के नीचे
किसी माँ की आवाज़ दब जाती है—
“मेरा बेटा किसने मारा था?”
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